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Friday, July 30, 2010

उत्प्रेरक...Catalyst......जबरही बोली......ओह.....अपना इंडिया.....एकदम मुंबई माफिक..... सतीश पंचम

      सुबह का समय......  एक बस स्टॉप पर खड़ा हूँ............बस का इंतजार लंबा होता जा रहा है...... एक बस आती दिखाई दी.......करीब और करीब.......यार ये भी अपने नंबर वाली नहीं .......आएंगी तो सब एक ही नंबर की एक साथ आएंगी......बस वाले भी चाय पानी पीकर एक साथ निकलते होंगे......भाईचारा ठहरा...... एक बस आकर रूकी ही थी  कि तभी बस का इंतजार करता एक सोलह- सत्रह साल का लड़का पास आया और पूछने लगा कि यह बस कुर्ला जाती है ?  ....मैंने हाँ में सिर हिला दिया। उसने बस स्टॉप के शेड के भीतर खड़ी अपनी माँ को आवाज लगाई कि चल...चल....लेकिन उसकी माँ सुनने को तैयार ही नहीं....कहने लगी कि नहीं.....ये बस नईं जाता......मेरे को मालूम....।  इसी पूछ-पूछौवल में.....बस निकल गई।

    ओठो के उपर हल्की हल्की मुंछों के रेख वाला अब  वह कुछ  आवारा सा लगता लड़का लगा अपनी माँ को भला बुरा कहने...........लगा भुनभुनाने..... तेरे को बोला मैं.....फिर भी तू सुनतीच नईं......अबी खड़े रै आरधा कलाक ।  काफी देर तक वह बडबड़ाता रहा। मैंने ध्यान से देखा लड़के को......हल्की हल्की मुँछों के रोएं अब जड़ जमा रहे थे उसके.......हाथ में एक झोला लिए.....कानों में छोटी बाली पहने वह साँवला सा लड़का......कुछ कुछ उखड़ा सा लग रहा था....... अगली बस आई और वह दोनो माँ बेटे चले गए।

       इधर मेरी बस अब तक नहीं आई थी....... बाकीयों की बस आती और लोग निकल लेते......। धीरे धीरे  बस स्टॉप खाली हो गया........तब तक बस स्टॉप के पास ही एक टैक्सी आकर रूकी.....टैक्सी के भीतर बैठे एक पैसेंजर और टैक्सी  वाले के बीच किराए को लेकर चिकिचिक हो रही थी।  टैक्सी वाला मीटर कार्ड दिखा रहा था.....पैसेंजर अपनी ही कहे जा रहा था.....थोड़ी देर तक यह चिकचिक चली और  अंत में पैसेंजर ने कहा कि मैं.... भाड़ा नहीं दूँगा.........यह कह कर पैसेंजर टैक्सी से निकल कर मेरे बगल में आकर खड़ा हो गया। टैक्सी वाले ने भी ताव में कहा कि मत दो किराया।

   मैंने सोचा चलो....शांति हुई.... लेकिन  टैक्सी वाले ने एक क्षण रूक कर थोड़ी सी टैक्सी पीछे की और  ठीक मेरे सामने टैक्सी खड़ी कर दिया और लगा उस पैंसेंजर को गरियाने..........ए भड़वा....ए माद***.........ए....तेरा अऊरत को......तेरा .....।  उधर पैसेंजर भी मोहड़ा थामे था.... अच्छा खासा टाई वाई लगाया प्रोफेशनल.....पीछे काला पैगपैक लटकाए.....केवल इतना कहता....चल निकल ....चल.....चल ....चल। बेचारा गाली नहीं दे पा रहा था। उधर टैक्सी वाला मुझे माध्यम पा कर  उस शख्स को गाली दे रहा था....देखो ना....ये चू**....ल***  भाड़ा देने को ना बोलता.....भाड़ा नईं तो टैक्सी में काए को बैठता रे....तेरी.....।   एकाध मिनट तक  टैक्सी वाले का गालीयों वाला वन वे  ट्रैफिक चालू रहा....तब तक दूसरी कोई बस आ गई....मजबूरन टैक्सी वाले को टैक्सी बस स्टॉप से आगे बढ़ानी पड़ी और जैसे तैसे मामला शांत हो गया।

 थोड़ी देर बाद उस शख्स की भी बस आ गई और वह भी निकल लिया। उसके जाने के थोड़ी देर बाद मेरी भी बस आई एकदम कसी हुई। किसी तरह अंदर हुआ।

     बस में खड़े खड़े ही मेरी विचार धारा अभी अभी हुए इन दो वाकयों की ओर चल निकली...... सोच रहा था.....कि   पैसेंजर को बेइज्जत करने के उद्देश्य से ही वह टैक्सी वाला टैक्सी पीछे लाया और बस स्टॉप पर किसी पैसेंजर को नहीं पा ...... ठीक मेरे सामने ही टैक्सी खड़ा कर उस पैसेंजर को बेइज्जत करने लगा....... गाली फक्कड़ देने लगा। उधर वह दोनों माँ बेटे भी याद आ रहे थे कि मैं वहाँ  था इसलिए तो वह लड़का मुझसे बस के बारे में पूछ बैठा.....और जवाब देते ही अपनी माँ पर झल्लाहट निकालने लगा।

  उसी दौरान मुझे साइंस में पढ़ा उत्प्रेरक catalyst की परिभाषा याद आ गई कि उत्प्रेरक किसी क्रिया में हिस्सा नहीं लेता लेकिन अपनी उपस्थिति मात्र से किसी क्रिया की स्पीड बढ़ा देता है। इन दोनों घटनाओं में मैने कोई हिस्सा नहीं लिया था या हिस्सा लिया भी तो उस पहली वाले माँ बेटे की पूछ ताछ में केवल हाँ....नाँ कहा था.....लेकिन इस हाँ कहने से ही दोनों के बीच झगड़ा हो गया। उधर दूसरे केस में तो मैंने कुछ कहा भी नहीं....... लेकिन मेरी उपस्थिति मात्र से दो लोगों का झगड़ा लंबा चला...। यदि वह पैसेंजर अकेला खड़ा होता तो क्या वह टैक्सी वाला फिर भी उसे उतनी देर तक सुना पाता ? मैं वहां  था इसिलिए टैक्सीवाला मुझे माध्यम पा उस पैसेंजर पर चढ़ बैठा।

 यानि कि मैं साईंस की भाषा में एक तरह से उत्पेरक सा बन गया......उत्प्रेरक...... The Catalyst जो किसी प्रक्रिया में हिस्सा तो नहीं लेता लेकिन अपनी उपस्थिति मात्र से किसी  प्रक्रिया को तेज कर देता है :)

    अब जब पोस्ट लिखने बैठा हूँ तो सोच रहा हूँ कि हमारा पाला  कभी न कभी.... किसी  केटालिस्ट से जरूर पड़ता है ......इस दौरान कुछ प्रक्रियाएं पॉजिटिव होती हैं तो कुछ नेगेटिव। मेरे मामले में दोनों घटनाएं नेगेटिव किस्म की थी।  गुस्सा....झल्लाहट......और चिल्लमचिल्ली वाली घटना। लेकिन कई जगह पॉजिटिव किस्म का असर भी होता है...जैसे कि कक्षा में या हॉस्टेल में किसी अच्छे स्टूंडेंट को देख....उसके मार्क्स को देख किसी कमजोर बच्चे पर होने वाला असर......। अच्छे नंबरों वाला बच्चा उस प्रक्रिया में हिस्सा नहीं लेता लेकिन उसे देख कर .....उसकी अपने बीच उपस्थिति देख कर कमजोर बच्चे की पढ़ने की  इच्छा का बढ़ जाना अपने आप में उत्प्रेरक सा ही है.....वहीं यह भी हो सकता है कि बच्चा उसके इतने अच्छे नंबरों को देख हतोत्साहित भी हो जाय....यानि कि एक नेगेटिव असर।

     इस प्रक्रिया में एक चीज तो छूटी जा रही है.....मेरी चुप्पी।   इन दोनों वाकयों के दौरान संभव है मेरे टोकाटाकी से टैक्सीवाले का बड़बड़ाना कम हो जाता.....उस लड़के का भुनभुनाना कम हो जाता.....लेकिन थोड़ा मौजे साक़िन के अंदाज में कहूँ तो साला अपना इंडिया इदरइच मार खा जाता है :)

    जास्ती नईं बोलन मांगता.....जास्ती भंकस बी नईं..... ...बस इतना कहूँगा कि जो मुंबई में रहते हैं.....जो मुंबई को अच्छी तरह से जानते हैं......जो मुंबई की पब्लिक को अच्छी तरह से समझते हैं..... उनसे पूछिए कि क्या वह इन दोनों के फालतू लफड़ों में पड़ना चाहेंगे.....वह भी तब जब आप ऑफिस के लिए लेट हो रहे हों.......कस्टमर कॉल आ रहा हो....घड़ी की सूई भन्नाती हुई निकली जा रही हो.......शायद आप औऱ किसी शहर में हों तो बोल भी देते...लेकिन यहाँ की भागती दौड़ती जिनगी में......दो बोल चहकते हुए अगर बोलना भी चाहेंगे तो नहीं बोल पाएंगे........ये अपना इंडिया.....साला इदरइच मार खा जाता है.....एकदम मुंबई का माफिक :)


 - सतीश पंचम


( चित्र : साभार नेट से )

23 comments:

परमजीत सिँह बाली said...

विचारणीय पोस्ट लिखी है।

Vivek Rastogi said...

बरोबर बोला भिड़ु, अपुन की मुंबई में ये फ़ोकट का टैम नहीं है किसी के पास :)

Vivek Rastogi said...

और कभी ऐसा कोई सीन अपने ऑफ़िस जाते समय हो जाता है तो अपने "दिमाग का तो शॉट" ही लग जाता है। और अपन भी कलटी मार लेता है कि "क्या पका रहा है" :)

मुनीश ( munish ) said...

ये सब ठीक ही कहा आपने मगर गाली के प्रथमाक्षर के बाद का ये तारांकन नहीं जमता जैसे पुरानी फिल्मों में कोई चुम्बन संपन्न होने वाला हो कि दो फूल हिलते-मिलते या दो परिंदे चोंच भिड़ाते दिखा दिए जाते थे . ये तो'Once upon a Time in Mumbai' वाली बात हुई . आज कल तो माननीय सेंसर बोर्ड स्वयं भोसड़ी , गांड आदि शब्दों को अविकल ,निर्बाध प्रस्तुत करने दे रहा है !

PADMSINGH said...

@मुनीश जी ... गजबे करते हैं आप भी

सटीक पोस्ट ...

mukti said...

माहौल को अच्छा रीड करते हैं आप और उस पर गहन विचार-विमर्श. हमारे आसपास ऐसी बहुत सी घटनाएं घटती रहती हैं, पर ज्यादातर लोग ध्यान नहीं देते. आपने ध्यान दिया और उस पर पोस्ट लिख डाली तो आप तो कैटलिस्ट से थोड़ा आगे बढ़ गए...फालतू के झगडों में ना पड़ना अच्छी ही बात है... कासकर जब तक किसी एक को हानि ना पहुँच रही हो. अगर कोई किसी के साथ मार-पीट कर रहा हो और आप चुचाप तमाशा देखें तो मेरे ख्याल से अच्छी बात नहीं होगी.
आज की पोस्ट का समय और स्थान नहीं लिखा आपने :-)

गिरिजेश राव said...

बरोबर बोला। सिरफ बम्बई (ठाकरवा तो यह ब्लॉग नहीं पढ़ता होगा) नहीं किसी भी शहर में ऐसा ही हाल है। हाँ, हमरे ऊ पी में टैक्सी वाला किराया ले ही लेता। वैसे इहाँ टैक्सी अमीर ही लेते हैं और उन्हें मीटर सीटर से फरक नइ पड़ता। अरे आपो तो ऊ पी वाले हो ! काहे बता रिया हूँ?
अज़ीब इत्तेफाक है, कल सुल्ताना डाकू नौटंकी (कमबख्त फेमिनिस्ट विचारधारा के छिपे प्रभाव ने अच्छे भले नाटक की ऐसी तैसी कर दी) देख कर लौटते यह गाना सुन कर मस्त हो रहा था - ऐ दिल है मुश्किल जीना यहाँ ...
अमाँ, लगा ही दो और मुनीश बाबू की बात पर अमल लाओ।

प्रवीण पाण्डेय said...

बहुत सुन्दर पोस्ट। आपने कभी ध्यान दिया है कि जब कोई सौन्दर्य निकट होता है तो धारा प्रवाह अंग्रेजी फूट पड़ती है हम लोगों की। वे विदेशी कैटलिस्ट, आप देशी कैटलिस्ट।

Arvind Mishra said...

पुरुष कैटलिस्ट,महिला कैटलिस्ट दोनों के रेट आफ रिएक्शन के प्रभाव पर अध्ययन किया जाना चाहिए -मौलिक संवाद में कोई श्रोता भी हो तो संवादी प्रोत्साहित होते हैं -कभी कभी वे काफी संवादित होकर उत्प्रेरक को भी बीच में लपेटने की कोशिस्श करते हैं -अबे भडुआ ** भो** वाले भकुआ कर क्या देख रहा बे चल रास्ता नाप !

वाणी गीत said...

जो किसी प्रक्रिया में हिस्सा तो नहीं लेता लेकिन अपनी उपस्थिति मात्र से किसी प्रक्रिया को तेज कर देता है ...
उत्प्रेरक बनने की कोशिश ही नहीं की जानी चाहिए ...
गाँधी जी भी कह गए हैं अपने तीन बंदरों के माध्यम से ...!

सतीश पंचम said...

@ मुनीश जी,

कभी कभी वातावरण का प्रभाव हमें अवचेतन रूप से ऐसा कुछ करने....लिखने आदि पर मजबूर कर देता है जैसा कि हम अक्सर नहीं करते।

कल शाम जब यह पोस्ट लिखने बैठा था तो उसके जस्ट पहले ही ऑफिस से आकर पूजा आदि की थी...अगरबत्ती वगैरह जलाया था....सो माहौल थोड़ा सात्विक सा लगा और मन भी :)

सो उसी मूड़ में यह पोस्ट ठेल दिया और ऐसे में सात्विकता की चादर ओढ़े.... तारांकित शब्दों का इस्तेमाल किया.....वरना तो मेरी किसी किसी पोस्ट में तो लोगों ने आपत्ति भी दर्ज कराई है कि इतना खुलापन ठीक नहीं......एकाध जगह तो केवल किसी चित्र को लेकर ही बवाल हो चुका है :)

सतीश पंचम said...

गिरिजेश जी, सुलताना डाकू की नौटंकी पर कुछ बताइए........लिखि्ए.... बहुत दिन हुए....कभी विवाह आदि के वक्त चार तख्तों को जोड़कर बनाए मंच पर नौटंकी देखे हुए.....अब तो लोग अगले दिन सुबह ही विदाई करा देते हैं....घराती खुश....बराती खुश....समय की बचत....पैसे की बचत....सब का भला :)

और वह नौटंकी की कुड़कुड़ीया नगाड़ा..जब बजने लगता है कुड़....कुड़...कु़ड़.....कुड़..... घम्म....घम्म....घम्म तो लगता है जैसे मंच पर बंधा परदा उचर जाएगा :)

सतीश पंचम said...

@ विवेक जी,
दिमाग का शाट....क्या बात कहीं :)


@ मुक्ति जी,
समय और स्थान जान बूझकर नहीं लिखा...क्योंकि इससे पोस्ट के मूल भाव से ध्यान बँटने की संभावना थी...... इस कॉम्पलिकेटेड पोस्ट में और झोल नहीं करना चाहता था :)

सतीश पंचम said...

@ वाणी जी,

शायद मैंने पोस्ट में Abstractism ( अमूर्त तत्वों ) की बढ़ोतरी कर दी है....इसलिए कहीं कहीं पोस्ट गड़बड़झाला कर रही है। यहाँ मैं अनचाहे तौर पर Catalyst बनने की ओर इशारा कर रहा हूँ कि आप कहीं कही परिस्थितियों में इस तरह उलझ जाते हैं कि चाह कर भी कुछ नहीं कर पाते और आप का वहाँ होना....दूसरे लोगों के लिए बहस...मुबाहिसे का माध्यम बन जाता है।

उस टैक्सी वाले और उस पैसेंजर की चखचख कम लंबी चली होती यदि मैं वहां उपस्थित न होता...तब दोनों एक दूसरे को भला बुरा कह संक्षेप में निकल लिए होते....लेकिन मुझे वहाँ पाकर टैक्सी वाले ने पैसेंजर को लज्जित करने का मुझे माध्यम बना लिया।

और मुझे लगता है कि गाँधी जी खुद एक बड़े Catalyst थे....जिनका कि केवल नाम लेकर ही न जाने कितनों की राजनीतिक नैया पार हो जाती है....गाँधी जी नहीं हैं तो भी :)

सतीश पंचम said...

अरविंद जी,

@ पुरुष कैटलिस्ट,महिला कैटलिस्ट दोनों के रेट आफ रिएक्शन के प्रभाव पर अध्ययन किया जाना चाहिए ...

ये तो बहुत मार्के की बात कही श्रीमान.....एकदम टटका-नवहर मुद्दा :)

मुनीश ( munish ) said...

@आपत्ति उठाऊ पाठक -- आपकी भावनाओं की क़द्र करते हुए यही कहना चाहता हूँ कि आप मधुर भंडारकर की 'पेज थी' देखें ! रामू की फ़िल्में लें ....और उन सैंकड़ों साहित्यिक कृतियों को छोड़ें जिनमें समाज की असल बोली को चिरकाल से यथावत पेश किया गया है . अब वो सब करें तो कला और सतीश पंचम लिखे तो बला ! ये दोहरे मान-दंड क्यों ?

सतीश पंचम said...

मुनीश जी,

यही तो मुश्किल है ब्लॉगजगत में कि यदि कहीं कुछ स्पष्टता से लिख दिया जाय तो लोग डंडा ले दौड़ा लें....

मुझे याद है कि ब्लॉगजगत में एक वह भी दौर था कि हर कोई 'मेनस्ट्रीम ब्लॉगिंग' में गाली लिखने....बोलने से झिझकता था ...गालीयां लिखने से परहेज करता था....ऐसे समय मैने एक पोस्ट लिखी थी आतंकवादी हमलों के बाद एक दुकान में चली गालीमय चर्चा पर......

http://safedghar.blogspot.com/2008/11/blog-post_30.html

हांलाकि यह पोस्ट कई जगह ढंके छुपे तौर पर थी तारांकित थी.... लेकिन पोस्ट का मूल भाव लोग समझे जा रहे थे.....शायद मैं फिर उतने काल के बाद 360 degree घूम घाम गया हूँ :)

कोशिश करूंगा कि अब जब कभी ऐसी कोई पोस्ट हो...तो मेरे उदगार सहज हों :)

ज़ाकिर अली ‘रजनीश’ said...


पंचम जी, एकदम राप्चिक लिखेला है...

…………..
प्रेतों के बीच घिरी अकेली लड़की।
साइंस ब्लॉगिंग पर 5 दिवसीय कार्यशाला।

Udan Tashtari said...

दिमागी बादल की गर्जन-कीन ऑबजर्वेशन...सटीक लेखन. उत्प्रेरक का प्रभाव देखते सुनते सब हैं बस ऐसे शब्दों में ढालना-वो संतीश पंचम का कमाल है.

डा० अमर कुमार said...


उत्प्रेरक वह दोनों पात्र ( टैक्सीवाला, टपोरी छाप लड़का ) क्यों नहीं ?
स्वयँ ब्लॉगिंग में सक्रिय न होते हुये भी आपसे एक्ठो पोस्ट निकलवा लिये !
डॉ. अरविन्द से सहमत.. वहाँ यदि कोई आइटम खड़ी होती, तो टैक्सी वाला मुँहमाँगा भाड़ा वसूलने को मज़बूर न होता, और लड़का सिस्टर सिस्टर करके अक्खा टैम आपके पहलू से चिपका होता, अपनी आई को समझाता, यह बस माफ़िक नहीं, अपुन अगली बस से चलेंगा । तब कितनी भिन्न स्थितियाँ बनतीं ।
समाज में रहने के तौर तरीकों में, सह-अस्तित्व और समूह उत्प्रेरण एक सतत प्रक्रिया है.. , जिसे हम अनजाने ही भागीदार बन जाते हैं । आपने प्लाज़्मा टी.वी. लिया.. अपनी पत्नी के सम्मुख अपना अस्तित्व पुख़्ता रखने के चक्कर में आपके पड़ोसी ने आपने को लाख रूपये के कन्ज़्यूमर-लोन में फँसा लिया । आपने चाहा भी नहीं, पर एक बैंक का मुनाफ़ा और कलेक्शन एज़ेन्ट के हाथों उसकी ज़हालत हो गयी !

सतीश पंचम said...

@ डॉ अमर जी,

आपने तो बहुत ही बढ़िया ढंग से मेरी इस कच्ची-पक्की पोस्ट की विवेचना की ....एकदम मस्त। सह-अस्तित्व और समूह-प्रेरणा की बात आपने बहुत सटीक कही....पूरी तरह सहमत हूँ।

अरविन्द जी ने विपरीत लिंगी मुद्दे को लेकर जो मोहड़ा खोला है.....वह काफी दमदार है।

vibha rani Shrivastava said...

मंगलवार 02/07/2013 को आपकी यह बेहतरीन पोस्ट http://nayi-purani-halchal.blogspot.in पर लिंक की जा रही हैं ....
आपके सुझावों का स्वागत है ....
धन्यवाद !!

sushma 'आहुति' said...

sarthak post...

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