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Tuesday, September 7, 2010

'वाहियात्मक खयालों' की 'चाय छानात्मक' बतकही .........सतीश पंचम

     आजकल बड़े वाहियातात्मक ख्याल उछलते कूदते मेरे मन में आ रहे हैं। वैसे, एक समय में कोई एक खयाल आए तो ठीक है, लेकिन ससुरे झड़ी बाँध कर आ रहे हैं और लगातार आए चले जा रहे हैं। 

अभी कल ही एक खयाल चाय छानते समय लटक गया,  कह रहा था  - स्टीफन हॉकिंग की ईश्वर के बारे में दी गई अवधारणा मान ली जाय तो धर्म के नाम पर खर्च होने वाले कितने तो पैसे बच जाएंगे। 
 मैंने भी सोचा हां, बात तो सच है। जब सब लोग मान लेंगे कि ईश्वर है ही नहीं, भगवान या खुदा है ही नहीं तो फिर झगड़ा किस बात का ? सभी लोग शांत होकर, शायद सोचने भी लगें कि यार मंदिर-मस्जिद पर इतना घमासान क्यों हो.....इतनी सारी माथाफोड़ी क्यों।

 उधर आतंकवादी भी कन्फ्यूजन में आ जाएंगे यार लड़ें तो किस बात पर लड़ें ?
 सबसे बुरी गत तो धर्म के नाम पर एक दूसरे को लड़ाने वाले राजनीतिक पार्टीयों की होगी। वो किससे कहें कि फलां विचारधारा भगवा रंगी है, फलां विचारधारा सब्ज़ रंग की है। मंदिर-मंस्जिद पर सारा ताकित- धिन, सारी बमचक धरी की धरी रह जाय। 

        इसके अलावा एक और नुकसान होने की संभावना है धार्मिक कर्मकांड वाले बंदों के लिए। अभी तो जिसे देखो चंदन टीका लगाकर रंगा सियार बना घूमता रहता है,  बाबाजी बना कहीं आश्रम खोल रहा है कहीं तंत्र साधना कर रहा है। मौका मिले तो कभी कभार नित्यांनंदात्मक भी हो उठता है। ऐसे लोगों की तो रोजी रोटी पर ही बन आएगी। 

     बेचारे क्या कमाएंगे, क्या खाएंगे। बोल बचन के अलावा ऐसे लोगों के पास और कोई गुण है भी नहीं, न बीटेक किए हैं, न MBA, न बी.एड., न बीपीएड..... और शायद कम्पटीशन देने की उम्र भी पार कर गए हैं ऐसे लोग। सरकारी नौकरी मिलने से रही। ये लोग करेंगे क्या आखिर। बहुत संभव है तब दया करते हुए सरकार Hawcking fund का एलान करे ताकि Stephen Hawcking के बताए नियमों के अनुसार जो लोग बेरोजगार हुए हैं, उन्हें कुछ महीने दर महीने मिलता रहे।

 वहीं साइड इफेक्ट के तौर पर यह भी हो सकता है कि तमाम चर्च, मस्जिद, मंदिर आदि सरकार द्वारा अपने कब्जे में ले लिए जांय यह कहते हुए कि  जब ईश्वर ही नहीं है तब इन स्थानों की, भवनों की आवश्कता ही नहीं रही। वहां पर जच्चा-बच्चा केन्द्र खोल दिया जाय या फिर किसी हाई-टेक नसबंदी केन्द्र की स्थापना कर दी जाय।

        ईश्वर के न होने से मामला प्रेमी जोड़ो के लिए भी थोड़ा-बहुत गड़बड़ा ही जाएगा।  जो प्रेमी अब तक अपनी प्रेयसी से बात करते वक्त बार बार कहते थे कि ईश्वर ने तुम्हे फुरसत से बनाया है..... वह अब कतराएंगे कि अब क्या कहा जाय, किस पर इस खूबसूरत बला को बनाने का आरोप मढ़ा जाय ?  और शायद कोई दिलफेंक आशिक इसी समय की ताक में हो और कह बैठे - क्या भगवान, क्या खुदा और क्या क्राईस्ट..... सब तो झूठे साबित हो गए.......अब ऐसे में कौन सा गोत्र, काहे का खाप.....काहे का बाप.....  आओ हम तुम अब एक हो जाएं.....धर्म की दीवारें तो अब अरराकर ढह चुकी हैं..... हमारे नये खुदा तो  हॉकिंग अंकल ही हैं  :) 




- सतीश पंचम


स्थान - वही, जहां के रंग ढंग देख कर Stephen Hawking द्वारा प्रतिपादित ईश्वरीय सत्ता के नकारने वाले विचारों पर सहज ही विश्वास करने को जी चाहता है। 


समय - वही, जब 'साईंस बुलेटिन' का  'ईश्वरीय अस्तित्व नहीं'  विशेषांक लेकर डाकिया स्वर्गलोक में ईश्वर के पास पहुँचे और कहे -  सर, इस Acknowledgement Card पर साईन कर दिजिए ताकि पता चल सके कि हाँ, सही जगह डिलीवरी हुई है।


( Stephen Hawking सहित अंतिम चित्र -  नेट से साभार )

25 comments:

Arvind Mishra said...

बढियां लपेट कर मारा है -:)

महेन्द्र मिश्र said...

जब रहेगा ही नहीं तो क्या डिलेवरी लेगा.....हा हा हा

गिरिजेश राव said...

कैमरे का ऐंगल जबरदस्त है और लेख की दिशा नई बनी सीधी चकरोड सी, जो लंठपुर जाती है। :)
धन्य हो।

ashish said...

बंधू ऐसे विचार तो खाली तोहरे खोपडिया में ही आ सकत है . और प्रेमी लोग हाकिंग अंकल की कसम तो तब भी खायेंगे .

संगीता पुरी said...

हा हा हा हा .. सोंचा तो मजेदार ही है !!

शोभना चौरे said...

ऐसे ख्याल तो प्याज की तरह परत दर खुलते ही जाते है अगर स्टीफन हॉकिंग की ईश्वर के बारे में दी गई अवधारणा मान ली जायतो आदिम युग में जाना ही बेहतर होगा \कैसा विकास ?
कैसी विद्वता ?सब कुछ वही? जहाँ से स्रष्टि शुरू हुई थी |और वही प्रश्न ?की पहले मुर्गी या फिर अंडा ?
शायद विषय से हटकर टिप्पणी हो गई |बहरहाल बहुत बढिया आपकी सोच और उसके परिणाम |मतलब ये तो तय है की इश्वर ने ये रोजगार के अवसर खुद दिए है मन्दिरों ,मस्जिदों ,गिरिजाघरो में बैठकर |

Pankaj Upadhyay (पंकज उपाध्याय) said...

बडी जबरदस्त सोच है.. एकदम झकास..

प्रवीण पाण्डेय said...

बड़ी रोचक परिकल्पना।

Udan Tashtari said...

बहुत सटीक महाराज!! जय हो!

DEEPAK BABA said...

हॉकिंग कसम, मज़ा आ गया.

PADMSINGH said...

वाह भाई वाह !

डॉ .अनुराग said...

...आदमी फिर कोई नयी चीज़ खोज लेगा लड़ने के वास्ते ...मसलन चाय....

anshumala said...

एक बात समझ नहीं आई की इतने बढ़िया ख्यालात को आपने वाहियात क्यों कहा है | बाबा हॉकिंग की बात मानने से ये हो सकता है तो इससे अच्छा और क्या हो सकता है |
बोलो हॉकिंग बाबा की जय |

सतीश पंचम said...

@ anshumala ji's comment

एक बात समझ नहीं आई की इतने बढ़िया ख्यालात को आपने वाहियात क्यों कहा है | बाबा हॉकिंग की बात मानने से ये हो सकता है तो इससे अच्छा और क्या हो सकता है |

अंशुमाला जी, मैने इन ख्यालों को वाहियात इसलिए कहा है क्योंकि यदि ईश्वर के अस्तित्व को नकारते हुए इस तरह के लाभ यदि लिए भी जांय तो भी इस सोच के छिपे हुए नुकसान बहुत ज्यादा हैं।

अभी तो हमारे मन में ईश्वर के प्रति सम्मान है, एक प्रकार का बंधन है जो हमें बुरे काम करने से थोड़ा बहुत रोकता भी है। हम व्याभिचार, हत्या आदि को अभी भी पाप की तरह ही मानते हैं और उसे करने से बचते हैं।

हम ही क्यों ज्यादातर इंसानी जमात इस तरह के पाप को मान्यता नहीं देता और इसके मूल में कहीं न कहीं ईश्वर के होने और उससे डरने का भाव भी है।

लेकिन यही ईश्वरीय डर यदि दिमाग से निकल जाय तो समूची मानव जाति संभवत: समय बीतने के साथ और भी खूँखार और दरिंदगी की हद पार कर जाय। तब न पाप करने का डर होगा न मरने के बाद वाले ईश्वरीय दंड की फिक्र ।

वैसे भी अभी ही जो हालात हैं धरती पर संभवत: कई लोग इस ईश्वरीय सत्ता को न मानने वाली विचारधारा पर कहीं कहीं चलते दिखाई देते हैं जिन्हें न पाप से मतलब है न पुण्य से।

और संभवत: पशुओं और इंसानों के बीच का एक फर्क यह भी है कि पशु ईश्वरोपासना, आराधना या पूजा आदि नहीं करते लेकिन इंसान करता है।

rashmi ravija said...

सतीश जी,
कई सारी बातें तो खुद आपने अपनी टिप्पणी में ही कह डालीं...एक बात और.... मुझे लगता है, ईश्वर पर आस्था ने समाज के बहुत बड़े प्रतिशत को मानसिक विक्षप्तता से बचाए रखा है...वरना दुख सहने के बहाने नहीं रहेंगे और मेंटल हॉस्पिटल हर गली-मोहल्ले में खोलने पड़ेंगे.

वैसे, ऐसे ख्यालात वाहियात ही सही..आते रहने चाहिए ...दूसरा पहलू भी बड़ा स्पष्ट नज़र आने लगता है.

ajit gupta said...

बहुत अच्‍छी पोस्‍
ट। आपने और रश्मि रविजा ने मेरी बात कह दी है।

Shiv said...

बहुत खूब पोस्ट.
इस पोस्ट को बहुत फुरसत से बनाया है आपने!!!
चाय छानात्मक पढ़कर मज़ा ही आ गया.

मनोज कुमार said...

आपका यह आलेख पढते हुए एक ख्याल आया। जितने भी ऐसे लोग आए, जिन्होंने स्थापित धार्मिक मान्यता के खिलाफ़ कोई थ्योरी दी, बाद में या तो खुद भगवान बन गये या समर्थकों द्वारा बना दिए गए, अगर उतने सफ़ल न हुए तो गुरु बन कर मोक्ष का नया मार्ग बताने लगे।
अब मोक्ष से यह भी ख्याल आया कि इस महाशय, स्टीफन हॉकिंग ने जैसा कहा है, वैसा हुआ और अगर ईश्‍वर न रहा, तो लोगों को मोक्ष कैसे प्राप्त होगा? शायद ये भी कोई थ्योरी ईज़ाद कर ही रहे होंगे। कोई नया रास्ता ....
देसिल बयना-खाने को लाई नहीं, मुँह पोछने को मिठाई!, “मनोज” पर, ... रोचक, मज़ेदार,...!

मनोज कुमार said...

ओह! एक बात तो छूट ही गई, वह भी बतानी है, मेरे पास भी ख़्यालात वाहियात टाइप का ही आए थे।

अभिषेक ओझा said...

मैं भी चाय बनाता हूँ फिर छानता हूँ शायद कोई छानात्मक आईडिया आ जाय :)

cmpershad said...

"धर्म के नाम पर खर्च होने वाले कितने तो पैसे बच जाएंगे।"

कितने हॉकिन्स चाहिए धर्म को डिस्मैन्टल करने के लिए :)

निशांत मिश्र - Nishant Mishra said...

नई पोस्ट पर ठेलने के लिए ये टिपण्णी टाइप की थी. उसपर तो कमेन्ट बंद किये बैठे हैं आप. और जब कमेन्ट डिसेबल कर ही दिए तो पोस्ट कमेन्ट करने के लिए लिंक क्यों दिखती है? ये रहा कमेन्ट.:-

हूँ. इन state-of-the-art बर्तनों के चक्कर में हम भी कई सामाजिक-आर्थिक-राजनैतिक विमर्श के शिकार हो चले हैं.

उसपर तुर्रा ये कि घर में दसियों नौन-स्टिक होने के बाद भी डेढ़ किलो की कढ़ाई में बने व्यंजन खाने में ही सार लगता है.

और मेरा थर्टी फाइव ईयर का एक्सपीरियंस यह कहता है कि कल्लू का हैंडल जल्द ही या तो ढीला पड़ जायेगा या उसका स्क्रू निकल जायेगा. फिर कल्लू अपनी कटी नाक के साथ खूब खिझायेगा.

और आप जिसे पतीला या टोप बता रहे हैं उसे हमारे यहाँ भगौना कहते हैं... छोटी हुई तो भगौनी.

अभिषेक ओझा said...

ऊपर वाली पोस्ट पर टिपण्णी क्यों डिसेबल्ड है?
फिलहाल सीधे वाले एरिया से चाय निकलने की कोशिश की क्या आपने? जो मुंह बना हुआ है उसे इग्नोर करिये और किसी और तरफ से ढार के देखिये.

अभिषेक ओझा said...

ऊपर वाली पोस्ट पर टिपण्णी क्यों डिसेबल्ड है?
फिलहाल सीधे वाले एरिया से चाय निकलने की कोशिश की क्या आपने? जो मुंह बना हुआ है उसे इग्नोर करिये और किसी और तरफ से ढार के देखिये.

अभिषेक ओझा said...

ऊपर वाली पोस्ट पर टिपण्णी क्यों डिसेबल्ड है?
फिलहाल सीधे वाले एरिया से चाय निकलने की कोशिश की क्या आपने? जो मुंह बना हुआ है उसे इग्नोर करिये और किसी और तरफ से ढार के देखिये.

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