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Saturday, October 2, 2010

पीपली लाइव के एक दृश्य से मेल खाता ताजा अदालती फैसला .........मुलैमा टेर.......वामपंथी मुंडे़र.......भजपइया कजरी.........सतीश पंचम

    
अपनी ढपली - अपना राग
   पीपली लाइव का एक दृश्य है जिसमें नत्था द्वारा  आत्महत्या कर लेने की धमकी के बाद सरकारी अधिकारी उसे फुसलाने के लिए एक लालबहादुर देता है…..लालबहादुर यानि कि  हैंडपंप। साथ ही हैंडपंप देते हुए नत्था को ताकीद करता है कि अब तुम आत्महत्या नहीं कर सकते क्योंकि तुम्हें लालबहादुर दिया गया है।  

      नत्था अवाक्…क्या कहे। पूछने पर कि हैंडपंप तो दे दिया…. अब उसे गाड़ने का खर्चा भी दो तो सरकारी अधिकारी कहता है – अरे कहां तो तू मरने वाला था…..शास्त्री जी ने तुझे बचा लिया…. खर्चे की बात करता है ?

     ठीक वही पीपली लाइव जैसे हालात रामजन्मभूमि के बारे में आए अदालती फैसले के बाद से है। अदालत ने जनता को अपना फैसला तो सुना दिया है लेकिन अब जनता को कहीं से लग रहा है कि यह तो न्याय नहीं हुआ बल्कि एक लालबहादुर पकड़ा कर फुसलाना  हुआ। उधर अदालत शायद मन ही मन कह रही हो…….अरे कहां तो तुम लोग मरने-मारने वाले थे। इस जजमेंट ने तुम्हें बचा लिया।  सुप्रीम कोर्ट भी तो है...जो कमी बेसी हो वहां निपटा लेना। न्याय की बात करते हो ?
 
     लेकिन अदालत का फैसला जो आया सो आया….इसको लेकर राजनेताओं की प्रतिक्रियाएं बड़ी दिलचस्प रहीं। वामपंथी अपनी बात को अदालती नु्क्ताचीनी के जरिए प्वाईंट दर प्वाइंट बता रहे है कि किस क्लॉज से क्या मतलब निकलता है…..किस पैराग्राफ से क्या कहना चाहती है अदालत। कहां मुसलमानों के हित वाली लाइनें हैं और कौन सा फुल स्टॉप हिंदुओं तक जाकर लग रहा है। यह सब बौद्धिक कवायद ज्यादातर वामपंथीयों के खेमें में हो रही है।
 
     उनकी कवायद देखकर ‘काशी का अस्सी’ में वर्णित डॉ. गया सिंह की याद आती है जिनके बारे में ख्यात था कि वह बेहद विद्वान और बौद्धिक किस्म के इंसान हैं, बैहद तीक्ष्ण बुद्धि वाले। इनकी बौद्धिकता के आतंक का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि लोग कहते हैं जब कभी डॉ. गया सिंह नौकरी के लिए दिए साक्षात्कार में छंटे हैं तो अपने बौद्धिक आतंक के कारण। अपनी मूर्खताओं से छंट जाने वाले और लोग होंगे।
 
    भारतीय राजनीति में मुझे वामपंथी ठीक उन्हीं डॉ. गया सिंह की तरह के बौद्धिक प्रतीत होते हैं जो कि भारतीय लोकतंत्र में बेचारे छंट जा रहे है केवल अपनी बौद्धिक आतंक के कारण।
  
      खैर, अदालती फैसले की बेहद तीव्र प्रतिक्रिया हुई है भारतीय राजनीति के मौलाना श्री मुलायम सिंह यादव पर। अचानक ही अदालती फैसला उन्हें नागवार और मुसलमानों के हित के विरूद्ध लगने लगा और तुरंत ही चिल्लाने लगे- ये ठीक नहीं है…..सही नहीं हुआ है। उनका चिल्लाना सुनकर यूं लगा मानों कह रहे हों…..उठो सुबह हो गई…….सुबह हो गई।

     आवाज सुनकर आसपास के लोग जो सोए थे जग गये और घड़ी की ओर देखते बोले – ए महाराज, अभी आधी रात को ही मत चिल्लाओ….. अभी सुप्रीम  कोर्ट बाकी है  भैं…भैं चिल्ला रहे हो।  सो जाओ चुप मार के।

सोओ यार।

    वहीं एक अलग किस्म की प्रतिक्रिया मायावती जी पर हुई है। अदालती फैसले से पहले और बाद तक इनकी प्रतिक्रियाएं चालू ही रहीं। वह कह रहीं थीं कि हमने सुरक्षा बल और ज्यादा संख्या में मांगे थे लेकिन मिले बहुत कम।  अगर कहीं कोई गलत सलत बात हुई तो पूरी जिम्मेदारी केनदर सरकार पर होगी।
 
       वहीं अगले ही पल जब अदालत ने जमीन के बारे में फैसला सुना दिया तो कह रहीं हैं कि अब अदालत ने जबकि फैसला दे दिया है तो अयोध्या की केन्द्र द्वारा अधिग्रहीत जमीन पर जो केन्द्रीय बल लगा है उसे वह नियंत्रित करे और उसे लागू करे……..उस जमीन की जिम्मेदारी केनदर सरकार की है न कि हमारी।

      उनकी प्रतिक्रिया देखते हुए ऐसा लग रहा है मानों कि मायावती जी के घर के आंगन में केन्द्र की कोई  पेड़ की टहनी आ गई है। मायावती जी जब चाहती हैं अपने घर के आंगन में आए उस केन्द्रीय पेड़ वाली टहनी की छाया में सुस्ता लेती हैं….छहां लेती हैं और साथ ही साथ पेड़ के मालिक केन्द्र सरकार को ताकीद भी करते जाती हैं कि देखो डाल पतली है…… उसे और छायादार और फलदार बनाओ नहीं तो  कल को आँधी पानी आने पर अगर तुम्हारी टहनी टूट गई तो सारी जिम्मेदारी तुम्हारी। तब मुझे जिम्मेदार न ठहराना। बात बता दूं साफ।
 
      इसके अलावा एक और किस्म की प्रतिक्रिया देखने को मिली भाजपाइयों पर। फैसला आते ही उनके चेहरे खिल गए। हर कोई एक दूसरे को जीत की बधाई दे रहा था मानों कहना चाह रहा हो – देखो, मैं न कहता था कि जीत हमारी ही होगी…..देख लो…..खुदैं अपनी आँख से देख लो।

कुछ के चेहरे तो ऐसे चहक रहे थे....मन ही मन ऐसे फुदक रहे थे  मानों अंदर ही अंदर.....  मदर इंडिया का गीत चल रहा हो  -

  दुख भरे दिन बीते रे भइया….अब सुख आयो रे......रंग जीवन में नया लायो रे ..

       और कांग्रेस……..उसे तो पहले सूझा ही नहीं कि वह क्या प्रतिक्रिया दे। हिंदुओं की जीत को दर्शाता फैसला  आ जाने से सारा माहौल हिंदूमय था ........ऐसे में हमेशा से मुसलमानों के पक्ष में रहने वाली काँग्रेस…….मुसलमानों को वोट बैंक की तरह इस्तेमाल करते रहने वाली कांग्रेस के मुँह से बोल नहीं फूट रहा था।
   मुसलमान नेता हैरान..... कि यार काग्रेस क्यों नहीं कुछ बोल रही है। प्रतिक्रिया क्यों नहीं दे रही....कहां हैं राहुल...कहां हैं सोनिया......?

 शायद ऐसे ही किसी परिस्थिति के लिए वह नज़्म लिखी गई थी कि –

वो जो मिलते  थे  हमसे कभी  दीवानों  की  तरह,
आज मिलते हैं ऐसे - जैसे पहचान न थी  कभी।

       थोड़ी बहुत शुरूवाती हिचक और सोच-सोचौवल के बाद गुणीजन श्री चिदम्बरम महाराज के बोल सुनाई पड़े कि अभी सुप्रीम कोर्ट का फैसला आना बाकी है।  चिंतित न हों। प्रधानमंत्री जी के मुखारविंद से भी कुछ इसी तरह के मिलते जुलते बोल सुनाई पड़े।
 
   ले देकर यह 'ग्रेट इंडियन पॉलिटीकल ड्रामा' किसी तरह सम पर आया। अब देखिए आगे आगे क्या होता है।

   अरे, वो कौन बोल रहा है माइक लेकर- ओह…..तो  ओबम्मा चच्चा जी हैं……वह भी प्रतिक्रिया देना चाहते हैं….दो भई….दो………जिसके जो मन में आए दो…..अपन चले…..इतना फालतू का टाइम नहीं है कि तुम्हारी प्रतिक्रियाओं पर जां निसार करें ओबामा चच्चा  :)

- सतीश पंचम

स्थान – वही, जहां पर लेटे-लेटे अपनी दुपहरीया की नींद खराब कर यह पोस्ट लिख रहा हूं।

समय – वही, जब पोस्ट पब्लिश करने जाउं और श्रीमती जी कहें – अजी, सुनते हो……. ओबामा जी का कहि रहे हैं ? तनिक सुनिए तो !! 

17 comments:

बंटी चोर said...

रामजन्मभूमि के बारे में - एक लालबहादुर पकड़ा कर फुसला दिया है।..
काम कि चीज है जरुर पढ़े .... और हाँ एक टिपण्णी अवश्य कर दे ...
http://chorikablog.blogspot.com/2010/10/blog-post_9549.html

गिरिजेश राव said...

कहाँ करूँ?
अरे वही - टिप्पणी।
आप लोग तय कर लो आपस में कि असली कौन है?

प्रवीण पाण्डेय said...

लोग रहें, अन्दाज रहें,
सधे रहें और बाज रहें,
आग निकलती रहे स्वरों में,
जलते दुखी समाज रहें।

ajit gupta said...

बढिया विश्‍लेषण है।

prkant said...

जस्टिस खान ने ठीक ही लिखा है अपने निर्णय में कि यह बारूदी सुरंगों से भरा क्षेत्र है जिसमें घुसने पर चीथड़े उड़ना तय है . उन लोगों ने फिर भी एक कोशिश तो की .दूर से तमाशा देखनेवालों को लाल बहादुर लगे तो लगता रहे.

सतीश पंचम said...

महाशय बंटी-फंटी आप जो भी हैं....ये जो किसी भी पोस्ट के पब्लिश होने के चंद मिनटों में उसे आप रिपब्लिश करने का टाइम पास खेल खेल रहे हैं न....तो इतना बता दूं कि यह टाइम पास कोई राकेट सांइंस नहीं है कि जिस पोस्ट को पब्लिश होते मिनट नहीं होता और आप अपने ब्लॉग पर रिपब्लिश कर देते हो।

सीधा सा फंडा है आपका कि किसी भी ब्लॉग के सबस्क्राईबर बन जाओ...either via Buzz or by mail....or whatever....जैसे ही कोई मनचाही पोस्ट पब्लिश होकर आपके मेल बक्से में पहुंचे तुरंत उसे ब्लॉगर प्लेटफार्म के पब्लिश बाय मेल ऑप्शन के जरिए एक खास आई डी पर फारवर्ड कर दो........सिम्पल। बीच में आपको थोड़ा शीर्षक बदलने में जो समय जाय....बस वही देरी समझो...वरना इस पोस्ट पब्लिश बाय मेल ऑप्शन ऐसा ऑप्शन है कि इसके जरिए कई अकाउंट से एक साथ कई ब्लॉगों पर पोस्ट पब्लिश की जा सकती है। बस वो मेल आई डी बनाने में जो वक्त लगे।


तो भई इसमें इतनी सनसनी और हा हा हू हू करने की क्या जरूरत।

पोस्ट पब्लिश करते ही एक कमेंट करते हुए चले जाना कि मैने आपका पोस्ट चुरा लिया है... हे...हे....हो ...हो..... तो ये अगर आप का टाइम पास का तरीका ही है तो भाई और भी तरीके हैं टाइम पास करने के।

बेमतलब चिलगोजई करने की क्या जरूरत?

अगर कोई पोस्ट पसंद आती है और चाहते हो कि
सर्च इंजिन में ऑप्टिमाइज हो जाय(तुम्हारे लिये ही इशारा है महाशय) ....तो तुम भी अपनी कोई चर्चा सजा लो भई अगर इतनी ही फुर्सत है तो ।

बेकार का टाइम पास करते फिर रहे हो और दूसरो का भी समय नष्ट कर रहे हो।

Arvind Mishra said...

पूरे मुआमले पर एक समग्र तफ्सरा (या तप्सरा -सही शब्द क्या है )
कांग्रेस तो सुप्रीम कोर्ट का लेमन्चूस दिखा रही है -इतने जनखे हैं सब हद है !

अनूप शुक्ल said...

अब कुछ दिन तक उन लोगों के दिन अच्छे गुजरेंगे जिन्होंने हाईस्कूल में त्रिकोणमिति/ज्यामेट्री अच्छे से रटी है। लोग तरह-तरह से तीन भुजाओं वाले चित्र बनाकर उसका विश्लेषण करवायेंगे।

कुछ लोग यह आग्रह भी करेंगे कि उनको अपना हिस्सा इनको देकर बड़ेपन का परिचय देना चाहिये। उसी समय उनको कोई ध्यान दिलायेगा कि आजादी के समय पाकिस्तान को कुछ रुपये दिलाने के कारण गांधी जी कित्ते तो कोसे गये थे।

बंटी भैया जुगनू सरीखे कुछ दिन चनक कर निकल लेंगे। देखना हम बता रहे हैं। :)

rashmi ravija said...

अपने चिर-परिचित अंदाज़ में रोचक विश्लेषण किया है...

अमरेन्द्र नाथ त्रिपाठी said...

कांग्रेस - मुल्लायम - माया - साम - बाम - झंडूबाम ...कौन बचा अब ! सब लपिट गए !

गया सिंह से बारे में एक बात बता रहा हूँ कि गया जी हमको एक सर ने पढ़ाया है उन्हीं के सहपाठी हैं ! बी.एच.यू. में पढ़ते हुए सर ने एक कहानी लिख दी थी और गया सिंह को किसी ने बता दिया था कि यह कहानी उनको लक्ष्य करके लिखी गयी है ! गया बाबू हमसे सर की गटई दाबने आ पहुंचे थे | गया जी इतने गये हैं :)

पिछली पोस्ट के चित्र बड़े मनभावन हैं ! आभार !

ताऊ रामपुरिया said...

बहुत सटीक विश्लेषण किया है, शुभकामनाएं.

रामराम

DEEPAK BABA said...

मुलैमा टेर.......वामपंथी मुंडे़र.......भजपइया कजरी...

और इन पर सतीश पंचम......
बढिया जनाब

और चोर महाशय को ज्यादा तवजो मत दीजिए.

शोभना चौरे said...

अच्छा विश्लेषण |
मिडिया को देखकर ,और लोगो ने जो सामान घर में भरा आगामी होने वाले झगड़ो के डर से तो ऐसा लगा मानो
"खोदा पहाड़ निकली चुहिया "फैसले के बाद

Siddhartha said...

इस अदालती फैसले का नत्था को हैंडपंप देने से तुलना करना बड़ा विचित्र लग रहा है ... आपने पार्टियों की प्रतिकियाएं के बारे में तो हमेशा की तरह मज़ेदार ढंग में लिखा है. लेकिन एक तरफ अलाहाबाद कोर्ट के जजों का 16 साल के बाद अपने अनुभव और तर्कों से दिया हुआ ये फैसला और उधर नत्था को सरकार की तरफ से आत्महत्या करने से रोकने के लिए एक हास्यात्मक और तुच्छ प्रयास में समानता देखना मुश्किल है. और इनका परिणाम भी काफी अलग थलग सा है ...

सतीश पंचम said...

सिद्धार्थ जी,

अदालत का दिया फैसला मुझे भी पसंद आया और खूब पसंद आया। लेकिन जिस तरह से राजनीतिक पार्टीयों द्वारा फैसले का अपने-अपने हिसाब से मतलब निकालना एक के बाद एक शुरू हुआ उसके कारण इस किस्म की व्यंग्यात्मक परिस्थितियां स्वत: बनती चली गई।

ध्यान दिजिए कि अदालत ने केवल अपने स्तर पर फैसला दिया है...सुप्रीम कोर्ट का फैसला अभी बहूत दूर है लेकिन राजनीतिक दल ठीक नत्था के भाई बुधिया की तरह कह रहे हैं...अरे अभी तो सिर्फ आत्महत्या की बात (मार-काट के माहौल) कह देने से हैंडपंप मिल गया...आगे आगे देख क्या क्या मिलेगा।

उधर जनता होरी महतो की तरह रोजमर्रा के कामकाज में हाड़ तोड़ पसीना बहा रही है.... उसके रोजमर्रा के मिट्टी खोदने-लादने और बेचने के उपक्रम में तनिक भी बदलाव नहीं है वह अब भी अपने अपने काम में लगी है लेकिन राजनीतिक दल है कि अपने अपने हरकत से उसके रोजमर्रा के काम में विघ्न डाले जा रहे हैं...हर ओर आशंका ....हर ओर एक भय....कि आगे क्या होगा।

ऐसे में अदालत का फैसला सचमुच एक तरह से प्रेशर डिफ्यूजर् की तरह आया है और एक अर्थ में आगे की अदालती लड़ाई और वर्तमान माहौल को देखते हुए तुरंता लालबहादुर देकर समय आगे की ओर करने सरीखी बात है क्योंकि राजनीतिज्ञों की नजरें अब भी नत्था के चालाक भाई बुधिया की तरह ही कह रही हैं - आगे आगे देख क्या क्या मिलता है ?

Siddhartha said...

सतीश जी,

explain करने के लए धन्यवाद ... इतिहास को देखते हुए आपका नजरिया मानने का दिल करता है :)

sanjay said...

rapchikatmak

pranam.

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