सफेद घर में आपका स्वागत है।

Friday, August 27, 2010

ब्लॉग महंत...........ब्लॉगिंग का ककहरा पढ़ते मिस्टर मदन.......आलू का जीजा........ढेला ढोवन.......सतीश पंचम

       पिछली गर्मियों में जब गाँव गया था तब ककड़ी के खेतों में एक दिन फोटो शूट कर रहा था। तरह तरह की ककड़ियां दिख रहीं थी। हर एक ककड़ी किसी न किसी फल या सब्जी की रिश्तेदार की तरह लग रही थी।  किसी ककड़ी की शक्ल आम जैसी थी तो किसी का आकार केले जैसा,  कोई ककड़ी शतुरमुर्ग के अंडे जैसा बड़े सफेद रंग का तो को कोई- कोई तो 'आलू का जीजा' भी लग रहा था।   

     इसी फोटो शूट के दौरान बगल में ही ककड़ी के बीजों को धो-मसलकर इकट्ठा करने का भी काम चल रहा था। लू चलने से कई ककड़ियां खराब भी हो गईं थी।   अम्मा-बाबू दोनों जन ककड़ी के बीजों को इकट्ठा कर रहे थे। बीच बीच में मैं भी पहुंच जाता था। बातचीत के दौरान जब मैंने उनसे कहा कि किसी बंदे को ठीक क्यों नहीं कर लेते जो कि खेती बाड़ी के काम में हाथ बटाए और जो पैसा वैसा लगे दे दिया जायगा।  मेरी इस बात पर अम्मा का कहना था कि अरे आदमी मिलते ही नहीं अब तो कहां से किसी को ठीक किया जायगा। ज्यादातर लोग जो हैं वो बाहर कमाने चले गए हैं, जो बचे हैं वो किसी काम के नहीं हैं, कुछ आधे मन से काम करते हैं तो कुछ काम ऐसे करते हैं मानों एहसान कर रहे हैं।

  अभी यह बातचीत चल ही रही थी कि गाँव का ही एक शख्स मदन बगल के खेतों से गुजरा। उसे  देखकर मैं एकाएक चौंक सा गया।   दरअसल  वह शख्स अपने साथ ढेर सारे ढेले लेकर जा रहा था।  कोई ढेला एक डिब्बे के भीतर रखा था तो कोई ढेला बगल में तो कोई बड़ा सा ढेला सिर पर। उसे देख कर मैंने पूछा कि ये ढेला ऐसे क्यों लेकर जा रहा है, कोई टोकरी वगैरह में क्यों नहीं लेकर जाता ? 

 मेरे इस तरह सवाल पूछने से अम्मा हंसने लगी। उन्होंने बताया कि अरे ये आज से ढेला नहीं ढो रहा हैं, धीरे धीरे दो-ढाई साल से ये ढेला ढोने का काम कर रहा है।     इसी तरह के अगलहा पगलहा लोग अब बचे हैं गाँव में जो हरवाही-चरवाही करते हैं। कहाँ से आदमी ठीक किया जाय ?

अम्मा की बातें सुनते हुए मैं हैरान भी हो रहा था कि आखिर ये ढेलों का करता क्या है ?

      पूछने पर अम्मा ने बताया कि पिछले कुछ साल से यह सनक सा गया है। ढेला ढेला ले जाकर अपना दुआर पाट रहा है। दिन भर में शौच के बहाने सात आठ बार तालाब की ओर जाता है और आते समय डब्बे में ढेला भर कर लाता है। कुछ ढेला सिर पर रख लेता है, कुछ बगल में। यही करते करते इसका समय पास होता है।

    मुझे हंसी आई कि यार ये कौन सा नया मिथकीय चरित्र है मेरे गाँव में कि ढेला ढेला ही अपना आशियाना बनाने को उद्दत्त है। कई बार किस्से कहांनियों में सुना कि फलां ने थोड़ा थोड़ा करके अपना यह स्थान बनाया, वह बनाया....फिर किसी ने सड़क तक बना डाला। लेकिन ढेला ले जाकर अपने घर का दुआर पाटना कुछ अजीब सा लगा।

        मैंने फोटो खींचना चाहा तो अम्मा ने झिड़क दिया कि क्या करेगा उसकी तस्वीर लेकर.....अभी बेमतलब अंट शंट बकने लगेगा वह....चल वापस लौट आ। लेकिन मैंने न न न करके भी एक तस्वीर पीछे से मिस्टर मदन की खींच ही ली।

         शाम के समय ऐसे ही खेतों में खड़े होकर बातचीत चल ही रही थी कि तभी मेरे भतीजे ने बताया कि अगर मदन को महंत कहो तो वो खुश हो जाता है। मै और हैरान कि यार ये कौन सा नया शौक है बंदे को कि महंत कहो तो खुश हो जाए। थोड़ी पूछ-पछोर करने पर बाकीयों ने बताया कि पहले यह खेतों में अधिया आदि जोत कर अपना जीवन यापन करता था लेकिन पता नहीं कब और किसने क्या कह दिया कि सब लोगों से कहता फिरता है कि मेरे गुरू ने कहा है कि मैं महंत बनने वाला हूँ और मेरे पास बहुत सा पैसा आने वाला है।

Really.....what a cunning hope.

           बातचीत में ये भी लोगों ने बताया कि यह अक्सर अपनी पत्नी को बुरा भला कहता रहता है कि तेरे ही कारण अब तक मैं पुजारी के पद पर हूँ न अब तक मैं किसी मठ का महंत बन गया होता।

        Hmm.....तो मिस्टर मदन को महंत बनना है। मिस्टर मदन की इच्छा और उनका ढेला प्रेम देख कर मुझे लग रहा है कि उन्हें ब्लॉगिंग में सक्रिय होना चाहिए। सारे लक्षण ब्लॉगरों वाले ही हैं।  खुद ढेला लिए रहेंगे.....उछालते रहेंगे....खेलते रहेंगे....मौका मिला तो तड़ जड़ भी देंगे :)

 इधर एक किस्म का ट्रेण्ड और चला है कि ब्लॉगर अपनी श्रीमती जी को ही अपनी मति हर लेने के लिए दोष देने लगे हैं। अक्सर कहते भी रहते हैं कि पोस्ट लिख रहा था तभी ....श्रीमती जी कह रही हैं सब्जी लानी है, दाल लाना है....बाजार जाना है वगैरह वगैरह ऐसे में महंत बनाने सरीखी पोस्टें ड्राफ्ट बनकर ही सदा सदा के लिए रह जा रही हैं। अब हालत यह हो गई है कि  उन ढेर सारे ड्राफ्टों की मिस्टर मदन की तरह पूजा करनी पड़ रही है ।

     मुझे जहां तक लग रहा है कि थोड़ा बहुत ढेला फेंकने की प्रैक्टिस हो जाय...... थोड़ा ढेला आदि लेकर चलने की आदत सी बन जाय, एक ढेला सिर पर, एक बगल में.....एक अगल में....  बस..... फिर तो ब्लॉगिंग की  महंतई धरी है...... वह कहां जाएगी...... हाँ...... थोड़ा श्रीमती जी लोग मति न हरें कि बाजार जाइए...... सब्जी वगैरह लाइए.....कि आज ब्लॉगिंग से ही पेट भरने का इरादा है    :)


  और इधर मैं देख रहा हूँ कि मिस्टर मदन ब्लॉगिंग का ककहरा पढ़ रहे हैं -

प से पोस्ट
फ से फॉलोअर
ट से टिप्पणी
ढ से ढेला
ब से बकरी....नहीं नहीं....ब से ब्लॉगिंग :)


- सतीश पंचम

स्थान - वही, जहाँ पर छह करोड़ से ज्यादा के हीरे चोरी हो गए थे।

समय - वही, जब साढ़े छह करोड़ के हीरे चुरा कर भाग रहे चोर फ्लाइट में बैठ कर खबरें सुन रहे हों कि कॉमनवेल्थ गेम्स के दौरान हजारों करोड़ रूपयों का घपला हुआ है और तभी उनमें से एक कहे - यार हम तो साढ़े छह करोड़ के हीरे चुरा कर भी चिंदीचोर के चिंदीचोर ही रहे.....वह दिन कब आएगा जब हमें भी ऐसा मौका मिलेगा कि सब कुछ अंदरखाने करने के बावजूद चिंदीचोर की बजाय हम इज्जतदार कहलाएं :)   

( अंतिम चित्र में वही ककड़ी है जिसे देख मेरे मुँह से बरबस यह शब्द निकल गया   -
 'आलू का जीजा'        कम्बख्त आधा जमीन में आलू की तरह धँसा है,  आधा बाहर हवा में लू से जूझ रहा है....तिस पर छांह कर रही हैं रिश्तेदार बनीं हुई पत्तीयां  :)

23 comments:

मो सम कौन ? said...

मज़ा लगा दिया सतीश भाई। अगली बार जायेंगे गाँव तो भावी महंत जी का ब्लॉग बनवा ही दीजिये। ढेले भी भरपूर इकठा हो जायेंगे तब तक।
कश्मीर के घरों में पत्त्थर ढेले इकट्ठे करने की खबर के बाद ब्लॉग जगत की ढेलेबाजी वाली पोस्ट दिखाती है कि हम एक(जैसे) हैं।
ककहरा पूरा करें, हांक तो लगा देते एक बार -
फ़ से फ़र्जी
ब से बेनामी

Ashok Pandey said...

गर्मियों में जब तालाब सूख जाते हैं तो करैल मिट्टी में चौड़ी दरारें उभर आती हैं और कुदाल की मदद से बड़ा-बड़ा ढेला निकालना आसान होता है। उस समय हमारे गांव में बूढ़े, बच्‍चे, जवान, महिलाएं सभी ढेला ढोने में लग जाते हैं। ऐसा लगता है मानो सेतु बांध बांधने वाली बानरी सेना अपने काम में लगी हो। दरअसल ये ढेला तालाब पाटने के लिए ढोते हैं। कागज में तालाब भले सरकार की हो, लेकिन गांव में चलन है कि तालाब के जिस हिस्‍से को जो पाट देता है, वह हिस्‍सा उसका हो जाता है। गांव में दो तालाब हैं लेकिन लगता है कि दो-चार सालों में उनका अस्तित्‍व हमेशा के लिए मिट जाएगा।

प्रवीण पाण्डेय said...

ककहरा सीखना प्रारम्भ कर दिया जाये।

Himanshu Mohan said...

ढेला…
हूँऽऽ!
महंत - ब्लॉगर - पत्नी - ककहरा - जीजा - ककड़ी है कि खीरा?
हमें तो अंग्रेज़ी वाले क्यूकम्बर लग रहे हैं।
वाह!
ककहरा अच्छा है, आलू का जीजा अभिनव प्रयोग। वास्तव में, सच्ची - मज़ाक नहीं कर रहा…
अगर साला कह कर गरियाया जा सकता है तो "आलू का जीजा" भी भावनाओं की स्वत:स्फूर्त अभिव्यक्ति बहुत ताज़गी भरी है - हरियर ककड़ी की ही तरह - या फिर करइल जैसी नम्यता और 'सड़ाक्' लिए हुए।

cmpershad said...

"वह शख्स अपने साथ ढेर सारे ढेले लेकर जा रहा था"

अगर कश्मीर में होता तो अच्छी कमाई हो जाती:)

Shiv said...

बहुत मस्त पोस्ट.
दुआर पाटने का काम अक्सर लोग करते हैं. दुआर ऊंचा हो जाए इसलिए.
मुझे सबसे बढ़िया लगा ककड़ियों की फोटो. खेत में ककड़ी देखे हुए जुग बीत गए थे. आपकी न जाने कितनी पोस्ट ने बहुत कुछ याद करवा दिया. सच!

Tarkeshwar Giri said...

Chha gaye hain aap to kabhi hamare blog par aa jaya kare

indu puri said...

बचपन से खेतों का बहुत शौक था,ननिहाल के सिवाय कभी इनका आनंद नही ले सकी.अब कुछ जमीं ली है ,जहाँ खेत के मजे लेना चाहती हूं किन्तु काम धाम मुझसे ना तो होते है ना आदत ही रही.कोई छोटी फेमिली ऐसी मिल जाए जो अगर सम्भाल ले तो गाय भैंस भी रखना चाहती हूं.मेरे ग्रेंडसन्स को तो शुद्ध दूध का स्वाद कैसा होता है वो भी नही मालूम.
बाज़ार से कितनी भी सब्जियां ले आयें किन्तु किसी भी पौधे पर उगी दो चार भिंडिया,मिर्च या बैंगन मेरा मन मोह लेते हैं.
बाबु! किस्मत की बात है,मुझे खेतोंमें काम करने में कोई शर्म नही.और सीखने की ललक आज भी है किन्तु...शरीर इन सबका आदि नही रहा. फोटोज देख कर लग रहा है जैसे मैं भी आपके साथ साथ ही खेतों में घूम रही हूं.
आलू के जीजाजी तो दिख ही नही रहे हैं.मदन की मनःस्थिति का पढ़ कर बहुत दुःख हुआ.ईश्वर उसे जल्द अच्छा कर दे.

अनूप शुक्ल said...

मजेदार पोस्ट!
ब्लॉगिंग का ककहरा चौकस। बीच से पढ़ा जा रहा है। किनारे के अक्षर माडरेट कर दिये गये क्योंकि वे मनमाफ़िक नहीं हैं। जय हो!

बी एस पाबला said...

शायद मुझे नींद आ रही! संशय में हूँ कि बात ककड़ी की हो रही कि खीरे की?

या फिर ककहरे - ककड़ी की कोई जुगलबन्दी है!

Udan Tashtari said...

वि से विवाद
क से कौव्वा महंती

..जरा ठीक से पढ़े भई...:)

बहुत मस्त लेखन!

सतीश पंचम said...

पाबला जी,

जैसे दक्षिण की ज्यादातर भाषाओं को हम एक ही कैटेगरी का मानते हुए उन्हें मद्रासी कह मान लेते हैं वैसे ही मेरे हिसाब से ककड़ी, खीरा सब एक बराबर है।

दरअसल मेरे यहां खेतों में खीरा हो या खरबूज हो या कुछ और इसी नस्ल की फसल हो...सभी को एक ही रूप में देखा कहा जाता है और झटके में बस यही कहते हैं कि- ककड़ी वाले खेत में पानी देना है, भले ही उस खेत में खरबूजे ही क्यों न लगे हों....कहलाएगा ककड़ी वाला खेत ही :)

सतीश पंचम said...

इंदू जी,

आलू के जीजाजी इसलिए ठीक से नहीं दिख रहे हैं क्योंकि कुछ जमीन में गड़े हैं और उपर से पत्तियों ने रिश्तेदारी निभाते हुए छाया कर रखी है...भई आलू के जीजाजी जो ठहरे :)

सतीश पंचम said...

@अशोक जी,

ये तालाब पाटने वाली जानकारी मेरे लिए नई है क्योंकि मेरे गाँव में तो उल्टा हो रहा है...जो तालाब कम गहरा था उसे और गहरा किया जा रहा है।



@संजय जी, समीर जी,

आप लोगों ने तो ककहरे को और भी रोचक बना दिया है :)

उम्मीद है मदन जी के यह बड़े काम आएगा :)

indu puri said...

फ़ोटो पर क्लिक करते ही जीजाजी दिख गए.चलो इनका पता तो चल रहा है कि जितने बाहर दिख रहे हैं उससे ज्यादा जमीन मे नही हैं नही तो.........
कौन कितना जमीं के अंदर तक है पता ही नही चलता.
हा हा हा
अच्छा लगा आना,आती रहना चाहती हूं.लिंक भेजना पड़ेगा भाई आपको समय समय पर. प्लीज़ .......

अभिषेक ओझा said...

ककड़ी, अरे हमारे यहाँ एक वेराइटी को फूट भी बोलते हैं. आलू का जीजा तो गजबे शब्द है. कोई साली जैसी नहीं दिखी क्या ?
ऐसे सनकी बहुत मिल जायेंगे आपको... बस ऐसे ध्यान से देखने वाले सनकी होने चाहिए :)

ललित शर्मा-للت شرما said...


हम तो आलु के जीजा से पहली बार मिल रहे हैं।
उम्दा पोस्ट-सार्थक लेखन के लिए आभार

प्रिय तेरी याद आई
आपकी पोस्ट ब्लॉग4वार्ता पर

अनूप शुक्ल said...

ऐसे सनकी बहुत मिल जायेंगे आपको... बस ऐसे ध्यान से देखने वाले सनकी होने चाहिए :)

इस टिप्पणी पर कोई कार्रवाई होगी कि छोड़ दिया जायेगा! :)

सतीश पंचम said...

@ अनूप जी's comment

ऐसे सनकी बहुत मिल जायेंगे आपको... बस ऐसे ध्यान से देखने वाले सनकी होने चाहिए :)

इस टिप्पणी पर कोई कार्रवाई होगी कि छोड़ दिया जायेगा! :)

--------------

अभिषेक जी का यह कहना कि ऐसे लोगों को देखने वाला भी सनकी होना चाहिए तो मेरा मानना है कि सनकी आदमी प्रतिक्रिया मे कार्रवाई नहीं करता :)

ऐसे में उनकी बात पर कार्रवाई करने का मतलब है कि मै साबित हो जाउंगा कि सनकी नहीं हूँ और बेवजह ही कार्रवाई की गई है:)

सतीश पंचम said...

सूचना - कुछ और तस्वीरें पोस्ट में लगाई गई हैं।

DEEPAK BABA said...

बहुत ही बदिया......... एक नए शख्स से मुलाक़ात हुई मदन ढेले वाला......... और हाँ आलू के जीजा से परिचय करवाया........ साला आलू......... तभी सोचे हर जगह घुसपैठ क्यों करता है. जीजा दमदार है.

गिरिजेश राव said...

हा हा हा। हँसी की सारी विधाएँ एक जगह - मुस्कुराना, दाँत निपोरना, रुक रुक हँसना, जोर से हँसना... सब सम्पन्न। पंचम भाई, हँसी के प्रकारों पर एक लेख लिखो न।

मामा के गाँव रहते थे एक रुपई मिस्त्री। राह आते जाते ईंटों के अध्धे पव्वे जुटाया करते थे। कहते थे कि इसकी जुड़ाई मज़बूत होती है। जब मकान बनाए तो दो कमरों की दीवारें उन्हीं ईटों से बनीं (by God it's true!) लेकिन मात्र इस होशियारी के अलावा बाकी मामलों में वह स्वस्थ व्यक्ति थे। बाउ कथा में कभी इनका प्रसंग भी आना है। ढेला ढोवन को पढ़ कर उनकी याद हो आई।

RAJ SINH said...

' president ' ब्लोगिंग महंथों को नाराज़ न कर देना .

वैसे ठीक जा रहे हो :) .

फोटो ब्लॉग 'Thoughts of a Lens'

फोटो ब्लॉग 'Thoughts of a Lens'
A Photo from - Thoughts of a Lens

ढूँढ ढाँढ (Search)

© इस ब्लॉग की सभी पोस्टें, कुछ छायाचित्र सतीश पंचम की सम्पत्ति है और बिना पूर्व स्वीकृति के उसका पुन: प्रयोग या कॉपी करना वर्जित है। फिर भी; उपयुक्त ब्लॉग/ब्लॉग पोस्ट को हापइर लिंक/लिंक देते हुये छोटे संदर्भ किये जा सकते हैं।




© All posts, some of the pictures, appearing on this blog is property of Satish Pancham and must not be reproduced or copied without his prior approval. Small references may however be made giving appropriate hyperlinks/links to the blog/blog post.