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Saturday, September 11, 2010

थोड़ा खाओ थोड़ा फेंको.............चाय प्रणाली ऑफ कल्लू..............सतीश पंचम

       मेरे घर में चाय अब तक एक देसी पतीले में ही बनती थी। वही देसी पतीला जिसे कि अक्सर टोप कहा जाता है। आम घरों में अक्सर इस तरह के टोप को बहुतायत में इस्तेमाल होते देखा होगा आपने। माँजने-धोने में भी आसान, रखने वखने में भी कोई दिक्कत नहीं। एकदम धड़ल्ले से इस्तेमाल किजिए....चाहे पटकिए-पुटुकिए......कहीं थोड़ा बहुत पिचक-पुचुक जाय तो अलग बात है वरना तो न जाने कितने बार ये टोप बिरादरी के बर्तन गिरते पड़ते रहते हैं, लेकिन मजाल है जो आग पर चढ़ने से इन्कार कर दें। 

     लेकिन हाल ही में एक बर्तन वाली दुकान में चाय बनाने में इस्तेमाल होने वाला बर्तन देखा तो लगा कि इसे ले लेना चाहिए।  उसमें लगा हैंडल कुछ खास आकर्षक लगा क्योंकि अक्सर टोप में चाय बनाते समय पकड़ का इस्तेमाल करना पड़ता था फिर इसमें तो लगा - लगान हैंडल। न पकड़ ढूँढने की झंझट न जलने गिरने का डर। एक जगह किनारे पर एक तिकोना सा मुहाना भी दिया गया था, ताकि उड़ेलते समय चाय बटुर कर इसी मुहाने से गिरे। 

  इस नये नवेले बर्तन को देख अचानक ही मुझे अपने देसी पतीले में खामीयां ही खामियां नजर आने लगीं।    वह अचानक ही उन्नीस लगने लगा।  नया बर्तन टोप के मुकाबले बीस ही नहीं इक्कीस लगा। सो खरीद लिया गया। कीमत लगी साढ़े पाँच सौ रूपए, आखिर टेफ्लॉन कोटेड भी तो था।  

    यूं तो मेरे घर में और भी दो चार और बर्तन हैं टेफ्लोन कोटेड, लेकिन इसका काला रंग और हैंडल वाला बांकपन कुछ ज्यादा ही भा गया और मैंने मजाक-मजाक में इसका नामकरण करते हुए इसका नाम कल्लू  रख दिया।  लेकिन मित्रों इस कल्लू के बड़े नखरे थे। साथ में आए इंस्ट्र्क्शन मैन्युअल में लिखा था कि हमारा कल्लू चूँकि टेफ्लॉन कोटेड है तो इसे खुरदरे पदार्थ से न मांजें और स्टील या लोहे की कड़छी की बजाय लकड़ी के चलावन का उपयोग करें। 

  मैने कहा चलो, नये किसम का बर्तन है तो नया टीम टाम भी होगा, यह भी सही। कल्लू को First time use सेरिमनी के चलते (Teflon coating के कारण) तेल की परत लगा उसे गर्म किया गया और फिर धो धा कर आग पर चढ़ा दिया गया। बड़े मन से श्रीमती जी ने कल्लू के भीतर पानी रखा, शक्कर डाला, चाय पत्ती डाली, दूध डाला और चाय तैयार किया। 

     अक्सर मेरे यहां चाय को पतीले से सीधे ग्लास या कप में चाय छानी जाती है, बीच में केटली-फेटली का टीमटाम नहीं होता। सो जब हैंडल पकड़ कर चाय छानी जाने लगी तो देखा कि तिकोने मुहाने से चाय गिर तो रही है लेकिन थोड़ी चाय कप में जा रही है और थोड़ी बाहर। मैने कहा, ये क्या चक्कर है। श्रीमती जी को परे हटा मैंने खुद से चाय को छानने की कोशिश की, लेकिन इस बार भी वही हाल। थोड़ी चाय तो कप में गिर रही है, बाकी चाय कप के बाहर। उधर किचन का प्लेटफॉर्म चाय के गिरने से खराब ही हो चुका था।

    अब मैंने ध्यान दिया तो पता चला कि बर्तन के उपरी डिजाइन में थोड़ा बदलाव लग रहा है। उपरी किनारों में कहीं भी टोप की तरह बाहर को निकला हुआ फैलाव नहीं था। टोप में बर्तन का उपरी हिस्सा उपर जाकर बाहर की ओर फैल जाता है जबकि  कल्लू की सीधी खड़ी दीवारें थीं और एक कोने पर तिकोना सा मुहाना।  बस....इससे ज्यादा कुछ नहीं था। वह मुहाना भी केवल एक मन बहलाने का बहाना भर था। वहां से चाय बटुरती कम थी धड़ल्ले से  अदबदाकर गिरती ज्यादा थी। अब लगने लगा कि कल्लू जितना सीधा दिख रहा है, उससे ज्यादा टेढा है। 

   होता यह था कि जब चाय उड़ेली जाती तब गिलास या कप के आकार के हिसाब से बर्तन को धीरे धीरे तिरछा किया जाता था और उसी क्रम में चाय का धीरे धीरे गिरता हुआ अंश बर्तन का पेंदा पकड़ लेता था और पेंदे को पकड़े पकड़े निचले हिस्से से गिरना शुरू कर देता था। जबकि टोप से चाय उड़ेलते समय जो भी चाय गिरती थी वह गिरते वक्त टोप के मुहाने पर फैल भले जाती थी लेकिन टोप के बाहर को निकले हुए उभारों के कारण बटुर कर गिरती एक ही धार से थी। सो पतीले से चाय गिराते वक्त समूची चाय छोटे से कप में बिना इधर उधर गिरे समा जाती थी। लेकिन इस कल्लू की खड़ी दीवारों ने तो अजीब मुश्किल खड़ी कर दी। अब क्या हो। बर्तन वापिस भी नहीं किया जा सकता था, इस्तेमाल हो चुका था। 

      एक तो पैसा भी ज्यादा लग गया....उपर से बर्तन की कार्यप्रणाली भी अजीब सी.....। एकाध बार तो लगा कि यह बर्तन एकदम अमरीकन अभिजात्य वर्ग की तरह का है। सुना है कि वहां भी जितना खाया जाता है उतना ही वेस्ट किया जाता है। रह रह कर मुझे  'जाने भी दो यारो' फिल्म के मोटू कमिश्नर की याद हो आई जो ....थोड़ा खाओ....थोड़ा फेंको.....वाली कार्यप्रणाली अपनाता है। थोड़ा केक खाता है...थोड़ा खिड़की की तरफ बाहर फेंकता जाता है। 

 सो मन मार कर तरह तरह के प्रयोग किये गये। कप में तेजी से चाय उड़ेली गई लेकिन फिर भी कप की कैपेसिटी के हिसाब से थोड़ी ही चाय उड़ेली जा सकती थी।  एक तरीका यह हो सकता था कि बड़े मुहाने वाले बर्तन में पहले पूरी चाय एक साथ उड़ेल दी जाय और फिर हर एक कप में चाय सर्व की जाय लेकिन यह सब करने का मतलब था कि एक और बर्तन गंदा करना, जबकि यही काम पहले टोप से डायरेक्ट कप में चाय उड़ेल कर किया जाता था और उसमें मध्यस्थ के रूप में चौड़े मुंह वाला एक्स्ट्रा बर्तन भी नहीं लगता था।

 फिर एक दिन बाहर देखा चाय वाले के यहां, उसके यहां यही बर्तन था लेकिन एल्यूमिनियम का। वह पूरी चाय एक साथ उसी हैंडल वाले बर्तन में बनाकर एक टोप में छानता था और फिर सर्व करता था। बीच-बीच में कोई ग्राहक जल्दी मचाए तो एक लंबे हैंडल वाले कपनुमा बर्तन को उसमें डुबोकर चाय सर्व करता था। उस चायवाले के हैंडल वाले बर्तन और उससे जुड़ी कार्यप्रणाली को देख इतना जरूर समझ गया कि कल्लू के बिरादरी वाले बर्तनों की यह खासियत है कि बिना एक दो बर्तन और चँहटियाये...गंदा करे इस कल्लू का standard procedure पूरा नहीं होता।  

       नतीजतन इसका सरल उपाय खोजना शुरू किया गया ताकि अलग से चौड़े मुंह वाला बर्तन या केटली न फंसाना पड़े और काफी हद तक कामचलाउ उपाय ढूँढ भी लिया गया।  

    चूँकि कल्लू से कप में उड़ेलते वक्त थोड़ी चाय उसके मुहाने से गिरते हुए थोडी उसके बाहरी  दीवार को पकड़ कर पेंदे की ओर से गिरती थी, सो सभी कप एक के बाद एक सटा कर लाइन से रखे जाते और सबसे आगे वाले कप में जब चाय उड़ेली जाती तब थोड़ी चाय उससे सटा कर रखे गये पिछले कप में भी गिरती  और यही क्रम चलाते हुए अंत में मेरी फेवरेट प्लेट रखी जाती (मैं वैसे भी कप की बजाय प्लेट में चाय पीना पसंद करता हूँ  :- ) 

   सो इस तरह से चाय सर्व होने में किचन का प्लेटफॉर्म गंदा होने से बच जाता है। मुसीबत तब होती है जब घर का केवल एक सदस्य चाय पी रहा हो और ऐसे में दो कप तो सटा कर नहीं रखे जा सकते, इसलिए अंत में वहां कोई कटोरी रखी जाती है जिसमें गिरने वाली चाय पुन: कल्लू में उड़ेल दी जाती है।

  लेकिन इस सारी कवायद से इतना जरूर समझ आ गई कि जो जितना सीधा दिखता है असल में वह उतना ही टेढ़ा भी हो सकता है and vice versa  :-) 

( चाय छानने जैसी अदनही बात पर भी पोस्ट बन सकती है ये आज जाना :-)


  नोट - साथीगणों से एक बात कहना चाहूंगा कि मैं अब से टिप्पणियों को अपनी पोस्टों पर अलाउ नहीं कर रहा हूँ..... इसकी वजह है -  पोस्ट करने के बाद टिप्पणियों की आवाजाही से मेरा ध्यान बंटना......... यूं तो टिप्पणियों के आने न आने पर अब उतना नहीं सोचता.... अब फर्क भी नहीं पड़ता    (पहले जरूर पड़ता था  :-) ..... लेकिन यदाकदा अब भी कभी-कभार अपने रूटीन वर्क के दौरान ही बीच बीच में मोबाइल आदि पर टिप्पणियां चेक करता था जो कि एक तरह से डिस्टर्बेंस की तरह लग रहा है । 
  
 सो मित्रों.... बतौर स्वांत-सुखाय लेखन,  मुझे यही बेहतर तरीका लग रहा है कि - 
 पोस्ट लिखो और भूल जाओ....... शायद महाभारत काल में ब्लॉगिंग होती तो यही कहा जाता  :-)
      
     एक बात और......  'Buzz'.....वहां डिस्टर्बेंस जैसा फील नहीं होता इसलिए Buzz पर status quo बनाये रखा है :-)
     
     वैसे, अपनी पोस्टों पर डिस्टर्ब नहीं होना चाहता तो इसका मतलब यह नहीं कि आप लोगों को डिस्टर्ब न करूंगा। आप लोगों की पोस्टों पर मेरी ओर से जैसा बन पड़े, जब बन पड़े कमेंट होता रहेगा ......जब तक कि आप लोग स्वंय मेरे द्वारा डिस्टर्ब होने को तैयार बैठे हों :)  

- सतीश पंचम

(सभी चित्र नेट से साभार)

फोटो ब्लॉग 'Thoughts of a Lens'

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