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Thursday, October 7, 2010

सकारात्मक चिलगोजई ऑफ फारेन बाबू .........सतीश पंचम

     आज ही एक खबर पढ़ा कि कॉमनवेल्थ के दौरान गेम्स विलेज के टॉयलेट कॉन्डम के इस्तेमाल के कारण ब्लॉक हो रहे हैं....चोक हुए जा रहे हैं। खबर है कि अक्षरधाम के पास बने खेलगांव में खिलाड़ी बड़ी तादाद में कॉन्डम का इस्तेमाल कर रहे हैं।


     मजे की बात तो यह रही कि राष्ट्रमंडल खेल महासंघ के प्रमुख माइक फेनेल ने इस पर कहा कि खिलाड़ी सुरक्षित सेक्स को बढावा दे रहे हैं। 'यदि टॉयलेट चोक अप होने जैसी घटनाएं हो रही हैं तो इससे साबित होता है कि कॉन्डम का इस्तेमाल हो रहा है और यह सकारात्मक बात है।'

    हम्म....यानि कि फेनेल महाशय के पास जरूर कोई दिव्य दृष्टि प्राप्त है, जरूर कोई कुकुरही नाक है जो वो चिलगोंजई वाली बातों में भी सकारात्मक बातें सूंघ लेते हैं।

     वैसे हम लोगों को तो पता ही नहीं था कि टॉयलेट का चोक हो जाना भी एक किस्म की सकारात्मक बात है। वरना अब तक तो जहां पूरा देश नकारात्मक बातों से ही हलकान था ऐसे माहौल में टायलेटों के ब्लॉक होने सरीखी कुछ सकारात्मक बातों से हम भी खुश हो लेते कि यार फिकर काहे करते हो....संजय नगर के सार्वजनिक शौचालय में सकारात्मक बात हो रही है...... सरोजिनी नगर.....हापुड़ गंज....गुड़हल गंज.....मीर गंज....हर जगह सकारात्मक बात ही बात है।

     उधर जीडीपी नीचे जा रही है.....फिकर नहीं.....गेहूं सड़ रहा है....फिकर नहीं......महंगाई बढ़ रही है.....फिकर नहीं.....क्योंकि हमारे पास सकारात्मक बातों के लिए पूरा का पूरा चोक अप तंत्र है यार। प्रधानमंत्री जी कैबिनेट मिटिंग में जब देश की नकारात्मक खबरों पर चिंता जताएंगे तो तुरंत हमारे टॉयलेट मंत्री जी अपनी रिपोर्ट कार्ड पेश कर देंगे और देखते ही देखते प्रधानमंत्री जी की नकारत्मकता आधारित चिंता, सकारात्मक बातों में बदल जाएगी।

     मुझे लगता है फेनेल महाशय को भारत के किसी झुग्गी इलाके में ले जाकर ऐसे समय वहां छोड़ देना चाहिए जब कि उन्हें जोर की लगी हो और उसी समय माइक लिए पत्रकारों को पूछना चाहिए कि बताइये फेनेल महाशय....कैसा लग रहा है....कोई सकारात्मक बात दिखी। तब शायद फेनेल महाशय का जवाब हो कि - आज मुझे समझ आ गया कि भारत की सत्तर प्रतिशत जनता खुले में शौच क्यों जाती है। लगता है आप लोगों के यहां सकारात्मकता का माहौल कुछ ज्यादा ही है :)


- सतीश पंचम

9 comments:

ज़ाकिर अली ‘रजनीश’ said...

गजब की सकारात्मकता।

गिरिजेश राव said...

चिलगोजई का यह प्रकार भी दिखा ;) आभार।
कंडोम लिखिए न, कॉंन्डम से 'कन्डम' होने का डर रहता है।
@ फेनेल महाशय के पास जरूर कोई दिव्य दृष्टि प्राप्त है, जरूर कोई कुकुरही नाक है जो वो चिलगोंजई वाली बातों में भी सकारात्मक बातें सूंघ लेते हैं।

उधर जीडीपी नीचे जा रही है.....फिकर नहीं.....गेहूं सड़ रहा है....फिकर नहीं......महंगाई बढ़ रही है.....फिकर नहीं.....क्योंकि हमारे पास सकारात्मक बातों के लिए पूरा का पूरा चोक अप तंत्र है यार।

बहुत सुन्दर (अच्छा और बढ़िया से अभी तक दहशत है ;)।) बिन्दुओं की संख्या का क्रम देख रहा हूँ - 5,5,4,6,5,5। कोई राज की बात छिपी है क्या इस क्रम में?

अब हम भी गन्धाती सड़कों के किनारे पाए जाने वाले भाँति भाँति के आदमचोतों में सकारात्मकता के रंग ढूँढ़ेंगे। पीपली लाइव वाले उस रिपोर्टर का नाम क्या था जो गुह के रंगविश्लेषण में दक्ष था?

Mahak said...

अनोखी सकारात्मकता

मो सम कौन ? said...

सकारात्मकता का नया पैमाना, क्या खूब!!

@ गिरिजेश जी:
अब बिन्दु ...., अच्छा लगा आपको फ़ार्म में देखकर।

VICHAAR SHOONYA said...

ये विदेशी भी ना.... कुछ नहीं जानते की इस्तेमाल किये हुए कंडोम को कैसे सुरक्षित रूप से ठिकाने लगाया जाता है...... दिल्ली का ठेठ गुजारी इस्टाइल तो कहता है प्रयोग करो, गीठ मारो और छत पर जाकर बिलकुल हैमर थ्रो की तरह हाथ गोल घुमाकर हवा में उछाल दो. बस सुबह पता चलता है कि रात में किसके घर कि किस्मत खुली.

sanjay said...

in videshi bigre bachhon ko ye pata
nahi ke plastic/rubber ki chees ko
is tarah nahi phenkte.....chok-up
to hoga hi.....lekin koi baat nahi...
agar isme 'sakaratmkta'khodi ja rahi
ho to......

pranm.

डा० अमर कुमार said...


मेरा स्टिंग ऑपरेशन चल रहा है,
तीन दिनों में 8,000 कॅन्डोम..
बोलिये, बेचारे जायें तो जायें कहाँ,
मज़ा किये जाने के बाद फेंक दिये गये !
कलमाड़ी को मौज़-विलास की ऎसी स्मारिकाओं को
सँग्रहित करने के लिये कन्डम कॅन्डोम बिन्स की व्यवस्था
करनी चाहिये थी । इनको रिसाइकिल करने से पहले स्पर्म-बैंकों के
हवाले किये जा सकते थे, जिससे देश को तकरीबन 60 हज़ार विदेशी मुद्रा का
लाभ मिलता । यह सारा आयोजन विदेशी मुद्रा-कोष बढ़ाने के लिये ही तो किया गया है ।
हुँह, चिलगोज़ों द्वारा आयोजित ऎसे प्रत्यक्ष चिलगोजई को आप देख ही नहीं रहें है, पँचम भाई ।

माँग-आपूर्ति के लिये आस्ट्रेलिया से कॅन्डोम आयायित करने की सोची जा रही है, कुछ ख़बर भी है, आपको ?


प्रवीण पाण्डेय said...

हर विषय में सकारात्मकता, हद है उसकी भी।

DEEPAK BABA said...

ल्यो जी, फेनाले साहेब के कंडोम की बात करते करते गिरिजेश जी, बिंदु गिनने लगे... ५, ५, ४, ६, ५, ५. क्या बात है.
अभी कुछ मित्र बैठ कर इसी टोपिक पर चर्चा कर रहे हैं - की इत्ते कोंडोम इस्तेमाल कहाँ किये होंगे.......... मेरे ख्याल से दिल्ली सरकार नें आजकल आँख बंद कर रखी हैं.

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