सफेद घर में आपका स्वागत है।

Saturday, September 25, 2010

झगड़ही टंटही बारात .........हदर बदर करती मोटर साईकिलें........खड़खड़ाते पत्तल...... छुछुआती ललक......हत्त तेरे की.....धत्त तेरे की...... ...सतीश पंचम

   
    अक्सर शादी विवाह में झगड़ा टंटा होना लगा ही रहता है। कभी किसी बात पर तो कभी किसी बात पर। और जहां तक मुँह फूलौअल की बात है तो वह तो जैसे एक जरूरी रस्म की तरह है। जिस शादी-विवाह में मुंह फूला-फूली न हुई तो वह भला विवाह काहे का……फिर तो वह मरनी करनी जैसा ही कोई कार्यक्रम की तरह हो जायगा……… केवल करीबी ही  रोएगा-कलपेगा…..बाकी सब शांत…… सब कोई चुप……. ।


         यही वजह है कि  विवाह-समारोह आदि के मौके पर नाराजगी-फूलौअल  हेन तेन सब प्रकरण एक तरह से कार्यक्रम में जान डालने के लिए ही होते हैं।  कभी दूल्हे का जीजा नाराज हो जाएगा कि  हमारी ओर कोई तवज्जो नहीं दे रहा है तो कभी दूल्हे का चचा……कहां लाकर लड़के को बियाह दिए हैं भाई साहेब……और कोई रिश्ता नहीं बचा था जो यहीं उबड़ खाबड़ आंगन वाला घर मिला…….. …कम्बख्तों को इतना भी खयाल नहीं कि दरवाजे पर जहां मंडप बंधा है कम से कम वहां की जमीन तो समतल करवा दिए होते……..कुरसी पर बैठो तो एक पाया ढुकुर-ढुकुर हिलता है…….डगडगाता है…….  बराती लोग के लिए कुरसी लाकर रख दें…….मूड़ी कटवाय दीये हैं…और कुछ नहीं।
  
         ऐसे लोगों की बातों को सुनने पर लगता है कि जैसे इनके घर के बाहर का आंगन…….बैठका आदि सब बिलियर्डस के टेबल की तरह सपाट है …….कहीं उंच खाल नहीं………  कोई त्रुटि नहीं……..न खड्डा….. न खुड्डी।  और जहां तक तवज्जो न दिए जाने वाली बात से नाराज  जिजउ की बात है तो ………उन जैसे लोगों की  नाराजगी देखकर मेरे मन में आता है कि पट्ठे के बदन में बिजली का बल्ब फिट करवा देना चाहिए ठीक वैसे ही जैसे कि याराना फिल्म में अमिताभ बच्चन के बदन पर छोटे छोटे बिजली के बल्ब फिट थे। सब को पता चल जायगा कि यह कोई खास बाराती है इसका विशेष ख्याल किया जाना चाहिए। बार बार उससे पूछा जाएगा कि जीजा जी पानी पिया कि नहीं……खाना खाया कि नहीं……..कुर्सी पाया कि नहीं।
 
        कुछ और सुविधा के लिए यह भी किया जा सकता है कि हर एक बाराती के इम्पोर्टेंस के हिसाब  से अलग अलग रंग का बल्ब उनके बदन में लगा दिया जाय । जीजा हैं तो लाल रंग की बत्तीयां । चचा है तो हरे रंग की बत्ती…….मामा है तो पीले रंग की बत्ती।   हो सकता है कि समय बीतने के साथ लोग कलर को भी सामान्य बातचीत में शामिल कर लें और उससे जोड़ते हुए कहें –   क्या यार……ममेरे रंग की शर्ट पहने हो………तुम्हारे पास कोई चाचा रंग का जीन्स हो तो बताना दो दिन के लिए चहिए…….हो सकता है ऑफिस में लोग कहें कि – कल जीजा डे है सो सब लोग जीजा रंग की ड्रेस पहन कर आएं। इसी तरह महिलाएं भी आपसी बातचीत में कहेंगी – मेरे पास तो देवर रंग की चार चार साड़ी है लेकिन ननद रंग की एक भी नहीं। कोई कहेगी कि मेरी जीजा रंग की साड़ी पर फॉल लगवाने को दिया था अब तक नहीं आई……तो कोई कहेगी  भौजाई रंग की ब्लाउज मैच नहीं कर रहा।

      खैर, ये सब तो हुई विवाह में तवज्जो…..फवज्जो और नाराजगी वगैरह को लेकर मेरी ओर से रंग-रंगीली बातें।

       लेकिन मित्रो आज मुझे मेरे गाँव के ही एक  शख्स श्री एबीसीडी यादव जी की नाराजगी याद आ रही है। एबीसीडी नाम इसलिए लिख रहा हूं क्योंकि कल को मेरे गाँव देस के लोग मुझपर किसी का नाम लेकर बदनामी करने की तोहमत न लगाएं। हां तो बात हो रही है श्री एबीसीडी यादवजी की………… स्वभाव से श्री एबीसीडी यादवजी एकदम लंठ……….. कब क्या कर बैठें कोई नहीं जानता। पास बैठ कर धीरे धीरे बतियाते हुए कब इनकी आवाज का डेसिबल कर्कशावस्था को छू दे किसी को अंदाजा नहीं।

        तो हुआ यह कि कई साल पहले  श्री एबीसीडी यादवजी के घर में एक लड़की की शादी पड़ी थी। तब,  बारात एक रात रूकने के बाद अगले दिन शाम ढलने के बाद ही खिचड़ी आदि की रस्म पूरा करते हुए वापस लोटती थी। सुना तो मैंने यह भी है कि पहले बड़हार होता था। बारात किसी के यहां जाने पर दस-दस दिन तक रूकती थी और पूरा गाँव उस बड़हार को सकुशल निभा ले जाता था। अब तो रात में बारात रूकी…..न्योता हकारी हुई…..भोजन ओजन के बाद ज्यादातर बाराती रात ही में अपनी-अपनी मोटर साइकिल से हड़र हड़र करते हुए रवाना हो जाते हैं। और घर पहुंच कर तान के सोते है।

      तो ऐसे ही पुन्ना जमाना था और विवाह के बाद का अगला दिन था। रात में तो बाराती कम ही थे लेकिन सुबह होते होते और बाराती जुटने शुरू हो गए। संभवत:  लगन का मौसम था और बाराती हर ओर रात में ही अपने अपने हिसाब से बारात करने हेतु  बंट चुके थे…..कोई किसी के बारात में गया था तो कोई किसी के……..और उसी दौरान रात में ही आसपास की किसी बारात में झगड़ा टंटा हुआ था ,गोली वगैरह चली थी।   गाँवों में अक्सर हर कोई एक दूसरे की चिन्ह-पहचान से रिश्तेदारी में आता है और इसी चिन्ह-पहचान के चलते  सुबह होते न होते वही झगड़ैले बाराती लौटते हुए इस बारात में आन मिले।

           तब साइकिल से चलने का रिवाज था और ज्यादातर बाराती या तो शाम हो जाने पर रवाना होते थे या एकदम सुबह सुबह ताकि ठंडे ठंडे पहुंच जांय।  लेकिन मौजूदा हालात ऐसा हो गया कि  श्री एबीसीडी यादव जी के यहां निर्धारित बाराती संख्या से दुगुनी-तिगुनी संख्या  दोपहर होते होते जा पहुंची। कोई किसी को ना नहीं कह सकता था। सब एक दूसरे को जानते मानते भी थे।

      लेकिन दूसरे बारात का झगड़ा टंटा श्री एबीसीडी यादवजी अपने सिर क्यों मोल लें। अब इतने बारातीयों को संभालने का माद्दा भी तो होना चाहिए। गाँव वाले भी परेशान कि यार अब क्या किया जाय। रसद तो इफरात है लेकिन कड़ाह चढ़ाना और फिर फिर  भोजन बनाना बड़ा मुश्किल है। मुसहरों के यहां से तय संख्या में ही पत्तल मंगाया गया था……..कुल्हड़ भी कहांरो के यहां से निर्धारित संख्या में ही मिल पाए थे…… शादी ब्याह के मौसम और तेज लगन के चलते और ज्यादा पत्तल और कुल्हड़ मिलना मुश्किल था। तब फाईबर वाले प्लेट और प्लास्टिक की गिलासों का चलन नहीं था।

     तब श्री एबीसीडी यादव जी ने तुरंत ही अपनी लंठई बुद्धि लगाई। घर में जाकर हंडा फंडा जो कुछ दहेज वगैरह में देने को रखा था उठा पठाकर फेंकने फांकने लगे। जो गेहूं चावल बोरे में रखा था यहां वहां छींट छांट दिए। लोग हां हां कर धरौअल लगे कि अरे क्या हो गया…..क्या हो गया। लेकिन श्री एबीसीडी यादव जी बोलें तब न। वह तो अपनी तोड़ फोड़ जारी रखे थे। साथ ही बड़बड़ाते जा रहे थे कि मेरे भाइयों ने मेरा सिर झुका दिया….. मैंने कहा था कि सात सौ बारती के लायक खाना बनवाओ……लेकिन नहीं…..ये लोग मेरी बदनामी करवाना चाहते थे तभी तीन सौ के लिए जान बूझकर खाना बनाए………बाकी के चार सौ लोग क्या भूखे रहेंगे। मैं यह सब बरदाश्त नहीं करूंगा।
 
     यही सब श्री एबीसीडी जी बोलते जाते और उठा उठा कर कुल्हड़ फुल्हड हंडा फंडा सब फेंकते जाते। एक तो हंडा वगैरह फेंकने से वैसे ही तेज आवाजा होता है। वही ज्यादा उठाकर पटक रहे थे। बारात में हड़कंप। अब क्या हो। अगुआ को बुलाया गया। लड़के के बाप-ददा को बुलाया गया। सब कोई दंग।

    मजे कि बात तो यह कि लड़के वाले एकदम सहम गए थे…….उनकी समझ में नहीं आ रहा था कि अचानक माहौल कैसे खराब हो गया। लोगों ने तब बताया कि ये ऐसे ही हैं……सनक जाते हैं तो फिर किसी को कुछ नहीं समझते। अब गुस्सा इस बात पर हो रहे हैं कि हम लोगों ने जान बूझकर कम खाना बनाया। जान बूझकर कम पत्तल और कुल्हड़ मंगाए।
 
    बताइए…..आप ही लोग सोचिए कि भला हम अपने गाँव की इज्ज्त इस तरह जान बूझकर बिगड़ने देंगे।
 लड़के वाले भी क्या कहें। वह लोग तो अब तक इस बात पर खुश थे कि ज्यादा बाराती आने से उनका रौब दाब बढ़ा है। लोग जानने मानने लगेंगे कि अरे फलां कि बारात में इतने ज्यादा लोग पहुंचे थे। लेकिन यहां तो मामला भिण्डी हो गया है।

 हो- होवा कर लड़के वालों ने ही प्रस्ताव रखा कि एबीसीडी यादव जी आप चिंता न करें। हम लोग मात्र लड़की की विदाई करने भर से खुश हैं। स्वागत सत्कार की क्या बात…..मोहब्बत बड़ी चीज है।

       अंत में हुआ यह कि जो कुछ मजबूरी में कच्चा पक्का बना…..खिला-पिलाकर बारातीयों को रवाना किया गया। जल्दी के लिए पत्तलों के बदले कुछ केले के पत्ते काट लाए गए…..कुछ लोग कुल्हड़ पाए…..कुछ नहीं पाए……….कुछ लोग हाथ से ही चुल्लू बनाकर पानी पी लिए।
 ले देकर अंत में सब रवाना हुए।
   
      लेकिन मित्रो, आज फिर मुझे फिर से श्री एबीसीडी यादव जी की याद आ रही है। वजह है कामनवेल्थ खेल। यहां भी एक गांव है खेल गाँव। ढेरों बाराती आ रहे हैं लेकिन कुल्हड़-पत्तलों  का अब तक  इंतजाम नहीं हो पाया है। फिर उनके रहने ठहरने की तो बात ही क्या।  अब तक तैयारी चल ही रही है। लोगों के हाथ पांन फूले है कि कैसे होगा यह सब।

     हमारे प्रधानमंत्री जी अब जाकर श्री एबीसीडी यादव जी की तरह बिहेव कर रहे हैं। कभी गिल पर बरस रहे हैं तो कभी कलमाडी़ को बैठक में शामिल नहीं कर रहे हैं। और मीडिया है कि हंडे के गिरने पटकने की तरह तेज आवाज में कह रहा है वो देखिए फुटओवर ब्रिज गिर गया है….वो देखिए सीलिंग गिर गई है। अब क्या होगा…..कैसे होगा। कुछ समझ नहीं आ रहा।

     उधर कामनवेल्थ फेडरेशन के अध्यक्ष माइक फेनेल जी खुश थे कि बहुत देशों से लोग आ रहे हैं….खेल गाँव में बहुत लोग शामिल हो रहे हैं। ज्यादा लोगों के शामिल होने से  उनका रौब दाब बढ़ेगा लेकिन यहां की तैयारीयों को देखते हुए अब उन्हें महसूस हो रहा है कि पूरा  मामला तो भिण्डी हो गया है। कहीं पानी बरस रहा है…..कहीं यमुना बढ़ी हुई हैं तो कहीं मलवा अब तक नहीं हटाया गया है।
  
      लेदेकर अब जाकर फेनेल जी का बयान आया है कि हम कामनवेल्थ की तैयारीयों को ठीकठाक मानते हैं। और शायद मन ही मन कह भी रहे हों -  स्वागत सत्कार और तैयारीयों की क्या बात……. खेल बड़ी चीज है।

     हो सकता है कि कामनवेल्थ की कमनीयता के चलते किसी को रहने का ठिकाना मिले….किसी को न मिले…..कोई टेंट में रहे……कोई बेटेंट रहे।

   आखिर …….स्वागत सत्कार की क्या बात……  मोहब्बत बड़ी चीज है यारो  :)

- सतीश पंचम


Note -   मेरी पिछली पोस्टों के बाद आप लोगों में से  कई पाठकों के मेल आ रहे थे कि पाठकों को कुछ तो कहने का मौका दिजिए....बार बार मेल करने की मुसीबत क्यों......क्या यह एक किस्म की क्रूरता नहीं है ?  कुछ ऐसी ही बातें अरविंद जी ने भी अपनी पोस्टों के माध्यम से कही थीं और अब आप लोग व्यक्तिगत मेल के जरिए कहे जा रहे हैं।


     औसतन आप लोगों के पांच-छह  मेल मेरी कोई नई पोस्ट लगने के चौबीस घंटे के भीतर  तक आते हैं। चूँकि मेल व्यक्तिगत तौर पर आते हैं इसलिए उनका जवाब देना एक तरह से बाध्यकारी भी हो जाता है। 


   यहां मैंने अनुभव किया कि  टिप्पणी चालू रखने पर जवाब देने की बाध्यता नहीं रहती थी जबकि इस तरह से मेल आने पर जवाब देना पड़ता है जो कि पाठक और मेरे हम दोनों के  लिए एक तरह की दुविधा वाली और असहज स्थिति है। 


     बहरहाल, यही सब ध्यान में रखते हुए आज से मैंने http://hindiblogjagat.blogspot.com की तर्ज पर एक चैट बॉक्स प्रयोग के तौर पर साइड बार में लगाने का विचार किया ताकि पाठकों को यदि कुछ कहना हो तो उनके लिए कुछ सुविधाजनक स्थिति  रहे। 


- सतीश पंचम

No comments:

फोटो ब्लॉग 'Thoughts of a Lens'

फोटो ब्लॉग 'Thoughts of a Lens'
A Photo from - Thoughts of a Lens

ढूँढ ढाँढ (Search)

© इस ब्लॉग की सभी पोस्टें, कुछ छायाचित्र सतीश पंचम की सम्पत्ति है और बिना पूर्व स्वीकृति के उसका पुन: प्रयोग या कॉपी करना वर्जित है। फिर भी; उपयुक्त ब्लॉग/ब्लॉग पोस्ट को हापइर लिंक/लिंक देते हुये छोटे संदर्भ किये जा सकते हैं।




© All posts, some of the pictures, appearing on this blog is property of Satish Pancham and must not be reproduced or copied without his prior approval. Small references may however be made giving appropriate hyperlinks/links to the blog/blog post.