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Sunday, August 29, 2010

'वही इंद्रधनुष'.....कह सकते हैं कि इस रचना में प्रस्फुटित Abstractism / अमूर्त तत्व को बेहद अनोखे ढंग से प्रस्तुत किया गया है .......सतीश पंचम

      
         कल रात फिर से मैंने एक बेहद दिलचस्प कहानी पढ़ी। फिर से इसलिए कह रहा हूं क्योंकि पहले भी इसे कई बार पढ़ चुका हूँ लेकिन हर बार उसके नये नये Absracts सामने आ जाते हैं। पढ़ने के बाद एक दो बार मन में आया कि इस कहानी ‘वही इंद्रधनुष’ के Absractism से ब्लॉगजगत को भी परिचित कराता चलूँ लेकिन कोई न कोई कारण था कि रह जा रहा था। लेकिन जब कल रात  ‘वही इंद्रधनुष’ पढ़ने बैठा तो बाहर झमक कर तेज बारिश हो रही थी, तेज बिजली कड़क रही थी और ऐसे में कहानी का आनंद दूना हो उठा।  सुबह होते न होते आप लोगों के बीच इसे बांटने, इसके अमूर्त तत्व (Abstract values) से परिचित करवाने का मन बना लिया ।

       यह कहानी लिखी है विवेकी राय जी ने। विवेकी राय, जिनके बारे में इतना बताना जरूरी है कि वे ग्राम्य जीवन के ऐसे रचेता हैं जो अपनी लेखनी के जरिए सब कुछ सामने लाकर धर देते हैं। फणीश्वरनाथ रेणु जी के काल के लेखक छियासी वर्षीय वही विवेकी राय जिनके जीते जी ही उनके नाम पर सड़क भी है, विवेकी राय मार्ग – जो शायद भारत में एक हिंदी के लेखक के लिए प्रकट किए गये सम्मान के तौर पर नोबल पुरस्कार से कम नहीं है।

     तो बात हो रही है कहानी ‘वही इंद्रधनुष’ की। इस कहानी में एक शख्स  है जिसका कि विवाह एक लड़की से पांच साल पहले होते होते रह गया……कारण जो भी रहे हों……लेकिन विवाह नहीं हुआ। बाद में उस लड़की का विवाह उसी शख्स के एक मित्र से हो गया। कुछ साल बाद किसी काम से वह शख्स अपने उसी मित्र के यहां आकर ठहरा जिससे कि उस लड़की का विवाह हुआ।
   
      अब यहां इस शख्स के मन में आस पास की चीजों को देख एक अलग ही तरह के भाव आना जाना शुरू करते हैं …..वह सोचता है कि वह लड़की, वह स्त्री कहीं न कहीं से उसे ताक रही है…….एक तरह का उल्लास  …… एक तरह का मनसायन……. कि इन्हीं से विवाह होते होते रह गया…..यही वह स्त्री थी जिससे विवाह होना था …..

इन्हीं सब बातों को बहुत खूबसूरती से दर्शाते हुए विवेकी राय जी लिखते हैं कि -
    
     पश्चिम ओर जिधर मुँह करके वह खड़ा था, ठीक उसके सामने एक बड़ा सा इन्द्रधनुष उग आया। उसे लगा, भीतर का इन्द्रधनुष बाहर कढ़कर टंग गया है। कहीं टूट नहीं, एकदम पूर्ण इन्द्रधनुष, आसमान की उंचाई को छूता हुआ, पूरे क्षितिज को घेरकर, सप्तरंगी निखार का तरल-ज्योति पथ।

    कोई सपना नहीं, कोई जादू नहीं, कल्पना नहीं, बिल्कुल ही सामने ……. नदी उस पार जिसे पकड़ा जा सकता है,ऐसा इन्द्रधनुष उग आया, बिना हल्ला गुल्ला किये।

    वह नदी भूल गया, नाव भूल गया। ……..पानी में खड़े खड़े चूड़ियों की खनखनाहट, मुक्त खिलखिलाहट और कंठवीणा के कुछ बोल गूंज गये। फिर एक बार गंगाजली प्रतिमा उसकी आँखों में लहरा गई।……………….

   भोजन के लिए पीढ़े पर बैठा तो पीछे चुहान घर में, कोठिला के ओट के पीछे कुछेक क्षणों का समारोह हो गया और वही आर-पार का संग, लेकिन कितना जोरदार।
  
      वह कल ही वहाँ गया था। जरूरी काम था। नहीं तो भदवारी की शेष बीहड़ता में वह यात्रा नहीं करता। वहां पहुँचा तो अभी दिन था। दोस्त ने खूब खातिर की। उसे मालूम था कि ‘वह’ है और एक बड़ी थाली में उदारता के साथ भरकर ढेर सारी पकौड़ी आयी। तेल-मसाले में तर आम के अचार की एक बड़ी-सी सलगी फट्ठी और उसी तरह मिरचे का भी एक भीमकाय अचार। देख कर ही मारे मिठास के उसका मन भर गया।

    वह उसके दोस्त की बीवी है। उसे वह अच्छी तरह जानता है। एकाध बार देखा भी है। खूबसूरती में जवाब नहीं, लम्बी, छरहरी, सोनगुड़िया। संयोग नहीं बैठा, कट गयी, नहीं तो उसकी शादी ‘उसी’ के साथ लगी थी। यह कोई चार-पांच साल पहले की बात है।
“थके होंगे ?" दोस्त ने पूछा था।
“बिल्कुल ही नहीं”। उसने जवाब दिया।

   वास्तव में वह बहुत सुख अनुभव कर रहा था। दोस्त का वह गांव उस दिन बहुत हंसता लगता था। मित्र के दरवाजे पर रौनक बरस रही थी। मच्छरों के डर से ढेर-सी करसी एक जगह कोने में रखकर धुँआ कर दिया गया था। मोटा कड़ा धुआं गुम्मज बांधकर पहले तो बैठक में अंड़स गया और फिर बाहर फैलने लगा। बैलों का सारीघर बैठक से लगा था। उसमें भी धुआं भरा था और उसी बीच खिला-पिलाकर हटाये गये बैल आँख मूंदकर जुगाली कर रहे थे। उधर से धुएं से मिल एक अजीब-सी गीली-गुमसाइन गोबरही गंध बैठक में आ रही थी। मगर यह धुआं और गंध जब भी उसके नथुने पर धक्का देतीं, फिसल जातीं और वह कैसे आराम से बीड़ी दगाये पड़ा था।
 
    इन सब बातों को याद करने में भी एक सुख था मगर सामने सवाल था नदी पार जाने का, नाव का। उस पार वाले आदमी ने स्वर उंचा कर पूछा, “अरे भाई, नाव का कहीं पता है ? ”
बस कहीं से आती होगी। उसने उत्तर दिया।

और कहीं नहीं आई तो ?

इस तो का उत्तर उसके पास नहीं था। …..
……
     उसके दोस्त ने रात में भोजन के लिए जगाया तो उसे रोमांच हो आया। हवेली में घुसते उसे लगा कि हर चीज पर उसके आने की छाप है, दालान में एक अतिरिक्त चिराग रखा गया है। नये सिरे से झाडू लगा है। आंगन में जिस ओर पानी गिरता है, हाथ लगा दिया गया है ( पानी निकाल दिया गया है ) और बहुत साफ लग रहा है। एक ओर आंगन में एक जोड़ी खड़ाऊँ गुनगुने पानी के साथ रखा है। अनावश्यक चीजें हटा दी गई हैं।

     पैर धोते-धोते उसका मन एक जोड़ी आँखों पर अटका रहा। किसी न किसी ओर से निशाना बांधा गया होगा। चौके में आते-आते तो वह जैसे एकदम उड़ रहा था। चौके में नयी माटी से ‘ठहर’ दी गई थी (लीपन-पोतन) जिसकी ताजी सोंधी गंध अभी गई नहीं थी। पीढ़ा भी धो-पोंछकर साफ किया गया लगता था। लोटा-गिलास चमचम।

     पीढ़े पर बैठते ही साड़ी की खरखराहट, चूड़ियों की खनक और कुछ सांय से (धीमे से) कही गयी बात की आहट पीछे कोठिले की ओट से मिली। इसी बीच परसी-गई थाली दोस्त ने सामने कर दी। सोनाचूर की सुवास से तबीयत भर गई।

“आप भी बैठ जाइये न !”  उसने कहा।

    संकोच झाड़कर अब उसके दोस्त भी एक पीढ़ा खींच बगल में कुछ उधर हटकर इस तरह बैठ गये कि आवश्यकता पड़ने पर चीजें भीतर से बाएं हाथ सरकाया करेंगे।

    लक्ष्मीनारायण हुआ और दो-दो हाथ शुरू ही हुआ था कि भीतर से ‘हाय राम’ फिर एक खिलखिलाहट और फिर ‘घी तो आग पर ही रह गया’, बहुत धीमें पर साफ सुनाई पड़ा। उसने जिन्दगी में पहली बार कोयल की आवाज सुनी थी। एक जिंदा रस।

    “तब यहां कौन तुम्हारा लजारू है, उठकर दे दो।" उसके दोस्त ने कहा। और जो आंचल से जलती-कटोरी पकड़कर दाल में घी छोड़ा गया तो वह पिड़-पिड़-पिड़ करता उसके अंतर में, गहरे अंतर में अपनी सुगंधित तरलता लिये उतरता चला गया और फैल गया। उसने देखा तो जादुई खनक की खान कलाई को और रेशमी उंगलियों को, पर अधघूँघट में अनदेखी चंचल आँखें और बिहंसते होंठ की भी देखारी हो गई।

     न हाथ-पैर बजा, न शोर-हंगामा और एक घटना घट गई। दोस्त की बीवी ने नीले पाढ़ की चेक डिजाइन वाली हलके गुलाबी रंग की रेशमी साड़ी पहन रखी थी। उसे यह रंग बहुत पसंद है। नीला और गुलाबी : विस्वास और भाव। उसने मन ही मन सोचा – अबकी धान उतरा तो ऐसी ही एक साड़ी अपनी बीवी के लिए खरीदेगा।

  भोजन समाप्त कर अंचवते-अंचवते वह एक निर्णयात्मक शब्दावली पर पहुंच चुका था – इंद्रधनुष में लिपटा चम्पा का ताजा फूल।
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    इन्हीं सब विचारों से आलोड़ित वह कब सो गया पता ही न चला।  अगले दिन कब वह दोस्त से विदा मांग बीहड़ बरसाती मंजिल तय कर वह नदी पर आ गया, यह भी पता न चल सका।

    पछिवा हवा सिसकारी दे रही थी और हल्की ठंडक गुदगुदा रही थी। सवेरे ही सवेरे देव घिर आये। झींसी पड़ने लगी। वह कपड़ो को गीला कर देने के लिए काफी थी। उसने छाता तान लिया।

      उस पार तीन स्त्रियां थीं और एक पुरूष। ये लोग भी उसी की तरह प्रतीक्षातुर थे। नदी बहुत चौड़े पाट की नहीं थी, परंतु इस पार और उस पार में अंतर तो था ही। वक्त गुजारने के लिए उस पार वालों से बातचीत करना भी कठिन था। उसने देखा उस पार वालो के पास छाता नहीं है। पुरूष बेचैनी से नाव के लिए इधर-उधर ताक-झांक कर रहा है। उसे फुहार की तनिक परवाह नहीं है। वह साधारण कुर्ते धोती में एक किसान लग रहा है।

   अचानक वह चौंक उठा। वह स्त्री किसी काम से उठ गई तो उसकी आड़ में बैठी स्त्री की झलक साफ हो गई। वही चेक-डिजाइन, वही गुलाबी रंग, वही इंद्रधनुष, इंद्रधनुष के भीतर इंद्रधनुष, लेकिन यह दूसरा (इंद्रधनुष ) गठरी की तरह क्यों सिकुड़ा, धरती में गड़ा जैसा अतिसंकुचित क्यों।  इसके भी कोमल कलाइयां होंगी, कलाइयों में चूड़ियां होंगी और चूड़ियों में खनक होगी। लेकिन वैसी खनक यहां कहां। वह तो पीछे दूर छूट गई, बहूत दूर जहाँ के धुले बागों के पत्तों में अजब सी तेज गाढ़ी हरियाली है, जहां की माटी में सुवास है।  वह एक बार फिर गहरे में डूब गया और क्षण भर बाद वापस आया तो फिर वही मनहूस पानी। 

      लेकिन अबकी बार उसे लगा कि यह नदी का पानी नहीं, सड़क है। सड़क की इस पटरी पर वह खड़ा है और उस पटरी पर एक सजीला समारोह है, जिसमें इंद्रधनुष के विशाल फाटक से होकर जाना है। रंगारंग ज्योति के ये दो सप्तरंगी खंभे गोल घेरा बनाते हुए आसमान में उठते-उठते पूरी उंचाई पर जाकर मिल गये हैं। अमरावती का फाटक, गोलोक का सिंहद्वार कि बैकुंठ की पवित्र पौर है ?

   उसने देखा इंद्रधनुष के फाटक के भीतर वह किसान बौने की तरह लग रहा है। वह बबूल का पेड़ एक मामूली झाड़ी की तरह लग रहा है। दूर-दूर के बगीचे मरकत प्राचीर की तरह लग रहे हैं। और वह नारी ? विशाल, गोल, रंगों के झिलमिल मेहराबी मंडप के बीच इंगुरौटी ( लकड़ी की पतली-लंबी सिंदूरदानी) की तरह लुढ़की है। कौन लूट रहा है कि लाज का ऐसा बचाव ? इंद्रधनुष धरती में धंस क्यों जाय ? पानी में खड़ा होकर वास्तव में उसका मछुआ मन दो पारदर्शी चंचल मछलियों की झलक के लिए छटपटा उठा।

    उसके मन में एक बात आयी मगर अपनी मूर्खता पर स्वंय हंस पड़ा। साड़ी की तरह साड़ी होती है, रंग की तरह रंग होता है और औरत की तरह औरत होती है। उस इंद्रधनुष को देखा और अब वह इसे भी देख लेगा, उसके भीतर से, उस फाटक से होकर गुजरेगा, दुनिया का एक खुशकिस्मत इंसान, लेकिन यह पानी ? इतनी देर बाद पहली बार वह क्षुब्ध हुआ।

     पानी चुपचाप बह रहा था। धरती पर सरकती यह चंचल धारा और आसमान में उभर आयी क्षणजीवी विविध रंगों की अचंचल मणि-मेखला ! उसने जोर से सोचा, उसे इसी दम उस पार जाना है। समय चूक न जाय।

    इंद्रधनुष आसमान में उसी-गम्भीर आवाज से छाया था। बल्कि उसके ठीक समानांतर उपर से एक और पतली धार की तरह हलके-हलके उभर आया । नीचे चेक डिजाइन और गुलाबी रंग का रहस्य उसी प्रकार अनखुला था।   नाव उसी प्रकार लापता  थी। अथाह पानी उसी प्रकार सामने लहरा रहा था। सब वही था, मगर कहीं कुछ जरूर बदल गया था। उसने बंडी और चादर लपेटकर सिर पर रखा। उसके उपर छाता, धोती से कसकर बांध, लंगोट पहने पानी में उतर गया और दो हाथ चलाया कि दूसरे किनारे की माटी मिल गई, लेकिन उसे सख्त अफ़सोस हुआ कि इंद्रधनुष सच्चाई नहीं है।

  - विवेकी राय

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     तो ये थी कहानी ‘वही इंद्रधनुष’ । इसमें कितना अमूर्त है, Abstract है, यह शायद हर पाठक के लिए अलग अलग पैमाने पर होगा,  लेकिन मेरे हिसाब से  प्रस्फुटित तौर  पर इस कहानी का Abstractism कहीं कहीं प्रखर हो उठा है जो शायद आप लोगों ने पढ़ते समय महसूस भी किया हो,

जैसे,

 दाल में घी छोड़ने के समय .......आंचल से जलती-कटोरी पकड़कर दाल में घी छोड़ा गया तो वह पिड़-पिड़-पिड़ करता उसके अंतर में, गहरे अंतर में अपनी सुगंधित तरलता लिये उतरता चला गया और फैल गया। उसने देखा तो जादुई खनक की खान कलाई को और रेशमी उंगलियों को, पर अधघूँघट में अनदेखी चंचल आँखें और बिहंसते होंठ की भी देखारी हो गई।

   इसी तरह एक जगह लेखक कहते हैं  - चौके में नयी माटी से ‘ठहर’ दी गई थी  जिसकी ताजी सोंधी गंध अभी गई नहीं थी।

 Abstractism का गँवई माहौल.................

- सतीश पंचम

साभार – 'कालातीत' ( पराग प्रकाशन, शाहदरा, दिल्ली)
लेखक – विवेकी राय

( सभी चित्र मेरे निजी कलेक्शन से )

15 comments:

padmsingh said...

उफ़! शब्दों का ऐसा इन्द्रधनुष... मनोभावों का इतना साकार और प्रबल प्रस्फुटन... पिड़ोर मिट्टी की ठहर की खुशबू और घी का आलोडन जैसे जबरन खैंच कर उसी पीढ़े पर बिठा देता है... कहानीकार ग्राम्य परिस्थितियों और घटनाओं के प्रति सजग है ... ऐसी अद्भुद इन्द्रधनुष को अंतरतम मे संजो रहा हूँ... आपका बहुत धन्यवाद ऐसी रचना पढ़वाने के लिए

वन्दना said...

आपकी रचनात्मक ,खूबसूरत और भावमयी
प्रस्तुति के प्रति मेरे भावों का समन्वय
कल (30/8/2010) के चर्चा मंच पर देखियेगा
और अपने विचारों से चर्चामंच पर आकर
अवगत कराइयेगा।
http://charchamanch.blogspot.com

प्रवीण पाण्डेय said...

कथाजगत के चितेरे से परिचय कराने का आभार। कहानी पढ़कर बड़ा अच्छा लगा।

शोभना चौरे said...

आभार इतनी सुंदर कहानी पद्वाने के लिए

indu puri said...

बाबु! नाम भी किस्मत से मिलता है.नाम,अपनी एक पहचान होने पर पाठक भी अधिक मिलते हैं. ये हमारा दुर्भाग्य है कि एक से बढ़ कर एक प्रतिभाएं हमरे देश मे हुई और है भी किन्तु ..........
खैर..पूरी कहानी पढ़ गई.
कहानी मे ध्वन्यकता है. हर चीज बोलती सी पर समझ नही पाई लेखक कहना क्या चाहता था?
मैं विदुषी नही.कई बार सामान्य सी बात समझ मे नही आती और कभी कभी बूँद मे डूब जाती हूं.ऐसीच हूं मैं सच्ची.
लोग मुझे स्टुपिड कहेंगे इस डर से 'वाह वाह' भी नही कर सकती.
ग्राम्य भाषा,परिवेश,पात्रों का चित्रण अच्छा लगा.पर इसका उद्देश्य नही समझ पाई.
समय मिले तो एक रशियन स्टोरी 'इक्तालीसवाँ'जरूर पढ़ना.लेखक? अभी याद नही.याद आते ही बताउंगी.
किसी कहानी के मर्म को ज्यादा अच्छी तरह समझ लेते हो.यही आपके आर्टिकल्स मे हर कहीं दिखता है.

rashmi ravija said...

बहुत बहुत शुक्रिया..इतनी प्यारी सी कहानी से परिचित करवाने के लिए.
मन में उमड़ते घुमड़ते भावों को बहुत ही सुन्दरता से संप्रेषित किया है...सही कहा...सब कुछ abstract सा है..ऐसे ही पढ़ते रहें और पढवाते रहें .

सतीश पंचम said...

इंदू जी,

आप ने तो मुझे यह कह कर मुश्किल में डाल दिया कि कहानी की प्रत्येक चीज बोलती सी लग रही है लेकिन समझ नहीं आया कि लेखक कहना क्या चाहता है :)

चलिए अब थोड़ा सा कहानी के एक पहलू पर मैं शॉर्टकट में अपनी ओर से बात कहने की कोशिश करता हूँ। यदि विस्तार मे कहने लगूं तो पूरी किताब लिखनी पड़ जाय लेकिन कहानियों की विधा पर बात खत्म न हो :)

दरअसल कहांनियों के कहने और समझने की एक मान्य परिपाटी चली आई है कि सुखांत या दुखांत और इसमें पुरानी कहानीयों को शामिल किया जा सकता है कि - एक राजा था एक रानी थी टाइप की कहांनियां।

धीरे धीरे कहानी लिखने में बदलाव आया और लोगों ने किसी जरूरी निष्कर्ष देने की बजाय एक झलकी टाइप प्रस्तुत करना शुरू किया । शिल्प और कथ्य के साथ एक स्थान विशेष की परिस्थितियां दर्शाना उसी विधा की देन है।

धीरे धीरे कई पड़ावों से होते होते एक दौर ऐसा भी आया कि मनोवैज्ञानिक कहांनियों का चलन आया। इनमें कोई बात संपूर्ण कहानी पढ़ने के बाद समझ आती थी या कुछ कुछ विशेष अंश किसी बात की ओर इशारा करते थे और यह पाठक के उपर निर्भर रहता था कि वह किस हद तक इन अंशों से आत्मसात हो पाता है।

उदाहरण के तौर पर कहूँ तो मोहन राकेश की लिखी कहानी 'परिचय' उसी मनोवैज्ञानिक कहानी का एक उदाहरण है जिसमें ट्रेन के डिब्बे में अनजान महिला से परिचय होता है और बातचीत के दौरान मनोभावों के आदान प्रदान होते हैं और उसी में प्रतीक रूप में ट्रेन के डिब्बे के बल्ब से एक पतंगे का टकराना, फड़फड़ाना दर्शाया गया है जो कि पात्र के मनोभावों को दर्शाते जा रहा है। इसी में एक प्रकार की चुप्पी पर भी बात कही गई है।

ऐसी ढेरों कहानीयां है जो मनोवैज्ञानिकता की ओर रूझान रखे हैं। यह कहानी 'वही इन्द्रधनुष' भी उसी तरह की है जिसमें तमाम प्रतीकों और चिन्हों से एक शख्स के मनोभावों को दर्शाया गया है कि किस तरह वह अपनी पत्नी होते होते रह गई एक स्त्री के घर में जाकर अंतर्द्वद्व से जूझ रहा है, एक प्रकार का उल्लास अनुभव कर रहा है, उसे लग रहा है कि वह स्त्री उसे कहीं न कहीं से देख रही है और अनजाना अनचीन्हा सा अनुराग या पूर्वपरिचय उसे बटोरे हुए है।

इस उल्लास के बीच वह अपनी वर्तमान पत्नी की भी याद करता है कि अबकी धान की फसल से पैसे मिलने पर उसके लिए भी इस स्त्री की तरह वाली नीली-गुलाबी साड़ी लाकर देगा। यहां खूबी यह है कि ठोस मूर्त तत्वों के जरिए एक अमूर्त तत्व गढ़ा गया है जो कि बहुत मुश्किल विधा है और विवेकी राय जी ने बहूत खूबी से इन बातों को दर्शाया है।

ध्यान दिजिए कि शुरूवात में लेखक ने कहा कि उदारता से थाली भर पकौड़ी आई और इसी के साथ आसपास के वातावरण का वर्णन किया कि किस तरह गाय बैलों के बांधने के स्थान पर धुँआ आदि का अलग रस है।

वहीं रात में जब भोजन के लिए जगाया गया तब लेखक कहते है कि हवेली में घुसते उसे लगा कि हर चीज पर उसके आने की छाप है, दालान में एक अतिरिक्त चिराग रखा गया है। नये सिरे से झाडू लगा है। आंगन में जिस ओर पानी गिरता है, हाथ लगा दिया गया है ( पानी निकाल दिया गया है ) और बहुत साफ लग रहा है। एक ओर आंगन में एक जोड़ी खड़ाऊँ गुनगुने पानी के साथ रखा है। अनावश्यक चीजें हटा दी गई हैं।

यहां अनावश्यक चीजें हटाने से तात्पर्य अनराग मिश्रित खातिरदारी से है और एक तरह के स्नेहिल परिचय से है जिसकी तस्दीक लेखक यह कह कर कहते हैं कि - पैर धोते-धोते उसका मन एक जोड़ी आँखों पर अटका रहा। किसी न किसी ओर से निशाना बांधा गया होगा।

यह एक तरह का मन में उमड़ता घुमड़ता भाव है जिसे लिखने और उसे पाठकों को महसूस करवाने में विवेकी राय जी ने कुछ हद तक अमूर्त कलात्मक तस्वीर बनाने जैसा हुनर दिखलाया है।
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इंदू जी, मैंने अपनी ओर से एक अदनी सी कोशिश की है समझाने की , बाकि तो इस ब्लॉगजगत में कई विद्वजन लोग हैं, उम्मीद करता हूँ कि कहीं अगर कमी रह जाएगी तो साथी मेरी बात को और सरलता और विस्तार से बता कर मेरी सहायता करेंगे।

Vivek Rastogi said...

वाह मजा आ गया, किस सहजता से पात्रों के आसपास के वातावरण और मनोभावों को चित्रित किया है। ऐसी सहजता तो पढ़ते ही बनती है।

मो सम कौन ? said...

सतीश भाई,
विवेकी राय जी और रामदरश मिश्र जी, ग्राम्य साहित्य पर अपने बहुत फ़ेवरेट लेखक रहे हैं। मिश्र जी जहाँ सीधे सरल शब्दों में सब आंखों के सामने जीवंत कर देते हैं, विवेकी राय जी को पढ़ते समय सही में ज्ञानेन्द्र्याँ एकाग्र रखनी होती है और आपकी वही बात, कि जितनी बार पढ़ेंगे शायद हर बार एक नया अर्थ, एक नया आयाम सामने आता है।
धन्यवाद, इस खूबसूरत रचना को प्रस्तुत करने पर।

RAJ SINH said...

बहुत सालों बाद विवेकी राय जी का लिखा पढ़ा .७०-८० के दिनों में ' धर्मयुग ' आदि में काफी पढ़ा . मूर्त -अमूर्त और कहानी विधा पर संवाद संक्षिप्त ही सही अप्रतिम रहा .
और आपके लेखन का तो मुरीद हूँ ही . माटी से दूर माटी की सुगंध !

और ' सफ़ेद घर ' के क्षितिज पर तो हमेशा ही ' इन्द्रधनुष ' रंग बिखेरता नज़र आता है .

ऐसे ही रंग बनाये रखना मेरे ' रंगबाज़ ' :) .

Udan Tashtari said...

आभार इस कहानी एवं कथाकार से परिचय कराने का.

गिरिजेश राव said...

इस पोस्ट को नहीं पढ़ा है।
नहीं, "..उसी मित्र के यहां आकर ठहरा जिससे कि उस लड़की का विवाह हुआ।" तक पढ़ा और बन्द कर दिया।
इसके आगे 'पिन कोड' को पूरी तरह से समझ लेने के बाद पढ़ूँगा। एक अजीब सी ज़िद है। सनक है।

Asha said...

बहुत अच्छी सारगर्भित कहानी |बधाई|
आशा

संगीता स्वरुप ( गीत ) said...

बहुत अच्छी कहानी पढवाई ...

Er. Shilpa Mehta said...

Woww

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