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Wednesday, September 29, 2010

चकचोन्हर बालम....दुपहरीया कचहरी....मादलेन बबुनी...... पान खाए मुन्नी जरूर मिलना साढ़े तीन बजे.... .........सतीश पंचम

       बस में बैठा हूँ......  मोबाइल एफ एम से गाने सुनते हुए नज़रें खिड़की के बाहर  .......फिज़ा में अयोध्यात्मक धुंधलका फैला है...... …मन ही मन सोच रहा हूं.......उस अँधे कुँए की तलहटी किस युग तक गई होगी ......द्वापर....त्रेता....कलि.....या फिर वर्तमान सतयुग ही उस अँधे कुएं की तलहटी है.......साठ साल के अदालती उजाले से जी नहीं भरा प्यारे.......देखना चाहोगे सतयुग ईरा...... वो देखो कहीं बसों की खिड़कियों पर जाली बंधी है...... कहीं पुलिस की वैन खड़ी है........ कहीं राजनीतिक पार्टीयों के बैनर ........हर एक में पासपोर्ट साइज फोटो से लेकर लार्जर देन लाइफ वाले मुखड़े......जिन्हें देखते ही भय होता है.......इनके घर वाले इनको कैसे झेलते होंगे........कही कोई अदनी सी अपील कर रहा है शांति बनाए रखें......कोई भर भर के मार्मिक अपील कर रहा है......तो कोई धकधका कर अपील उड़ेल रहा है ....लेकिन अपील जरूर कर रहा है .........शांति की अपील.....अमन की अपील...... लेकिन किससे......जनता से.....पब्लिक से.......अरे.....जनता तो पहले ही शांत है बे...... उससे अपील क्या करना....लफड़ा करने वाले तुम लोग.....छूरी चाकू वाले तुम लोग...... औ अपील जनता से...... जा घोड़ा के सार लोग।   

       एक बैनर बोल रहा है.....हिन्दु-मुसलिम-सिक्ख-इसा.....आपस में सब भाई-भाई.....अच्छा....तो भाई होने से आपस में लड़ाई नहीं होती ......ओ अंबानीया........पढ़ा कि नहीं रे.....सर्व शिक्षा अभियान.....सब पढ़ो...सब बढ़ो............भाई भाई में कौन लड़ाई............अच्छा छोड़ो..... मत पढ़ो..... गाना सुनो एफएम वाला .....बीड़ी जलइले जिगर से पिया.....जिगर मां बड़ी आग है.....जियो रे जिगर......साला जिगर न हुआ कंपनी का बाइलर हो गया........फक फका कर जलता है।
      
     उ छुटभैया बैनर कहता है जब Diwali में Ali है और Ramzan में Ram तो क्यों लड़े हिन्दु और क्यों लड़ें मुसलमान.....धुत् सारे ......अब रोमनवा में लिख लिख कर पब्लिक को बताएगा कि देखो इसमें ए है तो उसमें उ है..... इही को कहते हैं चोरकटई चाह। अरे जहां मन चंगा तो काहे का दंगा और तुम आए हो कहने इसमें अली है औ उसमें वली है.........हटाओ अपना बैनरहा बुद्धि .....साला फ्लैक्स की तरह बुद्धि भी फ्लैक्स वाली हो गई है तुम लोगन की......
     
      औह.......रह रह कर जेहन में ‘इनभर्सिटी’ के प्रोफेसर काशीनाथ सिंह की लिखी ‘काशी का अस्सी’ पन्ने दर पन्ने फड़फड़ा रही है – ‘परलै राम कुक्कुर के पाले....खींच खांच के लै जाएं खाले’ ......... अब जाकर पता चल रहा है कि इहका मतलब.............अशोक पांड़े जी कहिन बजरिए काशी का अस्सी............ कहां तो भगवान राम की महिमा.......और कहां तो राजनीतिक कुकुरबाजी.....ससुरों ने ले जाकर राम जी को भी मोकदिमा-मोहर्रिरी में घसीट लिया।
    
     बताया है काशीनाथ सिंहवा ने लिखते हुए कि काशी के अस्सी घाट पर रहने वाले शास्त्री की दुविधा ........ मकान को किराए पर देना है इसाई महिला मादलेन को.....लेकिन कैसे दें...... एक तो इसाई.....औ दूजे महिला..... लेकिन मोह ए किराया बड़ा भारी...... लागी छूटे नाहीं रमवा............मन मारकर तैयार हुए.........आखिर समझाने वाले कन्नी गुरू ...... समस्या आई अटैच बाथरूम की......मादलेन को अटैच बाथरूम चाहिए....करने कुरने के लिए............
    
   तब  बोले कन्नी गुरू.......औ जम के बोले...... शास्त्री जी आप का गोत्र मेरे गोत्र से नीचे है.....मेरा गोत्र आपके गोत्र से उंचा है........ मैं बता रहा हूँ ..... वही मानिए ...... टाइलेट के लिए वही कमरा दे दो.... थोड़ा फेरबदल करने से अटैच टाइलेट बन जाय तो क्या हरज ।
    
  अरे वो कमरा....... उहां तो महादेव जी हैं....रास्ते में आते जाते लोग फूल माला भी चढ़ाते हैं महादेव जी पर.........कैसे उसे स्थान को टाइलेट में बदल दूं.......लेकिन जब समझाने वाले कन्नी गुरू..... तो जाता कहां है रे......अरे महादेव जी कोई रामलला हैं जो एक जगह जम गए तो जम गए.....अरे महादेव जी ठहरे नंदी बैल वाले हैं....आज इहां....तो कल उहां.....वो कौनो एक जगह टिकने वाले थोड़ी हैं......और आप हो कि महादेव जी को कैद करके कुठुली में रखे हो.....पाप....घोर पाप..... दे दो कमरा मादलेन को....बना दो टाइलेट....और......देखते देखते घर के आगे बालू.....इंट....गिरने लगी......टाइलेट जरूरी..........किराया जरूरी.......जय हो प्रभू तार लिया..........ओ काशीनाथ.....आरे वही कासिनाथ राजेस ब्रदर के सामने पेपर बिछा कर लाई रख के एक झउआ मिरचा बूकता था.....ओही कासीनाथ.................जियो रे इनभर्सिटीया बुद्धि .....का लिक्खा है........जय हो मादलेन...... जय हो कन्नी गुरू.......जय हो दालमंडी.....दालमंडी बूझते हो न कि उहो में फइल......

    लेकिन है बतिया वही........... कि राम रहें कि महजिद ..........औ फिर उन चकचोन्हर पार्टी लोगन का क्या.....किस पर लड़ेंगे.....किस पर लड़वाएंगे ........मु्द्दा खतम......ए नेताइन......कल ......कचहरी लग रही है...........फैसला हुई जाई.....आज से नेताई वाला खरचा पानी बन्न......कहां से खिलाएंगे लइका बच्चा.......कहां से फीस उस भरेंगे..............कचहरीया बालम छिटकाने वाले हैं. ..... इल्लो.... गुलजार बीड़ी सुलगाय दिए हैं...... जलाते हुए FM पर बोल रहे हैं..........इक दिन कचहरी लगाय लियो रे....बोलाय लियो रे ....दुपहरी...............का हो पांड़े........मुकदिमा का फैसला कब है........अरे उहै आर....कहा है न कि....... पान खाए मुन्नी जरूर मिलना...... साढ़े तीन बजे....... मुन्नी जरूर मिलना .........साढ़े तीन बजे......... चलो जो भी होगा..... फइसला मनबै के परी......बकि सुपरीम कोरटो त है बाद में........
    
     धुत्त सारे......तूम ठीक दुपहरीया की पैदाइस हो.........जौन होगा इहीं होगा कि तुम और सुपरीम कोरट को बीच में ला रहे हो.......एकरे बाद सब बवाल फवाल बंद........... का कहते हो यादौ जी......बोलो जोर से ...........बिरिन्दाबन बिहारी लाल की जय......राम लला की जै.......भईया राम राम..... जय सिरी राम....... गुड आफ्टरनून.......... अबे साले तुम अब जैरमी करना भी छोड़ि दोगे क्या .................बोलो आँख मून्न......गुड आफ्टर नून्न.

- सतीश पंचम

स्थान - अयोध्या से पन्नरह सौ किलोमीटर दूर।

समय - वही, जब साठ साल पुराने अँधे कुँएं मे झांकते समय आँखों पर चोन्हा मारने लगे।

(इस शब्द कोलाज़ का आधार काशीनाथ सिंह की लिखी 'काशी का अस्सी' और गुलज़ार की 'बीडी़ जलइले' है.....बेहतर परिणाम हेतु काशी का अस्सी जरूर पढ़े.....दिमाग के सारे तंतु खिल उठेंगे :)

12 comments:

देवेन्द्र पाण्डेय said...

का गज़ब लिख मारे हो ....! अरे ऊ..मुम्बइया भाषा में का कहत हैं...झकास! हां, झकास !! चौचक खिंचाई किए हो ...
अब का बधाई दें..कल मिलेंगे..साढ़े तीन बजे
..मुन्नी झांसा तs नहीं देगी न गुरू !!

अजय कुमार झा said...

ई ब्लॉगजगत के कुछे धरोहर हैं ..हमरे हिसाब से ..ओईसे तो सूची है हमरे पास ...मुदा आज सोचते हैं कि दु ठो नाम तो यहीं बताते चले आपको भी ...एक तो हैं गिरिजेश राव जी ..और दूसरे हैं सतीश पंचम जी ...जानते होंगे आप तो ..उन दुनु को ..। का धार है ...और का वार है ..खल्लास खल्लास ...

अमरेन्द्र नाथ त्रिपाठी said...

सालों से भूला रहा वाकया पर यही कोर्ट-कोर्ट की चिल्लपों में फिर याद आने लगा सब ! काशीनाथ जी की किताब का सही जिक्र किया है आपने जिसमें 'नारे'' की वास्तविक हकीकत उजागर कर दी गयी है , '' बच्चा बच्चा राम का / ल... न कौनो काम का !'' >> अंतिम सच तो यही रहा , पूरी पीढ़ी ही बेकाम की हो गयी !

खड़ी बोली में इतना ( भाषा से भाव तक ) लोक-सिक्त लेखन अन्यत्र नहीं मिलता ! भारतेंदु जी और नागार्जुन जी ई ब्लॉग देखते तो बहुतै खुश होते !
'' हिन्दी की है असली रीढ़ गंवारू बोली
यह उत्तम भावना तुम्हीं ने मुझमें घोली !'' [ ~ नागार्जुन ]

Arvind Mishra said...

इस्टाइल सतीश पंचम जिंदाबाद .........

गिरिजेश राव said...

मिल जाते तो तुम्हें अँकवार भर लेते!

ई झा जी का धार लगा गए! :) धन्य हो।

निर्मला कपिला said...

बिरिन्दाबन बिहारी लाल की जय......राम लला की जै.......भईया राम राम..... जय सिरी राम.. हाथी के पाँव मे सबका पाँव मस्त पोस्ट। शुभकामनायें

sanjay said...

ek blog hai jahan samjhne me dikkat
hoti hai.....

ek ye blog hai jahan tippani karne me
dikkat hoti hai.....

' हिन्दी की है असली रीढ़ गंवारू बोली
यह उत्तम भावना तुम्हीं ने मुझमें घोली !'' [ ~ नागार्जुन ]

pranam

शोभना चौरे said...

बहोत ही बढ़िया लिखे हो भैया \इससे ज्यादा हमे बोली नहीं आती \बहुत अच्छा लिखा है एक आम इन्सान की भावनाओ को लेकर |
भगवान भी सोच रहे है जिसे मैंने बनाया वो आज फैसला कर रहे है की मै कहाँ बसूँगा ?
अभी दो चार दिन पहले मै देवास से इंदौर आ रही थी बस में बैठकर |रास्ते में एक जनाजा निकल रहा था कोई प्रतिष्ठित व्यक्ति मालूम पड़ रहे थे क्योकि काफी मात्रा में शहर के लोग मौजूद थे और सभी ने सर पर टोपी लगाई थी जाहिर है रिवाज को सम्मान देने के लिए और लोगो ने भी उसका पालन किया |शाम के करीब ६ बज रहे थे तभी बस में पीछे की सीट पर दो व्यक्ति आपस में बात करने लगे की हमारे समाज में तो दिया बत्ती के समय शव नहीं ले जाते तब दुसरे ने कहा -हमरे यहाँ तो रत १० बजे तक अन्तं संस्कार कर देते है फिर दोनों अपने अपने नियम आपस में बताने लगे और अक दुसरे के समाज में ऐसे अवसरों पर जाने के अपने अपने अनुभव बताने लगे फिर उनका गाँव आ गया जिसका नाम है" क्षिप्रा" दोनों ने उतर कर अक दुसरे को नमस्ते और खुदा हाफिज कहा और उतर गये मै तो उने चेहरे भी नहीं देख पाई नहीं वेश भूषा ?
हाँ पर मैंने महसूस किया दो अच्छे इन्सान मेरे पीछे बैठे थे अभी अभी !

DEEPAK BABA said...

बीड़ी जलइले जिगर से पिया.....जिगर मां बड़ी आग है............


ई आग का इंतज़ाम करना होगा....

बाकि कपिल देव के इस्टाईल में:

"पंचम दा जवाब नीई"
बढिया साहब, जय राम जी कि.

प्रवीण पाण्डेय said...

एक पोस्ट में सारा खेत जोत डाले।

Udan Tashtari said...

बोलो आँख मून्न......गुड आफ्टर नून्न.

होई गवा फैसला...अब्ब!!

अनूप शुक्ल said...

कभी-कभी तो लगता है कि ये कुछ शाश्वत लफ़ड़े न होते तो हम अपनी ऊर्जी की ऐसी-तैसी कैसे करते?

बहुत खूब!

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