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Saturday, August 21, 2010

जाहली जी....गाँव के मनई...........पुलिस कलट्टर.....दरोगा-सरोगा.......मुझे जीने दो........डकैत बाबू.......सतीश पंचम

जाहली जी,

 मेरे गाँव के एक बुजुर्ग शख्सियत। इनको एक बार देखने से पता नहीं लगता कि इनके अतीत में एक ऐसा भी वाकया आया था कि जिले की पुलिस तक अपने आप को अपराधी महसूस करने लगी थी।

 बात उन दिनों की है जब डकैतीयां जमकर हुआ करती थीं। अब तो ज्यादातर चोरी चकारी और वाइट कॉलर क्राईम का दौर चल रहा है वरना जिन लोगों ने सुनील दत्त की फिल्म 'मुझे जीने दो' देखी हों तो उन्हें पता चल सकता है कि डकैती क्या होती है।

 डकैत आते थे, भरे विवाह मंडप से, सैंकड़ों के जमावड़े के बीच पूरी बारात को लूट कर शान से बंदूक लहराते चले जाते थे। तब बहुधा सेंधमारी भी चलती थी,  कच्चे घर और कच्ची दीवारों का होना इस काम में शायद  सहायक होता हो। अब तो दीवालें ज्यादातर पक्की हो उठी हैं और शायद यही वजह है कि, किसी के यहां सेंधमारी होने  का अर्थ अब सीढ़ी लगाकर छत पर चढ़ जाने से लगाया जाता है।

  तो बात हो रही है जाहली जी की।  गाँव के लोग बताते हैं कि बहुत पहले इनके यहां डकैती पड़ी थी और डकैतों ने घर के सभी लोगों को हथियार का भय दिखा बंधक बना लिया था। कुछ हाथापाई भी हुई और इसी चक्कर में जाहली जी की नाक जख्मी हो गई। उधर डकैतों ने उत्पात जारी रखा और इसी बीच जाहली जी ने किसी डकैत का चेहरा वगैरह भी देख लिया। डकैत लूटपाट कर चलते बने।

       पुलिस आई, तफ्तीश हुई, कहाँ, कैसे आदि के चक्कर में जाहली जी ने बताया कि कुछ डकैतों का कपड़ा मुँह से हट गया था, उनका चेहरा उनके सामने आने पर वे  उन्हें पहचान लेंगे। बस, फिर क्या था.....जाहली जी की मुसीबतें शुरू हो गईं। जहाँ कहीं पर कोई वारदात हुई, कोई पकड़ा गया तो पुलिस सबसे पहले जाहली जी को ही पहचान परेड के दौरान बुलाती कि बताओ, ये शख्स था क्या उस दिन वारदात के समय, वो था क्या, ये नहीं था तो कैसा था........वगैरह-वगैरह। जाहिर है रोज रोज के पुलिस थाने के इस चक्कर से जाहली जी परेशान हो उठे, रोज रोज हल-कुदाल छोड़कर, काम छोड़कर थाने जाना जाहली जी को परेशान करने के लिए काफी था।  इन सबसे निजात पाना अब जाहली जी को मुश्किल लग रहा था, डकैती में जो सामान गया सो गया, अब  पुलिसिया धौंस अलग सहो। जीना मुहाल हो गया ।

     तो, अंत में जाहली जी ने एक उपाय सोचा और पहचान परेड के दौरान एक पकड़े गये कैदी की ओर इशारा कर कहा कि यही है वह डकैत जो उस दिन मेरे यहां डकैती के दौरान आया था। बस फिर क्या था, चार्जशीट बनी, कार्यवाही हुई, जिस केस के लिए वह शख्स पकड़ा गया था उसमें अलग दफा लगाई गई कि बहुत सरकस किस्म का यह आदमी है , जाहली जी के यहां डकैती में भी इसका हाथ था.....आदि-आदि।  ये तो हुई कागजी खानापूर्ति, लेकिन जाहली जी को लगा कि अपनी रोज रोज की पुलिसिया आफत से जान बचाने के लिए किसी अंजान शख्स को इस तरह फंसाना ठीक नहीं, भले ही वह किसी ताजा मामले में दोषी ही क्यों न हो। आखिर है तो इंसान ही। जाहली जी की आत्मा ने गंवारा न किया और तब जाहली जी ने एक अगली चाल चली।

        जब अदालत में मजिस्ट्रेट के सामने गवाह के तौर पर उस शख्स की कारगुजारीयों को बताने का वक्त आया तो जाहली जी लगे उटपटांग बातें बताने, ऐसी बातें जिनका मुकदमे से कोई ताल्लुक न था। अदालत में मौजूद पुलिस सकते में, कि यार ये क्या उटपटांग बके जा रहा है। उधर मजिस्ट्रेट अलग ही हलकान की ये कैसा गवाह है जो कुछ भी बके जा रहा है।  तब मजिस्ट्रेट ने जाहली जी से सीधे जानकारी लेते हुए उनसे उनका नाम, पता, उम्र वगैरह बताने का कहा। सब कुछ तो ठीक ठाक बताया जाहली जी ने लेकिन उम्र बताते समय अपने पिता की उम्र अपने से भी कम बताया। मजिस्ट्रेट ने टोका तो भी इस बात पर डटे रहे कि-  हुजूर हमार उमिर हमरे बाप से जियादे है।

 तुरंत मजिस्ट्रेट ने मौके पर मौजूद पुलिस वालों की क्लास ले ली कि कैसा आगल-पागल गवाह लाकर खड़े कर देते हो, खबरदार जो आइंदा इस तरह का गवाह लाये तो ?

  बस फिर क्या था.....मुकदमा खारिज....।  गवाह की लिस्ट और पहचान परेड वाले पुलिसिया धौस से जाहली जी का नाम गायब।

      एक वह दिन था और आज का दिन है कि फिर  कभी  पुलिस की जीप उनके दरवाजे पर नहीं दिखी।

      पिछली ग्राम्य यात्रा के दौरान जब अपने खेतों में खड़े होकर फोटो शूट कर रहा था तब अचानक ही जाहली जी आते दिखे और मैंने उनकी तस्वीर हच्च से खींच ली। तस्वीर खींचवाते वक्त जाहली जी का हावभाव बिल्कुल बेपरवाह सा था, मानों कहना चाह रहे हों कि बड़े बड़े पुलिस कलट्टर, दरोगा-इसपी,  हमसे फरके रहते हैं औ तूम आए हो  फोटू हींचने...... अए तनि जिये द भईया  :)

- सतीश पंचम

स्थान - वही, जहाँ दरोगा और दरोडा ( डकैती )  जैसे शब्दों में नामराशि एक ही होती है।

समय - वही, जब एक पुराने चुटकुल्ले के अनुसार गाँव वाले देहाती मनई से जब दरोगा ने पूछा कि जब डकैती वाला वकुआ हुआ तो घड़ी में केतना बजा था ?  तब देहाती मनई ने कहा -  जी, घड़ी पर तो एकै लट्ठ बजा था और तभी वह टूट गई....मुला  समय अब तक वही दिखा रही है लट्ठ बजनहा  :)

(     जाहली जी की प्राईवेसी को ध्यान रखते हुए कैमरे से खींची गई उनकी क्लोस शॉट तस्वीर को यहां नहीं दे रहा हूँ , वरना कहेंगे कि बाहरी तो बाहरी, ससुरे यहां गाँव वाले भी हमका जिए नहीं दे रहे हैं    : )

22 comments:

महेन्द्र मिश्र said...

बहुत ही जोरदार प्रसंग बताया अपने जाहली जी के बारे में ... आम आदमी वैसे ही पुलसिया झंझट में नहीं पड़ना चाहते है ....आभार बढ़िया संस्मरण

Tarkeshwar Giri said...

Majedar Hai

Shiv said...

जहिली जी की जय हो!
अब अइसन मनई कहाँ मिलिही? पोस्ट बहुत बढ़िया बा. अब हम कौनउ नई बात कह थई?

Mahendra said...

Aapka blog jab bhi padta hu sidhe gaun pahuch jata hu .Aapke likhawat se jyada gauvn ki tasvire dil ke jyada karib hoti hai ,lagta hai are aisaa to mera bhi gauvn hai ,thik aisi hi pagdandi aise hi log aise hi makaan .Bilkul Mere gauvn jaisa.

रंजना said...

जब डकैती वाला वकुआ हुआ तो घड़ी में केतना बजा था ? तब देहाती मनई ने कहा - जी, घड़ी पर तो एकै लट्ठ बजा था और तभी वह टूट गई....मुला समय अब तक वही दिखा रही है लट्ठ बजनहा :)

हा हा हा हा....पेट दुःख गया हंस हंस कर....

मेरे मामा पहले वकील और बाद में जज बने...ऐसे ऐसे गवाह और मुकदमों के बारे में बताते थे कि मजाल नहीं सुनने वाला हँसते हँसते रो रो न भरे...

मो सम कौन ? said...

बढ़िया चरित्र से मिलवाया आपने। ऐसे लोगों को बहुधा लोग कम पढ़े लिखे मान लेते हैं जबकि अपना ये मानना है कि ये ’पढ़े कम और कढ़े ज्यादा’ कैटेगरी के हैं।
सतीश भाई, ऐसे चरित्र बिखरे पड़े हैं हमारे आस पास, लेकिन देखने की नज़र कम लोगों के पास है। आप उन कम लोगों में से हैं, देखने का एक अलग ही नज़रिया, अपने को बहुत पसंद है।

मनोज कुमार said...

ऐसे चरित्र प्रायः सब जगह पाए जाते हैं, तभी तो सब छूट जाते हैं।

प्रवीण पाण्डेय said...

बड़ा ही रोचक प्रकरण सुनाया। जाहली जी का समाजबोध पुलसिया तरीकों के कारण बदल गया। दुर्घटना से दूरी भली।

गिरिजेश राव said...

हमको इहाँ आ कर बड़ा संतोख होता है कि चलो कोई तो है जिसकी भेंट गाँव में भाँति भाँति के चरित्रों से होती है और उनसे परिचय भी कराता चलता है।
वरना बहुते शहरात तो हमरी बात कोरी गप्प मान बैठें।

DEEPAK BABA said...

भाई पुराने खूंट किस्म के खांटी लोग थे.. अपनी पे आ जाये तो क्या.... क्या DC - क्या BC, क्या CM क्या PM. इनके लिए सब बराबर

rashmi ravija said...

बहुत ही रोचक प्रसंग...जाहिली महाशय ने तो बहुत बढ़िया तरकीब निकाली पुलिस के चक्करों से से बचने की...

संगीता पुरी said...

बहुत ही रोचक ढंग से वर्णन करते हैं आप ..

Arvind Mishra said...

अच्छा तो आपके गाँव में हैं ऐसे किरदार -मेरे गाँव में भी -अगली बार चल के दिखायेगें ..
मजिस्ट्रेट ने पूछा की चोर किस रंग का था -देखा तो था नहीं अब क्या बताएं -तो कह पड़े हुजूर गेहूँअन कलर का -
क्या मतलब -हुजूर कुछ काला कुछ सफ़ेद !

Sanjeet Tripathi said...

shandar, to police ke taur tariko ke karan aise badalte hain aadmi aur aise bidakte hain gawah.....

Ashok Pandey said...

सतीश भाई, इंटरनेट पर गांव तो बस आपके ब्‍लॉग में ही देखने को मिलता है। पिछली पोस्‍ट के फोटो भी बहुत पसंद आए थे, लेकिन टिप्‍पणी लिखते वक्‍त बत्‍ती गुल हो गयी थी।

Mithilesh dubey said...

जोरदार, वज्र गवई हो भईया ।

cmpershad said...

अब डाकू ही नेता बन गए तो जनता जाहली हो या जाहिल.. की फ़रक पडेला है :)

अनूप शुक्ल said...

जाहिली जी की जय हो!

वाणी गीत said...

जाहिली इतने कमाल की होती है ...हमको पता नहीं था ..:):)

ab inconvenienti said...

काश ऐसे मस्त जाहिल हम भी होते.

शोभना चौरे said...

देखा गाँव के लोग अब सीधे साधे भोले भाले नहीं रहे |
जाहिली का बड़ा अच्छा संस्मरण रहा |

Vivek Rastogi said...

वाह क्या खूब तरीके से खुद को भी बचाया और जिसको फ़ँसाया उसको भी... ऐसे बहुत से वाकये गाँवों में सुनने को मिलते हैं। मजेदार..

फोटो ब्लॉग 'Thoughts of a Lens'

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