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Wednesday, July 14, 2010

मड़ैया-ए-हिन्द......पानी ठेलउवल .....खेतिहर देहात......मुस्की मारते प्रधानमंत्री......समर सेबुल........स्टेबलाइजर.... और मैं.........सतीश पंचम

    

         गाँव में अक्सर खेतों की रखवाली करने के लिए खेतों के पास ही मड़ैया आदि डालने का चलन है। छोटी सी मड़ई......एकाध बँसखट.....लालटेन। बस यही होता है ऐसी गँवई पाही के तहत। अब तो समर सेबुल ( एक तरह का पंपिंग सेट) का भी चलन आ गया है जिसमें कि मेन मोटर जमीन के भीतर गाड़ी जाती है और जमीन के उपर सिर्फ एक वोल्टेज कंट्रोलर के रूप में स्टेबलाईजर रखा होता है। आधुनिक पाही का एक जरूरी कल-पुर्जा।

  
      इन्हीं जरूरी कल-पुर्जों में से एक है प्लास्टिक की फोल्ड  पाइप.....जो कि खेतों में पानी पहुंचाने का काम करती हैं। जब इन पाइपों से पानी गुजरता है तो फूली पाइपें एकदम अजगर की तरह लगती हैं। लोग अब बरहा (पानी हेतु जमीनी नाली ) का उपयोग कम करने लगे हैं....क्योंकि उससे पानी का वेस्टेज बहुत होता है और जब तक पूरा बरहा भरने के बाद पानी आगे खेत की ओर बढे तब तक लाईट कट हो जाती थी.....चलो फिर से पानी ठेलने का इंतजाम करो....। इन प्लास्टिक की पाइपों को एक बार फैलाने की देर है.....उसके बाद तो सर्र से पानी यथास्थान पहुँच जाता है।  और कई कई बार तो किसी पाइप को यूँ ही दस बारह दिन तक फैलाए रखा जाता है.......खेती किसानी का काम है ही ऐसा। अब इसमें एक नुक्स यह है कि जहाँ जहाँ से यह पाईप गुजरती है वहां की फसल दब जाती है और जमीन पर एक लकीर सी बन जाती है। वहां कुछ उग नहीं पाता थोडे समय के लिए  और हरी भरी फसल के बीच पतली लकीर वाली पगडंडी को देख अजीब सा लगता है।  एक खेत का नाम तो मैंने ही गजनी खेत रख दिया है क्योंकि आमिर खान के गजनी फिल्म में सिर के उपर जिस तरह का कट मार्क है....ठीक उसी तरह का लकीर मार्क मेरे खेत में भी पाइप बिछी होने के कारण बन आया था।  सो गंवईं जीवन....चीजें यत्र तत्र फैली रहती हैं। कभी कभार चोरी-चकारी भी हो जाती है...पता चला किसी का पाईप कम पड़ रहा था तो यहीं से काट ले गया है.......।

 हाँ...तो बात हो रही थी पाही की....मड़ैया की........  चूँकि ऐसे स्थान घर से थोड़ी दूरी पर होते हैं तो ऐसे में इस तरह के स्थान अक्सर किसी न किसी किस्म के हल्के-फुल्के लम्हों को गुलजार करने के उपयुक्त स्थान हो उठते हैं। ऐसी ही गुलजार करती बतकही की गवाह है यह मड़ैया। इसीमें काशी का अस्सी किताब भी खोंसी हुई है। एक ऐसी किताब जिसका सस्वर पाठ केवल इसी तरह के एकांत स्थान पर किया जा सकता है। कुछ शब्द हैं ही इतने अश्लील कि उन्हें बोल-बोल कर पढ़ना बड़ी शर्मिंदगी दे जाता है।

  एक दिन इसी मड़ैया में हँसी-मजाक.....गोपन-गाथा...... गाँव में कहाँ क्या हुआ जैसी  बातों को अपने हमउम्र सखा......चचेरे भाई के साथ बैठ बतिया रहा था।  दुपहरीया में इसी मड़ैया में बैठ काशी का अस्सी का  सस्वर पाठ भी कर रहा था......बोल बोल कर .....थोड़ा मजे लेकर....। चचेरा भाई भी एक एक शब्द पर हंसी मजाक के बीच  थपोड़ी पीट रहा था हँस हँस कर......मैं भी मगन......क्या लिखा है काशीनाथ सिंह ने........एकदम गँड़उ गदर......

 किताब की एक बानगी देखिए कि..... बनारस के बेफिक्र अंदाज को बताते हुए काशीनाथ सिंह लिखते है  -

- जमाने को लौ* पर रख मस्ती से घूमने की मुद्रा आईडेंटिटी कार्ड है इसका...


- खड़ाउँ पहन कर पाँव लटकाए पान की दुकान में बैठे तन्नी गुरू से एक आदमी बोला- 


किस दुनिया में हो गुरू। अमरीका रोज रोज चाँद पर आदमी भेज रहा है और तुम हो कि  घंटे भर से पान घुलाए जा रहे हो।


 मोरी में पच् से पान की पीक थूक कर तन्नी गुरू बोले - देखौ...एक बात नोट कर लो। चन्द्रमा हो या सूरज...भोंसड़ी के जिसको गरज होगी, खुदै यहाँ आएगा। 


  तो ऐसी और तमाम साहित्यिक-असाहित्यिक टिटकारीयों का ठिकान रही है यह हरे भरे खेतों के बीच खड़ी मेरी  छोटी सी मड़ैया-ए-हिंद ।

 मेरी  इसी मड़ैया-ए-हिंद में रखा गया था लगभग आठ हजार की लागत का स्टेबलाईजर.....एकदम खुले में........कोई ताला नहीं......कोई रोक छेंक नहीं......कौन साला चुराएगा......। बेफिक्र.....जैसे हम वैसे ही वह स्टेबलाईजर।

  कल शाम जब गाँव में हाल-चाल लेने के लिए घर फोन किया तब पता चला कि परसों रात जब झमक कर बरसात हो रही थी.... तब खेत के बीचो बीच खुले में मड़ैया के नीचे रखे इस स्टेबलाईजर को कोई चुरा ले गया है। आठ हजार का फटका । गुस्सा तो बहुत आया। बारिश में पैरौं के निशान खोजने की कोशिश हुई लेकिन वह निशान सड़क पर पहुँच गायब हो गए हैं। वैसे भी रात भर बारिश हुई थी।

अब.....

     गाँव में खोज-खबर ली गई....किसी रामभरोसे नाम के युवक पर शक भी किया गया है कि इसी मे चुराया होगा.....पहले भी साईकिलें वगैरह चुराने का उसका रिकार्ड रहा है। क्या पता किसी और ने ही चुराया हो....। अब यह तो जाँच ओंच के बाद ही पता चल सकता है कि भई क्या गुल खिला है ।
 
   अब तो आठ हजार का फटका लग ही गया है। और इस फटके ने मुझे रात दिन न जाने किस चिंता में डाल दिया कि मैं सपने में भी स्टेबलाईजर देखता हूँ।

 अभी कल ही एक मौज को देख-सोच रहा था.......

 मैं देखता हूँ कि अपनी उसी मड़ैया-ए-हिंद में बैठा  हूँ ...... कुछ लिख-उख रहा हूँ..... कि अचानक  प्रधानमंत्री जी आ गए।.....प्रधानमंत्री..... इतनी बड़ी हस्ती .....मेरी मड़ैया में.....हैरत होना स्वाभाविक है। पूछने पर प्रधानमंत्री जी ने बताया कि भई  जिस तरह से पुराने जमाने में राजा लोग भेष बदल कर प्रजा का हाल जानने जाते थे तो मैं भी कुछ उसी तरह का काम कर रहा हूँ। बताओ.....तुम्हारा क्या हालचाल है....।

सुनकर मैं तो खुश हो लिया कि चलो......आज इस मड़ैया-ए-हिन्द के भाग भी जाग उठे.....कल को कोई मीडिया वाला चीखता हुआ कहेगा...... ध्यान से देखिए.... यही है वह मड़ैया.....मैं फिर से कहूँगा कि यही है वो मड़ैया जिसमें प्रधानमंत्री ने सतीश पंचम का हालचाल जाना......सतीश पंचम जी.....आप को कैसा लगा जब प्रधानमंत्री ने आपसे हालचाल पूछा.......।

 मैं बता ही रहा था कि प्रधानमंत्री जी ने मेरी तंद्रा भंग करते हुए कहा - अरे कहाँ खो गए.....हालचाल सुनाओ।

 मैं भी वापस लौटा......उफ्....क्या क्या सोचने लगा.....। प्रधानमंत्री जी सामने खडे हैं और मैं उनसे बात करने की बजाय मुंगेरी लाल की तरह सपने देखने लगा।

 खैर, प्रधानमंत्री को मैंने अपनी बंसखट पर बैठने का इशारा किया.......उसी बंसखट पर जो झूल कर इतनी ढीली हो गई थी कि लग रहा था मानों वह जमीन छूने को लालायित है.....कई रस्सीयां तो जमीन छू कर मानों कह रहीं थी कि हम अपनी खाद पानी यहीं से सोखती  हैं.....।

  बातों ही बातों में प्रधानमंत्री जी से मैं बताने लगा....यहां पर ही रखा था मेरा स्टेबलाईजर......बारिश की रात चोरी हो गया। अब आप ही बताइए कि..... क्या  यही है आपके कानून व्यवस्था की स्थिति। क्या इसी के दम पर भारत विकसित राष्ट्र की श्रेणी में आ जायगा।

    प्रधानमंत्री जी ने पहले तो मेरी बात ध्यान से सुना  फिर तनिक रूक कर  कहने लगे कि - देखो.....जहाँ तक कानून व्यवस्था की बात है तो यह संवैधानिक तौर पर राज्य का मामला है। इसमें केन्द्र दखल नहीं दे सकता। और जो विकास की बात कर रहे हो कि क्या यही है भारत का विकास....तो मेरा मानना है कि हाँ....इसे विकास ही कहना चाहिए कि पहले जहाँ दस बीस रूपये की खुरपी, सौ- सवा सौ का  कुदाल, झौआ, खाँची, हल वगैरह चोरी चले जाते थे अब उसकी जगह पर आठ हजार का स्टेबलाईजर चोरी हो रहा है.....यह एक तरह से विकास की ही निशानी है। 

 मैं चुप......सुन रहा था प्रधानमंत्री जी को....मेरे पूछे गए दोनों प्रश्नों का उन्होंने अच्छा जवाब दिया । अभी उस सोच से निकल भी नहीं पाया था कि प्रधानमंत्री जी ने मेरी ओर मुखातिब होते कहा - लेकिन यह बताओ कि तुमने अपना आठ हजार का स्टेबलाईजर ऐसे खुल्ले में क्यों रख छोड़ा था.....गलती तो तुम्हारी है।

 हाँ प्रधानमंत्री जी गलती तो मेरी है ही....लेकिन जब आपके कृषि मंत्री हमारे देश के हजारों टन गेहूँ को  खुले में रख उसे सड़ा रहे होते हैं तब तो आप को उनकी गलती नहीं दिखती। बंदरगाहों पर जगह नहीं मिल पा रही नई फसल  को रखने के लिए.....वहीं पर क्लियरेंस के चक्कर में तमाम अनाज खुले में सड़ रहा है....आप की भी तो इसमें गलती है।

 प्रधानमंत्री जी मेरी बात सुन कुछ और गंभीर से हो गए......। उनकी गंभीरता देख मैंने फिर अपने मन की बात उभारी। प्रधानमंत्री जी......मेरे यहाँ गाँव में एक छोटी सी दुकान है। मैं देखता हूँ कि उसका मालिक अपनी उस छोटी सी दुकान को संभालने में ही थेथरा जाता है....बिचारा सुबह से शाम उसी में लगा रहता है......कभी दुकान में सामान भरवाने की चिंता में वह शहर की ओर भागा जा रहा है तो कभी बाजार भाव जानने के लिए यहाँ वहाँ पूछ-पछोर लगाए हुए है।  मेरी समझ में यह नहीं आ रहा कि जब एक छोटी सी दुकान वाला आदमी एक दुकान को संभालने में इतना व्यस्त रहता है तो पूरे देश के कृषि मंत्रालय को संभालने वाला मंत्री कहां से इतना समय पा जाता है कि वह क्रिकेट को भी संभाल ले जा रहा है.....। 

- बात तो तु्म्हारी ठीक है....लेकिन क्या करें...गठबंधन की मजबूरियां हैं जो हमें कुछ करने से रोक रही हैं।

- हाँ...मुझे भी यही लग रहा है.....वरना आपके रेड्ड़ीज बंधूओं के द्वारा अवैध खनन मामले में तो अब तक आप एक्शन ले चुके होते......देश भी आपकी मजबूरियों को समझ रहा है।

- सच कहूँ तो इस देश के लोग ही असल मालिक हैं......वही हमारे सर्वे सर्वा हैं...यदि वह न समझें तो कौन समझेगा......।

- तो ऐसा कहिए न कि वह जनता ही है जो एक तरह से सजन के तरह है और सरकार सजनी की तरह......जो पल पल रंग बदल रही है।

- अब तो सजन कहो चाहे सजनी.......हालात तो मजबूरियों वाले ही हैं। सरकार भी मजबूर.....जनता भी मजबूर।

 प्रधानमंत्री जी की हताशा भरे स्वर को सुन मुझे लगा कि प्रधानमंत्री जी बहुत चिंतित हैं.....मजबूरी वाली चिंता।  अभी यह बातचीत और चली होती लेकिन किसी के रेडियो से आती आवाज से मेरी नींद खुल गई....। देखता हूँ कि कोई रेडियो बजाते हुए धीरे धीरे मड़ैया की ओर मुझसे मिलने चला आ रहा है......औऱ गाना बज रहा है -

 मेरे हाथों में नौ नौं चूड़ियाँ हैं.....थोड़ा ठहरो सजन मजबूरियाँ हैं :)

- सतीश पंचम

स्थान - लिखने का आज मूड़ नहीं है

समय- कुछ ठीक नहीं चल रहा....नहीं तो क्या मेरा स्टेबलाइजर चोरी होता...... ऐसे में क्या तो लिखूँ और क्या तो बताउं :)

( स्टेबलाईजर का पता आज चौथे दिन तक भी नहीं चल सका है......मिस्टर रामभरोसे पर शक तो जताया जा रहा है पर देखिए.....रामभरोसे जी कब भरोसा दिला पाते हैं...... मेरी 'मड़ैया-ए-हिन्द' सहित सभी चित्र मेरी ग्राम्य यात्रा के दौरान लिए गए हैं....स्टेबलाईजर का चित्र नेट से साभार )

( ग्राम्य सीरीज चालू आहे....)

15 comments:

Jandunia said...

शानदार पोस्ट

मो सम कौन ? said...

भाई जी, बात तो दुख की है, बाकी इत्मीनान रखें, कानून आना काम करेगा।
आज कमेंटियाने में भी मजा नहीं आ रहा।

Arvind Mishra said...

स्तैब्लायिजरवा त अब मिलई से रहा .. और बेखयाल रहज्जा .... मडवे तले के बाद पहली बार एक मडई तले आख्यान का लुत्फ़ ...सतीश पंचम के सपने ....और काशी की अस्सी ...बढियां सिम्फनी है गुरु ..क्या कामोद्दीपकता और गाली गलौज में कौनो तात्विक सम्बन्ध है ? मुझे तो लगता है नहीं ..हाँ इनमें पारस्परिक वैमनष्यता जरूर है ..टी ई गाली साली के बजाय कुछ मौलिक बात भी लेनी चाहिए थी ...गिरिजेश भाई शायद और अच्छी तरह से इक्स्प्लेंन कर पायें ...

अमरेन्द्र नाथ त्रिपाठी said...

गाँव के मड़िया में काशी का अस्सी पहुँच रहा है , समझिये टोला से लेकर गाँव तक की राजनीति पहुँच रही है . गाली स्वाभाविकता के साथ लिखना चाहिए था . * ( स्टार ) लगाने से लौ* की रौ नहीं आ पायी है . स्तेप्लाइजर तौ अब रामभरोसे ही गया . पी.एम. से बातचीत अच्छी लगी . सुन्दर पोस्ट !

गिरिजेश राव said...

अपनी असली जन्मतिथि मेल से भेजिए। मुझे पता करना है कि अपन एक ही राशि के तो नहीं ?
ब्लॉग जगत में ज्योतिषि - स्थैतिक, गत्यात्मक सब भरे पड़े हैं। किसी से तफसील से जँचवा लेंगे - नछत्तर वगैरह ...
हँसी हँसी में तीखी मौलिक मार! वार करना कोई आप से सीखे।

प्रवीण पाण्डेय said...

खराब लगा सुनकर। अच्छा हो कि मिल जाये।
कासी का अस्सी का कई बार सस्वर पाठ होता था, यात्राओं में।

वाणी गीत said...

एक बार फिर से सपना देखिये और इस बार सपने में भावी प्रधानमंत्री को ..शायद स्टेब्लायीजर मिल जाए ..
सड़ने वाले अनाज को कोई फेंका थोड़े ना जायेगा ...विद्यालयों की पोषाहार योजना में खप जायेगा ...

धारदार शानदार व्यंग्य ...सुन्दर तस्वीरें ...!

sajid said...

अच्छी पोस्ट

M VERMA said...

प्रधानमंत्री का तर्क मुझे तो ठीक ही लगा. यह तो प्रगति ही है कि स्टेबलाईजर चोरी हो रहा है.
राम भरोसे पर भरोसा करिये. देश तो भईया ऐसेही चलेगा.

ललित शर्मा said...

देश को दिल्ली के रामभरोसे ही चला रहे हैं, यही कानून उनसे आज तक नहीं उगलवा सका तो गंवई के रामभरोसे क्या उगल देंगे? ये भी इन्ही के चेले हैं।

कहीं देखिए आपका स्टेब्लाईजर किसी मंत्री विधायक के बंगले में तो सेवा नहीं दे रहा है।:)

बहुत करारी पोस्ट सतीश भाई

अभिषेक ओझा said...

बाकी सब तो ठीक लेकिन स्तैबिलाज़र ऐसे छोड़ियेगा तो चोरी तो होगी ही. और करिए लंठई :)

Shiv said...

क्या पोस्ट लिखे हैं..वाह ही वाह

प्रधानमंत्री तो अब सपने में ही दिखाई देते हैं....स्टेबिलाइजर का तो लम्बा फटका लगा लेकिन राम के भरोसे के अलवा कोई रास्ता नहीं है. बहुत खूब पोस्ट है...कहाँ से चलकर कहाँ से होते हुए कहाँ तक पहुँच गए. बहुत मज़ा आया पढ़कर.

ज्ञानदत्त पाण्डेय Gyandutt Pandey said...

स्टेबलाइजर में कितने पाउच आ जायेंगे? यह इस लिये कि चोरकट लोग किसी चीज को चुराने या उठाने में यही लॉजिक प्रयोग करते हैं।
प्रधान मंत्री जी इस समस्या (उठाईगिरी की) तभी टेकल कर सकते हैं, जब पाउच मन्हगा हो जाये और स्टेबलाइजर सस्ता। कृषि मंत्री यही करते हैं - अनाज को खुले में सड़ा कर उसे पाउच की तुलना में डी-वैल्यूड कर देते हैं।

प्रधान मंत्री जी अगर कुर्सी छोड़ने लगें तो कृषि मंत्री जी को वहां बिठा दिया जाये। पुरानी ख्वाहिश भी है!

सञ्जय झा said...

dadda ke post se dadda ke tippani tak' bari mark post bani hai.....

jai ho...

Summary said...

Stabilizer का insurance करा लेना चाहिए था ......

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