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Thursday, August 12, 2010

बस क्या कलमाड़ी अंकल................सतीश पंचम

         आज कल अपने कलमाड़ी अंकल जी को हर कोई गाली दे रहा है। यूँ तो उनके नाम के सामने जी लगाने को मन नहीं करता लेकिन न लगाने से चलता भी नहीं। इतने बड़े महानुभाव हैं कि चार हजार का तो आइ कार्ड बनवाया है महाशय ने।

        बताओ........ जो बंदा अपनी पहचान बताने के लिए एक कार्ड पर चार हजार खर्च कर सकता है वह अपनी पहचान बनाने के लिए हजार-बारह सौ करोड यहां वहां न करे तो क्या करे। उस पर तुर्रा यह कि चीजें इतनी महंगी कैसे खरीदी गईं। अरे भई कोई मछली बाजार है कि बारगेनिंग करते.....कह दिया जो दुकान वाले ने....तो ले लिया। अब इतने बड़े भारत के मंत्री होकर किसी संत्री की तरह मोल तोल करते तो अच्छा थोड़े लगता। लोग समझते तो हैं नहीं, बस मुँह उठाए और भक्क से जो मन में आया बोल दिया। भई बारगेनिंग भी सब किसी से नहीं जमता, वह भी एक प्रकार की कला है।

    अब मेरी श्रीमती जी को ही देखिए....बाजार में जाकर आधा आधा घंटा मोल तोल करेंगी तब जाकर कोई चीज खरीदी जाएगी। भई मुझे तो औरतों के इस बारगेनिंग कला पर कभी कभी चिढ़ सी होने लगती है कि दस रूपए के अरक फरक वाली चीजों पर भी आधा आधा घंटा तक मोल तोल चलता रहेगा।

      एक मैं हूँ कि कोई चीज अगर सौ रूपए की लाया होउंगा तो उसे जान बूझ कर सत्तर- अस्सी तक बताउंगा ताकि श्रीमती जी मीन मेख न निकाल सकें और जो कभी सही सही दाम बता दिया कि इतने में लाया हूँ तो फिर सुनो लैक्चर.........दुकानदार ने कह दिया और इन्होंने ले लिया....यह नहीं की भाव ताव करके कम कराया जाय.....चाहो तो पूरा का पूरा घर ही लुटा दो....बड़े आए बजरूआ बने हुए ।

   अब बताओ, मैं इसमें क्या कर सकता हूँ....बारगेनिंग करना नहीं आता सो नहीं आता। लेकिन मैं एक बात जरूर समझने लगा हूँ कि यदि किसी महिला को कॉमनवेल्थ खेल के साजो सामान की खरीददारी करने का कहा गया होता तो अब तक तो भारत के हजार-बारह सौ करोड़ तो बचा ही लेतीं। मजाल है कि विदेशी वेंडर एक पैसा फालतू मांग ले। चार हजार का आई कार्ड जो कलमाडी एण्ड कंपनी ने खरीदवाया है, उस वेंडर की तो वाट ही लग जाती। कार्ड वेंडर के दुकान की एक बानगी देखिए -


- मैडम, स्कूल के आई कार्ड और इसमें फरक है मैडम।

- कुछ फरक नहीं है, तुम सब लोग बेवकूफ बनाता है, सौ - डेढ़ सौ का चीज को चार हजार का दाम लगाता है....देना हो तो दो नहीं तो हम दूसरा दुकान देखता है......

- ओ मैडम जाओ मत...... तीन ह्जार ओनली...... जास्ती नई मैडम....हम आप से जास्ती नईं लेगा। धंधे का टाईम है, देखो बोहनी भी नहीं हुआ है।

- बोहनी नहीं हुआ है तो क्या हमसे ही तीन-चार हजार वसूलेगा......आखरी बोलता है, दो सौ फाईनल....देने का होगा तो दो.....अबी हम जास्ती नईं बोलेगा.....

- अरे मैडम आप इतना कम बोलता है, कैसे चलेगा मैडम.....संसद में जो कार्ड चलता है वो भी ढाई हजार का होता है......दो सौ में कैसा परवडेगा मैडम ... थोड़ा तो सोच्चो.....

- वो तुम सोचो.....पाच रूपए का प्लास्टिक कार्ड, उसमें नंबर बिंबर लिख के सब बेचेगा तो भी वो पचास के उप्पर नहीं जाता है, तुम को फिर भी दो सौ देता है....कम नहीं है.....

- अरे मैडम, ये वो इस्कूल का माफिक कार्ड नहीं है मैडम, सब कमपूटर कार्ड मैडम.....चलो आपके लिए दो हज्जार ...

- तो क्या कम्प्यूटर का है तो क्या हो गया, और सस्ता होना मांगता कि और तुम महंगा करके बोलता है....देने का होगा तो दो बाबा....नहीं तो हम दूसरा दुकान को देखता है दो हज्जार बहोत ज्यादा है......तीन सौ में देने का होगा तो दो.....

- अरे मैडम, इधर दुकान लगाने के लिए हफता देना पड़ता है.....वो टोपी बीपी लगा के आता है ना मामा लोग....वो लोग को भी इसमें से देना पड़ता है.....कइसा परवडेगा मैडम

- वो तुम जानो, तुम्हारा मामा लोग जाने.... अगर पांच सौ में देने का होएंगा तो दो....नहीं तो बस बाबा अभी जाता है.....

- ओ मैडम....ओ मैडम जाओ मत....लास्ट बोलता है.... हजार ........

- नही....तुम रखो अपना कार्ड अपना पास....लास्ट टू लास्ट छै सौ देगा......

- अच्छा, सात सौ.....मैडम........ओ मैडम.... जाओ मत मैडम........ अच्छा बाबा.... लेक जाओ :)


   अगर कलमाड़ी अंकल के पास ऐसी बार्गेनिंग पावर और थोड़ा सा दिमाग होता तो महाशय को आज इतनी खरी खोटी सुनने न मिलता.......वैसे दिमाग तो था.....तभी ना इतना सब घोल-घोटाला हो गया........दामों में इतना हेर फेर और घपला देख कर तो मन कह रहा है कहने को ....

 -  बस क्या कलमाड़ी अंकल....... आई कार्ड के नाम पर चार हजार की टोपी पहनाने को हम लोग ईच मिले हैं क्या........इदर मिले तो मिले बंधु...... उप्पर नको मिलना रे...  :)


- सतीश पंचम


स्थान - वही, जहां पर हफ्ते का एक और मतलब निकाला जाता है।

समय - वही, जब मंत्री अंकल के सामने एक तिनका आकर गिरे और उसे देखकर दाढ़ी खुद ब खुद बोले.....कम से कम दस बारह लाख का तो होगा :)

(  चित्र - नेट से साभार )

12 comments:

Suresh Chiplunkar said...

सुबह-सुबह शिवकुमार मिश्रा जी की कलमाडीमय पोस्ट पढ़ी और शाम होते-होते आपकी भी कलमाडीयुक्त झकाझक पोस्ट पढ़ ली… बस अपना आज का दिन सार्थक हो गया…।

आप दोनों एक साथ एक ही दिन क्यों नहीं लिखते, कम से कम हफ़्ते में 3 दिन तो सुधरेंगे हमारे… :) बाकी के 4 दिन तो अस्वच्छ संदेशों को पढ़ने, बहसियाने और गरियाने में निकल जाते है… :)

Vivek Rastogi said...

वाह क्या जबरदस्त बार्गेनिंग पॉवर है, लगता है कि भारत सरकार को आपके पास आकर प्रशिक्षण लेना चाहिये, कम से कम आपकी कला का कुछ तो फ़ायदा हो।

देखलिया हमने कि हमारे निवाले तक से टैक्स छीनने वाली सरकार कैसे इसे पानी की तरह बहा रही है, हमारी गाढ़ी कमाई, जो हम अपने भविष्य के लिये कमा रहे हैं।

कभी कभी तो ऐसा लगता है कि हम अपने भविष्य के लिये नहीं इन कलमाड़ी जैसे लोगों के लिये कमा रहे हैं। अब तो लिखते भी नहीं बन रहा है....

मो सम कौन ? said...

भाई जी, देश के पैसे की चिन्ता मत करो, कलमाड़ी नहीं उड़ायेगा तो कोई और दाढ़ी या साड़ी ने उड़ाना है।
हम तो ये सोच रहे हैं कि आप जब इत्ते गजब के बजरूआ हैं ही, तो आपैको मंत्री पद पर सुशोभित क्यों न करवा दिया जाये?
महानता वाली पोस्ट पर हम आपके विरोध में खड़े थे, अब हिसाब बराबर मान लेना जी।

'अदा' said...

बहुत ही अच्छी प्रस्तुति...
भाषा....स्थिति ..भाव ..प्रवाह सबकुछ बहुत ही अच्छा....
मोलाई करना भी एक कला है...सबके वश की बात नहीं होती ये....
धन्यवाद..

सत्यप्रकाश पाण्डेय said...

अच्छी प्रस्तुति...

anoop joshi said...

`sir ji jale me namak........kalmaadi ji naraj ho jayenge.......

शोभना चौरे said...

महिलाये ऐसे ही थोड़े सुचारू रूप से घर चलाती है ?बिना तोल मोल भाव के खरीददारी का आनन्द कहाँ ?
लगता है कलमाड़ी जी ?ने कोई मॉल से खरीदा होगा विक डे में आई कार्ड क्योकि न तो वहां कोई उस समय सेल होगी और बारगेनिंग का तो सवाल ही नहीं ?
बहुत बढ़िया आलेख|

mukti said...

वाह क्या मारा है घुमा के पापड़ वाले को...
पर ये जो मोल-तोल है ना, मुझसे भी नहीं होता. मैंने दो-चार सहेलियों को फिक्स कर रखा है और उन्ही के साथ जाती हूँ खरीददारी करने.

प्रवीण पाण्डेय said...

उल्टी दिशा में बारगेनिंग हो गयी। इसमें भी लास्ट आये।

निर्मला कपिला said...

बहुत बढिया पोस्ट बार्गेनिन्ग के बहाने अच्छा कटाक्ष। शुभकामनायें

DEEPAK BABA said...

बहुत बदिया सतीश जी. अच्छा लिखा. एक बात और, कई बार लगता है की हमारे बिसिनेस में हमारी श्रीमती की भागेदारी होती या वो आकार हिसाब-किताब करती - तो कमाई ज्यादा होती. बाकि कटाक्ष अच्छा किया है.

Sanjeet Tripathi said...

are ekdam dho dala hai boss, pahle to kalmaadi kopadhwao ise... aur baad me dheere se bhabhi ji ko, are han bhabhi ji padhwane se pahle pura buletphroof ho jane ka na ;)....

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