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Sunday, September 19, 2010

ठेंगावली फॉर भेड़चाल..... कतार कथा..........जॉन एण्ड बिप्स...... चिल्ल यार........ सतीश पंचम

      यूँ तो मैं भीड़ भाड़ वाले पूजा स्थानों से अक्सर दूर ही रहता हूँ…..न जाने क्यों ऐसे स्थल मुझे ‘आडंबर के सुसज्जित किले’ से  लगते हैं। लोगों का हूजूम देखादेखी भक्ति वाला प्रतीत होता है……’मैंने इसे पूजा…..मेरा भला हुआ…..अब तूम भी पूजो…..भला होगा’  वाली मानसिकता से रचे पगे स्थल। मैं मन ही मन ऐसे पूजा स्थलों से एक किस्म की दूरी बना लेता हूँ।  लोग जब मंगलवार के दिन किसी विशेष भगवान को पूजते हैं तो मैं मंगलवार की बजाय किसी और दिन उसे पूजता हूँ……बस यूंही….. ऐसी ही होती है मेरे ओर से 'भेड़चाल को ठेंगावली' :)
  
       लेकिन आज मुंबई के एक खास गणेश ‘लालबाग के राजा’ के दर्शन करने गया।  राजा…… यहां हर इलाके के अपने अपने गणेश राजा हैं।  कोई गणेश अंधेरी का राजा है, कोई माटुंगा का राजा है तो कोई कहीं किसी गली का ही। पर भगवान गणेश जी एक ही हैं…….भक्तों ने उन्हें टाइटल देकर एक खास इलाके से बाँध दिया है। यह मेरे गणेश वह तेरे गणेश। अपनी अपनी भक्ति अपना अपना प्यार।
 
     वैसे मैं बचपन में भी एक दो बार लालबाग के राजा के दर्शन कर आया हूँ…..अभी दो साल पहले अकेले भी गया था दर्शन करने लेकिन इस बार श्रीमती जी की जिद के चलते जाना पड़ा। लाख समझाया कि पहले की बात और थी……तब इतनी भीड़ नहीं होती थी…..अब बहुत कुछ भीड़ मीडिया के चलते भी बढ़ गई है……अपनी ओर से सब बहाने बना दिए लेकिन श्रीमती जी मानें तब न…।  जिद तो जिद।
  
    आसपास  होने वाली चर्चाएं -  मैं तो लाल बाग के दर्शन कर आई…..मुझे तो सात घंटे लगे दर्शन करने में……इतनी लंबी लाइन थी……वगैरह वगैरह जब बारंबार सुनाई पड़े तो ऐसे स्थान पर जाने की इच्छा होना लाजिमी है।

   सो, निकल पड़ा। लालबाग पहुंचते ही पता चला कि दर्शन के लिए कतार रानीबाग ( एक चिड़ियाघर) से शुरू है। वहीं जाकर खड़ा होना होगा। मैं मन ही मन भुनभुनाया……रानीबाग से लालबाग तक कतार लगी है मतलब खूब भीड़ भड़क्का है। श्रीमती जी को अब भी बरगलाया कि यार कतार बहुत लंबी है, टीवी पर बता भी रहे थे कि लोग बीस-बीस घंटे तक कतार में खड़े रहते हैं…..इतना देर मैं तो खड़ा नहीं रहूंगा। चलो दूसरे गणेश पंडाल गणेश गल्ली चलते हैं। वहां के भी गणेश जी काफी बड़े आकार के हैं और पंडाल वगैरह  काफी दर्शनीय हैं।  लेकिन नहीं।  श्रीमती जी को लालबाग के राजा को ही देखना है।

       इतने में कुछ लोग नंगे पैर आते दिखे……बदहवासी उनके चेहरे से टपक रही थी। उनसे मैंने चलते चलते ही पूछा – आप लोगों को कितना समय लगा दर्शन करने में। उन्होंने मासूमियत से कहा – नहीं हो सका दर्शन। बहुत भीड़ है। हम लोग कल फिर आएंगे।

    बस फिर क्या था, मुझे तो मौका मिल गया। श्रीमती जी से फिर ललकारते हुए कहा – देखा…..लोग वापस जा रहे हैं….दर्शन करके। और तुम हो कि लालबाग के दर्शन करने को उतावली हो। श्रीमती जी भी मायूस हो चलीं। बात ही ऐसी थी। लोगों का इस तरह से बिना दर्शन किए लौटना वाकई हिम्मत तोड़ने वाला काम था। मैं मन ही मन खुश था कि चलो इसी बहाने बाकी के गणेश पंडालों के दर्शन कर लेंगे वरना तो दस बारह घंटे यहीं खपने थे।

       तभी श्रीमती जी ने कहा कि चलो अपन एक बार कतार में खड़े तो हो जांय…..देखते हैं जब ज्यादा देर लगे तो निकल आएंगे। अब मैं  समझ गया कि खतरा अभी भी टला नहीं है। कतार में लगना ही है। मन मारकर कतार में जा लगा। कतार भी कैसी…..एकदम मेज स्टाइल की जिग जैग जूप। एक ही जगह पर बल्लियों के बने रास्तों पर चलते रहो…..घूमते रहो। यदि आपने शिर्डी संस्थान के यहां की कतार देखे हों तो समझ सकते हैं कि एक ही हॉल में कैसे घूमते रहने का खेल खेला जाता है। पहले उत्तर से दक्खिन चलो…फिर दक्खिन से उत्तर चलो… रूको मत। चलते रहो।
    
       नाक भौं सिकोड़ते हुए मैं चल पड़ा रानीबाग वाली कतार में। मन ही मन सोच भी रहा था कि न जाने हमारे इस तरह से एक ही जगह पर उत्तर – दक्खिन चलते रहने वाले हमारे क्रियाकलाप को देख चिड़ियाघर के जानवर हम लोगों के बारे में क्या सोच रहे होंगे।  रानीबाग वाली कतार से बाहर आए तो कतार आगे किसी और इलाके की ओर बढ़ चली। बीच बीच में कतार कई जगह खाली रखी जाती थी ताकि सड़क के आर पार जाने आने में गाड़ियों को बराबर रास्ता मिलता रहे।

        और जब भी इस तरह के खाली स्थान आ जाते तो अगले से जुड़ने के चक्कर में कई लोग दौड़ लगाते कि कोई बीच में न आ जाए। मजबूरन मुझे भी दौड़ लगानी पड़ी। हंसी आती थी कि यार ये क्या है बेवकूफी……दर्शन करने के लिए दौड़ो।
     
       आगे जाकर कई जगह कतार सुस्त भी पड़ जाती। आधा- पौना घंटा एक ही जगह पर। ऐसे में आसपास खड़े लोगों की बातें सुनने में मजा आता है। बगल में ही कॉलेज के छोरा छोरी ग्रुप था। कोई नील नितिन मुकेश पर बतिया रहा था तो कोई जॉन-बिप्स के बारे में गपिया रहा था। उनकी बातें भी इस तरह की होतीं मानों वह नील नितिन मुकेश, जॉन बिपाशा से रोज ही मिलते रहते हैं। फलां एक्टर  ने शादी करने में जल्दी की………But he had extra marrital affair yaar………Bips is looking cool yaar……….
  
       मैंने नजरें उठा कर उन लोगों की तरफ देखा  तो गहरा मेकअप…..स्नो लाइन……मस्कारा……. टीमटाम वाले कई चेहरे नज़र आए। शायद चेहरे पर गुलाबी रंगत के लिए कुछ और भी लगाया गया था, पर मुझे पता नहीं कि क्या कहते हैं उसे। एक तो महिलाओं के मेकअप फेकअप के बारे में वैसे भी मैं इंटरेस्ट नहीं लेता।  कुछ महिलाएं सितारों वाली चमचमाती साड़ी और गहरा सिंदूर लगाए आईं थी। कुछ लड़के थे जो ऐसी जीन्स पहने थे मानों अब गिरी की तब गिरी।
   
     कतार काफी अंदर तक गई थी और जैसे ही कालाचौकी इलाके की ओर मुड़ी सामने ही कई बंद मिलों के खंडहर दिखने लगे। यूं तो पहले भी इन खंडहरों को देख चुका हूं लेकिन  आज फुर्सत से देख रहा था। कतार में लगे लगे  करना ही क्या था। सो मिलो के काई लगे दिवारों को निहार रहा था।  दीवारों पर बनी नक्काशियों और उनके सुंदर सुंदर दृश्यों की वजह से अब मेरा भी मन रमने लगा।
 
      तभी कतार एक ऐसी बंद मिल के बगल से गुजरी जिसकी दीवारों का इस्तेमाल एक नंबर के लिए होता था। बदबू की वजह से नाक फटने लगी लेकिन कतार थी कि हिलने का नाम न ले रही थी। काफी देर बाद जब आगे बढ़ी भी तो एक और हॉल मिला जिसमें कि केवल चलने का काम था। उत्तर की ओर चलो, फिर दक्खिन की तरफ चलो। भीड़ बहुत ज्यादा थी और मैं उकता कर वापस जाने की सोच रहा था कि श्रीमती जी ने आग्रह किया जब इतना आ गए हैं तो थोड़ा और सही। मन मार कर लगा रहा। उधर कई कई लोग कतार के बल्लियों के बीच से निकल कर शॉर्टकट मारते हुए आगे बढ़ते। एक दो लोग चिल्लाते फिर चुप। ऐसा ही चलता रहा। उसी हॉल में करीब दो घंटे निकल गए केवल चलने वाला काम करते हुए। पैरों की तो हालत खराब।
  
        इसी बीच ज्यादा लोगों के होने से गर्मी होने लगी। खड़े खड़े भी पसीना आ जाता। लोग पकने लगे। एक दो लोगों पर बेहोशी छा गई। किसी ने पानी वानी पिला-पुलू कर उन्हें रास्ता दिया। उधर आयोजकों की ओर से बराबर अनाउन्समेंट किया जा रहा था कि शांति बनाए रखें।  मैं अब एकदम आपे से बाहर होने को था। कतार से निकल कर वापस जाने को था…… इस तरह के दर्शन से तो अच्छा है दर्शन न करना। श्रीमती जी मेरी मन:स्थिति को समझ रहीं थी और चुपचाप सहमीं सी खड़ीं थी।
    
        लेकिन पता नहीं क्या सोच कर मैं चुप था। एक तो शनिवार के दिन श्रीमती जी का उपवास भी था और आज जल्दी जल्दी में केवल चाय पीकर ही वह आ गईं थीं दर्शन करने। मैंने सोचा वहां पहुंच कर कुछ पेट पूजा करवा दूंगा लेकिन यहां तो दर्शन करने के चक्कर में बिना नाश्ता किए ही वह लाइन में खड़ी रहीं। रास्ते में कई जगह वड़ा पाव वगैरह के स्टॉल थे लेकिन उनके बनाने के स्थान और बाकी सब चीजें देख मन ही न होता कि खाया जाय। शायद यही सब सोचकर मैं चुप रह गया होउं।
  
         उधर कतार में उन लड़कियों पर नजर पड़ी जो सुबह खूब सज धज कर आईं थी दर्शन करने लेकिन अब तो गर्मी से उनका बुरा हाल था। मसकारा-फसकारा तो कब का छूट चुका था। लिपस्टिक-फिपस्टिक…..औडर पौडर सब पसीने की भेंट चढ़ गए थे।

        यह देख मुझे अचानक ही गाईड फिल्म का वह दृश्य याद आ गया जिसमें  एक साधू बनकर देवानंद बारिश करवाने के लिए उपवास रखते हैं और उनकी ख्याति सुन  शांति की तलाश में गहनों से लदी-फदी वहीदा रहमान उसी साधू यानि राजू गाईड से मिलने जाती है और अपने सभी गहने एक-एक कर उतारते चली जाती हैं।
 
         मैंने मोबाइल में समय चेक किया…..अब तक कतार में लगे लगे साढ़े चार घंटे हो गए थे। किसी तरह उस हॉल से बाहर को कतार हुई और फिर कहीं जाकर अगले आधे घंटे में भीड़-भाड़ के बीच लालबाग के राजा के दर्शन हुए। वह भी केवल कुछ क्षणों के लिए……ज्यादा समय खड़े नहीं होने दिया जाता। इस बीच कुछ वीआईपी लोग भी थे शायद जिनके लिए अलग से लाइन की जरूरत नहीं थी।
 
         पांच घंटे खड़े रहने के बाद बस पकड़ने की हिम्मत नहीं थी, सो दर्शन करने के बाद किसी तरह टैक्सी पकड़ जल्दी जल्दी घर आया। भोजन पानी करने के बाद बिस्तर पर पड़ते ही पैरो में नसों का खिंचाव महसूस किया। हरारत तो थी ही।

     एकाध टिकिया खाने और झण्डू बिरादरी का बाम लगा-ओगा कर थोड़ देर सोया और अब जाकर टाईम पास करते हुए ये पोस्ट लिख रहा हूँ  :)

- सतीश पंचम


स्थान – वही, जहां पर आज पांच घंटे की मैराथन लाइन लगाकर आया हूँ।

समय – वही, जब रानीबाग (चिड़ियाघर) के अहाते में हजारों लोगों की लाइन उत्तर दक्खिन होती हुई एक ही जगह आड़ी तिरछी चल रही हो और चिड़ियाघर के भीतर बैठा बंदर सोच रहा हो……इसमें कोई शक नहीं……हम लोग ही इंसानों के पूर्वज हैं।


Note : पोस्ट पढ़ने के बाद गहन अनूभूति वाली गिरिजेश जी की इस पोस्ट को जरूर पढ़ें ।

 

(सभी चित्र - नेट से साभार)

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