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Wednesday, August 4, 2010

इस फिल्म ने तो मन मोह लिया....शहरी.....दड़बाई.....रहन सहन की मुसीबतों के बीच अपने अनोखे ह्यूमर को दर्शाती एक बेहतरीन फिल्म है 'पिया का घर' ......सतीश पंचम

    आज  घर में सुबह-सुबह एक मजेदार फिल्म देखी 'पिया का घर' ।  मजेदार इस मायने में कि फिल्म की कहानी जरा हट कर है।  फिल्म का नायक राम ( अनिल धवन) अपनी नवविवाहिता पत्नी मालती ( जया भादुड़ी - तब तक वह जया बच्चन नहीं हुईं थी ) से विवाह कर उसे शहर में अपने घर मुंबई में ले आता है ।

    विवाह अरेंज्ड ही था.... सो जाहिर है फिल्म में प्यार व्यार का लफड़ा नहीं रखा गया। जो कुछ था एक आम रूटीन तरीके से था कि दो लोगों का विवाह बड़ों ने तय किया और गाँव की रहने वाली लड़की को शहरी लड़का ब्याह कर अपने शहर वाले छोटे से घर में लाया जहाँ कि पहले से ही उसके विवाहित बड़े भइया का परिवार और माँ-पिताजी साथ रहते हैं।

 अब असली मुसीबत शुरू होती है कि इतना बड़ा परिवार इतने छोटे घर में कैसे एडजस्ट करे। तो एक ओर केबिननुमा दड़बे वाले रूम में दूल्हे राम के बड़े भाई अपनी पत्नी के साथ सोते हैं तो दूसरी ओर किचन में नई नवेली आई दुल्हन मालती सोती है। बाहर वाले कमरे में राम के पिताजी, उसका छोटा भाई और माँ आदि सोते हैं। इधर राम की आदत थी कि वह शादी से पहले घर के बाहर गलियारे में सोता था।  अब जबकि शादी हो गई तो जाहिर है कि उसे भी किचन में सोना पड़ेगा।

  लेकिन किचन की मुसीबतें अलग थी....वहाँ सोने पर रात बिरात किसी को प्यास वगैरह लगती तो दरवाजा खटखटाया जाता......पीने का पानी आ जाने पर जल्दी उठ जाना पड़ता ताकि इससे पहले कि म्युनिस्पैलिटी का पानी चला जाए....पानी भर-भूर लो ..... और एक मुसीबत यह भी थी कि   किचन की खिड़की के कब्जे  ठीक न होने के कारण वह बंद नहीं हो पाती थी.....नतीजतन राम  वहां अपनी शर्ट टांग कर आड़ करता तो कभी चादर या लुँगी. लेकिन किचन की खिड़की थी कि वहां हवा लगते ही सब कपड़े जो टांगे जाते थे गिर जाते थे...... .और अगर मान लो सब कुछ ठीक ठाक रहता तो चूहेराम का आना जाना लगा रहता....जिससे उस नवविवाहित जोड़े के प्रेमालाप में खलल पड़ना स्वाभाविक  था।

         इसी बीच बड़े भाई के कमरे से भाभी और बड़े भाई की बातचीत वाली डिस्टर्बिंग आवाजें भी आती थीं.....जिससे नवविवाहित जोडे ने अनुमान लगाया कि उनकी आपसी बातें आदि भी वह लोग सुन  पाते होंगे... आखिर दोनों के बीच पार्टीशन भी तो केवल लकड़ी का ही था.......बड़ी मुसीबत।  चिढ़ कर राम ने फिर से गलियारे का रूख किया.....वह रोज रोज के तरह तरह के डिस्टर्बेंस से तंग आ गया था। अपने मित्र अरूण ( पेंटल) से राम अपनी इस मुसीबत की चर्चा करता है कि कैसे उसे बाहर सोना पड़ता है जबकि उसकी नवविवाहिता पत्नी किचन के अंदर।

 तो सोच विचार कर प्लान यह बनता है कि एक दिन घर के सभी लोग बाहर घूमने जांय, फिल्म वगैरह देखें और उस दिन राम ऑफिस से जल्दी आ जाय ताकि उसे अपनी पत्नी संग समय बिताने का मौका मिले। यह खटकर्म भी किया जाता है लेकिन मुसीबत फिर भी पीछा नहीं छोड़ती......घर के लोग तो बाहर जाते हैं लेकिन ऐसे में ही कोई एक पुराना मित्र पत्नी सहित आ धमकता है और नतीजा.....पूरी प्लानिंग टांय...टांय फिस्स।

 ऐसे ही हल्के फुल्के क्षणों और मुसीबतों को दर्शाती फिल्म है पिया का घर जो कि 1972 में बासु चटर्जी के निर्देशन में बनी थी।

 फिल्म के मुख्य आकर्षण हैं छोटी छोटी रोजमर्रा की चीजों में ढूँढा गया ह्यूमर.....। बाहर वाले कमरे में नवविवाहिता बहू घर के अन्य सदस्यों की जिद पर   कैरम खेलती है जबकि भीतर किचन में राम अपनी दुल्हन का इंतजार करता है कि अब आऐ.....तब आए......ऐसे में राम की भाभी दोनों को मौका देने के लिए किचन से सुपारी का डिब्बा लाने मालती को भेजती है.......लेकिन वहां जाते ही राम धर लेता है.....किसी तरह मना ओना कर मालती सुपारी का डिब्बा लिए बाहर जाती है कि लोग बाहर बैठे हैं और हम दोनों अंदर रहेंगे तो क्या सोचेंगे......।

  ऐसी ही ढेरों बातों का हल्का फुल्का सम्मिश्रण है 'पिया का घर' .

 विशेष  नोट - फिल्म में  हांलाकि कोई एडल्ट सीन नहीं है......लेकिन  इस फिल्म को हो सके तो बच्चों के साथ बैठकर न देखें क्योंकि उनकी शंकित निगाहें आपको थोडा़ सा कसमसाने पर मजबूर कर सकती हैं और मजा किरकिरा हो सकता है : )

- सतीश पंचम

स्थान - वही, जहाँ इस तरह के मुसीबतों से दो चार होना आम बात मानी जाती है।

समय - वही, जब ट्रेन में अपनी पत्नी मालती को लोअर बर्थ पर सोता देख.....अप्पर बर्थ पर सोया राम  पानी पीने के बहाने नीचे उतरता है और सुराही से पानी उड़ेलते वक्त नई दुल्हन को छूने-छाने की कोशिश करता है :)

28 comments:

बेचैन आत्मा said...

पाताल से ढूंढ लाते हैं खुशी
आप को पढ़ कर मिलती है खुशी.

rashmi ravija said...

ये फिल्म तो मुझे भी देखनी है...एक तो जया भादुरी मेरी फेवरिट (आज तक हैं )

और जब मैने अपनी कहानी में मुंबई में 'स्मिता ' की ज़िन्दगी का जिक्र किया , कई लोगों ने कमेन्ट में कहा,इस फिल्म जैसी लगी...कहाँ से मिल जाती हैं ,आपको ऐसी फिल्मे :(

kshama said...

Ye jeevan hai...'yah isi filmkaa geet.Mool film pahle Marathime bani aur baadme hindime.Saaf suthari achhee film!

सतीश पंचम said...

रश्मि जी,

अंधेरी स्टेशन के ईस्ट में चकाला की तरफ जाते वक्त रास्तें में गणेश मंदिर के जस्ट पहले एक दुकान पड़ती है.....वहां मैने अकसर इस तरह की पुरानी फिल्मों का स्टॉक देखा है.....वहीं से अक्सर मैं लाता हूँ इस तरह की फिल्मों की सीडी।

और नेट पर बुक करने पर भी मिलती हैं.... www.induna.com से तो मैंने कई बार सीडी मंगाई हैं....कई दुर्लभ फिल्मों का संग्रह है www.induna.com के पास।

सतीश पंचम said...

शमां जी,

जानकारी के लिए शुक्रिया.....मुझे नहीं पता था कि पहले यह फिल्म मराठी में बन चुकी है।

और हाँ....फिल्म बेशक साफ सुथरी है लेकिन कई दृश्य और उनके संवाद इतने ज्यादा क्लोज है कि बच्चों के साथ देखने पर कई बार कसमसाना पड़ता है.....जैसे कि जब रसोई में पहली रात मालती और राम को सोना पड़ता है तब शरारती भाभी के कारण खटिया में से आवाजें आती हैं और मजबूरन उन दोनो को जमीन पर चटाई बिछाकर सोना पड़ता है.....

ऐसा ही एक दृश्य और है जब राम की भाभी गाँव में शादी के दौरान राम और मालती को शादी से पहले मिलाने का इंतजाम करती है और दोनों को एक कमरे में एक एक कर बहाने से भेजती है।

हांलाकि यह सब सिचुएशन आज कल की बनने वाली नंगई वाली फिल्मों के मुकाबले बेहद साफ सुथरे हैं लेकिन फिल्म के अनबोले संवाद और उससे बनने वाले दृश्य से भावनाएं कहीं ज्यादा मारक हो जाती हैं और यही बासु चटर्जी जी की कलाकारी भी है...... ऐसे में बेहतर है कि बच्चों के साथ फिल्म को न देखा जाय।

और वह गाना तो मेरा फेवरेट भी है....ये जीवन हैं....इस जीवन में सारे सपने...यही है ...यही है रंग रूप।

शोभना चौरे said...

अरे ये तो हमारी जमाने की पिक्चर है ,गुड्डी पिया का घर ,उपहार गोल्डन जमाने की गोल्डन पिक्चर |

मो सम कौन ? said...

बढ़िया फ़िल्म की बहुत बढि़या समीक्षा की है सतीश भाई।
संबंधित विषय पर ही मंटो की एक कहानी है, कभी पढ़ देखियेगा। हास्य,विद्रूप और हां वो हमारी बोल्डनेस भी, गज़ब का ब्लेंड है। नाम शायद ’आवाजें’ है उस कहानी का।
अब प्रीरिकार्डेड मैसेज की तर्ज पर ’यदि आप अपने बिल का भुगतान पहले ही कर चुके हैं तो कृपया इस संदेश को इग्नोर कर दें।’ ज्यादा चांस वैसे यही हैं कि आपने पहले ही पढ़ रखी होगी, हा हा हा।

प्रवीण पाण्डेय said...

फिल्म देखी है, पुनः देख कर यादें ताज़ा कर लेते हैं।

सतीश पंचम said...

संजय जी,

मंटो की कहाँनिया मैंने ज्यादा नहीं पढ़ी हैं लेकिन जितनी भी पढ़ी हैं सभी अच्छी लगीं हैं।

आपने जब सजेस्ट किया है तो निश्चित ही ढूँढ कर पढूँगा।

Mithilesh dubey said...

हाहाहाहाह भईया आपका भी जवाब नहीं है। सही कह रहा हूं देखने में इतन मजा ना आता जितना मजा आपके विवरण को पढकर आया। बेचारे हिरो को क्या कहूं, लगता है शादी सही लगन में नहीं हुई थी।।।।।।।।

मनोज कुमार said...

बहुत बचपन में देखी थी यह फ़िल्म, अकेले। तब ज़्यादा समझ में नहीं आई थी। आज आपके साथ देखकर फ़िल्म समझा भी।

'अदा' said...

मैंने तो ये फिल्म देखी ही नहीं है..
अब इतना अच्छा विवरण मिला पढने को ..तो शायद देखने का आनन्द कई गुना बढ़ जाए...
आज ही कोशिश करती हूँ देखने की..
आपका हृदय से शुक्रिया..

Arvind Mishra said...

शायद यह फिल्म मैं देख नहीं पाया -आपने परिचय करा दिया ! शुक्रिया !

अनूप शुक्ल said...

गजब सिनेमा है।

गिरिजेश राव said...

यह फिल्म देखी हुई है। वासु दा की सारी फिल्में एक ऐसे व्याकरण में निबद्ध हैं जो बस उन्हें ही आता था।

रही बात विवाह के बाद साथ सोने की तो ये बताइए कि क्या होता था जब गाँव में हमलोगों से दशएक साल बड़े भाइयों की शादियाँ होती थीं? ... एक दृश्य बता रहा हूँ:
गर्मी का महीना है। कोठरी के दरवाजे पर ईया सोई हुई हैं जो सोती कम हैं,खाँसती अधिक हैं। दरवाजा थोड़ा सा खुलता है। दुआरे सोए भैया दबे पाँव (चप्पलें हाथ में हैं)उठते हैं... दरवाज़ा धीरे से खोलते हैं... चिर्र sss ... ईया चिल्लाने लगती हैं - चोर, चोर।
हे राम ! सपने बहुत सताते हैं। भगवान कब बुलाएँगे अपने पास।
भाभी का बुलाना निष्फल हो जाता है। मुल्तवी - अगली रात तक के लिए।

ये कोई गप्प नहीं है।

सतीश पंचम said...

क्या गिरिजेश जी,

कहाँ की रूमानी यादें दिला गए....खांसता बुढ़ापा.....अंधेरी रतिया.....कहीं भूँकता कुत्ता...कहीं जलती ढिबरी....और ऐसे में चप्पलों को उतार कर हाथ में ले दबे पाँव कोई जब अपनी ही पत्नी के पास इस तरह जाय मानों कोई चोरी करने जा रहा हो....तो समझिए....कि कितना आनंद होता है उस दृश्य में....यह रोक-छेंक....ढंके छुपे मिलन वाले क्षण विवाहित जीवन में एक नया रस घोलते हैं.....महसूस होता है कि हाँ मैं अब भी कॉलेज में हूँ...अपनी गर्ल फ्रेंण्ड से मिलने जा रहा हूँ.....

यह सिर्फ गँवईं गोपन में ही संभव है.....कि अपनी पत्नी से मिलने के लिए भी चोर की तरह जाना पड़े....और उसका आनंद भी :)

वो जो गाना था कि चलो एक बार फिर से अजनबी बन जांय हम दोनो .... एकदम फिट बैठता है गँवई विवाहित जीवन की यादों की चोरहट पर :)


और गाने की वह पंक्तियाँ तो लगता है ऐसे ही किसी क्षण के लिए लिखीं गईं थी कि जिसमें पत्नी भी प्रेयसी की तरह लगे ...और उससे इजहारे-प्यार का अंदाज भी .....तभी तो गीत कहता है कि -

तुम्हें भी कोई उलझन रोकती है पेशकदमी से
मुझे भी लोग कहते हैं कि ये जलवे पराए हैं


क्या क्या याद दिला दिया यार......

मुनीश ( munish ) said...

Basu Chatterji, Hrishikesh da and of course Gulzar are saints of Hindi cinema. Pure North Indian by heart with a pan-Indian appeal.See the way Hrishikesh Mukherji has used super stars like, Amitabh, Rajesh and Dharam ji .

मुनीश ( munish ) said...

Nobody think of projecting this lower middle class with a sympathetic heart like Basu did and the place where today's films are made is actually 'Bastard wood'.

खुशदीप सहगल said...

ये न सोच इसमें अपनी हार है की जीत है,
इसे अपना लो जो भी जीवन की रीत है,
ये ज़िद छोड़ो, बंधन यूं न तोड़ो,
हर पल एक दर्पण है,
ये जीवन है...

सतीश जी, पिया का घर १९७२ में आई थी...ये हिंदी सिनेमा का वो गोल्डन दौर था जब बासु चटर्जी, ऋषिकेश मुखर्जी, गुलजार ने एक से बढ़ कर एक क्लासिक फिल्मों की सौगात हमें दी थी...पिया का घर मेरी भी फेवरिट फिल्म थी..,ऐसी ही एक फिल्म उपहार भी थी...

जय हिंद...

जी.के. अवधिया said...

बासु चटर्जी निर्मित यह फिल्म तो हमें भी बहुत पसंद है सतीश जी! एक नहीं बल्कि कई बार देखा है इसे और हर बार देखकर नया ही मजा आता है।

सतीश पंचम said...

मुनीश जी,

Nobody think of projecting this lower middle class with a sympathetic heart like Basu did


Totally agree with u.

अभी इस थ्री इडियट फिल्म में ही देखिए कि फिल्म में हास्य पैदा करना था सो शर्मन जोशी के गरीब परिवार के जरिए Sympathetic way में हास्य जुटाने की बजाय निर्देशक ने बेलन, खुजली और रोटी वाला सीन देकर बहुत ही फूहड़ हास्य रचने की कोशिश की....sympathetic comedy का कोई अंश नहीं दिखा इस अंश में .....मुझे फिल्म का यह दृश्य बहुत घटिया किस्म का लगा था।

सतीश पंचम said...

खुशदीप जी,

यह उपहार फिल्म मैंने अभी तक नहीं देखी है। फिल्म के बारे में बता कर आपने अच्छा ही किया....

यह एक तरह से मेरे लिए एक और फिल्म का choice । अब दुकान पर जाकर सीडी देखने, समझने वाला समय थोड़ा बच गया :)

Shiv said...

बड़ी ही अद्भुत फिल्म की बात की आज आपने. एक-एक सीन कैसे पिरोया गया होगा. बारात लेकर ट्रेन से जाते हुए घर वाले ...ताश का खेल...नायक के लिए उसके भाई और भाभी द्वारा किया गया त्याग...ऐसी फिल्म बहुत कम दिखेगी. एक छोटे से घर में इतने लोग...फिर भी ज़रा भी असहज नहीं लगता कुछ भी...धरोहर हैं ऐसी फिल्में.

बेहतरीन पोस्ट, सतीश जी.

अजय कुमार झा said...

ये पिक्चर देखी हुई है , आज फ़िर से यादें ताजा कर दीं आपने ....सीडी डीवीडी लाकर देखने का तो मजा है ही ..वैसे स्टार गोल्ड ने क्भी..यही ढोल पीट कर चैनल की शुरूआत की थी कि पुरानी पिक्चर का मजा दिया जाएगा .....कुछ दिनों तक रहा भी ..मगर फ़िर जाने किन चक्करों में बस स्टार वाली क्वालिटी ही बची रह गई ..गोल्ड से निकल कर सब पता नहीं क्या क्या हो गया ...ओह वो यादें और वो पिक्चरें ...सब अनमोल हैं

बी एस पाबला said...

रजतपट के सुनहरे दौर की बात ही कुछ और है। यह फिल्म देखी हुई है, आपने पुन: इसकी याद दिला दी

बढ़िया

बी एस पाबला

बी एस पाबला said...

सआदत हसन मंटो को अवश्य पढ़िएगा

कुछ लिंक्स देखिए

http://www.bbc.co.uk/hindi/news/cluster/2005/05/050511_manto_fiftyyears.shtml

http://gadyakosh.org/gk/index.php?title=%E0%A4%B8%E0%A4%86%E0%A4%A6%E0%A4%A4_%E0%A4%B9%E0%A4%B8%E0%A4%A8_%E0%A4%AE%E0%A4%82%E0%A4%9F%E0%A5%8B

http://aarambha.blogspot.com/2008/05/blog-post_11.html

बी एस पाबला

बी एस पाबला said...

ठंडा गोश्त यहाँ है

http://www.hindisamay.com/kahani/Vibhajan%20ki%20kahaniyan/Thanda%20Gosht.htm

सतीश पंचम said...

पाबला जी,

मंटो के बारे में इतने सारे शानदार लिंक देने के लिए शुक्रिया।

मंटो की कहांनियों को पढ़ने के दौरान ठंडा गोश्त को ही मैंने सबसे पहले पढ़ा था।

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