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Saturday, August 28, 2010

क्षेत्रीय फिल्मों के परिप्रेक्ष्य में भोजपुरी फिल्मों की चिलगोजई.......... कुछ अलहदा बातें..........सतीश पंचम

          
       एक भोजपुरी भाषी होते हुए भी मैंने अब तक उतनी भोजपुरी फिल्में नहीं देखी हैं जितनी कि मराठी फिल्में।  भोजपुरी फिल्में न देखने की सबसे बड़ी वजह उन फिल्मों का फूहड़पन है जो कि हर दूसरे तीसरे दृश्य में नजर आता है। दांत चिआरते हुए हीरो जब कहता है - का हो....कहां जात बाड़ू....या फिर राह चलती लड़की को कहता है - का हो कईसन बाड़ू......देबू की ना.....पियास लगल हौ....... तब मन में जो पहला भाव आता है वह यही कहता है कि साले को पकड़ कर पहले एक लाफ़ा लगाया जाय। उसके बाद उसे बताया जाय कि साले एक्टिंग ऐसे नहीं ऐसे की जाती है। 

       ठीक  ऐसे समय में जो बात सबसे ज्यादा अखरती है वो है भोजपुरी संवाद लिखने वालों की लतोड़ जमात की। बात ऐसे लिखेंगे कि मानों सब गाँवो में या शहराती लोगों में इसी तरह का चलन होता है, इसी तरह का बात व्यवहार होता है, जबकि यही लेखक अगर चाहें तो फिर से नदिया के पार जैसी हिट फिल्म दे सकते हैं केवल थोड़ी सी फूहड़ता और नकली भदेसपन को दूर रख कर। नकली भदेसपन से तात्पर्य दांत चिआरते हुए ही ही करना, जान बूझकर शब्दों को दुलराते हुए बोलने आदि से है। 

                मेरे द्वारा भोजपुरी के साथ- साथ मराठी फिल्मों के बारे में  लिखने  का  मूल कारण यह है कि मुंबई में राज ठाकरे के मनसे और शिवसेना के उद्धव ठाकरे द्वारा थियेटरों में मराठी फिल्में न दिखाए जाने पर कार्रवाई किए जाने की धमकी देने के बाद सिनेमा हॉलों मे मराठी फिल्में प्राइम टाईम पर तो दिखाई जाने लगी हैं लेकिन उसके लिए दर्शक ही नहीं जुट पा रहे हैं। यह हालत तब है जब  मराठी के नाम पर पिछले दो सालों से राजनीति की जा रही है। 

        वहीं मैंने देखा है कि मराठी फिल्मों की क्वालिटी, उनके कलाकारों की संवाद अदायगी, उनकी कहानी सब एक से बढ़कर एक होते हैं। मराठी फिल्मों में ही मैंने देखा कि एक बच्चे को लेकर एक बेहद संवेदनशील फिल्म श्वास बनी जबकि भोजपुरी में ऐसी फिल्मों की अब तक शायद कल्पना ही की जा सकती है। विहिर, जत्रा, एका पेक्षा एक, अशी ही बनवा बनवी, चश्मेबहाद्दर (शायद यही नाम था फिल्म का)   जैसी न जाने कितनी फिल्में मैंने देख डाली हैं लेकिन भोजपुरी के नाम पर मेरे खाते में केवल बिदेसिया, नदिया के पार, ससुरा बड़ा पैसे वाला, बलम परदेसिया जैसी गिनी चुनी फिल्में ही हैं। 

         यूँ  तो कई बार केबल में भोजपुरी फिल्में दिखाई जाती हैं.......ढेरों फिल्में इसी आशा में देखना चाहा कि देखूँ भोजपुरी में क्या क्या बनाया जा रहा है...... लेकिन पांच मिनट से उपर उन्हें देखना बोझिल लगता है, कुछ कुछ कलाकार तो ऐसे लगते हैं मानों चार पांच बच्चों के बाप हैं और कई तो ऐसे जैसे कि उन्हें चार पांच दिनों से खाना नसीब नहीं हुआ लेकिन फिर भी मार कर गिरा देंगे दस बारह को एक साथ। यहां रजनीकांत स्टाईल भी अपनाई जाती है तो भूखे नंगे हीरो पर। 

          शायद यही सब कारण रहे हैं कि न जाने अब तक कितनी मराठी फिल्मों को देख चुका हूँ संभवत: उनकी संख्या सौ से उपर ही है लेकिन भोजपुरी  के नाम पर संख्या सात आठ से उपर नहीं बढ़ पाई।  मराठी फिल्मों के कई कलाकार जैसे भरत जाधव, सिद्धार्थ, संजय नार्वेकर आदि इतने जबरदस्त ढंग से संवाद अदायगी करते हैं कि एक बारगी लगता है काश ऐसे कलाकार भोजपुरी फिल्म इंडस्ट्री में भी होते। वहीं भोजपुरी में देखो तो रवि किशन, दिनेश लाल निरहुआ, मनोज तिवारी आदि ही नजर आते हैं लेकिन उनकी प्रतिभा को खा जाती है फूहड़ संवादों और दृश्यों के बीच बेवजह की घिचपिचई। घिचपिचई से तात्पर्य हा हा ही ही वाले बेवजह के ठूंसे दृश्यों से है।   

    यहां मैंने एक बात और नोटिस की है कि मराठी फिल्मों में भी कहीं कहीं फूहड़ता नजर आती है लेकिन बहुत कम। दादा कोंडगे वाली नाडा़ झुलाती फिल्में इसी प्रवृत्ति का नमूना रही हैं लेकिन वह भी सीमित संख्या में बनी और आगे चलकर इस तरह की नाडा़ झुलाउ फिल्में कम से कमतर होती गईं। जबकि यदा कदा चैनल सर्फ करते हुए सामने अगर कोई भोजपुरी फिल्म आती भी है तो कोई टकलू टाइप आदमी अपनी धोती लेथराते हुए चल रहा है तो कोई अपने उटपटांग कपड़ों से ही हास्य पैदा करने की कोशिश कर रहा है। ऐसा नहीं है कि धोती खुलने वाले हास्य को दर्शाने का चलन इन्हीं फूहड़ फिल्मों की देन है.....यह धोती खुलने वाला चलन कई फिल्मों में रहा है, गंगा-जमुना फिल्म में भी कुत्ते के पीछे पड़ जाने पर कन्हैयालाल की धोती खुलती है और किशोरवय  दिलीप कुमार उन्हें धोती खुल जाने की ओर इशारा करते हैं लेकिन उसके दिखाने का भी एक ढंग होता है, यह नहीं कि जब मन में आए तभी धोती खोल टाइप हास्य पैदा किया जाय।   
 वहीं, कहा यह भी जा सकता है कि ये तमाम उलूल जूलूल भोजपुरी फिल्में एक खास दर्शक वर्ग के लिए बनाई जाती हैं तो इस बात से मैं बहुत हद तक सहमत हूँ लेकिन क्या जिस दर्शक वर्ग की दुहाई दी जा रही है वाकई उसे इसी तरह की फिल्मों में रूचि है ? क्या वाकई वह यह सब देखना चाहता है ?  कहीं ऐसा तो नहीं कि कोई ऑप्शन न होने पर ही यह दर्शक वर्ग बार बार इसी तरह की मार धाड़ वाली, खींस निपोर वाली फिल्में देखने के लिए मजबूर है।

        मैंने एक बार यूँ ही कुछ पल के लिए मुंबई के कुर्ला इलाके में भोजपुरी फिल्मों के लिए लाइन लगाए दर्शकों पर निगाह डाली थी तो ज्यादातर जो लोग दिखे वह ट्रक ड्राईवर, खलासी,  फेरीवाले टाइप के लोग थे और उन लोगों को देख मुझे फिल्म नदिया के पार के लिए लाइन लगाए दर्शक भी याद आ गए जो ठीक इसी पृष्ठभूमि के थे।  यानि दर्शक वर्ग केवल कहने की बात है, अच्छी फिल्म हो तो सभी पसंद करेंगे चाहे वह किसी खास के लिए बनाई गई हो या आम के। 

         अब अंत में इतना जरूर कहूँगा कि मराठी भाषा के रसिक बहुत सौभाग्यशाली हैं जो इतने उम्दा किस्म की मराठी फिल्में उन्हें देखने मिल रही हैं। वह इसलिए भी सौभाग्यशाली हैं कि अपने पूरे परिवार के साथ मराठी फिल्में देख सकते हैं।  

         वह दिन कब आएगा जब भोजपुरी में भी उतनी ही उम्दा फिल्में बनेंगी, उतने ही उम्दा कलाकार होंगे और पूरा परिवार मिल बैठकर फिल्में देखते हुए कहेगा - आज मन जुड़ा गईल बा !!

- सतीश पंचम

स्थान - वही, जिसके बारे में कहा जाता है कि वह कभी नहीं सोती। 

समय - वही, जब केशव प्रसाद मिश्र जी की कहानी पर बनी फिल्म 'नदिया के पार' में चंदन बने नायक सचिन अपनी नायिका साधना सिंह से कहते हैं - बलिहार चलोगी गुंजा !!

 बलिहार.....नाम सुन कर ही अपनत्व की फुहार सा लगता है।

16 comments:

VICHAAR SHOONYA said...

पंचम बाबु फ़िक्र ना करी, दिन बदले का बा........

Majaal said...

भाई ने सुना था की बच्चन सा एक भोजपुरी फिल्म करने वाले है, उसका क्या हुआ? शायद उससे कुछ बात आगे बढे .

अनूप शुक्ल said...

अच्छा लिखा है। काफ़ी जानकारी भी हुई।

वैसे कोई यह भी कह सकता है कि मुम्बई में सकुशल रहने के लिये तो नहीं मराठी फ़िल्मों के लिये अच्छा लिखा गया। :)

DEEPAK BABA said...

पंजाबी जबान के होते हुवे भी ..... नदिया के पार मैंने ६-७ बार देखि है. एक बार तो सिनेमा घर में और बाकि जब भी टी वी पर आई .........

बदिया फिल्म है.

गिरिजेश राव said...

इन लोगों ने भोजपूरी का बहुत अहित किया है। क्या करें, मैं तो देखता ही नहीं। मैंने अंतिम फिल्म देखी थी - दुल्हा गंगा पार के। क्या गाने थे!
- रोज रोज आवेलू तू टेर सुनि के
- गँगा किनारे मोरा गाँव हो
..
केशवप्रसाद मिश्र के उस उपन्यास का नाम है - कोहबर की शर्त। घनघोर दु:खांत उपन्यास। बारहवीं में पढ़ा था और खूब रोया था।
कभी पढ़ना भाई।

indu puri said...

मैंने भोजपुरी फिल्म्स के नाम पर मात्र दो तीन फिल्म्स ही देखि है गंगा मैया तोहे पिहरी चढैबो,बिदेसिया,नदिया के पार.उनके गाने आज भी मेरे पास अनमोल मोती-से मेरे गीतों के खजाने मे संजोये रखे हैं......
इस भाषा की फिल्म्स राजस्थानी भाषा मे बनने वाली फिल्म्स से बेहतर होती है.बाद की भोजपुरी फिल्म्स के गाने और डायलोग्स ही सुने और तौबा कर ली.
आप बेस्ट फिल्म्स के बारे मे भी दिया करें जिससे सलेक्ट करने मे ज्यादा परेशानी ना हो.जहाँ मेरा दिमाग काम नही करता वहाँ मे दूसरों के दिमाग का उपयोग धडल्ले से कर लेती हूं.
हा हा हा
क्या करूँ?
ऐसिच हूं मैं तो.

गिरिजेश राव said...

कुछ देसज संश्लिष्ट शब्दों जैसे - चिलगोंजई आदि की एक अनुक्रमणिका बनाइए।
घबराइए नहीं राग दरबारी के फुट्टफैरी का अर्थ नहीं पूछेंगे।

प्रवीण पाण्डेय said...

एक दो देखी हैं। अधिक भाव ठूँस देते हैं।

बेचैन आत्मा said...

दो क्षेत्रीय भाषाओं का तुलनात्मक अध्ययन बहुत कुछ समझा गया. अच्छा लिखा है आपने। भोजपुरी की स्थिति और मराठी की समृद्धी गिना दी लेकिन भोजपुरी के पिछड़ने के कारणों पर प्रकाश नहीं डाला...!
....मुझे इसके पीछे मूल कारण जो दिखाई देता है वह यह कि भोजपुरी उन प्रदेशों की भाषा है जहाँ के निवासियों ने हिंदी को ही राष्ट्र भाषा मानकर, अपनी सम्पूर्ण क्षेत्रियता की तिलांजली दे, हिंदी के ही विकास में जीवन बीता दिया. दूसरी क्षेत्रीय भाषाओं के विकास के पीछे मूल कारण यह है कि उन्होंने राष्ट्रियता तो खूब दिखाई लेकिन अपनी क्षेत्रीय भाषा की तुलना में हिंदी को ठेंगा दिखा दिया..!
..सोचिए, यदि हमारे भोजपुरी क्षेत्र के हिंदी विद्वान अपनी सम्पूर्ण मेधा को भोजपुरी के विकास में ही लगाते तो क्या भोजपुरी की यही स्थिति होती..फिर हिंदी का क्या होता?
..लेकिन मुझे भारतीय होने के कारण उनके हिंदी प्रेम पर गर्व है।

अभिषेक ओझा said...

कोहबर की शर्त पढ़ने को राखी है. वैसे मोटाई के हिसाब से तो एक दिन में ख़त्म हो जाने वाली लगती है. लेकिन एक दिन से अधिक लगने वाली किताबें ख़त्म ही नहीं हो पा रही :)
बाकी कुल मिला कर एक ही भोजपूरी फिल्म देखी है 'नदिया के पार' तो क्या कमेंट करें.

Anaam said...
This comment has been removed by the author.
शोभना चौरे said...

बात फिल्मों की भाषा की बात पर आकर नहीं ठहरती ,उसके मूल में सन्दर्भ में कहानी का विषय भी बहुत महत्वपूर्ण होता है और साथ ही प्रस्तुतिकरण |

RAJ SINH said...

अरे ' व्हाईट हॉउस ' के ' प्रेसिडेंट ' ने तो मेरे ही मन की बात कर दी .और टिप्पणिओं ने तो बची खुची कसर भी पूरी कर दी .

' कोहबर की शर्त ' पढ़कर अपनी जवानी में वैसे ही मन रोया था जैसे गिरिजेश जी का .कोई भी फिल्म शायद ही उपन्यास के साथ न्याय कर पाए . ( ' ब्रिज ऑन द रीवर क्वाई ' उल्टा भी साबित कर देती है की घटिया उपन्यास पर अप्रतिम फिल्म बन सकती है ) पर ' नदिया के पार ' 'कोहबर ......' की संपूरक थी .
प्रार्थना करूंगा कि ' VICHAAR SHOONYA ' जी की बात शायद कभी सच
भी हो जाये .

@ इंदु पुरी
अपना भी हाल तुमारे जैसाच है . अपुन भी वैसेच हैं . हा ....हा...हा...
कोशिश करने पर भी आपसे ज्यादा भोजपुरी नहीं सह पाया . कारन भी वैसाच :)
मराठी फ़िल्में भी बचपन से देखता रहा हूँ . एक दादा कोंडके का दौर छोड़ दूं तो बाकी सब मन का आनंद ही रहीं .
आप सब से गुजारिश करूंगा की हालिया मराठी फिल्म ' नटरंग ' जरूर देखें .

Mired Mirage said...

बहुत अच्छी तुलना की है।
घुघूती बासूती

deepak kumar garg said...

फिल्म नदिया के पार में इस उपन्यास की आधी कहानी ही प्रयोग हुई थी .उपन्यास की बाकी कहानी को लेकर नदिया के पार पार्ट 2 बननी चाहिए, जैसे पिछले वर्ष सचिन और राजश्री की फिल्म अखियों के झरोखों से फिल्म का पार्ट 2 फिल्म जाना पहचाना बनी थी, वैसे उपन्यास की बाकी कहानी क्या है

सतीश पंचम said...

दीपक जी,

केशव प्रसाद लिखित कोहबर की शर्त पर आधारित नदिया के पार फिल्म का आखरी हिस्सा बदला गया था। फिल्म में जहां दिखाया गया है कि अंत में चंदन और गुंजा का विवाह हुआ वहीं कोहबर की शर्त उपन्यास में दर्ज है कि गुंजा बीमार रहने लगती है और उसकी अस्थियां चन्दन प्रवाहित करता है। हो सके तो उपन्यास पढ़िये, फिल्म की तरह ही उपन्यास भी बांधे रखता है।

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