सफेद घर में आपका स्वागत है।

Sunday, June 27, 2010

नदी तीरे का रास्ता....कोलतार वाली सड़क.....गँवई पूछ-पछोरन.....घिरती बदरी.....और मनोज मिश्र जी संग हुई एक गँवई ब्लॉगर बैठकी........सतीश पंचम

          जौनपुर के एक गाँव में.........गोमती नदी के  किनारे एक नाव में खडा होकर नाव खुलने का इंतजार कर रहा हूँ........ सवारी लेकर नाव खुलने की तैयारी में है. .....शाम का समय .........दोपहर तक तपिश लिए लू चलने के बाद अब जाकर कुछ ठंडी हवा चल रही है..... देखते देखते .नाव वाले ने नदी किनारे से लगी रस्सी खोल दी..... कि........   तभी किसी की आवाज सुनाई दी......रोक के........हो..... ......रोक के......।

    नाव वाले ने एक नजर किनारे पर दौडाई और इत्मिनान से कहा  .........बढ़े आओ।

     और तभी नाव में सवार लोगों ने देखा कि सिर पर सफेद  गमछा रखे एक उम्रदराज शख्स सरपत की ओट से चला आ रहा था......इत्मीनान से.....धीरे धीरे। नाव में सवार एक शख्स ने चुहल करते  कहा - अरे जल्दी आओ ......धीरे धीरे आ रहे हो.....मालूम पड़ता है चौके पर बैठने जा रहे हो......चौके पर बैठना यानि विवाह करने के लिए मंडप में जाने वाली प्रक्रिया । नाव में सवार बाकी लोग मुस्करा दिए......। आने वाले शख्स की उम्र होगी करीब पचास के आसपास .........उसने पास आते आते ही जवाब दिया.....चउके पर खुद  तो नहीं....लेकिन दूसरे को बैठवाने का इंतजाम जरूर करके आ रहा हूँ.......।
  
       सुनकर नाव में बैठे उसी शख्स ने फिर चुहल की - अरे तनिक हमरौ अगुआ बन जा.....हमरौ बियाह करवाय द .......। तब तक आने वाला शख्स नाव में चढ़ आया था.....हँसते हँसते उसने कहा ......अरे तुमसे कौन बियाह करेगा.....न घर न  ठेकान......न आगे कोई..... न पीछे कोई......। ऐसे तैसे को कौन अपनी लडकी देगा....मैं तो इस तरह के ब्याह में अगुअई नहीं करूंगा.....बात बता दूँ साफ।

      पता चला कि यह जनाब शादीराम घरजोड़े टाईप जी हैं....यत्र तत्र अगुआ बने घूमते रहते हैं........लड़की का विवाह.....लड़के का विवाह......लड़की बीएड है.....लड़का बीटीसी में हो गया है.......फलानें की नौकरी लग गई है....फलांने का घर दुआर अच्छा है.......जैसे जुमलों के चलते....अगुवई के चलते कई गाँव तक प्रसिद्ध हैं जनाब  और उसी का प्रताप था कि नाव वाले शख्स उनसे चुहल कर रहे थे और वह भी इस मजाक का जमकर उत्तर दे रहे थे। एक तरह से इन्हें आप चलते फिरते मैट्रीमोनियल कह सकते हैं :)

  तो मैट्रीमोनियल जी के आते ही नाव चल पड़ी....लेकिन नाव चप्पू की सहायता से नहीं, एक लोहे के तार और एक बांस के सहारे से चल रही है । नदी को पार करने के लिए दोनों किनारों पर  आमने सामने जोड़ते हुए एक तार का इस्तेमाल किया गया .....उसी तार में लगे छल्ले और रस्सी के जरिए नाव  को नदी के इस किनारे से उस किनारे तक एक सीध में रखा जाता है और नदी की तलहटी में बाँस गोदकर आगे की ओर नाव को ठेला जाता है।

   लोहे की तार ......एक तरह का जुगाड़ .........जिसके बारे में  मनोज जी  ने बताया कि इस तरह के नदी के बीचो बीच तार बाँधने पर अदालत ने रोक लगा दी है क्योंकि इसकी वजह से कई हादसे हो चुके हैं। होता यह है कि लोहे के तार के सहारे नाव को एक किनारे से दूसरे किनारे तक एक सीध में जो़ड़ दिया जाता है,  लेकिन तेज बहाव या तेज हवा में नाव अपना स्वाभाविक फ्लोट नहीं बना पाती और ऐसे में एक ओर तार से जुड़े होने के कारण नाव के उलट जाने का खतरा रहता है। 

  तो इसी जुगाड़ वाली नाव से मैं जा रहा था नदी के उस पार एक बारात का हिस्सा बनकर......और बारात भी मेरी ससुराल के पास ही एक घर में ही जा रही थी... भतीजे का विवाह वहीं पास ही तय हुआ था ......सो जाहिर है, सुसराल विजिट भी होना था। 

   बारात वारात जो किए सो किए....अगले दिन चली चला की बेला पर मैंने मनोज जी को फोन किया......... जो कि मेरी ससुराल से करीब चार किलोमीटर की दूरी पर ही रहते हैं।  इतने करीब आकर बिना मिले कैसे चला जाता.....सो फोन घुमा दिया।  

 जब मैं बनारस में अरविंद मिश्र जी से मिला था, तब उसी समय उनके छोटे भाई मनोज जी  से भी  बात हुई  और तय हुआ कि अबकी गाँव जाकर उनसे जरूर मिलूंगा । एक छोटी सी गँवई ब्लॉगर बैठकी का आयोजन। 

   तो साथियो,  इन्ही मा पलायनम् वाले श्री मनोज मिश्र जी से मिलने निकल पड़ा जिनकी कई दिलचस्प पोस्टों से आप परिचित ही हैं.......जमैथा वाले खरबूजा वाली रिपोर्टिंग हो या अपनी टिप्पणी में चच्चा की देशज पंक्तियां  ब्लॉगजगत के सामने पेश करने की बात हो, हमेशा ही अपने अनोखे और सधे अंदाज में रिपोर्टिंग करते हैं मनोज जी,

 सरकारी नौकरी के महात्म्य को व्यंगात्मक ढंग से दर्शाती उनकी एक टिप्पणी की बानगी देखिए - 

 देश बरे की बुताय पिया - हरषाय हिया तुम होहु दरोगा ( देश जल कर राख हो जाये या बुझे; मेरा हृदय तो प्रियतम तब हर्षित होगा, जब तुम दरोगा बनोगे!)

   तो इन्हीं मनोज जी से मिलने मैं जा रहा था....सुबह -सुबह.....ठीक बारात की विदाई की बेला पर जब आंगन में दूल्हे को बिठा कर वधू पक्ष की ओर से तमाम पंखी, बेना, खिलौना, नोटों का हार वगैरह दूल्हे को पहनाया, चढ़ाया जा रहा था...दुल्हन की सखियों की ओर से दूल्हे के चेहरे पर मजाक मजाक में हल्का सा दही वगैरह चपोड़ा जा रहा था....और एक नए किस्म का मजाक देखा जिसमें स्प्रे फोम वाली बोतल के जरिए....दूल्हे पर फोम स्प्रे कियाजा रहा था.....दूल्हे के अगल बगल बैठे  दो चार लोग भी इस हंसी ठिठोली का शिकार हो रहे थे.....बार बार उन लोगों को एक तौलिए से दूल्हे का चेहरा वगैरह पोंछना पड़ रहा था..........मुरेरी गई करारी नोट....कल्ले से दूल्हे के जेबा में पहुंच रहा था.....चोरउथा.....। 

   ऐसे ही चला-चली की बेला-कार्यक्रम के दौरान मैंने अपने श्वसुर जी से कहा कि एक मित्र रहते हैं यहीं करीब, उनसे मिलकर आता हूँ....। उन्होंने एक युवक को मेरे साथ मोटर साईकिल पर भेज दिया जो कि वहीं गाँव का ही निवासी था।

          जिस वक्त मैं चला उस समय सुबह के करीब आठ ओठ बजे होंगे....गर्मियों में वैसे भी जल्दी पांच बजे ही वहां उजाला हो जाता है, फिर अब तो आठ बज रहे थे। धूप धीरे धीरे चोन्हा मारने लगी थी......लेकिन रह रह कर बदरी भी यहां वहां दिख जाती थी। रास्ते की सुंदरता पर मोहित मैं पीछे बैठा उस युवक से रह रह कर बातचीत भी करता जा रहा था......। हरियाली के बीच काली कोलतार वाली सड़क पर मोटर साईकिल से चलते हुए जाना वैसे भी मुझे बहुत अच्छा लगता है ।

  रास्ते में कहीं पर भैंस रास्ता काटती मिल जा रही थी तो कहीं गाय....कहीं कहीं कुकुर भी थे। यहां मैंने अक्सर देखा है कि जब कभी आप गाँव की सड़क पर चले जा रहे हों तो कुछ कुत्ते अक्सर आपको सड़क के आसपास विचरते मिलेंगे। उनकी भाव भंगिमा देखने पर लगता है मानों वह किसी का पता बताने के लिए खड़े हों।  अब कभी आप गाँव वगैरह जांय तो इन गंवई सड़क छाप कुकुर प्रजाति का एक बार जरूर निरीक्षण करें....उनके चेहरे और बॉडीलैंग्वेज से आपको एक किस्म की शालीनता टपकती दिखाई देगी.....जो शायद शहरी कुकुर में न मिले। शालीनता से तात्पर्य    उनके चाल- ढाल और मूक वार्ता से है....वरना अगर एक बार आप किसी को छेड़ भर दो, इससे पहले कि कुकुर कुछ बोले, समूचा गाँव जुट लेगा और आप पर ऐसे ऐसे व्यंग्य बाण छोड़े जाएंगे कि लगेगा कुकुर जी भी  कुछ बोलते तो अच्छा था :)

 कोई कहेगा - बैठे हैं मोटर साईकिल पर तो जैसे इनका रंग ही नहीं मिल रहा है....बाबू साहेब...... जंबो जट चलाय रहे हैं.....तो कोई कहेगा....अरे तनिक देख कर चलाओ.....कुकुर है तो क्या लेकिन तुमसे समझदार है....कम  से कम सड़क के एक ओर ही तो खड़ा है.....और एक तुम हो..... जो सड़क के बीचो बीच चले जा रहे हो.....पता नहीं कौन गाड़ी छूटी जा रही है।

     और गाँव की महिलाएं....उफ्....उनके व्यंग्य बाण झेलना तो ब्रम्हा को भी मंजूर न हों.....हाथ चमका बमका कर कहेंगी  - देख नहीं रही हो......फतुल्ली पहन कर , चसमा ओसमा लगाय के ससुरारी जा रहे हैं.......कहो तो असवारी भिजवाय दूं  :)

  खैर, अभी सुबह का समय था और मौसम भी कुछ खुशगवार हो चला था....आसमान में बादलों की दलबंदी होने लगी थी......। देखते ही देखते चार किलोमीटर कब खत्म हुए पता ही न चला। मनोज जी ने बताया था कि बाग के पास ही दुतल्ला मकान है..... पूछते पछोरते पहुँच गया। मनोज जी अपने बाग में ही मिल गए। मस्त पुरूवा हवा चल ही रही थी, लेकिन पुरूवा का चलना और बिच्छू का डंक याद आना अब स्वाभाविक सी बात हो गई है मेरे लिए।

   इधर  मुझे हाल ही में बिच्छू ने डंक मारा है यह बात मनोज जी जानते थे, सो पहुंचते ही पूछे कि अब पैर का हाल क्या है। मैंने बताया कि अब तो ठीक हूँ... कोई दिक्कत नहीं है.....अभी बातचीत चल ही रही थी कि सामने ही एक बेहद उम्रदराज शख्स दिखा जो वहीं बाग में काम कर रहा था। मनोज जी ने उस शख्स की तरफ इशारा करते हुए बताया कि इन्हें कम से कम बीस बार बिच्छू ने डंक मारा होगा.....मुझे तो सुनकर ही झुरझुरी होने लगी कि अभी हाल ही में एक बिच्छू के डंक से मेरी हालत पतली हो गई और इस इंसान को बीस बार....।

  उस मजदूर को मनोज जी ने आवाज देकर बुलाया......। पूछने पर कि कैसा लगता है तुम्हें बिच्छी मारने पर तो   बंदे ने कहा कि  ऐसा लगता है जैसे करेंण्ट मारा हो बस......इससे ज्यादा कुछ नहीं.....वही थोड़ा दरद ओरद होता है बसस्।  सुनकर मेरा हैरान होना लाजिमी था....थोड़ा सा दरद.....उफ्....कैसा करेर है ये बंदा।

  इसी बीच बाग में ही पेड़ों की लहलह के बीच मिठाई और पानी मंगाया गया। जलपान कर तृप्त हुआ ही था कि मनोज जी ने कहा, चलिए घर पर चला जाय वहां इत्मिनान से बातें हों।

 हम लोग बतियाते हुए बाग से घर में जा बैठे और शुरू हुई ब्लॉगिंग पर चर्चा।  तमाम ब्लॉगों की चर्चा आदि के दौरान मैंने एक बात नोटिस की कि मनोज जी भी ब्लॉगजगत की जूतमपैजार से क्षुब्ध हैं .....एक तरह की बेसिर पैर और लफ्फाज टाईप ब्लॉगिंग से वह व्यथित नजर आ रहे थे .....गुटबाजी....अनामी...सुनामी...तमाम तरह के वाद उन्हें भी बेहद नापसंद हैं।  

  अभी यह बातचीत चल ही रही थी कि पानी में डुबोए हुए बाल्टी भर आम सामने रख दिए गए।

 अब....

           एक एक कर हम लोग आम चिचोरते रहे और ब्लॉगिंग पर बातें करते रहे।   इसी बीच जिक्र हुआ अरविंद जी का कि वह अक्सर किसी मुद्दे पर बिना किसी लाग लपेट के सीधे अपनी बात रखते  हैं और नतीजतन लोगों के कोपभाजन का शिकार हो जाते हैं .....जबकि कई लोग सीधे सीधे टक्कर न लेकर जाने दो यार....छोड़ो....वाली शैली अपनाते हैं और इसी वजह से कई लोगों की गुडी गुडी छवि बनी रहती है जबकि अरविंद जी अपनी स्पष्टवादिता के चलते छवि-फवि की चिंता ही नहीं करते....... जो है जैसा है....कह दो।

         यहाँ मुझे लगा कि..... हाँ.....हम  ब्लॉगर भी ब्लॉगजगत में अपनी छवि को लेकर चिंतित रहते हैं.....यह बात सच है। और सिर्फ ब्लॉगजगत ही क्यों.....हम अपने घर, पास पड़ोस में भी एक छवि के दायरे में रहना पसंद करते हैं। मैं अपनी बात कहूँ तो मुझे FM  वगैरह सुनना पसंद है....रास्ते में जाते हुए या सफर करते हुए मैं कानों में इयर फोन डाले रहता हूँ....संगीत के मजे उठाता रहता हूँ। लेकिन जब भी अपने बिल्डिंग की सीढ़ियां चढने लगता हूँ....मैं अपने इयरफोन आदि निकाल कर अपनी जेब में रख लेता हूँ........ यदि बच्चे मुझे देखेंगे कि पापा गाना सुन रहे हैं......टाईम पास कर रहे हैं तो हो सकता है कि वह मेरी  देखा-देखी  पढ़ाई की तरफ ध्यान न देकर गाना वगैरह सुनने में कुछ ज्यादा समय लगाएं......मेरे गाना सुनने की आदत से मुझे अगंभीर मानें जो कि मैं नहीं चाहता..... बच्चों के सामने एक किस्म की गंभीरता ओढ़ना मैं अपनी मजबूरी समझता हूँ....हो सकता है कई लोग मुझसे सहमत न हों.....लेकिन यह मैं करता हूँ......।

   अभी आम का दौर चला ही था कि फिर दही में डुबोए और एक तरह से उतप्पा टाईप एकदम मस्त डिश आई। उसका भी मजा लिया गया। चाय पी गई...... बातें तो खैर चल ही रही थीं। तभी मनोज जी ने अपनी माताजी से, श्रीमती जी से भेंट मुलाकात करवाई.......माताजी पास आकर बैठीं........ पैलगी हुई....कुछ चीन्ह पहचान वाली बातें हुईं और उन्होंने बताया कि वह भी पहले मुंबई में रह चुकी हैं। बातचीत के दौरान ही पता चला कि उनकी रिश्तेदारी मेरे गाँव के पास ही है और मेरे इलाके  से अच्छी तरह वह परिचित भी हैं।

 इसी बीच मनोज जी ने यादगार के तौर पर एक सुंदर कलम भेंट की।  उधर  मुझे रह रह कर कई फोन आ रहे थे.....बारात वापसी के लिए निकल चुकी थी.....नदी पर लोग जमा हो रहे थे उस पार जाने के लिए .........उधर भाई साहब पूछ रहे थे कि कहां हो......कब तक आ रहे हो ........... यह कहने पर कि जल्दी ही बस थोड़ी देर में निकल रहा हूँ...... मुझे वापस लेने के लिए एक दो जन मेरी ससुराल में ही रूक  गए। 
  
  दरअसल मैं गाँव के टेढ़े मेढ़े रास्तों पर बहुत जल्दी भटक जाता हूँ और गाँव वालों से पूछने पर कि फलां जगह  जाना है कैसे जाउं तो उनका सीधा जवाब होता है कि बस इधर ही तो है...चले जाईए गाते गाते.....और उनका इधर ही तो है..... इतना लंबा रस्ता होता है कि खत्म ही नहीं होता.....। 

     इधर लौटानी के समय मनोज जी ने मुझे पहुँचाने के लिए अपनी गाड़ी निकाली.......उनकी गाड़ी का नंबर 7200 बड़ा आकर्षक लगा.....बाद में चर्चा के दौरान मनोज जी ने बताया कि उनकी सभी गाड़ियों के नंबर में नौ अंक की प्रमुखता है....किसी की 9090 है तो किसी का कुछ.....लेकिन जोड़ने घटाने पर 9 का ही अंक आता है ।  

         मैं सोच रहा हूँ किसी दिन अगर मनोज जी अपनी गाड़ी से किसी गँवई कुकुर वगैरह को थोड़ा सा धक्का आदि देकर निकल लिए तो ...... अगली बार जब कभी यह गाड़ी उस कुकुर के सामने पड़ेगी तो किसी और की गाड़ी पहचाने या नहीं..... मनोज जी के इस 7200 वाले आसान  और याद रखने लायक नंबर देख कर जरूर पहचान जाएगा कि यही गाड़ी है जिसने उसे धक्का मारा था....संभवत मनोज जी को वह  दौड़ा भी ले :)   

    तो इसी गाडी से मैं और मनोज जी निकल पड़े थे.....तभी संजोग देखिए कि  अचानक ही गिरिजेश जी का लखनऊ से फोन आया.......कहां हो.....कैसे.....और बात चल पड़ी.....। इसी बीच बातचीत के दौरान हम लोग गलत सड़क पर चले गए .....वहीं.....एक गांव वाले से पूछा कि यह रास्ता वहां जाता है क्या तो उसने भी हामी भरी कि हां जाता है......लेकिन मनोज जी को थोड़ा आगे जाने पर अंदेशा हुआ कि शायद यह गलत रास्ता है.... उन्होंने किसी से फोन पर कन्फर्म किया और गाड़ी मोड़ दी गई......दूसरा रास्ता पकडा गया.......अब मेरा पक्का विश्वास हो गया है कि किसी गाँव वाले से रास्ता पूछने पर अतिरिक्त सावधानी बरतनी चाहिए.....जो रस्ता गाँव वाले के लिए सीधे सीधे हो....वह समझ जाना चाहिए कि उस रास्ते का  टेढ़ा होना निश्चित है  :)


  आगे जाकर मुझे वह सड़क के दोनों ओर स्थित बेहया वाला रास्ता दिखाई दिया जहां पर कि पिछली रात में द्वारपूजा के दौरान फूहड़ और बेहयाई वाले गाने डीजे पर जोर शोर से बजाए जा रहे थे....कभी कोई गाने में जीन्स ढीला करने की बात की जा रही थी तो किसी में..... किस्स देबू का हो..... की बात की जा रही थी।  मैंने जोड़ मिलाया कि यही वह रास्ता है जिस पर रात में बेहयाई वाले गीत बज रहे थे और सड़क के दोनों किनारो पर बेहया के पौधे हिलोर मार रहे थे।   

  इधर  देखते देखते मेरी ससुराल आ गई। गाडी सडक पर खड़ी कर हम लोग बात कर ही रहे थे कि तभी मेरे श्वसुर जी आते दिखे....उन्हें देख मनोज जी ने कहा -  अरे, इन्हें तो मैं पहचानता हूँ.......। 

 क्या ? 

 हां इन्हें तो मैं अच्छी तरह से पहचानता हूँ। 

 मेरे आश्चर्य का ठिकाना नहीं ...........वाह रे इंटरनेट.....तेरी छवि न्यारी......संबंधों के अथाह सागर को अभी यह इंटरनेट न जाने अभी और कितने परिचय से जोड़े...... ।   बातचीत के दौरान पता चला कि मनोज जी के पिताजी से मेरे श्वसुर जी के अच्छे ताल्लुकात रहे हैं और संभंवत वह मेरे विवाह में अठारह साल पहले शामिल भी थे......संबंध...परिचय.....इंटरनेट.......अभी और भी न जाने कितने आयाम अपरिचित हैं इंटरनेट के जरिए....यह तो एक बानगी भर रही कि...... दो ब्लॉगर जो अब तक केवल नेट के जरिए एक दूसरे से जुड़े थे....उसके तार कहीं और जुड़े हुए मिले......।

     उधर हालत ये थी कि दोनों परिचित लोग आपस मे भेंट लिए.....एक दूसरे से कुशल क्षेम पूछने में लग गए और इधर मैं ही अपरिचित सा हो गया  ...... मनोज जी ने इस ओर मुझे इशारा भी किया कि.......

 देखिए.... !!! -   हम लोग तो परिचित हो गए और आप सतीश जी...... अपरिचित :) 

  और देखते देखते.....समय घूम सा गया.........बातचीत हुई......कुशल क्षेम हुई.....घरेलू यादों को ताजा किया गया ......और...... होते होते विदा होने का वक्त हो आया......

    थोड़ी देर बाद मनोज जी विदा लिए.....मैंने भी विदा हो लिया..... और जा पहुँचा उसी नदी तीरे.....मल्लाह को आवाज देते.....रोक के .....हो......रोक के.........।


- सतीश पंचम

स्थान - वही, जहाँ  के आसमान में बादलों की दलबंदी हो रही है और समुद्र हिलोरें मार रहा है 

समय - वही, जब आसमान से गिरती बूंदो को देख समुद्र मुस्कराते हुए कहे......ठहरो....जरा रेनकोट तो  पहन लूँ  :)

( मेरी हाल ही में हुई ग्राम्य यात्रा से संबंधित  ग्राम्य सीरिज........ चालू आहे )

25 comments:

Arvind Mishra said...

बढियां रही ग्राम्य यात्रा ...नदी का पारायण ,हेमा मालिनी के गाल की तरह गाँव की डामर सड़कें ,बाग़ की बतकही ,मनोज से मुलाक़ात ,अमियाही .....एक यादगार पोस्ट ..,..

ललित शर्मा said...

satish ji bahut badhiya rahi aapki blogger baithki.

padh kar aanand aa gaya.

han! kabhi manoj ji se ham bhi milenge.

shubhkamnayen.

निर्मला कपिला said...

ाद्भुत ब्लागर्ज़ मिलन नदिया पार जाना और वो भी नाव से वाह। तस्वीरें देख कर दिल करता है कि मिश्र जी एक सम्मेलन सब के लिये वहीं रख लें। हाँ आपकी पोस्ट से याद आया कि बहुत दिन से मिश्र जी के ब्लाग पर नही गयी जब कि पहले रोज़ जाती थी दूसरी तरफ आम अपना भी इन्तजार कर रहे हैं देखते हैं पहले क्या किया जाये। अच्छा यात्रा वृतांन्त धन्यवाद

अनूप शुक्ल said...

चकाचक किस्से हैं। मजेदार।

उनके चेहरे और बॉडीलैंग्वेज से आपको एक किस्म की शालीनता टपकती दिखाई देगीबाड़ीलैंग्वेज से हमें कई हीरो याद आये और शालीनता के कई जीरो। इनके ही हाइब्रिड से बनें होगें ये भाई देहाती कुकुर लोग। वैसे भी आप आसपास के दामाद हैं -सब इज्जत से देखते होंगे।

मनोज मिसिर बहुत समझदार, सज्जनटाइप के प्यार ब्लॉगर हैं। अपने आसपास के कई प्रसिद्ध कवियों के बारे में इन्होंने खूब लिखा है लेकिन अभी उनको अपनी आवाज में पेश करना बाकी है। उनकी जौनपुर के बारे में लिखी पोस्टें बहुत अच्छी हैं।

और आप के बारे में क्या कहें। आपके बारे में कुछ कहना तेल बढ़ते दामों के समय में दीपक दिखाना ही है।

और ब्लॉगजगत में इमेज के बारे में मेरा मानना है कि जो जैसा होता है अपने बात-व्यवहार से वैसी ही इमेज देर-सबेर बना ही लेता है। जब तक अपने स्वभाव के अनुरूप अपनी इमेज नहीं बना लेता तब तक उसी तरह बेचैन रहता है जिस तरह लिखी हुई पोस्ट को नेट पर पोस्ट करने के लिये कोई ब्लॉगर बेचैन रहता है। आप कितना भी छटपटायें, बतायें लेकिन दुनिया को आपका सोच/व्यवहार बैलेंस दिख ही जाता है।

मनोज कुमार said...

बहुत अच्छी प्रस्तुति।

मो सम कौन ? said...

सतीश जी,
आपकी पोस्ट पर आते समय ही हम तो सीट बैल्ट बांध लेते हैं कि आज पता नहीं कैसा सफ़र करवायेंगे आप। वर्चुअल टूरिज़्म एकदम।


@बीस बार बिच्छु दंश:
---------------
बचपन में फ़ैंटम की कामिक्स पढ़ते समय की एक कहानी याद आ गई। फ़ैंटम की प्रेयसी डायना अपनी पहली डिलीवरी को लेकर चिंतित थी तो फ़ैंटम उसे लेकर अपने एक मित्र(एक कबीले के सरदार) की पत्नी, जिसके बाईस या तेईस बच्चे थे, से मिलवाने ले जाता है। वो डायना को सांत्वना देती हैं कि पहली बार है इसलिये घबरा रही हो, मेरी लास्ट डिलीवरी तो, मुझे छींक आई थी, उसके साथ ही हो गई थी।
आपकी तो पहली डिलीवरी हो चुकी, अब दोबारा ऐसा मौका आया भी(बिच्छु द्वारा काटने का) तो कम दिक्कत ही होगी, है न?:)
पोस्ट बहुत मज़ेदार। आप तो अपनी ब्लॉगर्स मीट का नाम ब्लॉगर-ए-आम मीट रख लीजिये। मनोज मिश्र जी का ब्लॉग बहुत अच्छा ब्लॉग है। परिचय करवाने के लिये धन्यवाद।

kshama said...

Padhte,padhte,pata bhi na chala aur mai apne gaanv pahunch gayi...theek amraai ke neeche!

राज भाटिय़ा said...

बहुत ही सुंदर लगा आप का यह मिलन को यह विवरण, वेसे मुझे गांव बहुत ही सुंदर लगते है, धन्यवाद इस सुंदर ओर यादो भरी पोस्ट के लिये

अजय कुमार झा said...

वर्ष भर की सारी पोस्टों में से छांट छांट कर कुछ चुनिंदा पोस्टों को सहेज़ रहा हूं । आपके यहां आकर रोज रोज पोस्टों को मार्क करने से अच्छा है कि आपके ब्लोग को ही मार्क करके रख लूं । आपका तो बिच्छू भी हिट है और नाव भी ।

Shiv said...

शानदार पोस्ट!
नदी-नाव की तसवीरें और यात्रा...साथ में मनोज जी से मिलन, सबकुछ मिलकर इस पोस्ट को झकास पोस्ट का दर्जा दिलाते हैं. ग्राम्य सीरीज वाली आपकी सारी पोस्ट एक से बढाकर एक हैं.

सत्य गौतम said...

मेरा नाम शम्बूक है।"
शम्बूक की बात सुनकर रामचन्द्र ने म्यान से तलवार निकालकर उसका सिर काट डाला। जब इन्द्र आदि देवताओं ने महाँ आकर उनकी प्रशंसा की तो श्रीराम बोले, "यदि आप मेरे कार्य को उचित समझते हैं तो उस ब्राह्मण के मृतक पुत्र को जीवित कर दीजिये।" राम के अनुरोध को स्वीकार कर इन्द्र ने विप्र पुत्र को तत्काल जीवित कर दिया। http://hindugranth.blogspot.com/

प्रवीण पाण्डेय said...

बहुत सुन्दर परिचय व्यक्तित्व व परिवेश का ।

संजीव तिवारी .. Sanjeeva Tiwari said...

...रोक के .....हो......रोक के.........। हम तनि लेट हो गए थे, अब पूरा ग्राम्‍य यात्रा सिरीज पढें हैं.

बेचैन आत्मा said...

उम्दा पोस्ट.
लिखने की शैली लाजवाब है. गावों की यात्राएं तो बहुत होती हैं लेकिन इंतना रोचक वर्णन पढ़ने को कम ही मिलता है.
..मनोज जी को लंबे समय से कोई पोस्ट न लिखने के लिए उलाहना नहीं दिया ?

draradhana said...

बिच्छू के डंक वाली आपकी पोस्ट तो पढ़ ही नहीं पायी... बुरा हो बज़ का, जिसके भरोसे निश्चिंत रहती हूँ कि नई पोस्ट आयेगी, तो पता चल जाएगा... खैर ये वाली तो बज़ पर आयी और मैं यहाँ पहुँच गयी. बिच्छू के डंक से याद आया कि मैं जब डेढ़-दो साल की थी, तो हमलोगों के गाँव जाने पर मुझे काट लिया था... बिच्छू ने घर में लोग बताते हैं कि मारे गुस्से के बाऊ ने घर-हाता-दालान सब जगह से खोज-खोजकर बिच्छू का वंशनाश कर दिया और बीच-बीच में कहते रहे "मैं परशुराम का वंशज हूँ, छोडूंगा नहीं" :-)
पूरा किस्सा बड़ा मजेदार है...आप भी फुरसतिया की तरह लंबी पोस्ट लिखते हैं, पर एक सांस में पढ़ जाती हूँ.
कुक्कुर का वर्णन बहुत अच्छा लगा और औरतों के व्यंग्य का भी... बाकी ब्लॉगजगत के दो धुरंधरों के मिलने पर कुछ तो नया होगा ही :-)

rashmi ravija said...

नाव, मोटरसाइकिल और कार की यात्रा बहुत ही रोचक रही.
तस्वीरें बहुत ही मनभावन हैं..

Divya said...

So Mishra ji also believes in numerology. Nine number is a strong one, ruled by mars. His car number is indeed appealing and easy to remember..7200...9090.

Scorpion bite is indeed very painful. Glad to know you are fine now.

I envy this beautiful blogger's meet. I wish i too can attend such meets.

Nice post.

jitendra said...

sach mai duniya gol hai.

aapka bahut bahut shukriya itni aachi post ke leye.

mai dinbhar me kam se kam 2-3 bar aapa blog dekhta hu nai post ke leye..

aapka blog ek thandi puhar .. ke tharav ka aahas delata hai ...

jayadatar comment nahi karta hu per blog visit jarur karta hu..

thanks..

jitendra

आचार्य जी said...

सुन्दर लेखन व सुन्दर चित्र।

डॉ. मनोज मिश्र said...

आज -कल लगन बरात क व्यस्तता और इ बेईमान ब्राड -बैंड क इंटरनेट कनेक्शन आज कल धोखा दे देत है,नाहीं त हम कबै पढ़ के आपन कमेन्ट कर दिए होइत . के इ वर्णनं पढ़ कर तो मजा आई गय.पूरी जीवन्तता के साथ आप लिखे हैं .अब अगली बार हमहू आप के साथ पहली बार उस घाट पर नाव में चढ़ेंगे और उसी रस्ते विश्वविद्यालय जायेंगे --तब तक ई गंवई बतकही चालू रहे--भाई वाह.

महेन्द्र मिश्र said...

बहुत बढ़िया रोचक संस्मरण...... आभार ...

रंजना said...

ओह...आनंद आ गया...

आपके संग फ़ोकट फ़ोकट गाँव घूम आये...इतना लाजवाब विवरण हमारे भी स्मृति केंद्र को जागृत कर गया...खूब डूबे उतराए उसमे....

आनंददाई ...लाजवाब पोस्ट...

गिरिजेश राव said...

मैं तो लैण्डस्केप वाले फोटुओं पर मुग्ध हूँ। साँप की तरह लेटी लहरिया सड़क - बनाते समय सीधी क्यों नहीं कर दिए? रसूख वालों की जमीनें जा रही थीं क्या?
विराट फलक पर क्या क्या नहीं समेट दिए !
कितनी बातें जो लुप्त होती जा रही हैं - अगुआ, चोरउथा,कुकुर चर्चा, छवि की चिता... लम्बे रास्ते जो कभी खत्म नहीं होते.. रोक हो, रोक के ..
मज़ा आ गया, कसम से !

Sanjeet Tripathi said...

rok ke ho rok ke ham deri se aaye hain, aaj ise pdhe, baki iske baad ka aage roj padhenge....
is se pahle aapke bicchu kata wali ko padhe the.

lekin is post ne to maano mann jeet liya...., kal to aaram se baith kar, iske baad ki sari post padhta hu, halanki iske baad ki sarri post abhi bhi kholkar baitha hu, lekin samay dekh kar raha hu ki raat ke 1 baj gaye hain aur mujhe abhi khana bhi khana hai...isliye padhunga jarur iske baad ki sabhi post, aapko padhne ka aanand hi alag hai bandhu.

दीपक बाबा said...

भई वाह, खूब लिखा सतीश जी,

फिर वही बात "पंचम दा जवाब नई"


"देश बरे की बुताय पिया - हरषाय हिया तुम होहु दरोगा"

बहुत ही बढिया......... कायम रहे ये मस्ती.... और ये जिंदादिली.... गाम-दिहात से नाता बना रहे. देस बना रहे.

फोटो ब्लॉग 'Thoughts of a Lens'

फोटो ब्लॉग 'Thoughts of a Lens'
A Photo from - Thoughts of a Lens

ढूँढ ढाँढ (Search)

© इस ब्लॉग की सभी पोस्टें, कुछ छायाचित्र सतीश पंचम की सम्पत्ति है और बिना पूर्व स्वीकृति के उसका पुन: प्रयोग या कॉपी करना वर्जित है। फिर भी; उपयुक्त ब्लॉग/ब्लॉग पोस्ट को हापइर लिंक/लिंक देते हुये छोटे संदर्भ किये जा सकते हैं।




© All posts, some of the pictures, appearing on this blog is property of Satish Pancham and must not be reproduced or copied without his prior approval. Small references may however be made giving appropriate hyperlinks/links to the blog/blog post.