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Saturday, September 4, 2010

सत्या फिल्म और स्टीफन हॉकिंग के बीच विचारों की साम्यता........ईश्वरीय नाप तौल......और..... अलहदा सवाल.......सतीश पंचम

        फिल्म सत्या में एक दृश्य है जिसमें एक थुलथुला सा गुण्डा, गैंग में नये आये सत्या  को एक घर दिखाते समय भगवान की तस्वीर की ओर इशारा करते हुए  कहता है – वो देख, भगवान भी है। भगवान को मानता है क्या ?

सत्या का जवाब होता है – नहीं।

     आज फिर से ठीक वही जवाब ईश्वर के बारे में स्टीफन हॉकिंग ने दिया है – नहीं।

 इस संसार को रचने में ईश्वर का कोई योगदान नहीं है।
 
     जाहिर है, अभी उनके इस जवाब पर ढेर सारे वाद विवाद होंगे, बहुत सारे सिम्पोजियम इन मुद्दों पर आयोजित किए जाएंगे। डायस के डायस धारदार बहसों से धुँआ हो उठेंगे। न जाने कितने शोधपत्र सामने आएंगे…..यह सब तो जब होंगे तब होंगे…… लेकिन इस जवाब ने मेरे मन में थोडी हलचल बढ़ा दी है।
    
       हलचल मचने की वजह है मेरी और श्रीमती जी के बीच पूजा के दौरान अगरबत्तीयों की संख्या पर यदाकदा होने वाली झिकझिक। सुबह नहाने के बाद हल्के गीले बदन रहते पूजा करते समय अक्सर तीन अगरबत्तीयां जलाता हूँ….जबकि श्रीमती जी का कहना है जलाना है तो दो जलाओ या तीन से ज्यादा जलाओ…. तीन नहीं….दोख होता है। मैं प्रतिवाद करता हूँ कि नहीं तीन क्यों नहीं। भगवान को इससे क्या मतलब कि  दो जलाउं या तीन। और वैसे भी मैं अगरबत्तीयां अपने लिए जलाता हूँ कि मुझे वातावरण थोड़ा सा सुगंधित और अच्छा सा लगे।  भगवान के लिए अगरबत्तीयाँ भला किस काम की ?  थक हार कर श्रीमती जी भुनभुनाते हुए किचन में चली जाती हैं।
  
  उधर अगरबत्ती जलाने के लिए माचिस न मिलने पर किचन के गैस चूल्हे की ओर रूख करता हूँ….लेकिन वहां भी रोक छेंक…..अगरबत्ती लिए यहां क्यों चले आए…..यहीं पर जूठ कांठ पड़ा है और उसी में अगरबत्ती भी जलाओगे……भगवान खुस्स हो जाएंगे ऐसी जूठी पूजा पर …..।  मैं उसी तरह गीले बदन माचिस की खोजबीन करना शुरू करता हूँ और संयोग से माचिस मिल भी गई। चलो, गैस चूल्हे के जूठ कांठ वाली अग्नि की बजाय एक फ्रेश अग्नि से भगवान की पूजा करने का अवसर मिला….और मैं माचिस की डिबिया से तीली निकाल कर रगड़ देता हूँ……चिक्क्……
   
     एक हाथ में जलती तीली और दूसरे हाथ में तीन अगरबत्तीयाँ……..हवा से बचाते हुए जब उन्हें जलाया जाता है तो हाथों के अंगूठे और तर्जनी के जोड़ अनायास ही बुद्ध के हाथों की याद दिला जाते हैं…….. जब तक मैं अपने हाथों की इस मुद्रा पर ध्यान दूँ…… बिग बैंग हो चुका होता है…………..अगरबत्ती सुलग उठी होती है और मन ही मन ईश्वरीय बुदबुदाहट शुरू ।
   
     लेकिन आगे एक और बहस। भोजन में तीन रोटीयां लेने पर फिर बवाल कि तीन रोटी नहीं खानी चाहिए…..चार लिजिए।  लेकिन मेरी जिद….तीन ही खानी है।

   अच्छा तो ये लो……और उस तीसरी रोटी में से भी एक छोटा सा हि्सा कुपुट कर अलग कर दिया गया। ये लो अब तीन से कम हो गई। जब देखो तब अपने मन की ही करोगे।
 
    मैं मन ही मन भुनभुनाता हूँ…..महिलाएं इतनी धर्मभीरू क्यों होती हैं। जब देखो तब पूजा-पाठ, व्रत, उपवास, एकादशी, चतुर्दशी। इन्हें इतना ज्यादा पूजा-पाठ में संलग्न रहना पसंद है क्या ? 

  लेकिन  स्टीफन हॉकिंग  ने तो मेरी उस रोजाना की झिकझिक को दरकिनार करने का आसान सा उपाय ही बता दिया - कि ईश्वर है ही नहीं तो अगरबत्तीयां किसके लिए जलाओगे……भक्ति भाव किसके लिए और क्यों प्रदर्शित करोगे। पाप और पुण्य की फिक्र क्यों किया जाय……किसके लिए की जाय।
 
     याद आता है वह दिन जब अपने कश्मीरी पंडत  डॉक्टर गुप्ता के यहां मैं दवा लेने गया था तब वहां एक लड़की अपनी मां के साथ आई थी। बीमार….लाचार हालात में।
 
   पता चला कि इस पंजाबी लड़की का विवाह कनाडा के किसी शख्स से हुआ, जिसने कि विवाह के बाद पैसे, दान-दहेज आदि लेकर उसे यहीं भारत में छोड़ दिया है और वापस कनाडा चला गया है।  पिछली रात इस लड़की ने सुसाईड करने की कोशिश की। डॉक्टर गुप्ता ने मामला संभाल लिया और पुलिस केस बनते बनते रह गया।
  
   क्लिनिक में ही डॉक्टर गुप्ता ने उस लड़की से मुखातिब होते हुए कहा- कु़ड़िए…..किस वास्ते  तू परेशान है…….याद राखी उपर वाले दे लाठी विच वाज नहीं हुंदी……तूं फिकर ना कर असी हां…….ओ रब्ब इक दरवाजे बंद करदा ए ते दूजे दस्स दरवाजे होर खोल दिंदा ए…..तूं कोई टेंशन ना लई। 

    डॉक्टर गुप्ता,  जिनकी बातों से ही आधी बीमारी दूर हो जाती है । उनके द्वारा यह कहना कि उपर वाले की लाठी में आवाज नहीं होती…..उसी ईश्वरीय अस्तित्व को  स्वीकार करने की एक कोशिश है, एक ऐसा विश्वास है जो कहता है कि दंड देने वाला ईश्वर अभी मौजूद है। जो जैसा करेगा वैसा उसे दंड जरूर मिलेगा।
   
     संभवत: ये आस्था और विश्वास उसी ईश्वरीय अस्तित्व के होने की पुष्टि करते प्रतीत होते है….लेकिन विज्ञान तो आस्था और विश्वास से नहीं चलता न……..उसके भी नियम और कायदे हैं……..कई रूल्स और  अल्गोरिथम्स है जिन्हें यदि  नकार दिया जाय तो समूची दुनिया केवल एक जादुई मायाजाल सी लगे। सबकुछ गड्ड मड्ड।  कहां, क्या, कैसे कब…… सब कुछ धुआं-धुआं।
  
    यह तमाम भौतिकी के नियम, सूत्र और परिकल्पनाएं ही हैं जो कि दुनिया को एक मुकम्मल शक्ल देने की कूवत रखते हैं । जिज्ञासा की बगिया में  कुलांचे मारते हुए किए गये ढेरों अविष्कार, ये तमाम साजो सामान….. घड़ियां, पहिये, पैसे, आग  से लेकर आग्नेयास्त्र तक के निर्माण की क्षमता यही भौतिकी के नियम के तहत ही बन पाते हैं, एक विशेष प्रक्रिया के तहत ही संपन्न हो पाते हैं।
  
      लेकिन  इतना होने पर भी आखिर क्या वजह है कि इसरो जब कभी भारत के आसमान में उपग्रह छोड़ता है तो बड़े से बड़ा वैज्ञानिक भी प्रोजेक्ट की सही सलामती के लिए अगरबत्ती जलाने, नारियल फोड़ने, और दीप जलाने  के बाद ही उपग्रह की ओर बढ़ उसे आसमान की ओर विदा करता है। क्या वजह है कि अस्पताल में ऑपरेशन थियेटर के बाहर हाथ खुद ब खुद जुड़ जाते हैं उस अज्ञात ईश्वरीय शक्ति के प्रति जिसे कि कभी किसी ने प्रत्यक्ष देखा तक नहीं है।
 
   ये और इस तरह के  ऐसे  ढेरों सवाल लंबे समय से अनुत्तरित ही रहे हैं, मानों अनुत्तरित रहना ही उनकी नियति हो।  और सच कहूं तो जब तक इस तरह के प्रश्न अनुत्तरीत बने रहते हैं,  तब तक इस तरह के  प्रश्नों की  खूबसूरती भी बरकरार रहती है।

मेरे विचार से उन्हीं ढेरों खूबसूरत प्रश्नों में से ही एक अनुत्तरित प्रश्न यह  भी है  – ईश्वर का अस्तित्व है या नहीं ?
   
फिलहाल गुलज़ार की एक नज़्म को कोट करना चाहूंगा जिसमें वह कहते हैं  -

चिपचिपे दूध से नहलाते हैं
आंगन में खड़ा कर के तुम्हें ।
शहद भी, तेल भी, हल्दी भी, ना जाने क्या क्या
घोल के सर पे लुढ़काते हैं गिलसियाँ भर के
औरतें गाती हैं जब तीव्र सुरों में मिल कर
पाँव पर पाँव लगाए खड़े रहते हो
इक पथराई सी मुस्कान लिए
बुत नहीं हो तो परेशानी तो होती होगी ।
जब धुआँ देता, लगातार पुजारी
घी जलाता है कई तरह के छौंके देकर
इक जरा छींक ही दो तुम,
तो यकीं आए कि सब देख रहे हो ।

  
  ********************


- सतीश पंचम

(सभी चित्र नेट से साभार )

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27 comments:

मनोज कुमार said...

बेहतरीन। लाजवाब।

फ़ुरसत में .. कुल्हड़ की चाय, “मनोज” पर, ... आमंत्रित हैं!

rashmi ravija said...

कमाल की पोस्ट है....सारा अंतर ही उंडेल दिया...सबके मन में ऐसे भाव आते ही हैं...और कई अनुत्तरित प्रश्न छोड़ जाते हैं...गुलज़ार की नज़्म में भी यही सवाल है.

ईश्वर है या नहीं...यह तो अपनी अपनी आस्था है...लेकिन ईश्वर पर विश्वास बड़ी बड़ी विपत्तियों को झेलने की क्षमता प्रदान करता है...कुछ भी हो ' ईश्वर की यही मर्जी थी' कह मन को सांत्वना दे दी जाती है या फिर 'ईश्वर के घर में देर हैं, अंधेर नहीं' यह विश्वास भी जीने का संबल प्रदान करता है .नहीं तो हर आदमी 'स्टीफन हॉकिंग, जैसा ज्ञानी या फिर 'सत्या' के मवाली जैसा निडर तो नहीं हो सकता ...इसलिए आम आदमी सब भला-बुरा ईश्वर के ऊपर छोड़ चैन से जीता है.

अक्सर यह शेर ध्यान में आ जाता है..

फलसफी की बहस के अंदर ,ख़ुदा मिलता नहीं
डोर को सुलझा रहा, और सिरा मिलता नहीं.

तीन अगरबत्ती वाली बात भी खूब कही...उत्तर-भारत में तीन अंक को अपशकुन मानते हैं ...और बचपन से ये बातें इतनी गहरी जड़ें जमा चुकी हैं...कि आसानी से इनसे छुटकारा पाना मुमकिन नहीं. यहाँ महाराष्ट्र में ऐसा नहीं मानते इसलिए पहले अक्सर जब तीन मिठाई या कुछ भी तीन चीज़ें प्लेट में परस कर पेश की जातीं तो अटपटा लगता...अब तो आदत हो गयी है..पर फिर भी मैं, खुद किसी को तीन चीज़ें नहीं पेश कर पाती. इसमें धर्मभीरु होने जैसा कुछ नहीं..बस आदत सी हो जाती है.

Himanshu Mohan said...

मज़ा आया, और इसीलिए मैं भी आया था। मैं जा रहा हूँ, मगर मज़ा जाएगा नहीं, जो चाहे आकर ले सकता है।
मज़ा भी ईश्वर ही है, और ईश्वर के विभिन्न रूपों में से अनेक रूपों के बारे में यह भी प्रचलित है कि उन मन्दिरों में कोई एक बार दर्शन कर आए - तो कम से कम तीन बार बुलाते हैं ईश-अंश उसे अपने उसी दरबार में।
अब वहाँ तीन सही है, ये तीन हो या चार,
गड़बड़ मनुष्यों - खासकर पुरुषों में ही है यार!
वरना तीन देवियाँ…

ज़ाकिर अली ‘रजनीश’ said...

सतीश भाई, आपकी लेखनी का मुरीद हो गया। सत्या, स्टीफन हॉकिंग और ईश्वरीय उपस्थित का सवाल, लाजवाब कर दिया आपने।
………….
जिनके आने से बढ़ गई रौनक..
...एक बार फिरसे आभार व्यक्त करता हूँ।

DEEPAK BABA said...

पंचम दा, जवाब नई....... कपिल इस्टाइल में.

सुबह कि पूजा से लेकर ३ रोटी तक की किल-किल अपन कि दिनचर्या का हिस्सा है.........

पढ़ तो आपकी पोस्ट रहे थे ........ पर दिमाग में अपने घर की फिल्म चल रही थी...........

वधिया ....

निशांत मिश्र - Nishant Mishra said...

बहुत कुछ लिखन चाहता हूँ पर फिलहाल अगरबत्तियों की संख्या पर ही कह देता हूँ. कुछ दिनों पहले टी वी पर एक बाबाजी से सुना है कि हमेशा विषम संख्या में ही अगरबत्तियां जलानी चाहिए, मतलब, एक, तीन, पांच आदि. कारण न तो उन्होंने बताया न किसी ने पूछा. कारण बताते भी तो कुछ बेसिरपैर ही होता.
और मुझे भी टिफिन में दो रोटी साबुत और एक टूटी हुई मिलती है.

अपुन के दिमाग में भी घरिच्च की फिल्म चल रेली है बीडू!

Arvind Mishra said...

प्रवीण शाह जी के पोस्ट का तार्किक एइक्स्तेन्शन -कहीं यह ईश्वरीय प्रेरणा ही तो नहीं जो उनके अस्तित्व को नकार जाती है ..... :)

cmpershad said...

अरे........ सत्या तो स्टीफ़न निकला :)

प्रवीण पाण्डेय said...

महिलायें बहुत समझदार होती हैं। ईश्वर हो भी सकता है क्योंकि हॉकिंग जी की थ्योरी कल कोई पंचर कर देगा। तब भगवान निकल आया तो।

शोभना चौरे said...

सतीशजी
सच है ये प्रश्न हर किसी के मन में उठते है और आस्था उत्तर धुन्धती है \कही न कही आप भी तो इसी आस्था से जुड़े है तभी तो नहा कर गीला बदन ही अगर बत्ती जलाते है भले ही सुगंध के लिए कितु जलाते तो घर के मन्दिर में ही है न ?ये सब चीजे रस बस गई है हमारे जीवन के साथ | तीन का आंकड़ा इसान की अंतिम क्रिया के समय ही उपयोग में लाया जाता है इसलिए हम महिलाये अन्दर तक डर जाती है इनके साथ जुडी हुई मान्यताओ से |फिर भी" मानो तो देव नहीं तो पत्थर "|गुलजार जी की नज्म का तो जवाब नहीं |
वैसे मैंने अपनी बुद्धि से लिखा तो है प् आपकी पोस्ट का जवाब नहीं ?
आभार

Vivek Rastogi said...

ये तीन का आंकड़ा वाकई हमें भी शुरु से अच्छा नहीं बताया गया है, ये सब लड़ाई हमारे यहाँ भी चलती हैं, अगरबत्ती कितनी जलायें, कहाँ से सुलगायें, अगर गैस जल रही होती है तो हम माचिस की बचत करने से चूकते नहीं हैं, और बात भी सुनते रहते हैं, अब तो आदत पड़ गयी है :) हम कहते हैं कि हम भी तीन तारीख की ही पैदाईश हैं....... फ़िर....

हमारे एक मित्र थे उनका रिकार्ड थोड़ा खराब था, एक बार बहुत दिनों बाद जेल से बाहर आये और मंदिर में प्रसाद चढ़ा कर आये, फ़िर निकले पूरी कॉलोनी में प्रसाद बांटने, पर उनकी भी किस्मत देखिये कि हर बार तीन चिरौंजी दाने ही निकल कर आते, तो बोलते कि बाहर निकले नहीं कि लगता है कि वापिस से अंदर जाने की तैयारी शुरु हो गई है।

वैसे भी दाढ़ी कब बनायी जाये, बाल कब काटे जायें, सबके निर्धारित दिन हैं।

पर पता नहीं किसी इंसान से बात करने से उतना सुकून महसूस नहीं होता जितना कि भगवान के मंदिर में जाकर दो फ़ूल चढ़ाने से और उनके दर्शन से होता है।

हम तो पक्के आस्तिक हैं, बिना भोले बाबा बोले तो अपना दिन ही नहीं जाता।

काजल कुमार Kajal Kumar said...

मन की हार्ड डिस्क बड़ी पुख्ता होती है, कुछ भी ऊल-जुलूल मिटाने के मामले में पर उतनी ही कोमल होती है कुछ भी लिख लेने के मामले में....इसे बहुत बाँध-लपेट कर रखने की ज़रूरत होती है.

मो सम कौन ? said...

हमें तो ’पडौसन. फ़िल्म का मुकाबले वाला गाना याद आ गया, कभी घोड़ा कभी नार, कभी घोड़ा कभी नार।
उसी अंदाज में कभी सत्या, कभी स्टीफ़न, कभी बुद्ध मुद्रा और कभी अगरबत्ती। थका दिया सतीश भाई।
बहुत जोरदार प्रतीकों से भरी पोस्ट। खालिस पंचम इश्टाईल में।

ओशो रजनीश said...

इक जरा छींक ही दो तुम,
तो यकीं आए कि सब देख रहे हो ।
भई वाह सतीस जी, बेहतरीन
जब में ये कार्यक्रम देख रहा था तो हमारी श्रीमती जी न जाने क्यों स्टीफन हाकिंग को ही कह रही थी ऐसे सोच है तभी तो भगवन ने ऐसे हालत की है .........
http://oshotheone.blogspot.com/

अभिषेक ओझा said...

जीने का बहाना तो दे ही जाता है 'भगवान का कांसेप्ट'. कितने ही बस इसी कांसेप्ट पर जिंदगी निकाल देते हैं. बहुत बढ़िया कांसेप्ट है ये. अगर सही से लिया जाये तो. बाकी अगरबत्ति दो हो या तीन फर्क नहीं पड़ता है. अगर भगवान इतने से नाराज हो गए तो भगवान ही किस बात के ? :)

सतीश पंचम said...

गिरिजेश जी की ई-मेल प्राप्त टिप्पणी----


तबियत हरी कर दी मित्र! कभी कभी रंगीनियत के उपज की कोई वजह नहीं होती।
गुलज़ार नहीं जमे। अब लठ्ठ लेकर मेरे ऊपर पिल न पड़ना! यहाँ भी दिल की न कहूँ तो कहाँ कहूँ?

@ ये और इस तरह के ऐसे ढेरों सवाल लंबे समय से अनुत्तरित ही रहे हैं, मानों अनुत्तरित रहना ही उनकी नियति हो। और सच कहूं तो जब तक इस तरह के प्रश्न अनुत्तरीत बने रहते हैं, तब तक इस तरह के प्रश्नों की खूबसूरती भी बरकरार रहती है।

ऐसा ही एक प्रश्न 'प्रेम' है दोस्त। जितना ही तलाशता हूँ उतना ही नया मिलता जाता है। फिर लगता है कुछ हासिल ही नहीं हुआ, कहीं पहुँचे ही नहीं लेकिन सुन्दरता बरकरार रहती है और मैं तलाश में चलता ही जाता हूँ....
... ये क्या ज़मीं है दोस्तों !

अनूप शुक्ल said...

स्टीफ़ेन हाकिंग और हमारे तमाम वैज्ञानिक इस तरह के बयान देते हैं तो लगता है वे कविता कर रहे हैं। इनके पीछे उनका अनुभव होगा शायद और सहज मन। मैं यह नहीं कह रहा हूं कि भगवान है या होता है।

महिलाओं की सहज बुद्धि बहुत अच्छी होती है। अपने घर में ही देखिये कभी तीन का अंक ही उपयोग हो जायेगा और तब उसके पीछे के तर्क देखियेगा- राप्चिक होगा। :)

जहां तक तीन की बात है तो आपकी श्रीमतीजी चीजों को मुकम्मल देखना चाहती होंगी, जोड़े से।
तीन में एक जोड़ा रहता है और एक छुट्टा। इस नजरिये से देखिये उनकी बात खूबसूरत लगेगी।

सतीश पंचम said...

@ अनूप जी's comment

अपने घर में ही देखिये कभी तीन का अंक ही उपयोग हो जायेगा और तब उसके पीछे के तर्क देखियेगा- राप्चिक होगा। :)


अनूप जी, मेरे घर में राप्चिक रिजल्ट तो है.......मेरे तीन बच्चे :)

अब ऐसे में क्या तर्क और क्या वितर्क :)

हमारीवाणी.कॉम said...

बढ़िया है.

क्या आप हिंदी ब्लॉग संकलक हमारीवाणी.कॉम के सदस्य हैं?

दीपशिखा वर्मा / DEEPSHIKHA VERMA said...

"अच्छा तो ये लो……और उस तीसरी रोटी में से भी एक छोटा सा हि्सा कुपुट कर अलग कर दिया गया। ये लो अब तीन से कम हो गई।" :)

हमारे घर कि भी यही कथा है , और हमारे घर कि क्यों हो यु .पी , बिहार के घरों में तो आम आम ..

बाकी रही स्टेफेन जी कि बात, मैं भी खुश हूँ उनकी नयी उछाल से .. नकार दो उसे जिसने इतनो को उलझा रखा ..खैर सच ये है जब काम का तब राम राम , वरना क्या काम !

Udan Tashtari said...

स्टीफ़ेन हाकिंग- बस :)

लाजबाब लेखन हमेशा की तरह मोहित करता.

शोभा said...

टीवी में अगरबत्ती का विज्ञापन नहीं देखा जो भगवान की उपयोगिता बताते है.

संगीता पुरी said...

मेरे विचार से उन्हीं ढेरों खूबसूरत प्रश्नों में से ही एक अनुत्तरित प्रश्न यह भी है – ईश्वर का अस्तित्व है या नहीं ?
बहुत बढिया विश्‍लेषण .. गुलज़ार की इस नज़्म का भी जबाब नहीं !!

शोभा said...

३ महीने के बाद इस टॉपिक पर लिखना प्रासंगिक तो नहीं है पर अभी अभी मेरी बेटी की शादी हुई है. शादी के दौरान सभी मुझे ३ और काले से डराते रहे . एक सुझाव तो ये आया था कि अभी घर में कोई चीज काली मत रहने दो. तो मेरा सवाल था की अपने बालो और आँखों का क्या करू? क्या इन्हे भी निकाल दूँ ?

vikas said...
This comment has been removed by the author.
vikas said...

बहुत ही सुन्दर रचना

vikas said...

बहुत ही सुन्दर रचना

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