सफेद घर में आपका स्वागत है।

Saturday, July 24, 2010

रिक्शेवाले की तपिश.......बस वाले की आराधना.....संसद की चिचियाहट.........लालीपाप-ए-लपूझन्ना.......तुम्हारी बकलंठई.......और मैं...सतीश पंचम


    तेज कड़कती धूप के बीच शहर जा रहा हूँ........ड्राईवर की सीट के आसपास कई देवताओं की तस्वीरें लगी हैं....हनुमान जी हैं .....गणेश जी भी हैं......... लोग एक एक कर  आ रहे हैं..........दौरी - झपिया लिए हुए......लगन बियाह का मौसम ठहरा............एक जगह नजर पड़ती है...... ड्राईवर सीट के एकदम पीछे लिखी पंक्तियों पर-  50 % सीट महिलाओं के लिए आरक्षित।   एकाएक मेरी आँखों के सामने संसद घूम उठी है....महिलाओं के आरक्षण के नाम पर  बेवजह की लफ्फाज राजनीति का ठिकान........हम महिलाओं के सशक्तीकरण के लिए बिल लाएंगे.....हम ये करेंगे....हम वो करेंगे...........आरोप प्रत्यारोप.......अनुनय.....विनय .....के बीच इतनी धारदार....जोरदार  बहसे............. इतनी ....कि.. संसद के पलस्तर तक झड़ने लगे । लेकिन महिला आरक्षण......ले देकर......मिला भी तो....... लालीपाप-ए-लपूझन्ना.......कहने वाले कहते रहें......मोर बलम सुतवईया.....मैं ही आखिर कितना झनखूँ........। 

  रोज हजारों लाखों के वारे न्यारे करने वाले महानुभावो...... . यहां देखो....एक गाँव की बस में आरक्षण हो चुका है.....महिलाओं के लिए पच्चास प्रतिशत.....तुम्हारी बकलंठई से कोसों आगे है मेरा देहात......।  
 ...............
...............
    
 बस शहर आ चुकी है......उतरते हुए नजरें घूमती हैं......सामने ढेर सारे रिक्शा वाले.......ट्रिन ट्रिन घंटी बजाते .......कहिए.....कहाँ चलेंगें........।  इतनी तगड़ी धूप  में सड़क पर पैदल चलना मुश्किल है.......लोग बिना गमछा बाँधे  कम ही दिख रहे हैं.....इस तपिश में कौन जान दे...... एक रिक्शा कर ही लिया जाय...........। 

 एक नौजवान रिक्शा वाले से बात चीत करता हूँ.....

कितना लोगे....

पच्चीस !!!

अकेला हूँ.....फिर भी पच्चीस ? 

धूप भी तो देखिए.....रस्ता भी तो लंबा है....खींचान पड़ेगा ....।

खींचान.......क्या शब्द दे गया रिक्शेवाला.........

     मैं अक्सर इस तरह के  रिक्शे वालों से मोलभाव बिल्कुल नहीं करता....उनकी मेहनत.......उनका पसीना देख अपनी वातानूकूलित कमाई पर शर्म सी आने लगती है.......लेकिन एक बार टोकता जरूर हूँ कि कितना ज्यादा ले रहे हो.........बकलोलई वाले ये पूछ-पछोर करते शब्द खुद- ब- खुद जबान पर आ जाते हैं!

 मुंह पर गमछा लपेट.... रिक्शे का शेड उपर की ओर खींच उसकी छाँह में बैठते हुए कहता हूँ - चलो

 तेज  लू के थपेड़ो के बीच आसमान से आग उगलते माहौल में रिक्शे वाला चल पड़ा .....चेन की आवाज आ रही है....किर्ररर.......किर्ररररररर!!!!

       तभी नजर पड़ी.......  रिक्शे वाले नें इतनी तेज धूप के बीच कोई गमछा नहीं लपेटा है.....कोई टोपी या लू से बचाव का उपाय नहीं किया है। एक ओर मैं रिक्शे के शेड की छाँह में बैठा हूँ.....उधर दूसरी ओर सामने  ही पीठ है रिक्शे वाले की.....पसीने से तर बतर......तपिश मुझे महसूस होने लगी है।

 कोई गमछा-ओमछा नहीं रखे हो क्या ?

है गमछा....

लपेटते क्यों नहीं.......इतनी गर्मी है.....यार संभाल कर रहो.....काहें जिउ दे रहे हो।

किर्रररर किर्ररर की आवाज थम गई....रिक्शे को साईड में लगा रिक्शे वाला उतर गया...मेरी ओर मुड़ते हुए  बोला - तनिक उठिए तो....

क्यों.....क्या हुआ ? 

यही सीटीया उठानी है जरा....

ओह.....तो जिस पटरेनुमा सीट पर बैठा हूँ उसी के भीतर बने इस बक्से के भीतर इसका गमछा रखा है.......

एक नीला चौकड़ीदार गमछा निकाल कर रिक्शे वाला फिर अपनी सीट पर जा बैठा......किररररर.....किरररर

अब .... गमछा बाँधे रिक्शे वाले को देख कुछ सहज महसूस कर रहा हूँ ।

 रिक्शे पर बैठे-बैठे..... रास्ते की दुकानों पर भी देखता जा रहा हूँ...........डोरा अंडरवियर......सलीम टेलर......बुद्धू मिस्त्री.....हमारे यहाँ फटे पुराने नोट लिए जाते हैं.......अबे ए रिक्शा......अरे तोहरी बहिन क......किर्ररर.......किर्रर....

  दुकानों पर देखता हूँ कहीं विवाह हेतु मौर सजे हैं......कहीं साड़ियाँ..........कहीं मिठाईयां.......। 

विवाह......एक अर्थतंत्र...... जाने कहाँ से कहाँ रूपया घूमता फिरता है......शादी वाले घर से निकलकर....... बाहर से आने वाले नाते रिश्तेदारों की जेब से........ बाजे वाले की जेब से..........बीडी़ वाले की दुकान............पान वाला........मौर वाला......मिठाई वाला.....पटाखे वाला.......कपड़े वाला........रूपया रे रूपया...........किर्ररर.... किर्रररर.....

ओह.....  रिक्शे वाले का पैडल रूक गया है..........चलूँ..... उतरूँ.......... शहर आ गया है......रिक्शेवाला चला जा रहा है......किर्ररररर..........किर्रररररररर !!!

- सतीश पंचम


स्थान - वही, जहां पर इस तरह के रिक्शे नहीं चलते।


समय - वही, जब मेरा रिक्शेवाला एक जगह कार वाले से सट सा गया और कार के भीतर बैठे किसी लौंन्डे ने गरियाया..........ए रिक्शा...........तोहरी बहिन......क.....। 


 संभवत: कार के डैशबोर्ड पर किसी देवता का चित्र लगा था.....देवता का !!!

[ यह संस्मरण.....मेरी ग्राम्य यात्रा के दौरान के है....... सभी चित्र मैंने उसी दौरान हिंचे थे]


ग्राम्य सीरीज चालू आहे.........

22 comments:

Arvind Mishra said...

चित्र अच्छा हींचे ...खीचांन पडा या नहीं मालूम नहीं !तोरी ...त संस्कृति का हिस्सा है ...मुला दे डिड नाट मीन इट ...खरीददारी का का केगें यी बतावै के पडी ...

Girdhari khankriyal said...

Pancham Bhai jab riksha kir rrrrr kar rah tha to aapne use rikshe mein greas tail karwane ke liye nahi kaha!

सतीश पंचम said...

गिरधारी जी,

रिक्शे की किर्ररर की आवाज में भी आनंद पा रहा था....यहां मुंबई में तो इस तरह की आवाजें सुनने के लिए तरस जाना पड़ता है।

माहौल....आनंद...सब कुछ मिला कर किर्रररर अच्छा लग रहा था :)

प्रवीण पाण्डेय said...

बड़ा मेहनत का काम है रिक्शा चलाई, खीचान में।

Smart Indian - स्मार्ट इंडियन said...

बडे गजब का रिपोरट लिखे हौ भय्या! आनन्द आइ गवा!

Vivek Rastogi said...

बेहरतीन ग्राम्य जीवन की झलक,

वैसे देवता की तस्वीर कई जगह होती है, केवल कार में ही नहीं पर गालियाँ आम हैं और अपने गंदे विचार भी कहीं भी, क्योंकि कण कण में भगवान रहता है।

'अदा' said...

बहुत अच्छा चित्र खींचा आपने...शब्दों से भी और यथार्थ भी...
बहुत दिनों बाद 'मौर' बहुत देखा अच्छा लगा....
आपका धन्यवाद...

'अदा' said...

पहली टिप्पणी थोड़ी गलत हो गयी है...
क्षमाप्रार्थी हूँ...


बहुत अच्छा चित्र खींचा आपने...शब्दों से भी और यथार्थ भी...
बहुत दिनों बाद 'मौर' देखा बहुत अच्छा लगा....
आपका धन्यवाद...

आभा said...

अच्छी रिर्पोटिंग.....

शिवम् मिश्रा said...

बहुत ही बढ़िया ...............सटीक चित्रण किये है !

राज भाटिय़ा said...

रिक्शेवाले वाले का दर्द महसुस किया आप ने. धन्यवाद

मनोज कुमार said...

बेहतरीन। लाजवाब।

महफूज़ अली said...

गजबे रिपोर्टिंग...

वाणी गीत said...

लॉलीपोप पर खूब नजर टिकी आपकी ...
रिक्शेवाले से मैं भी नहीं करती कभी मोल भाव ...हममे से कितने लोग है ऐसे जो इन कामगारों से भी सहानुभूति रख पाते हैं...

बढ़िया रिपोर्टिंग ...!

अजय कुमार said...

जीवंत वर्णन ,कुछ शब्द बहुत दिन बाद कानों में पड़े ।

गिरिजेश राव said...

निहाल कर दिए उस्ताद !
बकलंठई - इस शब्द पर विस्तृत भाष्य माँगता है। न न , मैं नहीं कोई और करेगा।
लपूझन्ना नाम से एक ब्लॉग भी है। इस शब्द का अर्थ बताइए, प्लीज!
... एक दौर याद आया। शायद 6 महीने चला होगा। सनक ही थी। रिक्शे पर नहीं बैठना। आदमी आदमी को ज़ानवर की तरह खींचे - मंजूर नहीं। ऑटो से चलता या कई किलोमीटर पैदल ही... गुजर गया वह दौर भी। सभी अपने अपने सलीब ढो रहे हैं। ... ब्लॉग पढ़ना, टिप्पणी करना बहुत कम हो गया है। लेकिन पंचम दा की बात ही और है।

सतीश पंचम said...

भई गिरिजेश,

ये लपूझन्ना का अर्थ तो मोको भी ना पता है....लेकिन है बड़ा मजेदार। इस शब्द को पहली बार जॉनी वाकर की किसी फिल्म में सुना था तब से याद है। यह शब्द कुछ कुछ उसी परिवार का है जिसके कि सदस्य रापचीक...ढिंचाक.... आदि हैं। अब ऐसे शब्दों के अर्थ पुरातात्व विभाग वालों से जानने पड़ेगे क्योंकि मॉडर्न साईंस इनका अर्थ बता पाने में विफल रहा है :)

शोभना चौरे said...

बहुत अच्छा चित्रणसब कुछ आँखों के सामने धूमने लगा
दुकानों पर देखता हूँ कहीं विवाह हेतु मौर सजे हैं......कहीं साड़ियाँ..........कहीं मिठाईयां.......।
विवाह......एक अर्थतंत्र...... जाने कहाँ से कहाँ रूपया घूमता फिरता है......शादी वाले घर से निकलकर....... बाहर से आने वाले नाते रिश्तेदारों की जेब से........ बाजे वाले की जेब से........
कितनो की रोजी रोटी चली है इन आयोजनों से और उनमे प्रयुक्त होने वाली वस्तुओ से |किसी जमाने जब छोटे बच्चो की शादी हो जाती थी १५ दिनों तक शादी की रस्मे चलती थी गाँव में ही वस्तु विनिमय हो जाता था |
आज तो बस रस्म निबाहने वाली बात हो गई है और बाजार को मौका |
बहुत अछि लगी आपकी यह पोस्ट भी |

शिवम् मिश्रा said...

एक बेहद उम्दा पोस्ट के लिए बहुत बहुत बधाइयाँ और शुभकामनाएं !
आपकी चर्चा ब्लाग4वार्ता पर है यहां भी आएं!

अजय कुमार झा said...

सतीश जी ,
हमेशा की तरह गजबे पोस्ट लिखे हैं ..रिक्शा से लेकर गमछा तक सबे समेट लिए हैं ....और एकदम कमाले रपटाए हैं सबको .......

अनूप शुक्ल said...

रिक्शेवाले की तपिश.......बस वाले की आराधना.....संसद की चिचियाहट.........लालीपाप-ए-लपूझन्ना.......तुम्हारी बकलंठई.......और मैं...सतीश पंचम पोस्ट का लेखक क्या समझते हो!

लपूझन्ना : बहुत ठंड में जब कम कपड़े पहन के कोई घूमता है तो कहा जाता है -बने लपूझन्ना घूम रहे हो। इससे अपने काम भर का मतलब निकालिये फ़िलहाल!

Lalit said...

Bhai log, ab kya kahein... asal mein main jyada to bolataa hoon nahi atah bas padh ke manan kar leta tha parantu yeh Lappujhannawa mera moonh kholawa diya sir.

Lapujhanna -- ek bahuaayaami shabdjo kisi bhi shthiti, parishthiti aur bhav ko sampreshit karataa hai. Hum isaki tulana bhojpuri ki ek abhivyakti "ethi" se kar sakate hai jisaka ki apnaa koi arth nahi hota hai lekin desh, kaal aur parishthiti ke anusaar arth vyakt karataa hai.

Prayog: Agar koi apna samaan faila ke rakha hai aur aapko kahanaa hai ki aap apna samaan sametiye to aap yeh bhi kah sakate hain ki "bhai apna yeh lapujhanna uthoa yehaan se, thoda baithanaa hai" aadityadi....

फोटो ब्लॉग 'Thoughts of a Lens'

फोटो ब्लॉग 'Thoughts of a Lens'
A Photo from - Thoughts of a Lens

ढूँढ ढाँढ (Search)

© इस ब्लॉग की सभी पोस्टें, कुछ छायाचित्र सतीश पंचम की सम्पत्ति है और बिना पूर्व स्वीकृति के उसका पुन: प्रयोग या कॉपी करना वर्जित है। फिर भी; उपयुक्त ब्लॉग/ब्लॉग पोस्ट को हापइर लिंक/लिंक देते हुये छोटे संदर्भ किये जा सकते हैं।




© All posts, some of the pictures, appearing on this blog is property of Satish Pancham and must not be reproduced or copied without his prior approval. Small references may however be made giving appropriate hyperlinks/links to the blog/blog post.