सफेद घर में आपका स्वागत है।

Saturday, June 19, 2010

एक अमियही टिप्पणी........बनारस ब्लॉगर बैठकी..........अरविंद मिश्र जी संग आम खाने की चुहलात्मक प्रतियोगिता..........और लमही यात्मक भेंट मुलाकात ......सतीश पंचम


   दादर- वाराणसी स्पेशल ट्रेन का डिब्बा......डिब्बे में मैं विंडो सीट से सटा हुआ बाहर अंधेरे में ताक रहा हूँ........चाय....चाय.....बढ़िया इलायची चाय..........  ए चाय  ..............अरे भई..... एक चाय  देना......अरे यार ये तो काली पड़ गई चाय है ........लाओ अब ले  लिया है तो चख ही लिया जाय.......उं...हूं.... चाय है कि...... बकरी का मूत.....पांच रूपया भेस्ट गया.......

     हा हा.... बकरी का मूत.....क्या कम्पेरिजन है.......लोग अक्सर पनैली- फीकी चाय को इसी एक जानवर के मूत्र से क्यों कम्पेयर करते हैं.....गधे...घोड़े....खच्चर....बैल आदि के मूत्र से कम्पेयर क्यों नहीं करते....सवाल कई हैं...........वन वे सवाल.....नो वे जवाब........ बाहर अँधेरा....भीतर उजास.........भागती ट्रेन........दूर कहीं कहीं बिजली के बल्ब जलते दिख रहे थे.....पता चलता था कि वहीं कहीं एक घर होगा.....पतंगे और तमाम रात्रिकालीन कीड़े मकौड़े जरूर उस लट्टू को घेर रहे होंगे.......आस पास के जंगलों में सियार...........तीतर....बटेर....न जाने कितने प्राणी होंगे जो लगातार छूटे जा रहे हैं.........


              ऐसे में ही अरविंद मिश्र जी को फोन करता हूँ......इससे पहले की नंबर सर्च करूं.......बगल के ट्रैक पर से एक ट्रेन तेजी से गुजरी ....धड़ धड़....धड़ धड़......बगल से जाती ट्रेन...... इतनी ज्यादा आवाज......और देखते ही देखते....धड धड अचानक धीमे होते  होते एकदम से खत्म..... स्कूली दिनों के सवाल याद आ गए..... ट्रेन की लंबाई.....प्रति सेकंड...... गति .....समय........नंबर मिलाता हूँ......बात हो रही है अरविंद जी से........गाडी सुबह करीब पांच बजे बनारस पहुंचेगी.....संकोच हो रहा है कि उन्हें इतने सबेरे कैसे बुलाउं स्टेशन पर.....लेकिन अरविंद जी मानें....तब न.....जोर दे रहे हैं कि मैं आ जाउंगा स्टेशन पर लेने......बगल में नजर दौड़ाता हूँ.....चाय वाला अब दुसरी ओर पलट कर जा रहा है......लगता है आगे रास्ता जाम है......लोगों ने बाथरूम के पास ही सामान रख छोड़ा है.....नो वे.....धड़ धड़.....धड़ धड़......।

 सुबह के तीन पचास हो रहे हैं...........पांच बजे का अनुमान गलत निकला...........गाड़ी बनारस स्टेशन पर समय से पहुंच चुकी है........बनारस स्टेशन से बाहर निकल कर ठीक स्टेशन के  सामने  खुले स्थान पर सामान रख खड़ा हूँ। सोच रहा हूँ....अरविंद जी को इस वक्त डिस्टर्ब करना ठीक होगा क्या ?  थोडा रूक जाता हूँ....इसी बहाने बनारस स्टेशन के आसपास का सौदर्य निहार लूँ....वरना तो जब कभी आया हूँ बनारस...हमेशा ही गाड़ी पकडने की जल्दी रही है.....कभी ठीक से बनारस स्टेशन के वास्तुशिल्प को ठीक से नहीं देख पाता हूँ। आज मौका मिला है......सुंदर .....मंदिर जैसा लगता है बनारस स्टेशन की संरचना......हिंदी, अंग्रेजी और उर्दू में लिखा वाराणसी........बीच में एक घड़ी.....। 

 आस पास नजर दौड़ाता हूँ.....लोगों का हूजम इस बनारस स्टेशन को सुबह के इस प्रहर में गुलजार किए है.....कुछ लोग बाहर ही बैठे हैं....गाडी का इंतजार कर रहे हैं....कुछ महिलाएं हैं.....कुछ बच्चे हैं......कुछ लोगों के ट्रेन के आने का अनाउंसमेंट हो गया है....अब वह उठकर चलने की तैयारी कर रहे हैं......महिलाएं....अपनी साड़ी ठीक कर रही हैं....कुछ अपनी साड़ी की प्लेटें तह कर रही हैं....फुख्ती को पेट में खोंस रही हैं........एक बोतल से एक शख्स पानी उड़ेल रहे हैं और बच्चे मुंह धो रहे हैं......और लो.....ठीक से मुँह धो लो.....ए बाबू उठो.....गाडी आने वाली है.....चलो....समान ओमान ठीक से रखना होगा....चलो उठो......वो अपना बैट भी रख लो.....एक शख्स आसाराम बापू  की मैगजीन पढ़ रहा है....पूरे श्रद्धा भाव से........मेरे जहन में आसाराम से संबंधित पिछली कई बातें कौंध जाती हैं......जमीन घोटाला.....तंत्र मंत्र......काला जादू................आहि रे.... अंध भक्ति........ ..

       दैनिक जागरण.....पेपर...पेपर.........एक  देना......पेपर लेकर पढ़ता हूँ.....समय सुबह के चार बजे हैं.... अभी थोडी देर और इंतजार करता हूँ....बाद में फोन लगाता हूँ.......चाय देना......कुल्हड़ नहीं है क्या......चलो दे दो.....हुंम्म............चाय तो ठीक है......खबरों पर नजर दौड़ाता हूँ........वही खबरें हैं.....एंडरसन को किसने भगाया.....फुटबाल का विश्वकप शुरू हो रहा है..... एक पेपर जमीन पर बिछा बैठ जाता हूँ........नजरें खबरों पर.......वातावरण में .हल्की शीतलता का अहसास हो रहा है ........आस पास  एक नजर डालता हूँ...........अरे ....ये मंदिर कब बन गया......सामने ही एक बिना प्लास्टर लगा केवल इंटों से बना एक मंदिर दिखाई दे रहा है....काफी पहले से इस मंदिर से वास्ता पडता रहा है.....इसे तो तोड़ दिया गया था विस्तारीकरण के चलते.....अब फिर यह बन गया....जय हो हनुमान गुसाईं......गिरिजेश ने भी एक बार इस मंदिर का जिक्र अपनी  रोवे देवकी रनिया जेहल खनवा वाली पोस्ट  में किया था.....और तब मुझे बताना पड़ा था कि यह मंदिर अब वहां नहीं है....टूट चुका है....भजन कीर्तन नहीं होता....लेकिन अब देखो............. पीपल के पेड का सहारा लेकर तैयार है मंदिर....प्लॉस्टर नहीं चढ़ा है......अबकी गिरिजेश को इसकी सूचना पोस्ट में देनी होगी....... भीतर किन किन भगवान की मूर्तियां हैं यह स्पष्ट नहीं हो रहा। फिलहाल इस मंदिर का नाम भी नहीं मालूम है, इसलिए सुविधानुसार इसे   गिरिजेशिया मंदिर  ही कह रहा हूँ   :).......वैसे मजाक में ही सही, पर अब यही नाम फब रहा है :) 





    मंदिर के अंदर एक बल्ब जल रहा है और गेट की तरफ बोरे का परदा लगा है। भीतर से पीले-लाल रंग की रोशनी बाहर झांक रही है।

       यह साथ में लगा जो  अंधेरे में खिंचा गया चित्र है, यह उसी    गिरिजेशिया मंदिर  का चित्र है ।




      समय चार पंदरह.......थोडा और सोने देता हूँ अरविंद जी को.......चलो इसी बीच एकाध फोटो सेशन हो जाय इस बनारस स्टेशन का.......औऱ साथ ही इस गिरिजिशिया मंदिर का भी......
आस पास  पुलिस वाले खड़े हैं.....फोटो लेना ठीक होगा क्या....कम्बख्त बेमतलब पूछौअल न करने लग जांय......होगा जो होगा....चलो खींच ही लूं तस्वीरें......तस्वीरें खींच रहा हूँ कि तभी एक बंदा पास आकर कहता है....टैक्सी.......लेंगे.......कहां चलेंगे.....नहीं कहीं नहीं जाना है..........बंदा चला गया.........मन ही मन हंसते हुए कहता हूँ......तुम क्या जानों......मैं यहां रूक कर एक जन को सुला रहा हूँ :) 

        फोटो खींच रहा हूँ....पूरा स्टेशन एक फ्रेम में नहीं आ रहा......काफी विशाल आकार है वाराणसी स्टेशन  का .....थोडा़ थोड़ा उजाला होने लगा है......साढे चार बजने वाले हैं....अब अरविंद जी को उठा ही देना चाहिए......एक फोन करता हूँ.....सामने से तुरंत अरविंद मिश्र जी की आवाज आई .....बस पंदरह मिनट में पहुँचता  हूँ.......आश्चर्य......अरविंद जी जगे हुए हैं.........


          स्टेशन के बाहर एक खुले हिस्से में जाकर खड़ा हो जाता हूँ......हवा थोड़ी थोड़ी चलने लगी है......उजाला होते ही एकाध और फोटो लेता हूँ.......तभी सामने एक जीप पर नजर पड़ी.....कहीं अरविंद जी ही तो नहीं हैं.... हां वही तो हैं...........जीप थोड़ा आगे जाकर खड़ी हुई......अरविंद जी ने उतरते ही मुझे फोन मिलाना शुरू किया....साथ ही साथ आगे स्टेशन की ओर बढ़ने लगे......मेरी जेब में रखा मोबाईल बजने लगा.....बिना मोबाईल उठाए....मैं अरविंद जी के पीछे जा पहुंचा और उनके  कंधे पर उंगलियों से एक बार स्पर्श भर किया कि वह घूम पड़े......अरे....सतीश जी !



          और अगले ही पल जीप बनारस की सडकों पर दौड़ी जा रही थी......इस सडक से उस सडक.......उस सडक से .इस सडक.......और गलियां......वह भी परस्पर एक दूसरे का काटती....गले मिलती......अगल बगल से निकलती जा रहीं थी.......बनारस की गलियां ऐसे ही मशहूर नहीं हैं.......देखते ही देखते जीप अपने गंतव्य स्थान पर पहुँची......।  अरविंद जी के निवास स्थान पर पहुँचते ही सफेद रंग की  डेजी से मुलाकात हुई.....अरविंद जी ने बताया कि जो कोई घर में आता है उसे यह पहले परखती है और अपना मेहमान समझ बिहेव करती है......इधर देख रहा था  अरविंद जी  के हर आदेश का वह बखूबी पालन कर रही थी....एकदम सधे अंदाज में.....। अभी बैठ कर हम लोगों में परिचयात्मक बातचीत चल ही रही थी कि टेबल पर चाय और नाश्ते की लाईन लगनी शुरू हुई......मैं ठहरा एक नंबर का पेटू.....बिना संकोच के शुरू हो गया......साथ ही साथ बातचीत भी चालू रही।


 बातचीत के दौरान अरविंद जी से ही मुझे पता चला कि कुछ ब्लॉगर ऐसे भी हैं जो किसी बीमारी या  पारिवारिक दिक्कतो आदि के चलते काफी चुनौती झेल रहे हैं और फिर भी ब्लॉगिंग से जुडे रहकर एक से उम्दा और सार्थक किस्म की टिप्पणी या पोस्ट के माध्यम से अपना योगदान दे रहे हैं।

      इन सक्रिय  ब्लॉगरों के बारे में अरविंद जी से जानकर और उनकी बातें सुनकर  मुझे ऐसे उन तमाम ब्लॉगरों पर तरस आने लगा जो आए दिन ब्लॉगिंग से दूर होने की बेमतलब घोषणाएं करते रहते हैं......ब्लॉगजगत छोड़ देने जैसे शीर्षक लगा भीड़ जुटाते रहते हैं। औऱ दो चार दिन की हा हा....हू हू......लूलू   आवन करवा कर फिर लौटने की घोषणा कर देते हैं....यह कहते कि आप लोगों का स्नेह खींच लाया वगैरह वगैरह....।    

          इधर बीच बीच में चाय नाश्ता जारी रहा। अरविंद जी की कुछ पोस्टों पर चर्चा हुई कुछ मेरी पोस्टों पर। इसी बीच अरविंद जी ने विषय छेड़ा कि आपने अपने प्रोफाईल में इलाहाबादी खरबूजों के बारे में लिखा है जबकि खरबूजे जमैथा के प्रसिद्ध  हैं ....... इलाहाबद के तो तरबूज बहुत प्रसिद्ध हैं। तब मैंने बताया कि मनोज मिश्र जी के पोस्ट से पहले मुझे पता ही नहीं था कि जमैथा के खरबूजे ही इलाहाबाद के स्टेशनों पर मिलते हैं........जब  मैंने यह कविता लिखी थी तब मैंने अपने जहन में इलाहाबाद के प्लेटफार्म पर दिखे खरबूजों को रखा था और उसी के चलते अपनी कविता में इलाहाबादी खरबूजों का जिक्र किया है ।

       तब तक अरविंद जी के पुत्र मिकी ( कौस्तुभ)  भी आ गए.....इनके बारे में जानकारी मुझे अरविंद जी के ही एक पोस्ट से मिली थी जब वह बैंगलोर में एडमिशन के सिलसिले मे गए थे। ज्यादा अनचिन्हार नहीं लगा......लगा कि हम लोग जैसे परिचित ही हैं  कोई हिच नहीं। तभी भोजन आदि का भी इंतजाम हो गया। एक ओर जायकेदार भोजन.....दूसरी ओर बातचीत का क्रम। 
    
     भोजन करते हुए ही फोटो सेशन भी हुआ और देखते ही देखते टेबल पर बनारसी लंगडा आम भी सट लिया चुपके से। वही लंगडा आम जिसे खाने को लेकर अरविंद जी और मेरे बीच चित्रलेखा वाली पोस्ट पर एक दूसरे से ज्यादा आम खाने की प्रतियोगिता की बात चली थी....दाँत कोठ हो जाने की हद तक आम खाने की बात चली थी......  हंसी ठिठोली हुई थी.... और देखते ही देखते इस आम खवाई की दावत का प्लान बन गया.....। दरअसल इस मुलाकात के  मूल में आराधना चतुर्वेदी मु्क्ति जी की  आम से संबंधित एक  टिप्पणी थी।  यह उस अमियही  टिप्पणी का ही कारण था कि हम लोग आज मिल रहे थे।

   सचमुच,  टिप्पणीयां कभी कभी सर्वर से उतर कर निजी जीवन में  भी आ धमकती हैं और न सिर्फ आती  हैं बल्कि, देखते ही देखते बनारस की गलियों  में भी मिल-जुल लेती हैं। 

     इधर  भोजन के बाद आम खाना था... हम दोनों जन आम खाने में व्यस्त हो गए.....बातें हो ही रही थीं। मैं आम रस पी रहा था....इधर मिकी फोटो खींच रहे थे कि तभी अरविंद जी ने कहा कि अब आप एक आम और खा लिजिए तो आप मुझसे जीत जाएंगे।


  हुंम्म.....तो  यह हैं अरविंद मिश्र जी......  केवल इसलिए मुझसे हारने को तैयार , कि मेरा मान रह जाए......जबकि पचपन आम तक खाने का इनका रिकॉर्ड रहा है..... हारने को तैयार..... ऐसी सहजता......ऐसी निश्छलता.....याद आता है मुंशी प्रेमचंद की  बचपन में पढ़ी  गिल्ली डंडा वाली कहानी जिसमें  एक मित्र सक्षम और  हावी होते हुए भी केवल इसलिए हारना चाहता है ताकि दूसरे का मान रह जाए..... .लगता है कि प्रेमचंद का बनारस अब भी लमही के रंग में सराबोर है।  निश्छलता  परोसने की आदत बनारस ने अब तक नहीं छोड़ी है और वह यहां अरविंद मिश्र जी के आग्रह में साफ झलक रहा है।

    इधर समय बीत रहा था और उधर घर से फोन आ रहा था कि अब तक गाँव पहुंचे क्यों नहीं....इंतजार हो रहा है.....। अरविंद जी का मन था थोडा बनारस घूमा जाय......भोले बाबा के मंदिर काशी विश्वनाथ तक  हो आया जाय.......लेकिन....वक्त का तकाजा था कि मुझे घर लौटना था... ... घर में ही  एक भतीजे के विवाह की तैयारी भी करनी थी....... इधर दोपहर तक लू चलने से दो घंटे का रास्ता मुश्किल होने की आशंका थी........। 

  करीब सुबह के साढे नौ बजे के आसपास अरविंद जी से विदा लिया......भोले बाबा के मंदिर न जाने की कसक मन में रह गई और शायद उसीका मुझे दंड भी मिला ......तब......जबकि रात में भोले बाबा के ही एक सिपाही से मेरा सामना हुआ............( जारी.......)

- सतीश पंचम

( ग्राम्य सीरिज चालू आहे.......)   
   

37 comments:

दिनेशराय द्विवेदी Dineshrai Dwivedi said...

सुंदर और स्वादिष्ट।
कहाँ हैं लंगड़े आम, इधर कोटा तक तो अभी नहीं पहुँचे।

P.N. Subramanian said...

यात्रा वृत्तांत रोचक रहा. सुना है मेहमान नवाजी में अरविन्द जी का कोनो मुकाबला नहीं है.

mukti said...

वाह ! आनंद आ गया आपका वर्णन पढ़कर... बनारस स्टेशन तो सच में बहुत सुन्दर है... भला हो आराधना चतुर्वेदी "मक्ति" की टिप्पणी का कि दो महान ब्लोगरों की मुलाक़ात हुयी :-)
वैसे कौन जीता????

ललित शर्मा said...

बढिया मुलाकात रही और वर्णन भी उम्दा रहा।

आनंद आ गया।

Anonymous said...

रोचक वृतांत

बहुत जल्द हम भी अरविन्द जी के साथ आम खाते दिखेंगे!

Anonymous said...

वाह! डेज़ी कितनी हैरानी से अरविन्द जी को आम खाते देख रही :-)

डॉ. मनोज मिश्र said...

यात्रा वृत्तान्त त रोचक आहे,चालू रहे ,अबै त बहुत लम्बा रस्ता बा.

Arvind Mishra said...
This comment has been removed by the author.
sidheshwer said...

बहुतै जब्बर गद्य !
बनारस इस्टेसन पर हमेसा एतना लोग बाहरे काँहे पड़ा रहता है।इसका जवाब बहुत दिनों से खोज रहा हूँ।
आपकी गद्य कथा जारी रहै १
सदा आनंदा रहे एहि द्वारे !

Arvind Mishra said...

इधर रहायिश नहीं ,उधर आपसे भी रहा नहीं गया...लिख ही डाला यह वृत्तान्त ....विक्की नहीं मिकी एलियास कौस्तुभ ..उस दिन आपके लायजन में थे ....विश्वनाथ बाबा की अब उपेक्षा मत करिएगा !आपसे तो अब आत्मीय बंधन हो ही गया !
हाल चाल लेते देते रहेगें -

mukti said...

अरे हाँ पाबला जी, मैंने भी गौर किया कि डेज़ी बड़े गौर से मिश्र जी को आम खाते हुए देख रही है और ये महाराज उसकी ओर ध्यान ही नहीं दे रहे हैं.

सतीश पंचम said...

अरविंद जी,

ध्यान दिलाने के लिए शुक्रिया...पोस्ट में सुधार कर दिया है।

Neeraj Rohilla said...

बेहतरीन पोस्ट,
हम जब २००७ में बनारस गये थे तो अरविन्द जी से परिचय नहीं था, इस बार गये तो लग रहा है बढिया खाने का इन्तजाम तो हो ही जायेगा...हा हा हा...:)

स्टेशन का जियोग्राफ़िया बढिया बनाया आपने, यादें ताजा हो गयीं। बनारस की खास बात लगी थी वहां के आटो रिक्शा चलाने वाले, २ फ़ुट दूरी में ही ९० डिग्री का टर्न इतने मजे से लेते हैं, आप का कलेजा मुंह को आये कि मरे मरे मरे, लेकिन बचे बचे बचे...और जब तक दम संभले दूसरा टर्न और फ़िर मरे, बचे, मरे, बचे...:)

डा० अमर कुमार said...


बकिया जौन बा, ऊ ठीके बा ।
मुला हमको सुरुये में एगो सँका हो गयी है, निदान किहल जाय !
ऊपरै मोटका टाइप में ’बकरी का मूत’ देखाताऽऽ, ई का हो ?
त कबहूँ हमरा अईसन चाय पीये के कोनो मौका लागि..
त हमनि के ई कईसे बूझल जाई कि ईहे ’ बकरी का मूत’ बाऽऽ !
आगला पोस्टवा में तनि एकर खुलासा किहल जाय ।

फोटुआ त रज्जा एकदम्मै चौंचक हॅओ,
ऊ फिलिम वाली करिनवा इसीको न बोली थी.. " तुम तऽ यार बड़े खूबसूरत निकले ?"
ई बाद में तै करियेगा कि कऊन खबसुरत है, अऊर हम किसको ई बोले हैं..
बकिया इस पोस्ट का नाम ’ जब वी मेट ’ काहे नहिं रक्खे जी ?

मो सम कौन ? said...

वाह सतीश भाई,
मीटिंग एंड ईटिंग मजेदार रही, ब्लॉग और ब्लॉगर्स पर चर्चा भी हुई आपकी।
वो एक शेर था न कुछ "वतन की फ़िक्र, हुक्काम, डिनर भी आराम के साथ," थोड़ा सा हेरफ़ेर करके समझ लेते हैं "ब्लॉग की चिंता, हुक्काम, ब्रेकफ़ास्ट और आम के साथ" ::)
बनारस स्टेशन और ’गिरिजेशिया मन्दिर’ भी अच्छे लगे।
और बकरी का ......., मेनका जी ने सुन पढ़ लिया तो देख लेना फ़िर,
मजा तो आ ही जाता है आपकी पोस्ट पर

गिरिजेश राव said...

मज़ा आ गया। भइ वाह !

इलायची, बकरी का मूत, चाय, सियार, तीतर, बटेर , आसाराम, अन्ध भक्ति, वास्तुशिल्प, मन्दिर, आम, गिरिजेश, अरविंद,खरबूजे, टिप्पणी .... इतने बड़े कैनवस पर सतीश का स्पर्श ! क्या कहने !!
अरविन्द जी के यहाँ तो बस आत्मीयता आत्मीयता ही रहती है। ऐसे मिलते हैं जैसे जन्मों का परिचय हो।

श्वान नस्ल आम नहीं खाती। डेजी अपने स्वामी का मुँह अगोर रही है।
अमर जी की फरमाइश पूरी की जाय।

@द्विवेदी जी,
लँगड़ा अभी लखनऊ नहीं पहुँचा। कोटा तो दूर है। जिसने पेंड़ का पका कपुरी (हम लोगों के यहाँ लँगड़ा को इसी नाम से जाना जाता है।) खा लिया वह हाफुस, चौसा, अल्फांसो ..आलतू फालतू सब भूल जाएगा। मलिकाइन गाँव गई थीं। बच्चों के साथ खूब कपुरी कचरी हैं। आज आते हैं लोग तो किसी बहाने से लड़ाई करनी है - जलन को अभिव्यक्ति मिलनी चाहिए।
लखनऊ के सबसे बड़े दोष हैं: कपुरी आम का बस एकाध हफ्ते मिलना और दसहरी मलीहाबादी आम की क़्वालिटी का 'वोवरवैल्यूड' होना ...

सिद्धार्थ शंकर त्रिपाठी said...

वाह-वाह। आम देखकर लार टपकने लगा।:)

मजा आ गया वृत्तान्त पढ़कर।

आज-कल में बोरिया बिस्तर बाँधकर इलाहाबाद से निकलने वाला हूँ। मुलाकात हो पाएगी क्या?

बेचैन आत्मा said...

वाह!
रोचक पोस्ट. लगता है अरविन्द जी का घर ढूँढना ही पड़ेगा.

प्रवीण शाह said...

.
.
.
आप की कलम है या कूँची... लग रहा है कि सब कुछ मेरे ही सामने घट रहा है... एक ऐसा शब्दचित्र सा उकेर दिया है आपने...

'लंगड़ा' तो मेरा भी प्रिय है पर हमारे यहाँ तो अभी बाजार में कलमी और दशहरी का ही बोलबाला है... फल वाले से पूछा तो बोला अभी एक सप्ताह लगेगा आने में... लंगड़ा जो है!

आभार!

Arvind Mishra said...

ताज्जुब है अभी तक आम के खाने के तरीके पर कोई टीका टिप्पणी नहीं -भदेस गवईं तरीका है आम को चूस कर खाने का !

Arvind Mishra said...

गिरिजेश भाई यी कह का रहे हैं तईं समूझ बूझ कर कहा करें -क्या कुत्ते आम नहीं खाते ? बहरहाल डेजी अपवाद है -आम की बड़ी शौक़ीन !
बेचैन जी आईये न ...१६ काटन मिल कम्पाउंड ,सूर्यविहार के बगल !

सतीश पंचम said...

अमर जी,

बकरी का मूत चहासु लोगों का एक तरह की कहावत या बोली है........जब चाय फीकी और पनैली किस्म की हो तब ही कहा जाता है कि चाय है कि बकरी का मूत.....अब ये किसने इजाद किया...किसने बकरी का मूत टेस्ट किया क्या कैसे.... .कौन इसका उदघाटन कर्ता था इसकी मुझे जानकारी नहीं है :)

फीकी चाय के बारे में एक और कहावत है कि चाय है या गरम पानी :)

वैसे, मेरे गाँव में एक कका जी थे जो चाय के घोर विरोधी थे और कहा करते थे कि काहे झूट्ठे मुंह जलावे खातिर चाह पी रहे हो। लेकिन बाकी के गंवई आदमी माने तब न, उन्हें तो लोटा भर भर के चाह चाहिए....मानो कोई जूस वगैरह हो :)


और फिल्म तीसरी कसम में भी तो हीरामन चाय की दुकान में एक चुक्कड़ या दो चुक्कड़ नहीं, बल्कि पूरा लोटा भर चाह मांगता है दुकान वाले से और उपर से कहता भी है कि - जी, हम चाह नहीं पीते....गाँव देस के लोग कहते हैं कि जवान आदमी को चाह नहीं पीनी चाहिए :)

सतीश पंचम said...

सिद्धार्थ जी,

फिलहाल मैं मुंबई वापस आ गया हूँ...गया भी था तो सिर्फ चार दिन के लिए ही...बच्चों का स्कूल खुल गया हैं सो समय से लौटना भी पड गया वरना तो इलाहाबाद गुलजार किया गया होता :)

सतीश पंचम said...

@ द्विवेदी जी,

यहां मुंबई में लंगड़ा लंगड़ाते लंगड़ाते पहुंच गया है....लेकिन यहां पर लोगों को देखता हूँ कि उन्हें उपरी तौर पर पीले हो चुके आम ही ज्यादा पसंद आते है औऱ लंगड़ा बगल में पड़ा रह जाता है।

लेकिन लंगडे के हम जैस प्रशंसक हैं कि जहां हरा आम दिखा कि लपक लिए....जान जाते हैं कि लंगड़ा है और फल वाला भी समझ जाता है कि लंगड़ा के कद्रदान आ गए :)


@ गिरिजेश जी,

आप भले ही यहां कह रहे हैं कि हमरी भौजाई से आज आप आम के बहाने लडाई करेंगे लेकिन इतने दिन बाद जब सामने आएंगी भौजाई... तो लडाई वडाई सब भूल जाएंगे.... यह मान कर चलिए :)

Vivek Rastogi said...

बहुत ही बढ़िया कोलाज, वैसे हमने यहाँ मुंबई में बहुत लंगड़ा खाया है, अभी ५-६ दिन से गायब है फ़िर १-२ दिन में आने वाला है, चूसकर आम खाने का आनंद कुछ और ही होता है ये तो देसी लोग ही जानते हैं, चाकू से काटना आज की संस्कृति में शामिल है, और वो भी छिलका उतारकर फ़ोर्क से खाना, अपन तो आज भी गुठली को ही प्राथमिकता देते हैं :)

Meenu Khare said...

रोचक यात्रा वृत्तांत.

Sanjeet Tripathi said...

रोचक विवरण यात्रा से लेकर स्टेशन परिसर और इस मिलन व आम खाने का।

आपके दिए गए संदर्भों ने और भी पठनीय बना दिया है।

बनारस स्टेशन पर पहुंचे थे हम 1999 में। दस दिन का प्रवास था। रोज पैदल ही घूमा करते थे शहर।
यादें अब तक हैं। शहर ऐसा है कि बार बार अपनी ओर खींचता है।

इस्लाम की दुनिया said...
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सतीश पंचम said...

भई ये अनचाहा खरपतवार वाला कमेंट कहां से उग गया।

इस्लाम की दुनिया जी,

लगता है आपने मेरे टिप्पणी बक्से पर लिखी चेतावनी नहीं देखी है -

टिप्पणीयाँ पोस्ट-विषय से संबंधित ही करें। बेसिर-पैर की, उलूल-जूलूल, बेमतलब लिंक देती टाईप टिप्पणीयों को हटाने का पूरा अधिकार है।

तदनुसार, मैं फिलहाल आपकी टिप्पणी हटा रहा हूँ :(

आपसे अनुरोध करूंगा कि कृपया दुबारा इस तरह के कमेंट न करें।


मॉडरेशन..... तू न गई मन से :)

महेन्द्र मिश्र said...

आपकी चाय समयचक्र पर ...लाजबाब प्रस्तुति ...आभार

Arvind Mishra said...

@गिरिजेश जी ,
ओह काहें कापुरी की याद दिला दिए ..देवरिया का एक कालखंड ही याद हो आया !

प्रवीण पाण्डेय said...

अब घर आकर आम कम्पटीशन करना पड़ेगा । 55 तो नहीं, 40 तो निपटा देंगे । लगता है अब 25 से अधिक न जा पायेंगे ।
बनारसी माहौल बना रहे ।

अनूप शुक्ल said...

मजेदार है सब कुछ!
बनारस कथा रोचक च चौचक है।
गिरिजेशिया मंदिर शानदार है!
आखिरी से पहली फोटो आपके प्रोफ़ाइल वाले फ़ोटो से ज्यादा चकाचक लगी। बदल डालिये प्रोफ़ाइल फोटो जो होगा देखा जायेगा।
आखिरी फ़ोटो तो आखिरी ही है। आखिरी बोले अल्टीमेट। डा.अरविन्द मिश्र के चेहरे से जैसे लाज का झरना फ़ूट रहा है। कित्ते क्यूट लग रहे हैं आपसे नजरे चुरा के बतियाते हुये, फ़ोटो खिंचाते हुये। :)

सतीश पंचम said...

@ अनूप जी,

आप मौज लेने से नहीं चूक रहे :)


@ गिरिजेश जी,

मैंने लंगडे का दूसरा नाम कपुरी आम पहली बार सुना है... वैसे लंगडा नाम से ज्यादा कपूरी नाम ग्लैमरस लग रहा है।


@ अरविंद जी,

अब केवल देवरिया कालखंड को याद करने से ही काम नहीं चलेगा....एक पोस्ट हो जाय इन यादों पर :)

सतीश पंचम said...

@ प्रवीण पाण्डेय जी,

लगता है आज सबके यहां आम ही आम खाए जाएंगे....गिरिजेश जी तो ठान कर बैठे ही हैं...इधर मैं भी अभी बाजार से दो किलो लंगड़ा ही लेकर लौटा हूँ और विवेक जी भी लगता है लंगडे की ही शॉपिंग कर लौटे रहे हैं ...उन्होंने तो एक पोस्ट भी शॉपिंग पर लिख डाली है..... उधर आप भी 25 का आँकडा दिखा रहे हैं....यानि कि अमियही बहार जोर में है :)

वाणी गीत said...

रोचक मुलाकात ...
बनारसी लंगड़े की खुशबू यहाँ तक आ रही है ...!!

दीपक बाबा said...

आह आम , वाह आम.

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