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Saturday, July 10, 2010

नील गोदाम.....सलामी......पत्रकार-फत्रकार.....भंभ ररती कोठी.... ललकारता देहात......सतीश पंचम


    फणीश्वरनाथ रेणू जी ने 'मैंला आँचल' में एक जगह पूर्णिया के नील गोदाम का जिक्र करते हुए लिखा है कि - जब भी  गाँव का कोई नौजवान बियाह के बाद गौना करवा कर अपनी दुलहिन लेकर लौटता था तो रास्ते में पड़ने वाले नील गोदाम के पास पहुँचते ही कहता था कि गाड़ीवान....गाड़ी को जरा धीरे हाँको....दुलहिन नील गोदाम का हौज और साहब की कोठी देखना चाहती है । सुनते ही दुलहिन थोड़ा सा घूँघट सरका कर ........ओहार हटा कर देखती ..... यहाँ तो इंटो का ढेर है...........कोठी कहाँ है......।

नौजवान कहता  - देखो, वह है नील महने ( मथने ) का हौज....।

  वही हौज जिसमें कि अंगरेजी राज ने भारतीय किसानों के लाल रक्त को नीले रंग में बदल डालने की जैसे कसम खाई थी। ......  अबकी गाँव जाने पर उसी नील महने के हौज के बगल से गुजरते समय नील गोदाम की तस्वीर खींच रहा था कि तभी एक शख्स पास आ कर खड़े हो गए।  पूछ बैठे......आप पत्रकार हो क्या ? 

 नहीं भई....पत्रकार फत्रकार कुछ नहीं हूँ.......बस गाँव आया हूँ.......यहीं बगल में आया था...... घूम घामते इस नील गोदाम के करीब आ गया......सो.... तस्वीरें इसलिए ले रहा हूँ.......।

 लेकिन मेरी समझ में यह नहीं आ रहा कि खंड़हर की तस्वीर में कौन चीज है जो आप इसे हींच रहे हैं। 

 बस ऐसे ही हींच रहा हूँ ......अच्छा लगता है.....। 

वो तो ठीक है.....लेकिन देख रहे हैं सब गाँव वाले हग-मूत कर खराब कर दिए हैं.........। सुबह आइए तो देखिए कि कैसे अंगरेज लोग को भारत वाले उनके ही नील गोदाम पर बैठ सलामी देते हैं। 


सलामी........ क्या बात कही......बातों ही बातों में नील गोदाम की तस्वीर खींचने लगता हूँ।  याद आता है कहीं कुछ पढ़ा हुआ कि ...... नील बनाने की प्रक्रिया के तहत नील की पत्तियों को इस पानी भरे हौज में डालकर सडाया जाता था......सड़ाने के बाद मथा जाता था और उसी दौर में निकलता था नील.......वही नील जिससे उठी ललकार ने भारत को पराधीन तंत्र से स्वाधीन तंत्र की ओर चलने हेतु अधीर कर दिया  ।

  तस्वीरें लेते समय मैंने ध्यान दिया कि नील गोदाम से ही सटा  है एक कुँआ........ जिससे कि पानी खींचकर नील मथने वाले हौज को भरा जाता होगा.......। कुँएं के मोटे-मोटे छूही ( घिरनी- स्तंभ ) को देख अंदाजा लगाता हूँ कि कितना सारा पानी इस कुँए से रोज खींचा जाता होगा । 

 नील गोदाम के बगल से सटी सड़क देख पता चलता है कि नील व्यापार के लिए  ही इस सड़क यातायात का समुचित प्रबंध किया गया होगा ताकि नील की फसल लिए बैलगाड़ीयों को नील गोदाम तक पहुँचने में आसानी हो और यहाँ से नील बाहर भेजी जा सके।
  
 उधर नील गोदाम का परनाला पहली ही नजर में कुछ  विशिष्ट किस्म का लग रहा है.....तीन मुहाने और तीनों अलग अलग आकार के.......  आस पास सटे हुए। 

  चंपारण में सन् 1917 में गाँधी जी ने नीलहे अंग्रेज अफसरों द्वारा किसानों से जबर्दस्ती तीन कठिया प्रणाली के तहत नील उगवाने का जमकर विरोध किया था .......तीन कठिया प्रणाली.....यानि कि  हर किसान को अपनी जमीन के 3/20 हिस्से पर नील उगाना जरूरी।

    इस प्रणाली को बनाए रखने के लिए..... नील  उगाने के लिए..... किसानों को नीलहे अंग्रेज अफसरों ने महंगे ब्याज पर कर्ज दिया........एक ओर अनाज की बजाय.......जबरी नील उत्पादन करवा कर शोषण.....दूसरी ओर   लिया हुआ कर्ज...... हालत यह थी कि एक बार लिया हुआ कर्ज गले की फांस बन कसता जाता.....कसता जाता....... ठीक हमारे वर्तमान में विदर्भ क्षेत्र के कपास उगाने वाले किसानों की तरह नील किसान भी छटपटाते रहते  । आज, फिर हालात वही है...... हमारे इन कपास उत्पादक किसानों को भी सरकार अच्छा खासा कर्ज दे रही है....खुलकर.....लेकिन यह कर्ज कब और कैसे लौटा पाएंगे किसान...... इसकी किसी को फिक्र नहीं है। फिक्र है तो उन सरकारी आँकड़ो की कि, जो सहायता राशि के नाम पर कागजों में चुप्पे से उतर आती है और रजिस्टरों में आराम फरमाती है.....यह कहते कि हमने तो गरीब किसानों की सहायता ही की है.......अब कोई और किसान आत्महत्या करे तो हम क्या करें............ सहायता राशि..........मरणोपरांत  कागज के फूलों में बदल जाती है।

   वैसे, नील युग का अवसान होने के कारणों में जहाँ एक ओर जर्मनी द्वारा नये किस्म के रासायनिक रंगों का अविष्कार था तो दूसरी ओर  1917 में चंपारण में गाँधीजी द्वारा चलाया गया नील आंदोलन........विरोध इतना तगड़ा था कि अंग्रेज पीछे हटने पर मजबूर हुए। बीरभूम, पाबना, खुलना आदि इलाके नील विरोध के मुखर क्षेत्र थे।   उधर जर्मनी के सस्ते और विविध रंगों ने भारतीय प्रणीली से बनने वाले नील के बाजार को ध्वस्त करना शुरू कर दिया दिया था .....धीरे धीरे नीलहे अंग्रेज साहबों की कोठियों पर भंभ ररने लगा........और एक वह भी समय आया कि नीलहे किसानों ने अपनी विजय पताका फहरा दी.............भारतीय स्वतंत्रता संग्राम का एक सफल युद्ध। 

  परंतु  वर्तमान में विदर्भ के कपास उत्पादक  किसानों की  जो हालत है...... कभी वही हालत नील की फसल उगाते किसानों की भी रही थी। उस समय संगठित विरोध का स्वर विदेशीयों के प्रति था........ अब .......अब किसका तो विरोध किया जाय और किसका समर्थन......कुछ समझ नहीं आता......। परिस्थितियां गड्डम गड्ड हैं........हमारी ही सरकार.....हमारे ही लोग.....लेकिन फिर भी किसानों की आत्महत्या रूकने का नाम नहीं ले रही। गरीबी, सहायता, मौत, मुआवजा......इस सब का कुचक्र चल ही रहा है......जो चीज पहले हो रही थी....अब भी वही हो रही है.....बस रंग बदल गया है......पैकिंग वही है.....।


 तनिक इन दो चित्रों को देखिए....एक में नील है......दूसरे में कपास ..... दोनों ही चीजों के बाँधने का तरीका एक समान ही है.......।  अगर हालात कुछ नहीं बयां करते हैं तो कोई बात नहीं.....लेकिन यह जालीदार पैकिंग तो बहुत कुछ बयां कर रही  है । नील भी उसी तरह पैक की जाती थी.....कपास भी।    

  अब चंपारण केवल बिहार में ही नहीं है.....भारत के हर राज्य में है.....। अफसोस, भारत में फैले इन तमाम  चंपारणों को चेताने के लिए......ललकारने के लिए कोई राजकुमार शुक्ल जैसा किसान नहीं है .......कोई गाँधी नहीं है....कोई ललकारता देहात नहीं है।


- सतीश पंचम


( ग्राम्य सीरीज चालू आहे......)

27 comments:

Arvind Mishra said...

वह नील की खेती पर एक प्रामाणिक दस्तावेज

गिरिजेश राव said...

मौलिक ब्लॉगरी का ज्वलंत उदाहरण। हाल में पढ़ी गई पोस्टों में सर्वश्रेष्ठ।
सत्ता के दलाल और असम्वेदनशील सुविधाभोगी नौकरशाह अंग्रेजों से भी गए बीते हैं। सबसे बड़ा अचरज है जन विरोध का अभाव। क्या यह माना जाय कि विरोध के स्वर मुख्य धारा से कट कर नक्सली रास्तों पर जाने को अभिशप्त हैं?
कहीं ऐसा तो नहीं कि शोषण के विरोध के नाम पर वहाँ भी कुछ लोग अपनी रोटियाँ सेंकने में लगे हुए हैं?
या यह मानें कि विरोध एक विशेष प्रकार के असंतुलन की स्थिति आने पर ही सक्रिय होता है और संतुलन आते ही समाप्त हो जाता है? सभी खुश - जो शोषित है वह भी खुश।
सत्ता के खिलाड़ियों को इस नब्ज़ गति का पता चल गया है और वे मरीज़ के साथ खिलवाड़ करते मजे लूट रहे हैं।
बहुत कुछ सोचवा दिया बन्धु! जब रिपोर्टिंग इतनी मौलिक हो तो ऐसा होता ही है

गिरिजेश राव said...

मुझे आश्चर्य होगा यदि चुनिन्दा ब्लॉगों के औसत दर्जे के लेखों पर भी बहस करते करते फेंचकुर फेंक देने वाले यहाँ से चुप निकल जायँ। कभी कभी लगता है कि हिन्दी ब्लॉगरी विपरीतलिंगी आकर्षण के भँवरजाल से अभी निकल नहीं पाई है।

वाणी गीत said...

अब चंपारण सिर्फ बिहार में नहीं ...भारत के बहुत से राज्यों में है ...
शासक आज भी शासक ही है , और प्रजा निरीह जनता ...
बस अब कोई गाँधी नहीं , सुभाष नहीं ...
हम सब एक जैसे सुविधा भोगी

जिस चंपारण में नील ने गांधीजी को आन्दोलन के लिए बाध्य किया , वही अंग्रेजों की गुलामी करने वाले राजा की पदवी से भी नवाजे गए ..

अच्छी रचनात्मक पोस्ट ..!

निर्मला कपिला said...

1917 में चंपारण में गाँधीजी द्वारा चलाया गया नील आंदोलन. इसके बारे मे बहुत कम जानकारी थी बस नाम सुना था। आपके ब्लाग से हमेशा बहुत कुछ अच्छा पढने को मिलता है। धन्यवाद ।

Jandunia said...

शानदार पोस्ट

महेन्द्र मिश्र said...

चंपारण में सन् 1917 में गाँधी जी ने नीलहे अंग्रेज अफसरों द्वारा किसानों से जबर्दस्ती तीन कठिया प्रणाली के तहत नील उगवाने का जमकर विरोध किया था .......तीन कठिया प्रणाली.....यानि कि हर किसान को अपनी जमीन के 3/20 हिस्से पर नील उगाना जरूरी...

बहुत ही जानकारीपूर्ण सरगार्वित रोचक आलेख .... काफी कुछ जानने का मौका मिला.....प्रस्तुति के लिए आभार.

अमित शर्मा said...

सारगर्भित और जानकारीपूर्ण लेख के लिए धन्यवाद ! आपकी हर पोस्ट में जानकारियों का खजाना भरा रहता है, चाहे ठेठ से लिखें या बंबई में बेठ के लिखें

Archana said...

hamesha padhkar chupke se nikal lete hain...kyunki kahne ke liye shabd kam pad jate hain......

har baar ki tarah.....behtarin
(aur pahli baar tippani ke liye aai to aye kya das barah kilo ka dhanyawaad kyun...hum aapko dete hain...hazar do hazar kilo ka dhanyawaad :)

अजय कुमार झा said...

आपकी पोस्ट ने और गिरिजेश जी की टिप्पणी ने अब यहां कहने लायक कुछ छोडा ही नहीं है । मौलिक ब्लॉगिरी का दस्तावेज़ी प्रमाण ...आपकी पोस्ट नहीं ...आपका ब्लोग ही ।

नील किसानों और कपास किसानों की एक जैसी दशा ने तो सोचने पर मजबूर कर दिया है कि क्या सचमुच ही आजादी को इतने वर्ष बीत चुके हैं ..??

अजय कुमार said...

विचारणीय लेख ,किसानों की किसे चिंता ,न तब न अब ।

अमरेन्द्र नाथ त्रिपाठी said...

सतीश जी ,
वाह .. कुछ लोगों का भारत नोयडा से से गुडगाँव तक होता है , ख़ास क्लास में , अंगरेजी की चमक-दमक में , देवनागरी - हिन्दी को भी अंगरेजी के मिनी - स्कर्ट में पेश करते हैं .. जिसके लिए बाकी 'कैटल क्लास' है .. लेकिन आपका भारत तो गांवों में बसता है , सोंधी महक है , व्पापक यथार्थ है , जिन्दगी के रंगीन महीन धागे हैं , इतिहास है , भूगोल है , और इन सबमें है एक पूर्ण जीवन का आग्रह ..

स्थिति कुछ ख़ास नहीं बदली है , नोयडा से गुडगाँव वाला भारत जरूर बदला है पर असली भारत वहीं खडा है जहां राजकुमार सुकुल जैसे किसान और महात्मा गांघी जैसे राजनेता छोड़ के चले गए थे , इस भारत को परिवर्तन की जरूरत है . राजनीतिक इच्छाशक्ति नेताओं की चौपट हो चुकी है . लगता ही नहीँ कि आजाद जैसा कुछ है मुल्क में . सही कहा आपने पैकेजिंग बदली है बस . कथाकार प्रेमचंद ने कब का ही भविष्य लिख दिया था - '' 'जॉन' की जगह 'गोविन्द' बैठ जायेंगे '' . इतना ही बदलाव हुआ है . सतीश जी , बेहतरीन पोस्ट है , गिरिजेश जी के कहने में कोई अतिशयोक्ति नहीँ है !

@ मुझे आश्चर्य होगा यदि चुनिन्दा ब्लॉगों के ............. भँवरजाल से अभी निकल नहीं पाई है।
राव साहब , नैसर्गिक वैपरीत्य का काल है , भ्रमर कुमुदिनियों पर जा रहे हैं , भंवर/भ्रमर-जाल बन रहा है , एक कुमुदिनी एक भौंरे को चार कवर में खा रही है = टीपों की संख्या सौ जा रही है ! , और बात = नौ दिन चले अढाई कोस ! फिर भी भंवर जाल का अपना मजा है ही ! छुटाले न छुटाला !

राज भाटिय़ा said...

नील बनाने की विधि आज मालूम हुयी, इन साले अग्रेजो ने हमे खुब सताया है, लेकिन जनता आज भी इन्हे सलम करती है, यह कामनबेल्थ गेम असल मै क्या है? इन हरामी अग्रेजो की चमचा गिरी ही तो??हम कब जागेगे. आप की रिपोर्ट ने यानि इस लेख ने आंखे खॊल दी बहुत सुंदर ओर अच्छा लगा. धन्यवाद

शोभना चौरे said...

सतीशजी
बिलकुल अलग हटकर पोस्ट और वह भी प्रमाणिक दस्ता वेजो के साथ |girijeshji ki bat se shmat .
आपको एक ताजा anubhav btati hoo abhi 20 -25 din phle ganv घर जाना हुआ था बोवनी के लिए बीज खरीदे थे soyabeen के सरकारी|बोवनी hui 8 din tak koi ankur nahi kreeb 100 aikad bhumi me .अलग अलग kisano ki bhumi थी |
fir se khet ko taiyar kiya और jo ghar के rakhe huye बीज थे unhe boya और ishvar ki krapa se unme ankur fute hai .
han ab ganv के log jag gye hai ikthha hokar srkar se सबंधित अधिकारियो की शिकायत की है |देखो क्या होता है |
आपकी पोस्ट ने हमारी गुलामी मानसिकता को उजागर कर दिया है |
आभार

मो सम कौन ? said...

सतीश जी,
आपकी पोस्ट हमेशा ही मन को उद्वेलित कर जाती हैं, और इस पोस्ट ने भी वही काम किया है। सरकारी पाठ्यक्र्म में नील हो या नमक, इन आंदोलनों का जिक्र किसानों और जनता के शोषण को कम और गांधीजी के महिमामंडन को ज्यादा बखानता है। आप तो स्वयं जमीन के आदमी हैं, शेष लोगों के बारे में सोचिये कि उन्हें इस सब की जनकारी भी नहीं मिल पाती है। मुझे खुद चूंकि बचपन से ही पढ़ने का शौक रहा, बंगाल और बिहार के कुछ साहित्यकारों ने इस विषय पर जो लिखा, उसकी चर्चा भी यदि साथ के लोगों से की तो उन्हें हैरानी होती थी कि नील की भी खेती होती थी और इसमें भी इस दर्जे का शोषण होता था।
आज के दौर की बात करें तो मुझे लगता है कि कागजों में ही योजनायें बनती हैं, छूट-सब्सिडी जैसी चीजों का लाभ सरकारी अमला, राजनीतिज्ञ और समर्थ वर्ग उठाता है,और जो डिज़र्विंग हैं और जिनके लिये यह सब ड्रामा किया जाता है वही इससे वंचित रह जाते हैं। और इस वर्ग का बने रहना बहुत जरूरी है भी, यह वर्ग नहीं रहेगा तो यह खेल चलेगा कैसे, किसके नाम पर?

Shiv said...

सबकुछ गड्डमड्ड है. किसान अब किसान नहीं रहे...गाँव अब गाँव नहीं रहे...देहात अब देहात नहीं रहे. कारण है कि उन्हें बड़े ही सलीके से ध्वस्त कर दिया गया है. आपकी पोस्ट शानदार है. हमेशा की तरह टिप्पणी के द्वारा कहने के लिए कम से कम मेरे पास कुछ नहीं होता.

ग्राम्य सीरीज हिंदी ब्लागिंग के लिए धरोहर साबित होगी. आपके द्वारा इस्तेमाल किये गए शब्द, जैसे छूही.., कोठियों पर भंभ ररने लगा..कहाँ मिलेंगे पढने को?

ललित शर्मा said...

नील की खेती किसानों से कराकर उनका शोषण अंग्रेजों द्वारा करने के विषय में पढा था। आज आपकी पोस्ट में नील के कारखाने का सचित्र वर्णन भी पढ लिया।
ये सही की उस समय नील की खेती किसानों के लिए गले की फ़ांसी बन गयी थी।

एक चम्पारण हमारे इलाके में भी है।

प्रवीण पाण्डेय said...

नीले खून को लाल करने में अब सदियाँ निकल जायेंगी, लगता है ।

Kunal Verma said...

आपने जो ग्राम्य जीवन की चर्चा की वो बहुत ही अच्छी लगी।

rashmi ravija said...

हमारी ही सरकार.....हमारे ही लोग.....लेकिन फिर भी किसानों की आत्महत्या रूकने का नाम नहीं ले रही। गरीबी, सहायता, मौत, मुआवजा......इस सब का कुचक्र चल ही रहा है......जो चीज पहले हो रही थी....अब भी वही हो रही है.....बस रंग बदल गया है......पैकिंग वही है.....।

इतना दुखद है...कहीं कुछ नहीं बदला...

ललकारने के लिए कोई राजकुमार शुक्ल जैसा किसान नहीं है .......कोई गाँधी नहीं है....कोई ललकारता देहात नहीं है।
कितना शर्मनाक है यह सब....और हम बस एक खबर की तरह पढ़कर दूसरे पल ही भूल जाते हैं.

सिद्धार्थ शंकर त्रिपाठी said...

यह विडम्बना ही है कि जिस विदर्भ क्षेत्र में गांधी जी ने सेवाग्राम आश्रम स्थापित किया और अपने जीवन के उत्तर काल में (१९३४ से १९४२ तक) इसी स्थान में रहकर अपने विचारों की प्रयोगशाला चलायी उसी क्षेत्र के कपास किसान आत्महत्या करने पर मजबूर हैं। वह भी जब देश और प्रदेश की सरकार उन नेताओं के हाथ में है जो गांधी जी के जायज उत्तराधिकारी बने फिरते हैं।

विदर्भ के किसानों की हालत खराब करने वाले कोई विदेशी अंग्रेज नहीं बल्कि इसी देश के नौकरशाह, वित्तीय संस्थाएं, बैंक, व्यापारी व उद्योगपतियों का धुर्त गठजोड है।

दीपक 'मशाल' said...

बेशक एक बहुत ही बेहतरीन आलेख.. नील और कपास की तुलना कर आपने आँख खोलने का काम किया है..

अनूप शुक्ल said...

बहुत सुन्दर लेख। रिपोर्ताज। ललकारता लेख। फ़टकारता रिपोर्ताज। जय हो।

Sanjeet Tripathi said...

sabse pahle muaafi, der se yaha pahuchne ke liye, pichhle kuchh dino se aisa vyast hu ki aapki bahut si post nahi padh paya hu aapki. aise hi baith kar dhire dhire padhta jaunga.

aapki yah jivant aur vaicharik report aur us par girijesh jee ka comment, dono hi yatharth hain,

aapki is post se na keval kuchh naya jan ne ko mila balki aapka samsamyik sandarbh me dard bhi ubhar kar saamne aaya hai.

aapke is kathan se ki "अब चंपारण केवल बिहार में ही नहीं है.....भारत के हर राज्य में है.....। अफसोस, भारत में फैले इन तमाम चंपारणों को चेताने के लिए......ललकारने के लिए कोई राजकुमार शुक्ल जैसा किसान नहीं है .......कोई गाँधी नहीं है....कोई ललकारता देहात नहीं है।"

asehmat hone ka koi karan hi nahi hai.....
fir pahuchunga aapke blog par hamesha ki tarah der se hi sahi lekin aana to hai hi yahan

Udan Tashtari said...

नील की खेती..नई जानकारी..गजब लेखन...आभार.

बेचैन आत्मा said...

अभी तक पढी सभी पोस्ट से बेहतरीन...
रोंगटे खडे कर देने वाली अभिव्य़क्ति.
कहाँ से उठाया और कहाँ लाकर पटक दिया..! सोचता हूँ मीडिया, पत्रकारिता का ध्यान इस और कब जायेगा ..!

सतीश पंचम said...

सूचनार्थ अपडेट - अब यह नील गोदाम तोड़ा जा चुका है। इसकी सिर्फ चंद तस्वीरें बची हैं जिन्हें इस पोस्ट पर देखा जा सकता है। इस पर ताजा पोस्ट का लिंक यह रहा -

http://safedghar.blogspot.in/2016/05/blog-post_22.html

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