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Monday, July 26, 2010

ये मुंबई आमा हल्दी..............सतीश पंचम

 
मुंबई अक्सर ही तमाम हादसों का शिकार होते रही है....कभी लोकल ट्रेन में बम विस्फोट वाले आतंकवादी हमलों के कारण तो कभी राजनीतिक सरगर्मियों के कारण तो कभी 26 जुलाई सरीखी बाढ़ के कारण। वही बाढ़ जिसे याद कर मुंबई वाले आज भी सिहर उठते हैं......वही बाढ़ जिसने न जाने कितने लोगों को मौत के आगोश में समाने को मजबूर किया था.......  आज फिर 26 जुलाई है। वही बाढ़ वाला दिन। 

और फिर 26/11 के हमलों की याद भला किसे नहीं होगी जब पूरी मुंबई एक तरह से बंधक की तरह थी...मात्र दस आतंकवादियों ने पूरे मुंबई में कहर बरपा दिया था। हर ओर लाशें ही लाशें......चीख....पुकार....हाहाकार मच गया था। कसाब जैसे हत्यारों के कहर ढाने के बावजूद मुंबई ठहरी नहीं....रूकी नहीं.....औऱ फिर  अगले दिन चल पड़ी। उसी जज्बे को देख मैंने उस दौरान एक कविता लिखी थी....ये मुंबई आमा हल्दी।

 आमा हल्दी......जिसे कि घाव लगने पर मरहम की तरह लगाया जाता है....... मेरी यह कविता उसी  मुंबई के लिए समर्पित है जो रूकना नहीं जानती, ठहरना नहीं जानती......





ये मुंबई आमा हल्दी
ये मुंबई आमा हल्दी

इक ठेस लगी, रूक सी गई
रूक कर फिर से चल दी

ये मुंबई आमा हल्दी

पलते सपने सबके यहाँ
सब पाते हैं थोडा थोडा
हाथगाडी के बगल खडी
होती है कारें  स्कोडा

एसे सपने हैं यहाँ पर कि
है  सपनों पर ही पल्दी

ये मुंबई आमा हल्दी
ये मुंबई आमा हल्दी

कंधे से कंधा है छिलता
भीड ये भागती चलती
हाँफने पर भी हाँफ न पाए
साँसें ऐसी हैं चलतीं

हो स्टेशन या पार्क खुशनुमा
हर जगह का रेलम-पेला
हो शाम गोधूलि सुबह लपकती
हर ओर  रहे है बवेला

ये मुंबई आमा हल्दी
ये मुंबई आमा हल्दी


यहाँ वक्त नहीं मिलता खुद से
 और वक्त को भी होती जल्दी
जाने कितनें जख्मों पर
ये अक्सर  मलती हल्दी


जख्म भरे..... फिर से उठे
उठ कर  फिर से चल दी


ये मुंबई आमा हल्दी
ये मुंबई आमा हल्दी


- सतीश पंचम

स्थान - वही, जिसे अंगरेजों ने कभी दहेज के रूप में दिया था।

समय - ठीक वही, 26 जुलाई वाला... जब समूची मुंबई में पानी ही पानी था और चारों ओर हाहाकार मचा था। 

( चित्र :  साभार नेट से )

20 comments:

draradhana said...

सच में, मुम्बई की ये जीवन्तता ही उसे मुम्बई बनाती है.'मुम्बई मेरी जान' फिल्म में इसे बड़ी खूबसूरती से पेश किया गया था.
आपने आमा हल्दी से इसकी तुलना की है... सच...हादसों से तुरंत ही उबार जाने की फितरत इसे आमा हल्दी बना देती है.

बेचैन आत्मा said...

मुंबई होती रहती बार-बार ज़ख्मी
पूरब के लोग लगाते इसमें
चोट-मुसव्वर, आमा हल्दी
ठीक हो जाती है जल्दी
तो लोग कहते- अरे,
अभी गिरी अभी चल दी..!
...जब आप जैसे लोग आमा हल्दी लिए तैयार खड़े हैं तो मुंबई को ठीक होना ही है.

Vikas Agrawal said...

सतीश जी बहुत अच्छा लगता है आपकी निटी नयी नयी पोस्टो को पढ़कर, आज एक मेल मिली,सोचा की आप सभी लोगो से शेयर करू.... गधे जो जवानी की सीढ़ियाँ चढ़ रहे थे, एक दिन साथ साथ चल रहे थे ! एक धोबी का गधा था और दूसरा कुमार का ! एक की पीठ पर गंधे कपड़े लदे थे और दूसरे की पीठ पर मिट्टी के बर्तन ! दोनों तेज तेज चल रहे थे जब की उनके बूढ़े मालिक काफ़ी पीछे रह गये थे ! चौराहे पर ग्रीन लाईट मिल गयी और दोनो गधे सड़क पार कर गये लेकिन जैसे ही इनके मालिक वहा पहुँचे रेड लाईट हो गई ! मौका देख कर दोनो गधे एक पतली गली से होकर एक घास के मैदान में आ गये !

पीठ पर बोझ लेकिन खुली हवा में स्वतंत्रता का आभास, दिल में खुशी की उमंग, दोनों एक दूसऱे से बातें करने लगे ! कुमार के गधे ने धोबी के गधे से कहा, " यार आज तो तू गबरू जवान लग रहा है, क्या कोई गधी पटाई है ! बता कब शादी का इरादा है ? मैने तो अपना जीवन साथी चुन लिया है ! गधी का बाप तो राज़ी नहीं है लेकिन हमने चोरी चोरी शादी करने का फ़ैसला कर लिया है ! इंसानों की तरह उसका बाप एक ही गोत्र में शादी के खिलाफ है, मैं तो नहीं मानता ! यार कमाल है हम इक्कीसवीं सदी में जी रहे हैं और मेरी माशूका का बाप इंसानो की तरह अभी भी मध्य युगीन सभ्यता और परम्पराओं के आवरण को लपेटे हुए है ! भयया हम तो शादी करेंगे और भाग जाएँगे, प्रदेश ही छोड़ देंगे, हमें नहीं लेना आनर किलिंग का रिस्क ! मैं ही बोलता जा रहा हूँ, तू भी तो कुछ बोल, कब कर रहा है शादी ? जल्दी कर ले ए गबरू जवानी ज़्यादा दिन नहीं रहेगी, फिर कोई घास भी नहीं डालेगा !"

धोबी का गधा बोला. " भया मैं क्या बोलूं, अभी किसी से नज़रें चार नहीं हुई ! कल मैं मालिक के घर के बाहर पीठ पर बोझ लादने के लिए खड़ा था, घर के भीतर मालिक गुस्से होकर चिल्ला रहा था और अपनी एक मात्र लड़की को कह रहा था' 'अब मैं तेरी नादानी बर्दाश्त नहीं कर सकता, रोज कोई न कोई समस्या पैदा करती जा रही है, मैंने फ़ैसला कर लिया है की अब तेरी शादी किसी गधे से ही करूँगा ! मेरे से अच्छा गधा वर इनको और कौन मिलेगा ? इंतजार है ये खूसट मालिक कब मेरी शादी अपनी लड़की से करता है" !

कुमार का गधा बोला, "अरे बांगड़ू उसने कह दिया और तूने मान लिया ! ये इंसान जो कहते हैं करते नहीं हैं ! इनका कोई ईमान धर्म नहीं है ! अरे मवेशी चारा तक खाने वाले हैं इनके नेता ! घर इनसे संभलता नहीं नेता बनकर देश का शासन चलाते हैं ! मवेशी चारा खाते हैं ! जर जोरू ज़मीन के लिए भाई भाई को भी मरवाते हैं ! भाषणों की गोली खिला कर जनता से वोट लेते हैं और फिर उसी जनता को लूटते हैं ! हमारा अपना मज़हब है अपनी सभ्यता है की हम केवल गधे हैं" !

इनकी बातें चल ही रही थी की इन्हें ढूँढते ढूँढते हाथों में डंडे लिए इनके मालिक वहाँ आ गये, ये बेचारे बेजुबान गधे दस दस डंडे खा गये ! दर्द के मारे ढेँचू ढेँचू करने लगे और शादी के स्वप्न ज़मीन पर बिखरने लगे !!

rashmi ravija said...

सतीश जी,
ये मुंबई को आमा हल्दी का नाम बिलकुल सटीक दिया आपने . यहाँ जख्म भरने में समय नहीं लगता....और यहाँ के लोगों का जज़्बा तो रश्क करने के लायक है.
कल से मुझे भी याद आ रही थी...वो २६ जुलाई और आतंकवादी हमले...
एक वाकया याद आ रहा है...ताज में आतंकवादी हमले के बाद अफवाहों का बाज़ार गर्म था....तब तक सही तस्वीर सामने नहीं आई थी...और ये अफवाह थी कि करीब 20-25 आतंकवादी पूरी मुंबई में फ़ैल गए हैं और कहीं भी निर्दोष लोगों पर गोलियां बरसा सकते हैं.
दूसरे दिन सुबह मैं औए मेरी सहेलियां मॉर्निंग वाक पे जाने से डर रहें थे. तो मेरे बच्चों ने कहा, "बिलकुल जाओ..इसमें डरना क्या है...हम डर कर क्यूँ रहें ,हमें तो उनलोगों को दिखा देना चाहिए कि बिलकुल नहीं डरते..."
सच कहूँ, १४,१५ साल के किशोरों के मुहँ से ऐसी बात सुन एक सिहरन दौड़ गयी,शरीर में....मुंबई की मिटटी और पानी में ही है कुछ , कि सारे डर भगा देती है और संभलने का हौसला भी देती है.

प्रवीण पाण्डेय said...

बारिश का जलभराव देखकर तो दिल दहल गया।

Arvind Mishra said...

सुना है आज फिर झमाझम है ....आमाहल्दी और आम हल्दी में गुगलिया विकिपीडिया जो भी कर भाई अंतर बता तू आज!

सतीश पंचम said...

अरविंद जी,
आपने बढ़िया काम में लगा दिया। इसी बहाने थोड़ा हल्दी के बारे में जानकारी भी ले लिया :)

एक जगह कुछ पढ़ा है वह यहां पेस्ट कर रहा हूँ।
हल्दी की प्रजातियां व उनके प्रयोग
रसोई में जिस हल्दी का प्रयोग किया जाता है, उसके अलावा भी इसकी कुछ अन्य विशिष्ट प्रजातियां हैं, जिनका औषधीय गुणों के कारण विभिन्न रोगों में प्रयोग किया जाता है।

आमा हल्दी
आमा हल्दी का वानस्पतिक नाम क्यूरकुमा अमाडा है। इसमें कच्चे आम की सी गन्ध आती है। इसीलिए इसे आमा हल्दी या आम्रगन्धि हरिद्रा कहा जाता है। इस प्रकार की हल्दी भारत के प्रायः सभी प्रान्तों में विशेष रूप से बंगाल, कोंकण तथा तमिलनाडु में उत्पन्न होती है। इसकी गांठें बड़ी-बड़ी अदरक के समान, पीले रंग की तथा आम की सी गन्ध से युक्त होती हैं।

वन हल्दी
वन हरिद्रा का वानस्पतिक नाम क्यूरकुमा ऐरोमेटिका है। यह भी भूमिगत तना होती है और सुखायी हुई पंसारी के यहां उपलब्ध होती है। इसका भीतरी भाग गाढ़े नारंगी रंग का होता है। इसमें से साधारण हल्दी से तेज और कर्पूर की सी गन्ध आती है। इसका सामान्यतः साधारण हल्दी के स्थान पर रंगाई के काम में उपयोग होता है। वन हल्दी समस्त भारत में विशेषतः मैसूर और मालवा प्रदेश के जंगलों में उत्पन्न होती है। इसकी खेती बंगाल और केरल में की जाती है।

दारु हल्दी
दारु हल्दी के वृक्ष जो हिमालय पर्वत पर तथा आसाम में पाए जाते हैं। जिनमें चार जातियों के वृक्ष मध्य भारत एवं दक्षिण भारत के नीलगिरी पर्वत पर पाए जाते हैं। इनका भूमिगत तना ही हल्दी होता है। बर्बेरिस अरिस्टेटा हल्दी का चिकित्सा में उपयोग किया जाता है। इस प्रकार की हल्दी पीले रंग की होती है, जिसमें हल्की-सी गंध आती है और स्वाद कड़ुवा होता है।
लिंक यह रहा - http://pustak.org/bs/home.php?bookid=3486#

अब इससे ज्यादा गहन रीसर्च हेतु ब्लॉग-बेटन आप की ओर बढ़ाता हूँ....कृपया ज्ञान दिजिए आर्य :)

shama said...

Mumbaikaron ke zakhm aaj bhi hare hain....92 ke riots me jo mile the...haan,unke paas roneki fursat nahi...yaa yun ke kiseeke paas wah dard sun leneki mohlat nahin....jazba to apni jagah haihi.

शोभना चौरे said...

मुंबई वासी बहुत जीवट होते है इअमे तो कोई शक ही नहीं है |आमी हल्दी के माध्यम मुंबई वासियों का जीनेके जज्बे की बढिया मिसाल |मराठी और गुजरती में इसे "अम्बा हलद "कहते है |
हल्दी की जानकारी देने का आभार |

Arvind Mishra said...

बहुत आभार ,पर्याप्त जानकारी पंचम जी ,मुझे पता था कि एक प्यासे की फरमाईश कुआं जरूर पूरी करेगा -रानी वाला बेटन तो छू तक नहीं सका -ई ले के का करेगें ,गिरिजेश जी को थमा दें ..वे दीवाने हैं !

संगीता स्वरुप ( गीत ) said...

बेहतरीन प्रस्तुति.....हल्दी के बारे में जानकारी अच्छी लगी

सतीश पंचम said...

अरविंद जी,

गिरिजेश जी तो रानी के बेटन से ही खुश हैं ऐसे में ब्लॉग बेटन पता नहीं उन्हें खुशी देगा या नहीं :)

वैसे एक मौजू ख्याल आ रहा है कि ब्याह के वक्त मड़वे में जो मथानी (जिससे मट्ठा वगैरह मथा जाता है)....अगर उसकी जगह बेटन बाँधा जाय तो कैसा रहेगा :)

ब्याह में दारू-शराब पी पा कर झगड़ा-झुगुड़ी की संभावना रहती है और ऐसे वक्त पर जिसके हाथ बेटन आ जाय उसकी विजय तय मानिए :)

और फिर हल्दी का उपयोग तो लोगों को करना ही पड़ेगा....फिर चाहे वह आमा हल्दी हो या फिर दारू हल्दी :)

sajid said...

सतीश पंचम जी बेहतरीन प्रस्तुति...
हल्दी के बारे में जानकारी अच्छी लगी
आप का धन्यवाद !

संगीता स्वरुप ( गीत ) said...

आपकी यह प्रस्तुति कल २८-७-२०१० बुधवार को चर्चा मंच पर है....आपके सुझावों का इंतज़ार रहेगा ..


http://charchamanch.blogspot.com/

Shiv said...

एक आम मुम्बईकर की ख़ास पोस्ट.
कल पढ़ लिया था. कविता बहुत अच्छी लगी.

मुनीश ( munish ) said...

very true indeed ! great !

Mired Mirage said...

वाह, मुम्बई की तुलना आमा हल्दी से! बढ़िया लिखा है।
घुघूती बासूती

डा० अमर कुमार said...


भाई सतीश जी, मैं आपकी पोस्ट का समर्थन नहीं कर सकता ।
आमाहल्दी को लेकर कोई अँडर-र्ग्रॉउन्ड मुहिम चला रखी गयी हो, तो यह और बात है !
पर, मैंने तो वहाँ जगह जगह यही पोस्टर-बैनर देखा है...
आयोडेक्स मलिये, काम पर चलिये ।

anitakumar said...

Aap jisse aamaa haldi kah rahe hain mein usse ambaa haldi ke naam se jaanti hun aur khoob prayog ki hai...dhaansoo cheez hai...mumbai ki tulna ambaa haldi se toh kamaal hai

kk said...

good very goood

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