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Sunday, August 1, 2010

महिलाओं की लिखी कविताओं पर वाहवाही इतनी ज्यादा होती है कि कभी कभी अपने कविता की समझ पर भी शक होने लगता है......सतीश पंचम

      देख रहा हूँ कि ब्लॉगजगत में महिलाओं द्वारा लिखी कविताओं पर बहुत सी वाहवाही होती है......पुरूषों की लिखी कविताओं पर कम....जबकि दोनों ही के लिखे कविताओं में मुझे कोई खास अंतर नहीं नजर आता।

     दूसरी बात यह कि अगर आपको कह दिया जाय कि अच्छा याद कर बताओ कि कौन सी कविता तुम्हें याद है जो कि तुमने इसी ब्लॉगजगत में पढ़ी हो.....तो मेरा अनुंमान है कि आप सब को ढेरों कविताएं याद आ जाएंगी.....एकदम लॉट के लॉट....भई कमेंट जो इतने सारे किए होंगे।  

     लेकिन यहां कविताओं को लेकर मेरी सबसे बड़ी मुश्किल यह है कि मैं उन्हें कम ही समझ पाता हूँ.....प्रेंम रस या स्नेह रस में पगी कविताएँ तो और भी समझ नहीं आती मुझे। हाँ अगर कविता में कोई खाने पीने वाली बात हो तो जरूर कविता समझ में आ जाती है ....न सिर्फ समझ ही आती है बल्कि लंबे समय तक याद भी रहती है। खाने-पीने वाली कविता के नाम पर हंसो मत यार ......ये मेरी बहुत बड़ी समस्या है।

   कविताएं याद कर बताने के मुद्दे पर मुझे ले देकर दो ही कविताएं पहले पहल मेरे जहन में आ रही हैं क्योंकि  उनमें खाने पीने की चीजों का जिक्र है।  मैंने यह कविताएं पहले पढा था ब्लॉगिंग में....लेकिन अब तक उनकी याद हैं । जबकि अब तक ब्लॉग जगत में न जाने कितनी कविताएं पढ़ चुका हूँ....फिर भी उनमें से केवल दो याद रहना मुझे कुछ अजीब सा लग रहा है।

 इनमें से एक कविता थी - वीरेन डंगवाल की लिखी  - 'चप्पल पर भात'  कविता,  जो कि कबाड़खाना पर मई 2009 में प्रकाशित हुई थी।  अब तक जस की तस याद है।  कविता यह रही  -

चप्पल पर भात

-वीरेन डंगवाल 

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क़िस्सा यों हुआ
कि खाते समय चप्पल पर भात के कुछ कण
गिर गए थे
जो जल्दबाज़ी में दिखे नहीं.

फिर तो काफ़ी देर
तलुओं पर उस चिपचिपाहट की ही भेंट
चढ़ी रहीं
तमाम महान चिन्ताएं.

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 और दूसरी कविता जो मुझे याद है वह श्री इब्बार रब्बी की लिखी कबाड़खाना पर ही प्रकाशित अरहर की दाल कविता है  ।

अरहर की दाल

कितनी स्वादिष्ट है
चावल के साथ खाओ
बासमती हो तो क्या कहना 
भर कटोरी
थाली में उड़ेलो
थोड़ा गर्म घी छोड़ो
भुनी हुई प्याज़
लहसन का तड़का
इस दाल के सामने
क्या है पंचतारा व्यंजन
उंगली चाटो
चाकू चम्मच वाले
क्या समझें इसका स्वाद!

मैं गंगा में लहर पर लहर
खाता डूबता
झपक और लोरियां
हल्की-हल्की
एक के बाद एक थाप
नींद जैसे
नरम जल
वाह रे भोजन के आनन्द
अरहर की दाल
और बासमती
और उस पर तैरता थोड़ा सा घी!

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  अब मैं जब अपने कविता सेंस को समझने की कोशिश करता हूँ और सोचता हूँ  कि यार मुझमें तो कविह़दय वाली आत्मा की बजाय किसी पेटू इंसान की आत्मा बसती  है । तभी तो  इतनी सारी कविताओं में से मुझे यही खाने पीने वाली कविताएं क्यों याद हैं।

 बाकी लोगों को देखो तो उन्हें शायद बहुत अच्छे से कविताएं वगैरह समझ आती हैं.....कितना तो लिख देते हैं कि भाव गहरे हैं.....एकदम से मन में उतर गया.....बहुत बहुत गहरे अर्थ वाला।

   और जब अपने खुद की लिखी कविताओं पर नजर डालता हूँ तो उनमें भी कहीं आमा हल्दी का जिक्र है तो कहीं कच्ची अमिया, खरबूजों की लकीरें, आम के पना आदि  का....मानों कविता न हुई किसी पंसारी की दुकान हो गई.....कोई फलवाली ठेलागाड़ी हो गई ।

   अब आप ही बताइए कि अपने में कविह़दय वाले भाव कैसे उत्पन्न करूँ कि और लोगों की तरह कुछ कविता फविता समझ सकूँ..... कुछ काव्यात्मक रच सकूँ......बड़ी मुश्किल है.....यारो :)

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 यहाँ बगल वाला चित्र मेरे भतीजे का है... जो कि अपने नन्हें पैरों से भी बड़े जूते में पैर रख खड़ा है....ठीक मेरी तरह....जैसा कि मैं बड़ी और भारी भरकम कविताओं के बीच उन्हें न समझ पाने की जद्दोजहद से गुजर रहा हूँ.....चाहता हूँ कि कहीं तो दिमाग में फिट हो जाए..... लेकिन क्या करूँ.....कम्बख्त कविताएँ मेरे भावों से ज्यादा गहरे भाव लिए हैं.....उनमें अँट जाना ठीक इस बच्चे के नन्हें  पैरों तरह  दुश्वार लग रहा  हैं मुझे  : )


- सतीश पंचम



स्थान -  वहीं, जहाँ पर लोगों के हृदय की सर्जरी का उत्तम स्थान उपलब्ध है..एकदम सस्ता और टिकाऊ।

समय - वही, जब एक कवि का दिल कसाई को लगा दिया जाय और कसाई को कवि का दिल लगा दिया जाय :)

( ऐसा नहीं है कि महिलाओं द्वारा लिखी गईं सभी कविताएं मेरे समझ से उपर की हैं....बहुत सी कविताएं हैं जो पढ़ते वक्त पसंद तो आईं......अच्छा लगा..... लेकिन फिलहाल याद नहीं हैं........ और हां.... मेरा यह लेख किसी को व्यथित करने के लिए नहीं है.........लेकिन कुछेक प्रवृत्तियों पर मन में शंका सी हुई सो यह हास्य फुहार पेश है.....take it lightly :)

24 comments:

Vivek Rastogi said...

:) :D

mukti said...

हम तो अपने आलावा और किसी की कविता पढते ही नहीं, तो क्या बताएँ ? :-)
और हम भी कोई कविता तो लिखते नहीं, जो लिखते हैं उसे हम मन की बातें कहते हैं...सीधे-सादे शब्दों में अपने मन की बातें बस.

1st choice said...

jhamaajham.

अनूप शुक्ल said...

आपकी पीड़ा का इलाज तीन साल पहले ही खोजा जा चुका है। देखिये यह पोस्ट! इसे हम आपको तो जबरियन पढ़वा भी चुके हैं अभी-अभी:
असल में कविता की बहुत कुछ खूबसूरती इसी बात होती है कि किसी को वह पूरी तरह समझ में न आये। जो कविता जितनी झाम वाली होगी उसके उतने ही चर्चे होंगे। बल्कि अक्सर कविता की तारीफ़ ही लोग तब करते हैं जब वह बिल्कुल पल्ले न पड़े।

मुनीश ( munish ) said...

आप जैसे हैं बने रहिये ! अफलातून ने एक आदर्श देश के लिए तीन को खतरनाक कहा था-- प्रेमी, पागल और शायर और मैं इसे सही मानता हूँ . पति, समझदार इंसान और गद्यकार ये तीन ही आदर्श समाज के निर्माता हैं :)

मुनीश ( munish ) said...

....later Shakespeare repeated this even though he himself was a poet !

मो सम कौन ? said...

विचारणीय पोस्ट।
वैसे आप जैसा लिखते हैं, कोई कविता लिखने वाला/वाली वह नहीं लिख पायेंगे। हरेक की अपनी शैली है।
ये याद करके सुनाने वाला शिगूफ़ा गज़ब का छेड़ दिया आपने। मुझे गाने गज़लें सुनना बहुत पसंद है, लेकिन मैं सुनाना शुरू कर दूं तो शायद सौ में से दस नंबर भी न आयें।
रही बात आपकी खाने पीने वाली कविता की, हमें तो सीधी सादी कविता ज्यादा पसंद है, काहे से कि बचपन से ही वही रूप देखा है कविता का।:)
आप लिखें कविता, खाने पीने वाली ही सही, हमें पसंद आ जायेगी।

ashish said...

दाल भात का फोटो दिखाने के लिए(अब फोटो ली गयी है तो उसका प्रयोग भी तो होना चाहिए) ठेली गयी ये पोस्ट अच्छी लगी. take it lightly .

वाणी गीत said...

मो सम कौन जी से सहमत ...
हर व्यक्ति की अपनी शैली होती है ...
पढ़ी तो बहुत जाती होंगी सभी कवितायेँ ...
मगर सब पर टिप्पणी लिखना इतना आसान नहीं होता ...!

परमजीत सिँह बाली said...

बढिया और विचारणीय पोस्ट लिखी है......।

आपकी पोस्ट पढ़ कर मन कर रहा है हम भी किसी मिठाई या और कोई खाने की चीज पर कविता लिख मारें....आप की टिप्प्णी तो मिल ही जाएगी:))

हमारीवाणी.कॉम said...

क्या आपने हिंदी ब्लॉग संकलन के नए अवतार हमारीवाणी पर अपना ब्लॉग पंजीकृत करा लिया है?

इसके लिए आपको यहाँ चटका (click) लगा कर अपनी ID बनानी पड़ेगी, उसके उपरान्त प्रष्ट में सबसे ऊपर, बाएँ ओर लिखे विकल्प "लोगिन" पर चटका लगा कर अपनी ID और कूटशब्द (Password) भरना है. लोगिन होने के उपरान्त "मेरी प्रोफाइल" नमक कालम में अथवा प्रष्ट के एकदम नीचे दिए गए लिंक "मेरी प्रोफाइल" पर चटका (click) लगा कर अपने ब्लॉग का पता भरना है.

हमारे सदस्य "मेरी प्रोफाइल" में जाकर अपनी फोटो भी अपलोड कर सकते हैं अथवा अगर आपके पास "वेब केमरा" है तो तुरंत खींच भी सकते हैं.

http://hamarivani.blogspot.com

Arvind Mishra said...

कविता यानि सीरत मगर सीरत के साथ सूरत भी हो तो क्या बात न ?
आपको खाती पीती कवितायेँ अच्छी लगती हैं और मुझे इसके साथ खाते पीते लोग भी !
पेट जब भरा होगा कविता दोनों तरह की पढने और मन रमने की अच्छी लगेगी ..
हाँ दोनों कवितायेँ बेहद उम्दा हैं -कभी मुक्ति को पढ़ा है -मतलब उनकी कवितायेँ -वे मुक्त/मुक्ति द्वार तक ले जाती हैं !

Arvind Mishra said...

मुक्तिबोध से मुक्ति तक और फिर मोक्ष तक ..यही रोड मैप बना रहा हूँ कविता का !

rashmi ravija said...

कविताओं को पसंद करनेवाले और समझने वाले भी बहुतेरे हैं....अगर महिलाओं को उनकी कविताओं पर ज्यादा वाहवाही मिलती है...तो यह भी देखिए...वे भी दूसरों की पोस्ट पढ़कर टिप्पणी करती हैं....तो टिप्पणियाँ तो मिलेंगी हीं,ना...

अब गद्य लिखने वालों को अपना लेखन टाइप करने से ही फुर्सत नहीं मिलती...और फिर गद्य पढने के लिए समय भी चाहिए...जो नेट पर इतना उपलब्ध नहीं हो पाता....मेरी पोस्ट के लिए तो अक्सर लोग कहते हैं...लम्बी होती है...पढने में समय लगता है...और फिर पढ़ लो तब भी...क्या लिखूं ,समझ नहीं आता.

तस्वीरें बहुत सुन्दर लगी...एकदम यथार्थ...ऐसी तस्वीर गूगल में भी नहीं मिलेगी...शुक्रिया..यहाँ लगाने का.

वन्दना said...

ऐसा ही होता है तभी तो कहा गया है ------कुडियों का है ज़माना………………घबराईये नही देखिये आपकी पोस्ट पर भी कितनी टिप्पणियाँ मिल रही हैं…………………वैसे सबकी अपनी अपनी सोच होती हैऔर ऐसा भी नही है कि सिर्फ़ महिलाओँ की पोस्ट पर ही ज्यादा मिलती हों कितने ही प्रुरुषों की पोस्ट पर भी लाइन लगी होती है और यही यहाँ का दस्तूर है ……………और सबसे ज्यादा तो हमारे ब्लोगजगत के सुपरमैन जो जहाँ चाहे अपनी फ़्लाइट लैंड करा देते हैं उनकी पोस्ट पर होती हैं…………बस ये है कि पोस्ट का कंटेंट अच्छा होना चाहिये बाकी काम तो हमारे ब्लोगर दोस्त कर देते हैं।
वैसे आपने मुद्दा अच्छा उठाया है काफ़ी लोग परेशान भी हैं इसी कारण्………………काफ़ी अच्छा लिखा है।

Mithilesh dubey said...

bilkul sahi kaha aapne, mujhe bhi yahi lagta hai

Shiv said...

कविता समझ में न आने की परेशानी तो मेरी भी है. वैसे वह कविता ही क्या जो समझ में आ जाए?
कमलेश बैरागी जी इस विषय पर प्रकाश दाल (अब देखिये लिखन चाहता था डाल और टाइप करने के बाद छापा दाल) चुके हैं.
http://shiv-gyan.blogspot.com/2008/05/blog-post_22.html

अजय कुमार झा said...

हा हा हा ............जे बात ..सब का सब धो डाला .......जाने कित्ते ही कवियों को आज सुसाईड प्वाईंट पर खडा कर दिया है ........हमही ठीक थे ....पहले जो मन करता था तुकबंदी कर दिया करते थे ......बाद में लगा अबे छोडो ..तुक की भी जरूरत नहीं है ..सो जो मन किया ....धर दिया लपेट के .....बस खुद को अच्छा लगा तो सोचा ....दूसरों को भी कम से कम उबकाई तो नहीं ही आएगी .....हा हा हा ..आप तो जुलुम काटते हैं गद्य हो या पद्य.....काटे जाईये ..

बेनामी said...
This comment has been removed by the author.
सतीश पंचम said...

बेनामी जी,

आपने कमेंट लिखा और डिलिट भी कर दिया.....लेकिन मेरे मेल बॉक्स में वह कमेट तो आना ही था....सो जब उस लिंक पर जाकर देखा तो वह पासवर्ड मांगता है।

अब इतनी जहमत तो उठाने से रहा....सो अगली बार फिर कभी विजिट करूंगा :)

और हाँ....आपने कहा कि मैं आपके टाइप का आदमी हूँ...तो भइया माफ करना....आज तक कभी बेनामी होकर कहीं कमेंट नहीं किया हूँ...जो कुछ कहना होता है अब तक तो खुल कर ही कहा है.....बल्कि जहाँ लगा कि एक तरह की फलतूयापा चल रहा है तो वहां बिना कमेंट किए ही निकल लिया हूँ.... लेकिन बेनामी ....नो वे.... इसलिए हे बेनाम बादशाह....मेरी तुलना आप अपने से बिल्कुल न करें :)

सतीश पंचम said...

@ वन्दना जी,
@ घबराईये नही देखिये आपकी पोस्ट पर भी कितनी टिप्पणियाँ मिल रही हैं

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वन्दना जी,
लगता है आपने मेरा मंतव्य ठीक से समझा नहीं या फिर मैं अपनी बात कहने में असफल रहा। यहाँ यह पोस्ट मैंने इस चिंता के लिए नहीं लिखा है कि मुझे टिप्पणीयां कम मिल रही हैं।

यहाँ बात हो रही है एक प्रवृत्ति की जो कि गाहे-बगाहे कहीं न कहीं झलक जा रही है कि लोग ब्लॉगर के महिला होने पर वाह वाही की ओर ज्यादा ही जोर मारते हैं।

रही बात टिप्पणियों की....तो यह उत्सुकता मुझे अपने ब्लॉगिंग के शुरूवाती दिनों में थी...कि देखूँ मेरे लिखे को कितने लोग पढ़ते हैं....कितने लोग टिप्पणी करते हैं....क्या क्या कहते हैं। समय बीतता गया और यह उत्सुकता धीरे धीरे टिप्पणीयों को लेकर खत्म हो गई है।

इस बात को नापने का जरिया यह है कि पहले जब कभी मोबाइल में कोई कमेंट आया दिखता ( हिंदी सपोर्ट न होने से मोबाईल में डब्बा डब्बा दिखता है) तो तुरंत लैपटॉप खोल कर देख लेता था.....लेकिन अब यह हाल है कि पता चलता है कि हाँ कोई कमेंट आया है.....लेकिन फिर भी उसे देखने की इच्छा नहीं होती.....शाम को या कभी फुरसत से ऑफिस में समय होता है तब देखता हूँ कि किस बंदे ने क्या कहा।

और रही बात भीड़ जुटाउ टाईप लेखन की तो मैं एक विदेशी लेखक का उद्धरण दूंगा....जिनका कि मैं नाम भूल चुका हूँ...लेकिन साहित्य अकादमी के मुंबई सभागार में यह बताया गया था कि फलां लेखक को सुनने के लिए....उनकी किताबों के लिए बहुत भीड़ जुटती थी।

एक दिन उसी भीड़ को देख लेखक के मन में आया कि मेरी लेखनी में जरूर कुछ गड़बड़ है....तभी इतनी ज्यादा भीड़ मेरे लिखे को पढ़ने के लिए जुटती है।

इस बात को इस तरह से समझ सकते हैं कि एक भरतनाट्यम की नृत्यांगना...जिसके नृत्य को देखने के लिए सौ दौ सौ की ही भीड़ जुटती है......अचानक ही राखी सावंत के आस पास वाली भीड़ की तरह तीन चार हजार की भीड़ जमा होने लगे....वाह वाह करने लगे तो उस नृत्यांगना को जरूर आभास हो जायगा कि कहीं तो कुछ गड़बड़ है.....उसकी वेशभूषा....उसके हाव भाव में कहीं तो कुछ गड़बड़ी हो रही है..और यही आभास उन लेखक महोदय को हुआ जब उनके लिखे को पढ़ने वाले ज्यादा हो गए।

मैं भी उन लेखक महोदय की तरह चाहता हूँ कि मेरे लिखे को भले ही कम लोग पढ़े लेकिन अच्छे से पढ़ें....वरना तो भीड़ जुटाने के लिए फलां ने ये कहा....फलां का रैंकिंग उपर क्यों....ब्लॉगवाणी में फर्जी चीज....ये वो.....सब फालतूयापा करना बहुत आसान है....लेकिन इससे हासिल क्या होता है ?

यहाँ मेरे कहने का मंतव्य यह है कि केवल टिप्पणी पाने के लिए लिखना मेरे लिए संभव नहीं है...मैं इसलिए लिखता हूँ कि लेखन से मुझे अच्छा महसूस होता है....एक तरह का सूकून मिलता है.....और मै अपने लिखे को ठीक ठाक मानता हूँ....ज्यादा बुरा भी नहीं....ज्यादा खराब भी नहीं...हाँ एक किस्म की क्वालिटी है...बस:)

शब्दों में कुछ अधिक तल्ख हो गया होउं तो क्षमाप्रार्थी हूँ।

Akanksha~आकांक्षा said...

मैं इसलिए लिखता हूँ कि लेखन से मुझे अच्छा महसूस होता है....एक तरह का सूकून मिलता है.....***बस इसी तरह लिखते रहें, फिर वाह-वाही कहाँ भागकर जाएगी...

मनोज कुमार said...

"दूसरों की पोस्ट पढ़कर टिप्पणी करती हैं....तो टिप्पणियाँ तो मिलेंगी हीं,ना...

अब गद्य लिखने वालों को अपना लेखन टाइप करने से ही फुर्सत नहीं मिलती...!"
रश्मि जी की इन बातों से सहमत।
अगर खाने वाली कविता प्रेरित करेंगी, तो जब से डायबिटिज़ डिटेक्ट हुआ है श्रीमती जी सुबह शाम कड़ैला खिला रहीं हैं, लिखता हूं उस पर एक कविता ....
शायद आपकी टिप्पणी मिल जाए।

प्रवीण पाण्डेय said...

किसी कविता या रचना को समझने का सर्वोत्तम तरीका रचनाकार की मानसिकता में प्रवेश कर रचना पढ़ना है। तब आपको भी अच्छी लगने लगेगी।

फोटो ब्लॉग 'Thoughts of a Lens'

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