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Sunday, August 15, 2010

साहित्य में अश्लीलता की छौंक...... छिनरपन वाली 'फँसा-फँसी'........रेणु जी का बावनदास...... बौद्धिक अय्याशीयों के बीच परोसी गई साहित्यिक थाली............सतीश पंचम

        बड़ा शोर है कि विभूति नारायण ने कुछ महिला लेखिकाओं को छिनाल कहा, यह कहा वह कहा.....बड़ी छीछालेदर हो रही है विभूति नारायण की। इस बमचक और शोर-गुल्लहटी के बीच मजे की बात यह हो रही है कि इस उधेड़न-खोलन-सीयन के दौरान कई और भी चीजें बेनकाब हो रही हैं।

      मैं उद्धरण देना चाहूँगा पिछले हफ्ते डीडी न्यूज पर चली एक परिचर्चा का जिसमें कि सुधांशु रंजन जी थे, पालीवाल जी थे, और दो महिला लेखिकाएं थी जिनका नाम मुझे याद नहीं है, और साथ थे फोन पर विभूतिनारायण। तो कुल जमा पांच लोग बतिया रहे थे। बात चल रही थी कि विभूति नारायण जी के छिनाल प्रसंग पर। बात चीत के दौरान ही सुंधांशु रंजन जी ने खुलासा किया कि जब वह इस प्रोग्राम के लिए मैटर इकट्ठा कर रहे थे तो कुछ महिला लेखिकाओं ने उनसे भी इस बात को कहा कि कैसे कुछ लेखिकाएं उन्मुक्तता के नाम पर छूट लेती हैं और बात ही बात में ऐसी लेखिकाओं के लिए उन महिलाओं ने छिनाल जैसे शब्द से भी ज्यादा बुरे शब्दों का प्रयोग किया है।

    अभी यह बातचीत चल ही रही थी कि उन्हीं दो महिला लेखिकाओं में से एक ने अपना विचार व्यक्त करते हुए जो कुछ कहा उसका लब्बो-लुआब यह था कि – क्या महिला लेखिकाओं को इतनी पढ़ी लिखी होने के बाद यही एक तरीका रह गया है जिससे वह अपने लेखकीय कैरियर को दशा और दिशा दे सकें....क्या इतना पढ़े होने के बाद.... उनके पास अपनी सोच और बुद्धि नहीं है जो कि लोग इस तरह के आरोप करे जा रहे हैं।

         अब यहां उन महिला पैनलिस्ट की बातों को एकबारगी सुनने में कुछ भी अटपटा नहीं लगता, लेकिन जरा ध्यान दिया जाय तो एक छुपा अर्थ भी निकल रहा है.....महिला पैनलिस्ट का यह कहना कि महिला लेखिकाओं द्वारा इतनी पढ़ी लिखी होने के बावजूद क्या यही सब करने को रह गया है अपनी दशा और दिशा सुधारने के लिए ? ......तो उनसे मैं पूछना चाहता हूँ कि क्या जो महिलाएं पढ़ी लिखी नहीं है या कम पढ़ी लिखी है, वही छिनरपन वाला काम करती हैं.........क्या वही लोग इस सब में आगे रहती हैं ? क्या छिनरपन फानने के लिए कम पढ़ी लिखी महिलाएं ही  जिम्मेदार हैं ?

   अप्रत्यक्ष रूप से ये वही छिनाल कहे जाने जैसी बात है जिस पर कि बवाल मचा हुआ है । उस समय सुधांशु रंजन की जगह पर मुझे रहना चाहिए था और यही सवाल पूछता...- कि पढ़ा लिखा हुआ तो छिनरपन नहीं,  और अनपढ़ हुआ तो संभावनाएं अनंत !!!

     खैर, अभी इस पर न जाने कौन क्या-क्या विचार करेगा और क्या क्या कहेगा.....। लेकिन मैं रेणु रचनावली से कुछ उद्धरण देना चाहूँगा जो कि साहित्य में अश्लीलता और उससे जुड़े हुए मुद्दों पर कुछ बहुत ही रोचक बातें बता रही हैं।

 सबसे पहले मैं सुश्री गौरा जी द्वारा उद्धृत एक लेख का अंश दे रहा हूँ जिसे कि 1956 में प्रकाशित किया गया था। गौरा जी लिखती हैं कि -

    - हिंदी में ऐसे निरामिष (?) आलोचक भी हैं जो समय पड़ने पर अश्लीलता के ‘अ’ से ही सिहर पड़ते हैं और समय-असमय नैतिकता अनैतिकता का प्रश्न उठाया करते हैं।

आगे गौरा जी ने और अपनी बातों को स्पष्ट करते हुए लिखा है कि -

     मैं साहित्य में चटपटी भाषा का नहीं, बल्कि वैज्ञानिकता का महत्व मानती हूँ। अत निवेदन करूंगी कि साहित्य में अश्लीलता का प्रश्न निरर्थक है। वह सब सनातन का व्यापार है और निकट भविष्य में वह सब बदलेगा ऐसी आशा भी नहीं है। फिर प्रक्रिया भी किन्हीं दो ही अंतों के बीच कहीं स्थित होगी। चाहे नदी के द्वीप की संयत काम क्रीड़ा हो या बर्बर नोंच-खसोट.....इसे नकारने का प्रयत्न सारे मानव-मनोविज्ञान एवं पाँच-हजार वर्षों के मानवीय उपलब्धियों को झुठलाना होगा। - (सुश्री) गौरा, जनवरी 1956

( रेणु रचनावली-4, पृष्ठ संख्या - 384)

    Hmm…. गौरा जी द्वारा कही गई यह बात तो मार्के की है कि - इन सब बातों को नकारने का प्रयत्न सारे मानव-मनोविज्ञान एवं पाँच-हजार वर्षों के मानवीय उपलब्धियों को झुठलाना होगा।

       अब जरा मैला आँचल के एक खास कैरेक्टर बावनदास के बारे में जान लिया जाय जो कि मूलत: कट्टर गाँधीवादी है, खद्दर पहनता है, हाव भाव भी विचार भी वही गाँधीवादी..... लेकिन है तो आखिर इंसान ही....सो एक घटना का बयान करते बावनदास को लेकर मैला आँचल में लिखा गया है कि –

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    एक दिन चन्दनपट्टी आश्रम में, दोपहर को तारावती जी बिछावन पर आराम कर रही थीं। सामने के दरवाजे पर पर्दा पड़ा हुआ था और पर्दे के इस पार ड्यूटी पर बावनदास। फागुन की दोपहरी। आम की मंजरियों का ताजा सुवास लेकर बहती हुई हवा पर्दे को हिला-हिलाकर अन्दर पहुँच जाती थी। तारावती जी की आँखें लग गईं। बावन ने हिलते डुलते पर्दे के फाँक से यों ही जरा झाँक कर देखा था। उसका कलेजा धक् कर उठा। मानों किसी ने उसे जोर से धकेल दिया हो। पर्दे को धीरे धीरे हिलाने वाली फागुन की हवा ने बावन के दिल को भी हिलाना शुरू कर दिया। बावन ने एक बार चारों ओर झाँक कर देखा, फिर पर्दे के पास खिसक गया। झाँका। चारों ओर देखा तब देखता ही रह गया मन्त्र-मुग्ध सा। पलंग पर अलसाई सोई जवान औरत। बिखरे घुँघराले बाल, छाती पर से सरकी हुई साड़ी, खद्दर की खुली हुई अँगिया....कोकटी खादी के बटन। आश्रम की फुलवारी का अंग्रेजी फूल गमफोरना, पाँचू राउत का बकरा रोज आकर टप-टप फूलों को खा जाता है। बावन के पैर थरथराते हैं। वह आगे बढ़ना चाहता है। वह जानता है । वह इस औरत के कपड़े को फाड़ कर चित्थी-चित्थी कर देना चाहता है। वह अपने नाखूनों से उसके देह को चीर फाड़ कर डालेगा। वह एक चीख सुनना चाहता है। वह अपने जबड़ों से पकड़ कर उसे झकझोरेगा। वह मार डालेगा इस जवान गोरी औरत को। वह खून करेगा....ऐं...। सामने की खिड़की से कौन झाँकता है ? गाँधी जी की तस्वीर !!  दीवार पर गाँधीजी की तस्वीर ! हाथ जोड़ कर हंस रहे हैं बापू ! ....बाबा !!  धधकती हुई आग पर एक घड़ा पानी ! बाबा ! छिमा ! छिमा ! दो घड़े पानी ! दुहाई बापू ! पानी...पानी....शीतल ....ठंडक!!!!


    इस घटना से जुड़े बावनदास के प्रसंग और उसके द्वारा किए गए कई विशुद्ध सामाजिक क्रियाकलापों के आलोक में मैला आँचल के बावनदास की चर्चा करते हुए आगे रेणु रचनावली में गौरा जी लिखती हैं कि –

    मैला आँचल के बावनदास की चर्चा श्री लक्ष्मीनारायण भारतीय जी ने की है और श्री नरोत्तम   नागरजी ने भी । भारतीय जी के शब्दों में, यथार्थ चित्रण के और भी रास्ते हो सकते थे। मगर मेरी राय है कि उक्त प्रसंग के अंकन में लेखक ने असाधारण संयम और कौशल से काम लिया है और कुछ यौन प्रतीकों, आभाओं, दृश्य संकेतों द्वारा ही दृश्य को समाप्त कर तुरंत एक महान् सबलाइमेशन प्रस्तुत किया है। मैं नहीं समझती कि कोई दूसरा शॉर्टकट था।


    आगे गौरा जी ने लिखा है कि -

‘फँसा-फँसी’ के अतिरेक से श्री नरोत्तम नागर जी खिन्न है, श्री लक्ष्मीनारायण भारतीय जी भी । भारतीय जी सोचते हैं कि वैषयिक संबंधों के अतिरेक के कारण, पूछने की इच्छा होती है कि “हर टोला नियमित, व्यवस्थित और खुले रूप से, अनैतिकता का अड्डा ही है क्या ? ” और नागर जी का कहना है कि “गर्ज यह कि सब किसी-न-किसी से फँसे हैं ”।

     भारतीय जी से निवेदन है कि कुशल उपन्यासकार के कैमरे की आँखें बहुत सेंसिटिव होती हैं और वे यदि सामाजिक समाजिक संबंधों के सतही चित्र भी प्रस्तुत करती हैं, तो ऐसे लोग चौकते हैं कि जिन्होंने जीवन को कम-देखा समझा है। यदि सभी को माइक्रो-फोटोग्राफी द्वारा विश्लेषण किया जाय तो बड़े विचित्र फल आयेंगे, जिनसे कुछ लोगों को भयंकर शॉक लग सकता है।...... - ( सुश्री गौरा, रेणु रचनावली-4, पृष्ठ 385)

     तो यह थे रेणु जी के बारे में गौरा जी का लिखा 1956 में एक लेख का अंश जिसमें कि साहित्य के अश्लीलता वाले पहलूओं पर प्रकाश डाला गया है और बहूत बढ़िया तरीके से साहित्य में अश्लीलता वाले बातों को स्पष्ट किया गया है। अब तनिक एक मौजू अंश को भी पढ़ा जाय जिसका संदर्भ हांलाकि अलग है लेकिन बहुत कुछ बातें यह अंश कह दे रहा है....... जिसमें कि रेणु जी ने पटना में आई बाढ़ का जिक्र किया है। रेणु जी लिखते हैं -

     एक नीमजवान,नवसिखुआ लड़का कमर भर पानी में खड़ा होकर पटना में आई बा़ढ़ की तस्वीरें ले रहा है। नहानेवाले लड़के उसके सामने जाकर मुँह चिढ़ा रहे हैं। भीड़ का एक कड़ियल-जैसा आदमी तैश में आकर कैमरे वाले से कुछ कह रहा है। ब्लॉक नंबर एक के छत पर खड़े कुछ लोग भी चिल्ला-चिल्ला कर कुछ कह रहे हैं। हमारे ब्लॉक के मुँडेरे से भी कुछ आवाजें कसी जाने लगीं। यहाँ लोग कल से घिरे हुए हैं, न नाव है न रिलिफ और ये फोटो वाले लोग हैं कि केवल तस्वीरें ले रहे हैं। इसी को कहते हैं कि किसी का घर जले और कोई मौज से तापे। …..मत खींचने दो किसी फोटोवाले को फोटो...इनको पैसा कमाने का यही मौका मिला है ?

        कैमरावाला नौजवान बुद्धिमान है। उसने तुरंत उस कैमरे का रूख तमाशबीनों की ओर कर दिया । तैश में आया हुआ कड़ियल-जैसा आदमी तुरंत ठंडा हो गया और गले में लिपटा हुआ अँगोछा तुरंत ठीक कर मुँह पर हाथ फेरकर फोटो खिंचाने के पोज में खड़ा हो गया। नहानेवाले लड़कों ने वहाँ पहुँच कर पीनी उलीचना-छींटना शुरू कर दिया। भीड़ का एक दूसरा आदमी तैश में आकर उन बच्चों को डांट कर भगाने लगा। छाती भर पानी में से भागते लड़कों में से एक ड्रम के बने बेड़े पर चढ़ गया और अपने पैंट के अग्रभाग के एक विशेष स्थान की ओर संकेत करते हुए बोला – ‘इसका फोटो लो’ ...... कुछ लोग हँसे, कुछ ने मुँह फेर लिया तो कुछ ने कहा – “अरे-रे...हरमजदवा.....” कहकर चुप हो गए....छाती भर पानी में जाकर बच्चों को पकड़ने का साहस किसी में न था।

         आगे रेणु जी ने पटना में आई बाढ़ के बीच हुए इस दृश्य की तुलना करते हुए लिखा है कि - मुझे पांच –सात महीने पहले देखी हुई युगोस्लावी फिल्म ( वी आर बिविच्ड, इरिन) के एक दृश्य की याद आ गई जिसमें कि झरने में अर्धनग्न नहाती हुई इरिन को चारों ओर से छुपकर देखने वाले लड़कों को खदेड़ते हुए जब इरिन का ससुर कहता है कि अब कभी इधर देखा तो जान से मार दूंगा, विल ‘किल यू’ तो भागते हुए छोकरों में से एक ने कुछ दूर जाकर उलटकर ऐसी ही मुद्रा बनाई थी और कहा था ‘किल दिस’  !!!

  भागते छोकरे द्वारा अपने विशेष अंग की ओर संकेत कर 'किल दिस' कहना.....अपने आप में साहित्य में अश्लीलता मुद्दे पर नाक भौं सिकोंडने वाली उन प्रवृत्तियों पर एक तीखा तंज है...... जो कि  गाहे-बगाहे नैतिकता की थाली परोसने को हमेशा तैयार बैठी रहती हैं.........नैतिकता.....जिसकी दुहाई समय और  मौका देखकर ही दी जाने की एक परंपरा सी रही है।


- सतीश पंचम

स्थान – वही, जिसे अंग्रेजों ने कभी दहेज में दे दिया था।

समय – वही, जब गाँधी टोपी लगाने और खद्दर पहनने वाले एन डी तिवारी द्वारा एक शख्स को अपना बेटा नहीं मानने और उसकी पैतृक पहचान नहीं करने वाली अर्जी अदालत द्वारा खारिज हो गई हो और तभी अदालत के बाहर खड़ा बावनदास हँसते हुए कहे – पाँचू राउत की बकरी लगता है अंग्रेजी फूल फिर से खा गई :)

15 comments:

'अदा' said...

स्वतंत्रता दिवस के शुभ अवसर पर हार्दिक अभिनन्दन एवं शुभकामनाएँ...!

काजल कुमार Kajal Kumar said...

एक बार एक सज्जन से सभा को संबोधित करते हुए कहा कि यहां उपस्थित लोगों में आधे मूर्ख हैं. खूब हो-हल्ला हुआ, वक्तव्य वापिस लेने पर अड़ गए लोग...

साहब ने वक्तव्य वापिस ले लिया -"ठीक है, यहां उपस्थित लोगों में आधे लोग मूर्ख नहीं हैं"

Pankaj Upadhyay (पंकज उपाध्याय) said...

मुझे लगा था कि ’छिनाल’ शब्द की गहमागहमी हस्ताक्षर अभियानों के बाद कम हो गयी होगी.. वैसे इस प्रकरण ने काफी कुछ ऎसा दिखाया है जिसे मैं शायद नहीं देखना चाहता था..
किसी ने आग जलायी, किसी ने तवा रखा और सबने रोटियां सेकीं.. और फ़िर बौद्धिक अय्याश(ये शब्द पसंद आया) लोगों ने मिल-बाँट कर खाया..

जाने कैसे अब तक ’रेणु जी’ को नही पढ पाया हूँ.. और न जाने कितने आर्टिकिल उनपर पढ चुका हूँ.. प्रतिलिपि पर एक सदन झा ने एक अच्छा लेख लिखा है लेकिन मुझे गिरिन्द्र जी की ये पोस्ट बडी पसंद आयी.. अच्छा लगा रेणु और रेणु रचनावली दोनो के बारे में पढना... ऎसे ही अच्छा पढवाते रहें और हमें धन्य करते रहें.. एक बात और वो भोजन पर कविताओं वाली पोस्ट भी बडी प्यारी थी... कविताओ को नये ढंग से रखती हुयी.. चाँद, तारों से दूर ’चिपके हुये चावल’ को छुडाने की कश्मकश..

अनूप शुक्ल said...

थाली चकाचक है। चटखारेदार!

प्रवीण पाण्डेय said...

आपका चिन्तन गहरा है,
यहाँ संवाद पर पहरा है।

Himanshu Mohan said...

देखिए सतीश जी, एक तो हम वैसे ही शोर्ट-टर्म मेमोरी-लोंस से बस ज़रा ही ऊपर रहते हैं उन बातों के प्रति जो हमें खास न रुचे-मगर फिर भी बार-बार सुना के कुछ बातें याद रह ही जाती हैं - कुमार सानू के गानों जैसी.
अब इस प्रकरण में हमारी समझ ने जो दर्ज किया है हमारी समझदानी में - वो ये है कि 'छिनाल' सुनते ही विभूति नारायण याद आ जाते हैं.
यानी "छिनाल बोले तो - विभूति नारायण"
और दूसरा असर यहाँ हुआ है कि पहले इसा शब्द को गाली या अपशब्द के रूप में जानते थे-मगर अब इस से किसी प्रकार की वितृष्णा खत्म हो गई है, जैसे रहते-रहते नाले की सडांध के अभ्यस्त हो गए हों.
आपकी पोस्ट टनाटन है - मस्त बोले तो.

Arvind Mishra said...

आप तो पूरा रौंद डाले हैं -सुन्दर संदर्भ सहित विवेचन !

बेचैन आत्मा said...

इस पोस्ट को पढ़कर आनंद आ गया..
..बावनदास की याद ताजा हो गई. कोई याद न दिलाए तो पढ़ा-लिखा, गुण-गोबर हो जाता है.
..आभार.

गिरिजेश राव said...

चौंचक गुरू! यह रूप भी तुम्हारा ही है।
धन्न कर दिए।
पंचम की लेखनी बकरी बन कर मोथा घास सब चर गई। अब पब्लिक लेंड़ी में खोजे जो खोजना है।

बी एस पाबला said...

हा हा

गिरिजेश जी के बाद अब अपन क्या कहें :-)

राज भाटिय़ा said...

स्वतंत्रता दिवस की हार्दिक शुभकामनाएं!!

Shiv said...

बढ़िया पोस्ट!

cmpershad said...

भैया, आपने महिला लेखिकाओं का ज़िक्र तो कर दिया पर पुरुष....? :)

सिद्धार्थ शंकर त्रिपाठी said...

यह लेख पढ़कर जाने क्यों मन को बहुत राहत सी महसूस हो रही है।

Sanjeet Tripathi said...

silsile jode hain to ekdam hi satik jode aapne, dar-asal in paribhaashao ka hi sara khel hai... shleel aur ashlel...... baaki jo sandarbh raha vo to rahegaa hi...

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