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Tuesday, August 31, 2010

नौटंकी-ए-कजरी ....... झिंसी.....फुहार......ऑफ्टरऑल इट्स दिलवा मांगे मोर..........सतीश पंचम


        गये इतवार की शाम जब मेरे यहां झिंसी पड़ रही थी, हल्की-हल्की फुहार पड़ रही थी ठीक उसी समय मैं घर से कुछ दूरी पर स्थित एक मंदिर जा रहा था। अक्सर शनिवार या इतवार के दिन मंदिर का रूख करता हूँ और वह भी ज्यादातर शाम के समय क्योंकि वहां बीस पच्चीस मिनट का भजन चलता है। वहां भजन गाने के समय बैठने का तरीका ठीक पीपली लाइव के महंगाई डायन वाली स्टाइल में होता है, हारमोनिया मास्टर को घेर कर, ढोल पखावज के साथ।
    ऐसे वक्त पर मैं थोड़ा पीछे ही बैठता हूँ, क्योंकि भजन वगैरह के बोल मुझे आते नहीं, और ऐसे समय उन लोगों के साथ थोड़ा देर बैठ कर आंखें मूंदे हुए आनंदित हो लेता हूँ। मंदिर के पंडित जी कई बार आग्रह किए कि आओ पास बैठ कर साथ दो लेकिन पता नहीं, कौन सा संकोच रोके रहता है कि मैं कह कर रह जाता हूँ – नहीं यहीं ठीक हूँ....आप लोग जारी रहें।

     तो उसी मंदिर के लिए निकला था कि अचानक रास्ते में पड़ने वाले एक स्कूल के हाल से कुछ गीत संगीत की आवाजें सुनाईं पड़ीं। एकाध शब्द सुने तो वह भोजपुरी के लगे। जिज्ञासा वश चल दिया उस स्कूल के हाल की तरफ। पहुंचने पर पता चला कि किसी संगठन की ओर से कजरी महोत्सव चल रहा है। हाल में काफी भीड़ भाड़ है।

      मैंने हाल के बाहर से अंदर नजर डाली। महिलाओं की कतार अलग बैठी है, पुरूषों की अलग। एक शख्स खड़ा होकर देवी वंदना गा रहा था। अच्छा लगा। सो उन लोगों के बीच जाकर सबसे आखिर में बैठ गया। मंदिर जाने का प्रोग्राम कैंसल। अब यहीं कजरी महोत्सव का आनंद लिया जाय।

      कुछ देर तो भोजपुरी भजन वगैरह चला कि तब तक किसी महिला गायिका को पुकारा गया। आते ही उन्होंने भी एक देवी गीत गाया। मैंने कहा, चलो बढ़िया है। लोग सुन भी रहे थे, कुछ मन से, कुछ यहां वहां जगर मगर देखते ताकते। जगर-मगर से तात्पर्य महिलाओं की कतार की ओर निरख लेते थे रह रह। ज्यादातर महिलाएं उत्तर भारत की थीं...सो जाहिर है घूंघट काढ़े वह भी कजरी का आनंद ले रहीं थी। सलमा सितारे वाले घूँघट। चम चम चमकते।

     अभी बैठा ही था कि बाहर बारिश तेज हो गई। जो लोग अब आ रहे थे उनकी छतरियों से पानी ढरक कर जमीन पर यहां वहां छितरा रहा था। अभी यह सब चल ही रहा था कि पुरूषों की कतार से आवाज उठने लगी - तनि जम के हो।

   बस फिर क्या – महिला जी ने अगला गीत गाया – संईंया जी दिलवा मांगे ले गमछा बिछाय के। इतना सुनना था कि पुरूषों की कतार लहालोट हो उठी। महिलाओं की कतार में हल्की फुल्की सांय-फुस शुरू हुई। क्या पता संभवत: वह भी आनंद ही ले रही होंगी इन गीतों का। आखिर सइंया जी गमछा बिछा कर दिल मांग रहे थे। एकबारगी लगा कि गाना कहीं पेप्सी का भोजपुरी संस्करण तो नहीं है क्योंकि उसमें भी तो कहा जाता है –
      ये दिल मांगे मोर। और भोजपुरी में मोर का मतलब ‘मैं’ ‘मेरा’ भी होता है। तो ये ‘दिलवा मांगे मोर विथ गमछा’ का आनंद मैंने भी लिया । लोगों ने बीच बीच में पैसे भी पकड़ाए उन महिला जी को गाते समय। गाना रोककर अनाउंसमेंट भी हुआ कि फलाने जी, और ढेकाने जी की ओर से एक सौ एक रूपइया इनाम।

    कि तभी वही शख्स दुबारा खड़ा हुआ गाने के लिए जो देवी गीत गा रहा था। भूमिका बांधते हुए बंदे ने कहा कि देखिए गाँव में अपनी पत्नी को शहर में रहने वाला पति क्या कहता है। उसका गाया गीत पूरा तो याद नहीं, पर कुछ कुछ जो याद रहा वह कुछ ऐसा था -

अबकी लेबै तोहके मोबाइल गोरिया
लाइफटाइम टाकटैम भराउब गोरिया
मारू एक्कै मिस काल
ततकालै फोन लगाउब गोरिया

     ऐसा ही था कुछ, कि अबकी बार तुम्हारे लिए मोबाइल लेकर आउंगा, उसमें लाइफटाइम टाकटाइम भराउंगा, तुम एक मिस काल करना मैं तुम्हे फोन तत्काल लगाउंगा।

   सब लोग आनंद ले रहे थे। उसके बाद बंदे ने एक और गीत गाया। उसकी भूमिका बांधते हुए उसने कहा कि इस कलजुग (इसे कलजुग ही पढ़ियेगा) में अगर केहू के फैसन वाली मैडम मिल जाय तो उसका क्या हाल होगा यह इस गीत के जरिए पता चलता है। इतना कह कर हारमोनियम मास्टर ने तान छेड़ी.....अरे तर्ज वही है.....कहते हुए बंदे ने आsssss कह गाना शुरू किया –

होइगै माटी मोर जवानी,
पाया फैसन वाली जनानी
कभी कहे मोहे पौडर लाओ
कभी कहे मोहे लाली
देते देते थक गया खर्ची
आन पड़ी बदहाली
होइगै माटी मोर जवानी,
पाया फैसन वाली जनानी

     पूरा याद नहीं। सभी लोग मजे ले रहे थे। कई लोग बीच बीच में पैसे भी पकड़ा रहे थे और गाना रोककर उनका नाम उच्चारित किया जा रहा था।

     तभी अगले पल एक नीमजवान लौन्डे को बुलाया गया गाने के लिए। उम्र उसकी होगी यही कोई बीस-बाइस की। आते ही उसने पहले सरस्वती वंदना की और कहा कि उसके गुरू यहां बैठे हैं और आज पहली बार सार्वजनिक मंच से गाने जा रहा है तो आप लोगों का आशिर्वाद चाहिए। सुनते ही लोगों ने उत्साह बढ़ाते हुए ताली बजाई।

    लेकिन यह क्या आते ही महाशय ने गाना शुरू किया। गदराइल जोबना, महकाइल जवनिया, रात में मिलबू अईसे ही......। पुरूषों की कतार में जो लोग आगे की ओर बैठे थे कुछ तो ठठा कर हंस पड़े, उधर महिलाओं की कतार में से दो चार महिलाएं उठ कर जाने लगीं। मेरे मन में सबसे पहले यही आया कि अभी अभी तो महाशय सरस्वती वंदना कर रहे थे और तुरंत ही गदराइल जोबना, महकाइल जवनिया पर टंग गए।

     खैर, यह कोई नई बात नहीं है मेरे लिए। बचपन से लेकर अब तक कई बिरहा, लोकगीत, नौटंकी आदि में यही होते देखा है। पहले सरस्वती वंदना होती है हाथ जोड़कर और फिर अगले ही पल अपना असली रंग दिखाते हुए कहेंगे

– ओ मोरी सजनी, चूम्मा दे दे।

   कुछ देर उस लौण्डे को झेलने के बाद अब मैं कुछ-कुछ उकता चुका था, इन लोगों को और झेलना माने अपना कपार खवाना था । सो, उठकर मंदिर की ओर चला। मंदिर की ओर जाते हुए सोच रहा था कि अब तो भजन वगैरह भी खत्म हो गया होगा, चल कर केवल दर्शन कर लिया जाय। लेकिन वहां जा कर देखता हूँ कि फिल्मी धुन पर - पूजा करूंगा तेरी.....दिल में तुझे बसाकर गाया जा रहा है।

    आश्चर्य.......यह किस तरह का भजन हो रहा है आज। रोज तो ऐसा भजन नहीं होता था...... लोग भी नये लग रहे हैं।

ओह,

तो ये कृष्ण जन्माष्टमी वाले लोग हैं बाकायदा प्रोफेशनल गाने वाले। तभी अब तक भक्ति गीत चल रहा है। कुछ प्रैक्टिस वगैरह का दौर चलता है तो यही मंदिर ठिकान मिलता है उन्हें। भजन का भजन, प्रैक्टिस की प्रैक्टिस।

     उनके भक्ति गीत सुनकर ईश्वर की बजाय मेरे जहन में पहले दिलीप कुमार और बैजंती माला के चित्र उभरते हैं। देवानंद और न जाने किन किन हिरोइनों के चित्र भी उभरते हैं - इक बुत बनाउंगा तेरी और पूजा करूंगा ।

ऐसे में ईश्वर क्या खाक दिखेंगे।

    उनको भी लगता होगा कि कितना तो डिवैल्यूएशन हो गया है भगवानियत का.....इंसान तक की पूजा बुत बनाकर भगवान के समकक्ष की जा रही है।

     खैर, यही सब देखते-ताकते, मेरी इतवारी शाम बीती। लौटते वक्त फोन आया कि कहाँ हो, बाहर कितनी बारिश हो रही है और आप अब तक बाहर ही हो।

मैंने कहा – आ रहा हूँ।

अच्छा आते वक्त दही लेते आना, आज दही जमी नहीं है।

     मन में तो आया कह दूँ कि तुम दही के नहीं जमने की बात कर रही हो यहां मुझे भगवान भी नहीं जमे हैं। उपर से तुर्रा यह कि गाया जा रहा है- मैं तुझको चुरा लाया हूँ तेरे घर से....कभी श्याम बन के ओ कभी राम बनके.......

    लेकिन फिर सोचा कि मुझे भगवान की आराधना जमे या न जमे, दही के बिना तो मेरा नहीं जमेगा, दही जरूरी है भोजन में।

    और मैं भगवान जी की भक्ति भावना को दरकिनार कर बढ़ चला दही वाली दुकान पर।

ए भाई, दही देना तो :)



- सतीश पंचम

स्थान – .........

समय - ..........

(आज कुछ सूझ नहीं रहा है स्थान और समय......सो इसे खाली ही रख रहा हूँ )
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प्रिपब्लिश अपडेट – जब ड्रॉफ्ट में रख कर गया कि फलां काम से आते ही भक्ति भावना के रचे पगे वाहियात गीतों के बारे में लिखी यह पोस्ट पब्लिश करूंगा.....तब तक मेरा छाता लेकर कोई चलता बना।

लगता है भगवान को मेरी बातें पसंद नहीं आईं ......शायद इसीलिए उन्होंने मेरा छाता ही गायब करवा दिया.................चुराओ चुराओ.....कभी दही चुराते थे आज छाता चुराते हो......इतना आरोही उत्थान।


(सभी चित्र नेट से साभार)

20 comments:

Arvind Mishra said...

वाह यह कजरी का कजरारे कजरारे संस्मरण जोरदार रहा ...आपकी फीलिंग्स से मेरी फीलिंग्स जुडी !
मुबई का यह माहौल तो रस भी आया और थोडा हरास भी किया !

हमारीवाणी.कॉम said...

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महेन्द्र मिश्र said...

बस फिर क्या – महिला जी ने अगला गीत गाया – संईंया जी दिलवा मांगे ले गमछा बिछाय के। इतना सुनना था कि पुरूषों की कतार लहालोट हो उठी। महिलाओं की कतार में हल्की फुल्की सांय-फुस शुरू हुई ।

कजरी के बारे में रोचक संस्मरण है मै भी इसे पढ़कर लटालोट हो गया ... बढ़िया प्रस्तुति....

Shiv said...

बहुत मस्त पोस्ट! रविवार की शाम बढ़िया बीतती है आपकी.

सच यही है कि सरस्वती वंदना तमाम और दरवाजे खोल देती है. कुछ-कुछ उस सेठ की तरह जो हर दो महीने पर गंगा नहा आता है. मुंबई आऊंगा तो एक दिन रविवार को आपके साथ मंदिर जाऊँगा...:-)

सतीश पंचम said...

महेन्द्र जी,

मेरे 'लहालोट' के बदले आपके द्वारा दिये गए इस नये शब्द 'लटालोट' ने तो आनंद ला दिया :)

मजेदार शब्द लग रहा है 'लटालोट'...बढ़िया।

प्रवीण पाण्डेय said...

लोकगीत तो आनन्दित कर गये।

शोभा said...

बहुत अच्छा वर्णन, फ़िल्मी गानों से बनी पैरोडी सुनते हुए हमेशा मूल गाना ही ख्याल में बना रहता है ऐसे भजनों से कभी भक्ति भाव पैदा नहीं होता है.

Majaal said...

मंदिर भी भाईसाहब आखिर पुजारी जितना ही पवित्र हो सकता है. अपना मन चंगा रखे, बाकी क्या कर सकते है, गंगा मैया भी अब लोगो के भरोसे ही पाप धो रही है, अपनी पुरानी goodwill की वजह से, नहीं तो उसको भी भाई लोगो ने already बहुत प्रदूषित कर ही दिया है.

PADMSINGH said...

वंदना और गमछा बिछा के... दोनों मे कितनी समरूपता है ... मज़ा आ गया पोस्ट पढ़ कर .. बचपन मे बहुत नौटंकी देखी है मैंने ... असल नौटंकी ... आधीरात तक यही सब होता है ...

एक नमूना देखिये ... बेलवारिया की तान मे ---

ससुरे ना जाब, खाई जहर मरि जाबे
नैहर मा बोकरी चरैबे, सब लौंडन से मौज उडैबे
अरे हाँ ससुरे ना जाब खाई जहर मरि जैबे

आप के ब्लॉग पर आ कर मन लाहालोट होना पक्का है ... :)

DEEPAK BABA said...

पंचम दा आप भी न खूब मजे ले रहे हो......

cmpershad said...

"मैं तुझको चुरा लाया हूँ तेरे घर से....कभी श्याम बन के ओ कभी राम बनके......."
कल जन्माष्टमी है जी ... :) शुभकामनाएं

Vivek Rastogi said...

आज सुबह ही म्यूजिक स्पेस भजन पर भजन आ रहे थे बिल्कुल फ़िल्मी भजन फ़िर मजबूरी में चैनल बदलना पड़ा और बाबा रामदेव जी ज्ञान बाँट गये।

यह माहौल आप मुंबई में भी ढूँढ लेते हैं, वाकई गजब हो भई...

मो सम कौन ? said...

जगर मगर मतलब....... हा हा हा।

गज़ब हो भाई जी, भगवान जमे न जमे दही जरूर जमना चाहिये।

बड़े मौके पर कजरी सुनवाई, मज़ा आ गया।

indu puri said...

क्या लिखूँ? पदम जिन ब्लोग्स को एप्रिशिएट करते हैं वहाँ एक बार जरूर जाती हूं. मुझे तो ये भी नही मालूम 'कजरी' कहते किसे हैं?
लोक गीतों के नाम पर भद्दे गीत मुझे कभी पसंद आये.फ़िल्मी गानों पर आधारित भजन सुनने के बाद भजन सुनने की इच्छा ही खत्म हो गई.कोई जबरन बुलाता है तो कह देती हूं- भगवान और मेरी नही पटती'
कभी कभी मजबूरन जाना भी पड़ता है और मेरा भी वही हाल होता है जो आपका वहाँ हुआ.
हा हा हा
किन्तु........रसखान,सूर,मीरा को सुनना और गाना पसंद है.'मेरो मन अनत कहाँ सुख पाए' उधो मन ना भये दस बीस' कान्हा तोरी जोहत रह गई बाट' 'अब राधे रानी दे डारो बंसी मोरी'जैसे भक्ति गीत सुनती हूं,आँसू नही रुकते.
जयपुर के दो भाई है अहमद हुसैन,महोम्म्द हुसैन उन्होंने जो भजन गाये हैं भाव विह्वल कर देते है .मिले तो उनकी 'श्रद्धा'सीडी या केसेट लीजियेगा और सुनियेगा. आँखे बंद करके सुनियेगा और एक पल के लिए सोचियेगा आप राधा हैं ,कालिंदी तट पर 'उसकी' प्रतीक्षा कर रहे हैं.'उसे' नही आना था, वो नही आया.....
जब 'कान्हा तोरी जोहत रह गई बाट' सुनेंगे लगेगा 'उसने' आ कर छू लिया आपको.अपने करीब महसूस करेंगे आप 'उसे'
'मैं निकला गड्डी लेके रस्ते मे श्याम पाया उसे साथ ले आया.' सुन् कर तो भगवान भी भाग जाये.
मुझे 'नफरत' है ऐसे भक्ति गीतों (????)से.क्योंकि ऐसिच हूं मैं.एकदम बकवास औरत.जिसे बिलकुल पसंद नही कि वो जब अपने'प्रियात्तम' से बाट करे तो दोनों के बीच कोई और हो.डायरेक्ट बात भाई.
ऐसीच हूं मैं सच्ची.

indu puri said...

'लोक गीतों के नाम पर भद्दे गीत मुझे कभी पसंद आये.'
लो अब मैंने इसमें 'नही' लिखा ही नही.एडिट करके पढ़ लेना भाई.
अक्सर गडबड कर देती हूं.
क्या करूँ?
ऐसिच हूं मैं तो सचमुच.

सतीश पंचम said...

@ indu ji's comment

जयपुर के दो भाई है अहमद हुसैन,महोम्म्द हुसैन उन्होंने जो भजन गाये हैं भाव विह्वल कर देते है .मिले तो उनकी 'श्रद्धा'सीडी या केसेट लीजियेगा और सुनियेगा. आँखे बंद करके सुनियेगा और एक पल के लिए सोचियेगा आप राधा हैं ,कालिंदी तट पर 'उसकी' प्रतीक्षा कर रहे हैं.'उसे' नही आना था, वो नहीं आया....

इंदु जी, मैं इस तरह भाव विह्वल हो जाने वाली भक्ति भी नहीं कर पाता, थोड़ी देर के लिए आँखें बंद की, इश्वर को याद किया और बस....मन ही मन थोड़ा बहुत चिंतन उसमें भी मन मे रह रह कर कभी ध्यान बाहर रखे चप्पल जूते पर चला जाता है तो कभी सुबह ऑफिस के काम की बात याद आ जाती है तो कभी कुछ तो कभी कुछ।

मुझसे यह एकाग्रचित्त भक्ति न हो पाना थोड़ा बहुत मैं अपने लिए प्लस प्वाइंट भी मानता हूँ क्योंकि अगर भाव विह्वल हो खुद को राधा समझने की भूल करूंगा तो संभवत उत्तर प्रदेश के उस आई पी एस अफसर की तरह हो जाउंगा जो राधा वेश धर के यहां वहां नाचता फिरता था और मांग में सिंदूर भर आंय बांय शांय बके जाता था :)

इतनी भी भक्ति ठीक नहीं होती....

--------------

यह तो हुई मजाक की बात।

अब थोड़ा सा सिरियसली कहूँ तो जिस सखा भाव की बात की ओर आपने इशारा किया है वह सभी लोग अक्सर ईश्वर वंदना के दौरान कभी कभी अनुभव करते हैं...ईश्वर में लीन हो जाने का मन करता है लेकिन न जाने क्यों मुझसे अब यह सब नहीं हो पाता।

बताया न, कि आँखें बंद की, ईश्वर को थोड़ा बहुत याद किया अगरबत्ती जलाया ....बस। इतनी ही भक्ति हो पाती है मुझसे।

Mayank Bhardwaj said...

बहुत मस्त पोस्ट

मेरी और से श्रीकृष्ण जन्माष्टमी के शुभ अवसर पर बहुत बहुत बधाई !

वाणी गीत said...

ईश्वर से लौ लगानी इतना आसान कहाँ है ...और सभी भगवान् हो गए तो मानव कहाँ बचेंगे ...
ईश्वर की आराधना का यह अंदाज जचता है मुझे कि मन में उस अदृश्य शक्ति को प्रणाम करते रहे ...अपने दैनिक कार्य कलापों के साथ ...हालांकि पूजा भी करती हूँ मैं मगर नियमित नहीं !

काजल कुमार Kajal Kumar said...

मंदिर जाने का प्रोग्राम कैंसल। अब यहीं कजरी महोत्सव का आनंद लिया जाय।

वाह !...इससे ज़्यदा कुछ और नहीं लिखा जा सकता.

शोभना चौरे said...

बहुत अच्छी लगी पोस्ट
घिर घिर आये बदरिया हो रामा
कैसे मै खेलू कजरिया हो रामा कैसे मै खेलू कजरिया
कभी बहुत गाते थे ये गीत |भक्ति करने का कोई पैमाना नहीं होता और पूजा जो जीवन की
प्राथमिकता है उसे ईमानदारी से पूरी करना भी पूजा ही है |

फोटो ब्लॉग 'Thoughts of a Lens'

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