सफेद घर में आपका स्वागत है।

Friday, June 18, 2010

यात्रा.....मुंबई टू गाँव.....वाया बनारस..... ग्रेट इंडियन पेनिनसुलर रेलवे की बमचक ..............सतीश पंचम


   मुंबई.........रात के बारह बज कर पन्द्रह मिनट ………गाँव लौटने का समय……..केवल… दो चार दिनों के लिए…….……गर्मी की छुट्टीयां खत्म होने को हैं……… बच्चों के स्कूल खुलने वाले हैं……….. गाड़ी प्लेटफार्म पर आ रही है…… सरकती हुई………कहीं कहीं से रह रह कर……..खट……खुट…..खट…..खट की आवाजें देती….…….. ..बिना रिजर्वेशन यानि  चालू वालों की लाईन में अचानक अउन पउन होने लगा है……थोड़ी हलचल सी मच गई है…….एक पुलिस वाला लोहे के गाडर पर लाठी पटक कर खन्न् सी आवाजों की धमक से लोगों को परेशान कर रहा है…….चालू वाले…….बिना रिजर्वेशन…….पुलिस वाले…….रिजर्वेशन…….……मैं प्लेटफॉर्म और उसके आसपास की हलचल देख रहा हूँ....देख रहा हूँ.......पुलिस वाला लोहे का गार्डर ठनठना रहा है........और भीड़........वह तो भीड़ ही तो है.....एकाध लाठी खा ली तो कौन बड़ी बात............कमअक्ल पुलिसिया साला........

       बोगी में घुसता हूँ……बोगी…….अजीब शब्द है। अँधेरा है । थोडी देर में लाईट आ जाएगी……लोगों का सामान के साथ आना शुरू हो गया है.......…..सूटकेस…..बोरा……चटाई……क्या गाँव में नहीं मिलती जो लिए जा रहे हैं………हां भाई…….बम्मई से लाए हैं……चटाई और बोरा न हो तो पता कैसे चलेगा……….बोरे में पत्थर ओत्थर भरे हैं क्या……काफी कड़क है……पैर में जरा सा लगा था अंधेरे में ……….……मोबाईल के टार्च अब काम आ रहे हैं……नोकिया वाले मोबाईल मे टार्च नहीं सटाते …….सीटें ढूँढने में दिखते हैं ज्यादातर चाईना मोबाईल….लगता है नोकिया बैठ जाएगा...... नोकिया बैठे या उठे...... लेकिन पहले से ये कौन बैठा है मेरी सीट पर.....उठो यार.........चालू टिकट है भई तो मुझे तो मत हलकान करो.....


ममता दी.....ओ ममता दी....तनि देखा हो....





    आप का कितना है जी……..सत्तावन……हमारा अट्ठावन…..ओनसठ……एकहत्तर है………..एक सीट लम्मे दे दिया है……कहां लम्मे है…..इधरईए तो है…….अरे भाई रास्ता छोडो……सामान साईड में कर लो……आने जाने तो दो……..ए बिजई……….अरे  उहां कहां लटका हउआ……इंहां आवा आर………पच्चीस….छब्बीस इहां हउए………..एक तो लईटिए नहीं जलाए अबहिन मादरचो……….रेलवई वाले……..सामान तो हटाईए भाई साहब….रास्ता तो किलियर करिए……..ए पुसपा……..बिट्टी के ले के हिंया आव……….रजिंन्दर……..हे रजिन्दर…….अरे इहां हौ सीट आर….उहां कहां लां* चाटत हउआ……….अरे  ई एस सीक्स है भाई ………..आपका टिकट एस सेवन का है……..जाईए…..अरे तो सामान हटाएंगे तब नूं आगे बढेंगे……..ए बोरा उधर करो भाई…….सादी का सामान है….……….सूट उधर उपर देखों एक  खिल्ला……टांगों न उधरै……..नहीं खराब नहीं होगा…..लटका रहने दो……देखा इहै……सादी पड़ी है तो केतना खियाल रख रहा है लईका कि मुड़े मड़े नहीं………..ल्ल……लाईट आय गई…..जय बम्मा माई………पंखवा चला द हो………ए मर्दे वो लाईट का बटन है…..वो देखो पंखा का निसान ओहपे है……….

    
    बुढ़िया माई को उहां बईठा दो……माई…..ए माई…….चलत हईं………पैलागी…..जियत रहा बचवा………गाड़ी चल पड़ी है…….. .हम्म…….बुढ़िया माई के पैरों में महावर लगी है……पतोहू ने रचि रचि कर लगाया होगा…….पैरों पर आढ़ी टेढ़ी लकीरें डिजाईन बना कर लगी हैं…..जरूर पतली सींक से लकीर बनाई गई होगी……..लेकिन बुढ़िया माई के तर्जनी में लाल रंग लगा है…….तो क्या खुद से रंग लगाया होगा पैरों में……पतोहू कौनो काम की नहीं………ए भाई साहब आप सामान वहां रख दिजिए तो बैठने में आसानी होगी……..अरे आप भी कमाल करते हैं…..टिकट हमारा यहां का है…….अरे तो दो जन का है…….एक ही पर बनाया है…..आर ए सी वालों का यही होता है…….. एक पर दो लोग जा सकते हैं……..तब क्या अईसे ही रेलवई लाभ ले रहा  है………..


ममता दी.....ए ममता दी......तनिक सुनिए तो.............

  बगल में मोबाईल पर कोई गाना सुन रहा है.....नो हेडफोन......नो रोक टोक.......ओनली हेडेक.......और गाना......क्या कहा जाय.............

जातारा परदेस बलमूआ…….
छोड़ के आपन देस बलमुआ……
का देखईब पंडित जी से…..
खोल के पोथी पतरा………. .
एगो चुम्मा ले ल राजाजी….
बन जाई जतरा…..
जातार परदेस बलमुआ……..

    हम्म तो पंडितों का पोथी पतरा देखना इसलिए कम हो गया क्योंकि चुम्मा आड़े आ गया………गाना भी तो खूब गाया है……चलिए टिकट बताईए……..आप का……आप का…….पैन कार्ड…….नहीं तो कुछ तो होगा……ड्राईविंग लाईसेंस……..नहीं तो केवल झेराक्स मान्य नहीं है….. आप कोई प्रूफ दो तब ही आपका टिकट मान्य होगा…..चलिए आप दिखाईए……..आप का…….अरे भई बोला न कुच्छो नहीं हो सकता………


ममता दी......ए ममता दी.........अरे तनिक .......सुनू रे.......

  मैं अपनी सीट पर इत्मीनान से बैठ जाता हूँ.......स्लीपर क्लास........पूरे रास्ते स्लीपर पर स्लीपते हुए जाना चाहता हूँ.......रफी की तरह गाते हुए......वफा कर रहा हूँ वफा चाहता हूँ..........पैसे भर चुका हूँ.....अब मजा चाहता हूँ.......लेकिन मजा.........स्लीपर क्लास में नींद का मजा..........क्या मजाक है :)

  का हो.....कौन गाँव.....जिल्ला...... आप कहाँ तक जाएंगे....... आप गए हैं वहाँ पर....... नहीं.....वहां कभी गए तो नहीं पर सुने जरूर हैं.......त  ...सुनिए...... गोसांई जी कहिन हैं कि....बड़े भाग मानस तन पावा............उफ् ये गर्मी...........और ये गोसांई जी.......लगता है पकाए बिना न रहेंगे...........पकाओ गुरू......बड़े भाग मानुस तन पावा..........

 नींद का झोंका आ रहा है......गोंसाईं जी जारी है......अरे त कहें हैं गोसाईं जी..............

 कौन टेसन आवा है..........जंगल है.......अरे त पता कैसे चलेगा कि जंगल जंगल रेल चली है...........



जारी..........




- सतीश पंचम

स्थान – रेल के डिब्बे में,........ खिड़की के पास वाली सीट पर……. एक पकाते हुए सहयात्री  के सामने ।

समय – पिछले हफ्ते मुंबई से गाँव जाते समय......फिलहाल........मुंबई में लौट चुका हूँ..... और जैसा कि पकाऊ यात्री का कहना था......बड़े भाग मानुस तन पावा..........मैं इसमें जोड़ता हूँ....

हाँ,
बड़े भाग मानुस तन पावा
यही तन ले हर ओर पटकावा
कबहुं मुंबई त कबहूँ गाँव 
पुनि पुनि यही  तन बने रेल चढ़ावा
बड़े भाग मानुस तन पावा

( ग्राम्य सीरिज चालू आहे )

23 comments:

ajit gupta said...

बढिया है लिखते रहिए पर गाली-वाली मत लिखिए। ऐसा है ना कि यहाँ सभी लोग हैं केवल मरदजात ही नहीं है ना। बाकि बहुत अच्‍छा है।

महेन्द्र मिश्र said...

बहुत ही रोचक .... आभार

सतीश पंचम said...

अजित जी,

दरअसल गालियां भी इसी समाज का एक हिस्सा हैं जिनके अस्तित्व को नकारा नहीं जा सकता। असल जीवन में हर मोड़ पर, हर गली मोहल्ले हमें कभी ड्राईवर के मुंह से, कभी फेरीवाले के मुँह से, कभी पुलिस तो कभी खुद के ही बेहद करीबी रिश्तेदारों के मुह से तो कभी खुद से जब तक गालियों के शब्द सुनाई दे ही जाते हैं।

गालियों के बारे में एक रोचक बात यह है कि गालियों के बकने और उनके व्यवहार में जब तब लाने के तरीके आदि को देख समझ कर किसी समाज के बारे में, उसके लोगों के बारे में, उनकी जीवन शैली,आर्थिक स्थिति के बारे में बहुत कुछ जान समझ सकते हैं।

बनारस में कई बार गालीयां प्रेम से एक दूसरे को दी जाती हैं( स्वभागत)....लोग उसका बुरा नहीं मानते और उसे उसी तरह हंसते हंसते लौटाते भी हैं।

पंजाबी स्टाईल तो अपने आप में जग प्रसिद्ध है। बिना एक दो शब्द पैं....माई अवे कहे बात पूरी ही नहीं होती।

लेकिन यदि इन्हीं गालियों को कुछ विशेष अंदाज में खींचकर या तुरंता फेंक वाली शैली अपना कर कहा जाय तो लोग बुरा मान जाएंगे और फिर ले बमचक। हत्त तेरे की धत्त तेरे की शुरू।

मैं गालियों को उसी समाज के हिस्से से रूबरू करवाने का जरिया समझता हूँ , लेखन का एक अंश..... और इसी कारणवश स्लैंग्स का इस्तेमाल हो जाता है..... कई जगह यह लेखन के फ्लो के तहत सहजता से आ ही जाते हैं और ऐसे में कुछ तारांकित ढंग से जरूर उसे ढंकने का प्रयास करता हूँ।

साहित्य में भी कई जगह इस तरह की गालियों का जमकर प्रयोग किया गया है। काशीनाथ सिंह रचित 'काशी का अस्सी' हो या ज्ञान चतुर्वेदी जी रचित 'बारहमासी'। हर एक में परिवेश और लोगों के अनुसार गालीयों का जमकर इस्तेमाल किया गया है। यहां तक कि प्रेमचंद रचित 'पूस की रात' कहानी में भी हलकू के जरिए गाली का इस्तेमाल किया गया है - तब, जबकि पूस की ठंडी रात में तेज पछुआ हवा चलने लगती है और खेत की रखवाली करते हलकू के मुँह से निकलता है कि - "ई पछुआ राँड मार डालेगी"। तो कहने का अर्थ यह कि हर समाज और परिवेश में यह विद्यमान रही हैं और इंटरनेट लेखन भी इसका अपवाद नहीं है। वह भी इसी समाज का हिस्सा ही है।

आशा है मेरी इस स्लैंग्स लेखन प्रवृत्ति को आप समझेंगी।

Arvind Mishra said...

तो आखिर चल ही पडी छुक छुक ट्रेन.....बनरस पहुँचने का इंतज़ार है ..मै स्टेशन पर मिलूंगा !
मगर क्या मिल भी पाया ? यह जानने के लिए दोस्तों पढ़ते रहें यह यात्रा संस्मरण !
रचना के रियलिज्म के लिहाज से स्लैंग्स के सहज वर्णन से हम परहेज नहीं कर सकते......
आपके विचार से सहमत हूँ ! अब ससुरी गालियों का क्या कीजे ज्यादातर औरत पुरुष के
अवांछनीय शारीरिक सम्बन्धों/दशाओं को ही फोकस करती हैं!

Udan Tashtari said...

मजा आ गया///

नोकिया वाले मोबाईल मे टार्च नहीं सटाते …….सीटें ढूँढने में दिखते हैं ज्यादातर चाईना मोबाईल….लगता है नोकिया बैठ जाएगा..


नोकिया के गुरु मंत्र दे दिये हैं अब उ जाने और उनका काम...:)

बहुते सन्नाटा..जारी रहो महाप्रभु!

आचार्य जी said...

बहुत बढिया।

अजय कुमार said...

अच्छा प्रस्तुतिकरण । मैं भी गांव से लौटा हूं ।

Vivek Rastogi said...

हम भी उसी डब्बे में सवार हो लिये हैं और सफ़र का मजा ले रिये हैं।

गाली - ऐसा लगा ही नहीं कहीं पर भी वो तो आम बातचीत का हिस्सा हैं, इसलिये लगे रहिये, हाँ जिन्होंने कभी सुनी नहीं है उनके लिये अभद्रता जरुर है यह गाली लिखना।

महफूज़ अली said...

असली जन तो स्लीपर में ही मिलते हैं..... अब तो अट्ठारह साल हो गए ...स्लीपर में सफ़र किये हुए.... नहीं तो गोरखपुर से एक बार बम्बई गया था.... सन 1992 में.... बिलकुल ऐसा ही नज़ारा था.... पोस्ट वैसे तो बहुत अच्छी लिखी है आपने.... इंटेलेक्चुयल तो नहीं कहेंगे.... हाँ! यह है कि अपने पूर्वांचली देसीपन को बिलकुल सही रूप से उकेरा है आपने.... (अपने हम उम्रों को आप लिखना बड़ा खराब लगता है.... ही ही ही ही )....जिन्हें आप स्लैंग्स कह रहे हैं.... ऐक्चुयली में वो डाईलेक्ट्स हैं.... तो ... आपने डाईलेक्ट्स को बखूभी निभाया है.... स्लैंग्स डिफरेंट चीज़ होती हैं..... और डाईलेक्ट्स अलग ..... स्लैंग्स यूनिवर्सल होते हैं.... और डाईलेक्ट्स लोकल....अब "बे" को हम स्लैंग कहेंगे.... लेकिन 'हग ले बा" को डाईलेक्ट्स..... 'हग ले बा" भी अपने पूर्वांचल में बहुत फेमस है.... ही ही ही ही ..... बचपन में गोरखपुर में हम बहुत चिल्लाते थे.... पिताजी हमारे कहते थे.... कि .... कौन कहेगा की कॉन्वेंट में पढ़ता है.... ? वैसे हमने भोजपुरी बारहवीं क्लास के बाद सीखी.... क्यूंकि ... जब हमने गोरखपुर यूनिवर्सिटी में एडमिशन लिया तो यही समझ में आया....कि.... मेजोरिटी विन्स.... एंड .... इन रोम डू ऐज़ रोमन्स डू.... अब चलते हैं नहा लें ज़रा.... अभी हमें कानपुर निकलना है.... लखनऊ से कानपुर .... बाई कार .... बड़ा अच्छा लगता है जाना...... १ घंटे का रास्ता है..... सड़कें भी बहुत अच्छी हैं....

मो सम कौन ? said...

भारतीय रेल में स्लीपर में यात्रा करने का अपना ही चार्म है, अकेले रहने पर अपन भी स्लीपर ही पसंद करते हैं। ए सी वाला काम मजबूरी में ही करना पड़ता है, जब परिवार हमारे सर पर हो या हम सरकार के सर पर हों।
एक मिनी हिन्दुस्तान, समाज का एक ट्रेलर, अपने को आकर्षित करता है।
गाली वाली भाषा पर अपना भी यही मानना है कि डा. साहिबा अपनी जगह ठीक हैं, और आप भी अपनी जगह ठीक हैं। नहीं लिखेंगे तो स्वाभाविकता खत्म हो जायेगी। *** का उपयोग बेस्ट है।
मजेदार पोस्ट हमेशा की तरह, आगे इंतजार रहेगा।

kshama said...

Bada mazedaar warnana hai...! Bogey me isi tarah baaten hoti hai..Bharat me rail yatraa ka alaghi andaaz rahta hai!

Shiv said...

हमेशा की तरह बड़ी बम्फाट पोस्ट है. एक से बढ़कर एक मजेदार बातें.

"ए बिजई……….अरे उहां कहां लटका हउआ……इंहां आवा आर………पच्चीस….छब्बीस इहां हउए"

वाह!

इन सारे कलेक्शंस की एक किताब छापवाईयेगा; "यहाँ से भारत को सुनो"

Sanjeet Tripathi said...

vahi ham soch rahe the ki kidhar gayab hain aap.
laute bhi to shandar khalis safedghar ki pehchan wali post se. majaa aa gaya, agli kisht ka wait karte hain

shikha varshney said...

बहुत रोचक लिखा है ..कुछ ओरिजनल ,कुछ हटके...अच्छा लगा.

Divya said...

बहुत बढिया।

प्रवीण पाण्डेय said...

रोचक । बस इतना ही कमेंटियायेंगे ।

'अदा' said...

Bahut accha likhte hain aap..
rochakta bani rahi ant tak..
aapka aabhaar..

rashmi ravija said...

क्या बात है...हमें तो उसी लहजे में आवाजें भी सुनायी पड़ने लगीं...बदहवास सी आवाजें...चिल्ला चिल्ला कर बोलना...तेज़ चाल में चलना....सफ़र में भी औरतों की चमचम साड़ी...प्लेटफॉर्म पर से ही नज़ारे दिखने शुरू हो जाते हैं...
रोचक विवरण..

गिरिजेश राव said...

वारे गए इस पर्यवेक्षण पर ! शिव बाबू की बात पर ध्यान अपेक्षित है।
@ .हे रजिन्दर…….अरे इहां हौ सीट आर….उहां कहां लां* चाटत हउआ………
हमरे एक 'चचेरे' चाचा थे, उनका तकिया कलाम था । आप ने याद दिला दी।
"तकियाकलाम क्या था?"
"अरे महराज ! समझ लो"

अनूप शुक्ल said...

गजनट पोस्ट है। जो अंश शिव बाबू ने माउसांकित किये उसके अलावा भी तमाम बमचक वाले अंश हैं। गाली गलौज के बारे में हम कुछ न कहेंगे। वैसे हमें तो गाली-गलौज के अधूरे अंश ज्यादा अश्लील लगते हैं।

नियम संख्या 35 के अपवाद स्वरूप आपको अपनी पोस्ट गालियों का सामाजिक महत्व वाली पोस्ट तो पढ़वा ही चुके हैं। अब किसे मुंह से और कोई बात करें!

P.N. Subramanian said...

आपको पहली बार पढ़ रहा हूँ. नाम तो सुना था की (छोटी इ) बड़े पंचम हैं. अच्छा लगा. परन्तु मादर वादर के प्रयोग से बचें भले ही अरविन्द जी ने आपका समर्थन किया हो. हाँ आपने जो फोटू लगायी है सब रेल के बाहर के दृश्य हैं. अन्दर का दिया होता तो मजा बढ़ जाता. पकाऊ यात्री ("पकाऊ" का प्रयोग हमने अपने पुत्र से जाना - लगता है यह हमारी भाषा में हाल ही में प्रवेश कर गया) का फोटो ले लेते तो वह शायद चुप बैठ जाता.

mukti said...

फिर चल दिए गाँव ! अभी कुछ ही दिन पहले तो लौटे थे...रो-धोकर... स्लीपर क्लास का बढ़िया चित्र खींचे हैं... आपके शब्दों में एकदम रापचीक पोस्ट है...

Maria Mcclain said...

interesting blog, i will visit ur blog very often, hope u go for this site to increase visitor.Happy Blogging!!!

फोटो ब्लॉग 'Thoughts of a Lens'

फोटो ब्लॉग 'Thoughts of a Lens'
A Photo from - Thoughts of a Lens

ढूँढ ढाँढ (Search)

© इस ब्लॉग की सभी पोस्टें, कुछ छायाचित्र सतीश पंचम की सम्पत्ति है और बिना पूर्व स्वीकृति के उसका पुन: प्रयोग या कॉपी करना वर्जित है। फिर भी; उपयुक्त ब्लॉग/ब्लॉग पोस्ट को हापइर लिंक/लिंक देते हुये छोटे संदर्भ किये जा सकते हैं।




© All posts, some of the pictures, appearing on this blog is property of Satish Pancham and must not be reproduced or copied without his prior approval. Small references may however be made giving appropriate hyperlinks/links to the blog/blog post.