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Friday, August 6, 2010

मुन्नी झण्डू बाम हुई ..... आईटम सांग कॉमनवेल्थ के लिए बिल्कुल सटीक बैठ रहा है......सतीश पंचम

        
             मुन्नी बदनाम हुई.......डारलिंग तेरे लिए.......ले झण्डू बाम हुई....... डारलिंग तेरे लिए............जैसे लिरिक्स के साथ धूम मचाता यह     दबंग फिल्म का गाना कॉमनवेल्थ खेलों की मौजूदा तस्वीर पर बिल्कुल फिट बैठ रहा है।

      और फिट हो भी क्यों न...... एक ओर तो कॉमनवेल्थ बाईजी आइटम डांस कर  रही हैं गाते हुए कि ....वे मैं टकसाल हुई....डारलिंग तेरे लिए......ले झण्डू बाम हुई.....डारलिंग तेरे लिए....... तो दूसरी ओर आई ओ ए अव्वा के अध्यक्ष और कॉमनवेल्थ खेलों के कर्ता धर्ता श्री दाढ़ीवाड़ी जी डांस कर रहे हैं.....चसमा लगा के।  और ये चसमा लगाना उनकी इमानदारी का सबूत भी है क्योंकि ऑल इंडिया बेवड़ा असोसिएशन के अध्यक्ष श्री बाबूराव गणपतराव आपटे के अनुसार चोर लोग चश्मा नईं लगाते। 

    हाँ तो मैं कह रहा था कि कॉमनवेल्थ वाली बाई जी गा रही हैं कि - मैं झण्डू बाम हुई डारलिंग तेरे लिए.......मैं तो बदनाम हुई डारलिंग तेरे लिए......तो इस बात में बहुत सच्चाई है। सच्चाई इसलिए  कि अब तक कई कॉमनवेल्थ गेम हो चुके हैं लेकिन यह पहली बार हुआ कि इतने बड़े पैमाने पर कॉमनवेल्थ खेलों को लेकर बदनामी हुई है...... भ्रष्टाचार का आरोप लगा है..........और लगे ही जा रहा है।  ऐसे में कॉमनवेल्थ बाई जी का यह कहना कि मैं तो बदनाम हुई डारलिंग तेरे लिए बड़ा सटीक लग रहा है।

 और झण्डू बाम ? ........... तो ऐसा है कि अब तक चाहे किसी की भी सरकार रही हो......लेकिन हमारे आई ओ ए अव्वा के अध्यक्ष पद पर लगातार रहते हुए श्री  दाढ़ीवाड़ी जी  को बराबर इस बात की पीड़ा रहती थी कि उन्हें उचित महत्व नहीं मिलता.....समय पर अनुदान नहीं मिलता.....फण्ड नहीं मिलता.......आखिर वह आई ओ ए अव्वा को चलाएं भी तो कैसे........ और ऐसे में ही आ पहुँची हमारी मुन्नी बाई के रूप में कॉमनवेल्थ बाई जी..... एकदम से  झण्डू बाम बनकर.......पीड़ाहारी .......... एक तरह से टकसाल बन कर..... उनकी बार बार की फण्ड की पीड़ा पर झण्डू बाम की तरह आराम  देते ......और ऐसे में भला हमारे दाढ़ीवाड़ी जी खुश होकर नाचें न तो क्या करें...भई दबंग ठहरे.....इसी दबंगई के चलते तो वह अब तक टिके हुए थे.....।

  लेकिन दोस्त....सब का एक न एक दिन आता है और साला टिप्प देकर चला जाता है......सुना है कि दाढ़ीवाड़ी जी ने वह झण्डू बाम कहीं गलत जगह लगा लिया और अब ऐसी जलन झेल रहे हैं  कि न  कुछ कहते बन रहा है न करते.........उपर से किसी ने टाईगर बाम बनकर एकाध जनहित याचिका भी दायर कर दी है...... हालात यह है कि पानी ओनी लेकर जितना ही चाहते हैं झण्डू बाम से पीछा छुड़ाना उतना ही वह और परेशान कर रहा है......क्योंकि हाथों में तो बाम अब भी चुपड़ा हुआ है.....इतनी जल्दी तो छूटने से रहा......और मुसीबत ये कि कई सारे दाढ़ीवाड़ी जी के दरबारी फरबारी भी हटा दिए गए हैं...........भ्रष्टाचार और चोरी-चकारी के आरोप के चलते.....ऐसे समय पर वही तो थे धोवनहार.....अब बिना उनके इस  जलन और पर्पराहट से पीछा छुड़ाएं भी तो कैसे........छुड़ाते छुड़ाते पूरी चमड़ी छिल सी गई है.....खलरा छोड़ने लगा है.....सो अलग :)

 खैर,  अब मेरी चिंता यह है कि ऑल इंडिया बेवड़ा असोसिएशन के अध्यक्ष श्री बाबूराव गणपतराव आपटे जी की उस धारणा का क्या होगा जिसके अनुसार चोर लोग चश्मा नहीं लगाते......यह उनकी इस धारणा का ही चमत्कार था कि जो लोग अब तक चश्मा नहीं लगाते थे वह लोग भी इमानदार दिखने की चाहत में चश्मा लगाने लगे  :)

 ऐसे में तो अब जोर शोर से बजने ही दिया जाय .........ले झण्डू बाम हुई...... डारलिंग तेरे लिए.....वे मैं टकसाल हुई डारलिंग तेरे लिए  :)

- सतीश पंचम

स्थान - वही, जहाँ पर बाबूराव गणपतराव आपटे का स्टार गैराज है।

समय - वही, जब हेराफेरी के आरोपों के चलते बाबूराव गणपतराव आपटे को पुलिस उठा कर ले जा रही हो और बाबूराव कहे जा रहे हों.....मैं नई रे....वो राजू हलकट ने मेरे को बोला था......मार साले को मार.....हटा उसको पद से....हटा :)

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23 comments:

मो सम कौन ? said...

सतीश भाई,
आज बिना काम के छुट्टी लेकर घर बैठना सकारथ हो गया। हंस हंस के दुहरा हुआ जा रहा हूं।
पीड़ाहारी की जगह पीड़ाकारी हो गया है झंडू बाम।
बाबू भाई की डेफ़िनेशन के मुताबिक पहले हम चोर नहीं थे, फ़िर चोर बन गये और अब फ़िर से नाचोर बनने वाले हैं।

बैजा बैजा कर दित्ती बाश्शाओ, ज्यूंदे रहो ते ऐंवे ही धोंदे रहो।

Arvind Mishra said...

बहुत तगड़ा लपेटा है ..झंडू बाम वाले तो आपके मुरीद हो जायेगें -बाकी कुछ हो या न हो !

anoop joshi said...

bhaut khoob.........

गिरिजेश राव said...

जब मैंने 'रानी का डंडा' (http://girijeshrao.blogspot.com/2010/07/blog-post_15.html) रचा था तो उद्देश्य था गुलामी के प्रतीक इन खेलों के बहाने पूरे देश के तंत्र के एक बहुत बड़े भदेस मजाक में बदल जाने को चित्रित करना। उस ऐब्सर्डिटी को दिखाना जो सामान्य सी स्वीकृत सी हो चली है।
उस समय सतीश जी! आप भी दिमाग में आए थे कि यह बन्दा जरूर लिखेगा। बाद में भ्रष्टाचारों के हुए खुलासों ने मेरी आशंका को सच किया और आप को उकसाया जो यह तीखा व्यंग्य सामने आया है - कृष्ण पक्ष को पूरे कोलतारी रंग से चित्रित करता हुआ। 'ब्लैक सटायर' जैसा कुछ है यह।
फिल्मी गीत, झंडू बाम, मल-इका आइटम सांग,मुन्नी टकसाल के बहाने आप ने सौ सौ जूते खाय तमाशा घुस के देखने वाली प्रवृत्ति पर तीखा तंज कसा है।
भ्रष्टाचार और बाज़ारवाद से चरमराते देश की कामुक मज़ैती (मज़ा लेने की प्रवृत्ति) को इतने बेहतर तरीके से यही प्रतीक दिखा सकते थे। ये '....' थोड़ा कम करो न, प्लीज।
अनाज गोदामों में सड़ रहे हैं, लोग भूखे मर रहे हैं, हजारों कन्याएँ जन्म लेने के पहले ही हलाल की जा रही है, जो जहाँ है वहीं रुपए बनाने की रिले रेस में बेतहासा भागे जा रहा है..(कहाँ तक गिनाऊँ!) और हम मज़ा लूटने को पागल हुए जा रहे हैं।
लूटो, लुटो और लुटाओ, यूरोप में जमा कराओ की संस्कृति का वीभत्स पर्व है यह आयोजन।
सही कहा दोस्त - दर्द है लेकिन हम बाम ग़लत जगह लगा रहे हैं।
कभी कभी सोचता हूँ कि मार्शल लॉ लागू होना चाहिए और इन अपराधियों को सरेआम स्ट्रीट लाइट खम्भों पर उसी तरफ से लटका देना चाहिए जिस तरफ भ्रष्टाचारी बाम लगाया जा रहा है।

बेचैन आत्मा said...

..इतने बड़े पैमाने पर कॉमनवेल्थ खेलों को लेकर बदनामी हुई है...... भ्रष्टाचार का आरोप लगा है..........और लगे ही जा रहा है। ऐसे में कॉमनवेल्थ बाई जी का यह कहना कि मैं तो बदनाम हुई डारलिंग तेरे लिए बड़ा सटीक लग रहा है।..
...एकदम सटीक लग रहा है. एकदम देशी अंदाज में करारा व्यंग्य. बहुत खूब.

काहे हौआ हक्का बक्का
छाना राजा भांग-मुनक्का
भ्रष्टाचार में देश धंसल हौ
का दुक्की का चौका-छक्का.

प्रवीण पाण्डेय said...

झंडू बाम ने मामला झंडू ही कर दिया। वाह।

अनूप शुक्ल said...

धांसू है। कामनवेल्थ कहीं भाग न खड़ा होय और बेमतलब में किसी दौड़ में इनाम न पा जाये!

गिरिजेश राव said...

अमाँ, इस पर टिप्पणियाँ इतनी कम क्यों हैं?
हमसे समझने में कुछ भूल हो गई क्या?

Shiv said...

बहुत मस्त पोस्ट!

वैसे बाबूराव गनपत राव का कमेन्ट भी मैं इच लाया हूँ...बाबूराव का कमेन्ट;

बोले तो मस्स्त पोस्ट है बाबा...मेरा वडिल..वडिल बोले तो बाप, बहुत बाम लगाता था...एक बार बाम लगाकर कामनवेल्थ गेम देखने गया...उधर में हॉकी का बोल आके लगा उसको...अरे बावा रे बावा..बोले क्या गुल्ला निकला...फीर, वो वहींच गाना गाया...बोल से गुल्ला हुआ डार्लिंग तेरे लिए...पिके मैं ठिल्ला हुआ डार्लिंग तेरे लिए..अभी मइ जाता ये..गैराज खोलना है न..

राम त्यागी said...

हाहा , अरविन्द जी से समहत ...तगड़ा लपेटा है :)

Suresh Chiplunkar said...

सादर नमन… भाई जी…
हम कौन होते हैं बाम पोंछने वाले… :)

संगीता स्वरुप ( गीत ) said...

बहुत करारा व्यंग ...

सतीश पंचम said...

@ गिरिजेश जी' s

अमाँ, इस पर टिप्पणियाँ इतनी कम क्यों हैं?
हमसे समझने में कुछ भूल हो गई क्या?



इस पर टिप्पणीयाँ इतनी कम इसलिए हैं क्योंकि सबने इसे उसी क्लासिक अंदाज में पढ़ा है जैसा कि पहले लोग खत लिखने के बाद अंत में लिखते थे - और क्या कहूँ....लिखा थोड़ा...समझना ज्यादा।

तो लोग लगता है इस लिखा थोड़ा, समझना ज्यादा के चक्कर में कहीं किसी मैटर को शायद ज्यादा ही समझ लिए हों :)

सतीश पंचम said...

सुरेश जी,

बाम पोंछने वाले दरबारी-फरबारी ससुरे पहले ही हटाय दिए गए हैं कि पर्पराने दो...जलन महसूस करने दो कहकर :)

और कहीं सांसदों का जोर का धक्का आया कि इतने बड़े घोटाले पर सिर्फ धोवनहार हटाने से काम नहीं चलेगा कुछ ठोस काम हो... तब जाकर शायद महाशय को हटाया जाय कि देखो हमने तो आपके मन की कर दी। अब चुप हो जाओ।

यह 'झुनझना-ए-हिन्द' , भारतीय लोकतंत्र का इजाद किया हुआ वह नायाब झुनझुना है जो कि गाहे-बगाहे कभी बहुत शोर-शराबा होने पर ही थमाया जाता है :)

सतीश पंचम said...

@ शिव जी, नहीं नहीं....बाबूराव गनपतराव आपटे जी,


आपका कमेंट तो एकदम राप्चीक है रे बावा....चलो इसी बात पे खंभा लेकर बैठते हैं....एकाध कोंबड़ी बिंबड़ी भी लेते हैं....लेकिन हच्यामाईला....श्रावण चालू है रे बाबा.....।

अगला महिना पक्का.....बोले तो श्रावण खतम होने दो...फिर गटारी के टाईम पर खाली खंभे से काम नहीं चलेगा....पूरा पेटी पाहिजे रे बाबा :)

*गटारी- वह दिन जब सभी शराबी जरूर शराब पीते हैं ...( संभवत श्रावण मास शुरू होने के पहले और खत्म होने के बाद वाली रात ) और ऐसा मानना है कि उस रात इतना पीयो कि गटर में गिरना ही चाहिए। अब इसमें कितनी सच्चाई है ये तो बेवड़ा असोसिएशन के अध्यक्ष बाबूराव गनपतराव आपटे जी ही बता सकते हैं :)

Girdhari khankriyal said...

kyaa baat! kya baat!! kyaa Baat!!!

boletobindas said...

पांच साल पहले ही इस पोस्तट को लिख दिए होते तो ससुरा हम भी कॉमनवेल्थ में जाकर कॉमन लोगो के पैइसे से कॉमन(जो अपन हैं) का भला कर लेते...हद है यार पहले क्यों नहीं बताया जी ..

mukti said...

आप भी सतीश जी गजबै हो. क्या व्यंग्य लिखा है. देखिये काल को झंडू बाम वाले आपके पीछे ना पड़ जाएँ कि हमारे बाम की तुलना ऐसी-वैसी चीज़ से क्यों कर दी?
और गिरिजेश जी तो लगता है व्यवस्था से बहुत आहत हो गए हैं, "कभी कभी सोचता हूँ कि मार्शल लॉ लागू होना चाहिए और इन अपराधियों को सरेआम स्ट्रीट लाइट खम्भों पर उसी तरफ से लटका देना चाहिए जिस तरफ भ्रष्टाचारी बाम लगाया जा रहा है।"

Sonal said...

ha ha...acha laga pad kar..

mere blog par bhi sawagat hai aapka..

Banned Area News : You can train your brain to control cravings

Md Firoj Akhtar said...

good concept
good news

Firoj Akhtar/biharphoto.blogspot.com said...

kya bat hai good news
bhaut khoob

रंजना said...

ओह...हंस हंस के पेटवा दुखा गया...
लाजवाब है लाजवाब !!!
इस पीड़ाहारी बाम ने तो सचमुच सारा पीड़ा हर लिया दिमाग का...

जरूरी है,ऐसे ही लपेटते रहना चाहिए ऐसे लोगों को....

Sanjeet Tripathi said...

kya lapetaa hai boss, majaa aa gaya....

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