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Sunday, June 6, 2010

कैसी जुल्मी बनायी तैने नारी.......कि...... मारा गया ब्रह्मचारी..........सतीश पंचम.

        मेरे यहां आज दुपहरीया आसमान में काले काले बादल जमा हो रहे थे। कुछ काले, कुछ श्यामल, कुछ उजले तो कुछ बेहद मटमैले। कुछ का आकार दैत्यों जैसा था तो कुछ पहाडों के होने का भ्रम दे रहे थे। एकाध को देख लग रहा था मानों कहीं आसमान में कोई आग जलाई गई है और उससे उठता धुआँ , उससे उठते गुबार ने समूचे आसमान को ढँक लिया है।
   
            अभी थोडी ही देर हुई थी कि बारिश झमाझम होने लगी। लोग जो यहाँ वहाँ आ जा रहे थे तपाक से किसी दुकान की शेड आदि में जाकर खड़े हो गए। बाईक से जाने वाले बाईक साईड में लगा वहीं कहीं किसी छत के नीचे खड़े हो गए। कुछ लोग उपर से गुजरते पुल के नीचे बाईक खड़ी कर बारिश से बचने लगे। धीरे-धीरे वातावरण में ठंडक आ गई। और आज यही वक्त था जब मैं अपने घर में फिल्म चित्रलेखा देख रहा था।
       
       चित्रलेखा....एक ऐसी फिल्म जो अपने आप में बेजोड़ है..अपने कथानक के कारण, अपने सुमधुर संगीत के कारण, अपने संवादों के गहरे भाव के कारण। और कॉस्ट्यूम............वो तो बस देखते ही रह जांय। सामंत बीजगुप्त का रंगभवन, नर्तकी चित्रलेखा का साज श्रृंगार, उसके बालों में शिवजी की तरह लगा आधे चाँद की आकृति,फूलों और बेलबूटों से सजे बाग. ....किस किस की तारीफ की जाय। हर एक फ्रेम अपने आप में बेजोड़।देखते ही लगता है कि राजा रवि वर्मा के बनाई तस्वीरें चल-फिर रही हैं।

          भगवती चरण वर्मा जी की कहानी पर आधारित यह फिल्म एक नर्तकी चित्रलेखा के इर्द-गिर्द घूम रही है जो मदिरा पान कर रही है, सज धज,..... साज-श्रृंगार में डूबी रहती है और सामंत बीजगुप्त से प्रेम कर बैठी है।
  
         इधर बीजगुप्त का विवाह किसी और से तय है लेकिन वह खुद चित्रलेखा के प्रेमपाश में हैं। इसी दौरान एक ब्रह्मचारी श्वेतांक का आगमन हुआ जिसे कि उसके गुरू ने सामंत बीजगुप्त के पास पाप और पुण्य का भेद जानने भेजा है। श्वेतांक को अपने ब्रह्मचर्य पर बड़ा घमण्ड है। रह रह कर वह महल की स्त्रियों को याद दिलाते रहते है कि मैं बाल ब्रह्मचारी हूँ। मुझे मत छूओ। ब्रहमचर्य नष्ट न करो।

       तब उसके गुरू भाई सामंत बीजगुप्त समझाते हुए कहते हैं कि - ब्रह्मचारी श्वेतांक, तुम्हें किसी स्त्री को नहीं छूना चाहिए। ऐसे ही एक बार श्वेतांक रूपसी चित्रलेखा के सामने पड़ जाने पर उसका रूप देखते ही रह गए मुँह खुला का खुला। तब, सामंत चित्रगुप्त चित्रलेखा से उसका परिचय कराते हुए कहते हैं कि - ये हैं ब्रह्मचारी श्वेतांक, मेरे गुरू भाई।

  श्वेतांक ने सुधारा - ब्रह्मचारी नहीं........बाल ब्रह्मचारी।

 चित्रलेखा ने कटाक्ष करते हुए कहा - मेरा तोता भी ब्रह्मचारी है, बाल ब्रह्मचारी।

    अभी पाप और पुण्य को समझने का यह खेल चल ही रहा है कि चित्रलेखा ने एक दिन अकेले में अपने कोमल कोमल और नरम बतियों में श्वेतांक को उलझा कर उससे मदिरा पान का आग्रह किया....बावले श्वेतांक ने हिचकते हुए ही सही मदिरा पी ली ।  उसी वक्त सामंत बीजगुप्त का आगमन हुआ...श्वेतांक लज्जित.....ब्रह्मचर्य पर आँच.....अब क्या करें।

 आहत श्वेतांक सामंत बीजगुप्त से कहते है - स्वामी, मैंने पाप किया है। आज मैंने मदिरापान किया है। सामंत बीजगुप्त ने समझाते हुए कहा कि मदिरापान में कोई पाप नहीं। मैं तो रोज मदिरा पीता हूँ। लेकिन श्वेतांक का यह कहना कि मैं मदिरापान के बाद खुद को अपराधी महसूस कर रहा हूँ - सामंत बीजगुप्त को यह कहने पर बाध्य किया कि - यदि तुम किसी काम को करने के बाद अपराध महसूस करते हो तो वह कार्य अवश्य पाप है।
जाओ प्रायश्चित करो।

   और उसी वक्त पास बैठी चित्रलेखा के चेहरे के भाव बदल गए ....वह भी तो नर्तकी बन, अपने रूप जाल में फांस कर जो कुछ कर रही है कहीं न कहीं उसमें अपराध है। सामंत बीजगुप्त का यह कहना कि जिस काम को करने से मन में अपराध बोध हो वह पाप है.....चित्रलेखा को गहरे तक भेद गया।
  
      ऐसे में ही सन्यासी कुमारगिरी का आगमन हुआ जो चित्रलेखा को समझाने के लिए आए कि वह सामंत बीजगुप्त का पीछा छोड़ दे और यशोधरा से उनका विवाह हो जाने दे। फिल्म में सन्यासी और एक पतित नर्तकी के बीच पाप और पुण्य को लेकर हुए संवाद बहुत गूढ़ अर्थ लिए हैं और उन बातों को देख सुनकर पता चलता है कि कितनी मेहनत की गई है संवादों के लेखन में और तब तो गजब ही असर आता है फिल्म में जब चित्रलेखा अपने विरोध में खड़े सन्यासी कुमारगिरी को पाप और पुण्य का भेद समझाते यह गीत गाती है कि -

 सन्सार से भागे फिरते हो
भगवान को तुम क्या पाओगे
इस लोक को भी अपना ना सके
उस लोक में भी पछताओगे


ये पाप है क्या ये पुण्य है क्या
रीतों पर धर्म की मोहरें हैं
हर युग में बदलते धर्मों को
कैसे आदर्श बनाओगे


ये भोग भी एक तपस्या है
तुम त्याग के मारे क्या जानो
अपमान रचेता का होगा
रचना को अगर ठुकराओगे
सन्सार से भागे फिरते हो


हम कहते हैं ये जग अपना है
तुम कहते हो झूठा सपना है
हम जनम बिता कर जायेंगे
तुम जनम गँवा कर जाओगे

       पूरे गीत को सुनते हुए महसूस हुआ कि गीतकार साहिर लुधियानवी जी ने कितनी गहराई से सांसारिक जीवन और व्यवहारिक जीवन के द्वंद्व को अपने गीतों के जरिए पेश किया है।

     उधर दिन बीतते गए और राज-रंग में डूबी, सामंत बीजगुप्त के प्रेम में गोते लगाती चित्रलेखा का मन धीरे धीरे अपराध बोध से ग्रस्त होने लगा। उसे लगने लगा कि यशोधरा जिससे सामंत बीजगुप्त का विवाह तय हुआ है उसके प्रति वह अन्याय कर रही है। सन्यासी कुमारगिरी की कही बातें उसे अब भी मथ रही होती हैं कि वह पाप कर रही है...। और एक समय आता है कि चित्रलेखा सब कुछ छोड़ छाड़ कर कुमारगिरी के गुफा में जा पहुँचती है। सांसारिक जीवन का त्याग कर देती है।
    
     कुमारगिरी पहले तो अपने मठ पर किसी महिला साधक के होने पर ही आपत्ति जताई और कहा कि वह उन्हें अपनी शिष्या नहीं बना सकते। लोग सुनेंगे तो क्या कहेंगे। महान साधक और तपस्वी कुमारगिरी के यहाँ एक स्त्री ?
   
   लेकिन चित्रलेखा ने तब सन्यासी कुमारगिरी को चुनौती देते कहा -  क्या इसी तपस्या और ध्यान के बल आप मुझे पतिता मानने लग गए थे जिसमें इतनी भी सामर्थ्य नहीं कि एक स्त्री को अपने यहाँ आश्रय दे सके। मजबूरन कुछ सोच कर सन्यासी कुमारगिरी नर्तकी से सन्यासन बनी चित्रलेखा को अपने यहाँ रहने देने का अनुरोध स्वीकार कर लिया।

       लेकिन, चित्रलेखा ने सन्यास भले धारण कर लिया हो....रूप तो उसका वही था,लावण्य तो उसका वही था। कुमारगिरी का ध्यान भटकने लगा.....तप, जप सब उन्हें अपना मन एकाग्र करने में सहायक न रहे। ईश्वर भक्ति से ध्यान बार बार चित्रलेखा के सौंदर्य की ओर भागता था। और एक दिन सन्यासी कुमारगिरी अपने आप पर काबू नहीं रख पाए और चित्रलेखा के मानमर्दन पर तुल गए।

    वह उसे बताते हैं कि आज सामंत बीजगुप्त का विवाह यशोधरा से हो गया है.....अब वह वापस नहीं लौट सकती....चित्रलेखा ने प्रतिरोध जताया लेकिन सन्यासी कुमारगिरी पर तो वासना ने अपना कब्जा कर लिया था...... चित्रलेखा को बलात् अपने शयनागार में ले जाकर पटक दिया...वासना की आग में रतिक्रीडा को आतुर कुमारगिरी के तप और सन्यास का चोला तार तार होने को उद्दत हो उठा। ऐसे में ही कुमारगिरी के एक शिष्य ने संदेश पहुँचाया कि सामंत बीजगुप्त ने भी राजपाट छोड दिया है और यशोधरा का विवाह श्वेतांक से हो रहा है जो कि अब बीजगुप्त के कहने से नया सामंत बनाये गये है।

     वस्तुस्थिति को जानकर सन्यासी कुमारगिरी को धिक्कारते हुए चित्रलेखा अपने बीजगुप्त से मिलने चल पड़ी और इधर सन्यासी कुमारगिरी की चेतना वापस लौटी.....वह क्या करने जा रहे थे....इसी झूठे जप और तप का बहुत मान था उन्हें......। अपने साथ हुए इस घटना से कुमारगिरी आहत हो आत्महत्या की ओर अग्रसर हुए तो उधर चित्रलेखा और बीजगुप्त का सुखद मिलन हुआ।

     फिल्म की जान है इसके गीत जो गहरे भाव लिये हैं। महमूद के रोल में श्वेतांक बहुत आकर्षित करते हैं तो सामंत बीजगुप्त के रोल में प्रदीप कुमार। चित्रलेखा के रूप में मीना कुमारी ने बहुत ही ज्यादा असरदार भूमिका अदा की है। भव्य चित्रण और क्लासिक फिल्मों के नजरिए से देखा जाय तो चित्रलेखा एक उत्कृष्ट फिल्म है।
 
  एक गीत जो बहुत ही ज्यादा सुमधुर और मन्नाडे की आवाज में गाया गया, वह है ब्रह्मचारी श्वेतांक के जरिए यशोधरा के प्रेम पाश में पड़ने पर गाया गीत -



लागी मनवा के बीच कटारी
कि मारा गया ब्रह्मचारी
कैसी ज़ुल्मी बनायी तैने नारी
कि मारा गया ब्रह्मचारी


ऐसा घुँघरू पायलिया का छनका
मोरी माला में अटक गया मनका
मैं तो भूल प्रभू सुध-बुध सारी
कि मारा गया ब्रह्मचारी ...


कोई चंचल कोई मतवाली है
कोई नटखट, कोई भोली-भाली है
कभी देखी न थी,
 ऐसी फुलवारी कि मारा गया ...


 बड़ी जतनों साध बनायी थी
मेरी बरसों की पुण्य कमायी थी
तैने पल में, भसम कर डारी कि
मारा गया ब्रह्मचारी ...


 मोहे बावला बना गयी वाकी बतियाँ
मोसे कटती नहीं हैं अब रतियाँ
पड़ी सर पे बिपत अति भारी
कि मारा गया ब्रह्मचारी...


मोहे उन बिन कछू न सुहाये रे
मोरे अखियों के आगे लहराये रे
गोरे मुखड़े पे लट कारी-कारी
कि मारा गया ब्रह्मचारी...

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तो यह रही मेरी आज की दुपहरीया की समयावली.............आसमान मे दलबंदी करते काले काले बादलों की घटाटोप के बीच फिल्म चित्रलेखा की देखवाई।

- सतीश पंचम

67 comments:

मनोज कुमार said...

आज कोलकाता में भी बादल उमड़े-घुमड़े और बरस कर चले गये।
और आपके ब्लॉग पर चित्रलेखा भी देख लिया।
सजीव चित्रण। अद्भुत शैली। अबाध प्रवाह।

Arvind Mishra said...

रूमानी मनवा सनक ग बा आज .....!

राज भाटिय़ा said...

इस फ़िल्म के गीत बहुत सुंदर है बिल्कुल फ़िल की तरह से ही आप का धन्यवाद इस सुंदर जानकारी के लिये

अनामिका की सदाये...... said...

sunder chitran
aabhar

सिद्धार्थ शंकर त्रिपाठी said...

बड़ा मनभावन ब्यौरा दिया आपने- मौसम के मिजाज का भी और चित्रलेखा की कहानी का भी। इस उम्मीद पर हम भी सन्तोष किए बैठे हैं कि इस इलाके में भी बादल आकर हमारा संकट हरेंगे।

बहुत आभार।

Udan Tashtari said...

बढ़िया ब्यौरा..लगा कि चित्रलेखा देख रहे हैं.

mukti said...

मैंने अभी जल्दी ही ये फ़िल्म देखी है. सच में बेजोड है. इसके गाने तो बचपन से सुनती रही हूँ. मेरी अम्मा वो ऊपर वाला गाना अक्सर गाती थीं और उसका भी वो अंतरा "अपमान रचेता का होगा" उन्हें बहुत पसंद था. जब ये गीत सुनती हूँ तो अम्मा की याद आ जाती है.
महमूद पर फिल्माए मन्ना डे के गाये लगभग सभी गीत सुपरहिट रहे हैं और मुझे बेहद पसंद हैं.

mukti said...

@ अरविन्द मिश्र, वर्षा ऋतु में अच्छे खासे सनक जाते हैं, ये तो फिर कच्ची अमिया पर नमक लगाकर खाने वाले आदमी हैं.

Neeraj Rohilla said...

@मुक्ति,
हाय हाय, कच्ची अमिया पर नमक...

उफ़...

सतीश पंचम said...

मुक्ति जी,

अक्सर किसी का ब्लॉग प्रोफाईल कोई याद नहीं रखता...उसमें क्या क्या लिखा गया है यह कोई ध्यान नहीं देता लेकिन मुझे खुशी हुई कि आपने मेरे कच्ची अमिया पर नमक वाले गीत के अंश याद रखे :)

नीरज जी,

मुक्ति जी ने जिस संदर्भ में यह कच्ची अमियों वाला प्रसंग छेडा है वह अंश मेरी एक कविता से जुड़ा है जिसे मैंने अपने प्रोफाईल में लिखा है।

यह रही वह कविता -


अच्छा लगता है मुझे,
कच्चे आम के टिकोरों से नमक लगाकर खाना,
ककडी-खीरे की नरम बतीया कचर-कचर चबाना।
इलाहाबादी खरबूजे की भीनी-भीनी खुशबू ,
उन पर पडे हरे फांक की ललचाती लकीरें।
अच्छा लगता है मुझे।
आम का पना,
बौराये आम के पेडो से आती अमराई खूशबू के झोंके,
मटर के खेतों से आती छीमीयाही महक ,
अभी-अभी उपलों की आग में से निकले,
चुचके भूने आलूओं को छीलकर
हरी मिर्च और नमक की बुकनी लगाकर खाना,
अच्छा लगता है मुझे
केले को लपेट कर रोटी संग खाना,
या फिर गुड से रोटी चबाना।
भुट्टे पर नमक- नींबू रगड कर,
राह चलते यूँ ही कूचते-चबाना।
अच्छा लगता है मुझे।

लोग तो कहते हैं कि किसी को जानना हो अगर
उसके खाने की आदतों को देखो,
पर अफसोस........
मायानगरी ने मेरी सारी आदतें
Luxurious शौक में बदल डाली हैं।

- सतीश पंचम

मुक्ति जी,

पुनश्च: धन्यवाद कि आपने मेरे प्रोफाईल को इतने ध्यान से देखा :)

Arvind Mishra said...

@मुक्ति जी ,गजब ! आप भी !! पंचम भी अपने जार जवार के मनई हैं -
और इनका प्रोफाईल बहुतै घातक है ...पढ़ कर ही यहाँ जमा हुआ हूँ और
कड़ी नजर है इन पर .....और आपने भी आज धर दबोचा!
सतीश जी पूंछ रहे हैं कि क्या आपने सुतुही से छील छील कर अमराई में
किसिम किसिम के आम नमक लगा के नहीं खाये ? कुछ नाम तो आज भी याद
होंगे ही !
खेतहवा ,सिकड़हवा ,सुग्गहवा, बैरियहवा ...
आईये अमराईयों में लौटे ...मौका भी मौसम भी है और दस्तूर भी ...
हम आपको जौनपुर में आम खाने सम्मिलित दावत देते हैं .....अब आम पक गए हैं !

सतीश पंचम said...

अरे का बात कही अरविंद जी,

एकदम्मै मन हिलोर।

सुतुही से आम छीलकर मैंने भी बहुत खाए हैं......ढेले वाले नमक के साथ......दांत कोठ होने की हद तक....चोपी लगने से न जाने कितने दिन तक अपने मुंह के परपराने वाली पीड़ा भी झेली है...लेकिन आम खाना नहीं छूटा :)

और मुझे लगता है जो भी गाँव जवार में रहा होगा हर किसी को कभी न कभी चोपी लगी होगी....दांत कोठ हुआ होगा...लेकिन फिर भी आम तो आम ठहरा....ऐसे न खाता होगा तो दाल में डाल कर खाता होगा....अमचूर बना खाता होगा।

यहां मुंबई में तो अब भी कच्चे आम खरीदकर दाल में डालता हूँ। देखने वाले शंका करते हैं कि इनके घर में कही कोई पेट से तो नहीं है.....उन्हें क्या पता कि पेट से तो नहीं लेकिन पेट वाला पेटू जरूर है।

दावत देने के लिए धन्यवाद।

अभी परसों ही गाडी पकड रहा हूँ जौनपुर के लिए.....परिवार को लाने जा रहा हूँ....गर्मी की छुट्टियां खत्म जो हो रही हैं। बहुत कम समय के लिए जा रहा हूँ...बेहद व्यस्त....अगली बार आपको पकड़ कर ले जाउंगा अमराई में और तब तक आम खिलवाऊंगा जब तक दांत कोठ न हो जाय...देखते हैं हम दोनों में कौन जीतता है :)

आत्मीय टिप्पणी के लिए धन्यवाद।

Arvind Mishra said...

@बाजी लगा लीजिये सतीश भाई नहीं हरा पायेगें -बचपन में एक बैठकी में ५५ सेनुरहवा आम खाने का रिकार्ड है !
इस बार बनारस ही आ जाईये ? कहाँ से ट्रेन पकड़ेंगें ? एक ठू बलागर मीट हुयी जाए बनारसी लंगड़ा के साथ !

सतीश पंचम said...

@ अरविंद जी,

55 आम ?

आहि रे दादा.... आप पर तो एक फिल्म बन सकती है जिसका टाईटल होगा - अब तक पचपन :)

'ब्लॉगर मीट' की बजाय 'मित्र बैठकी' कहिए वरना ब्लॉगर मीट का हाल तो देखही रहे हैं एक दूसरे का मीट बनाने पर तुले हैं महानुभाव लोग :)

दादर स्पेशल से वाराणसी ही उतर रहा हूँ 11 जून को सुबह सुबह....बशर्ते कौनो लेट लतीफी न हुई जाय :)

जल्द ही आपसे मेल पर बाकी संवाद स्थापित करता हूँ।

वाणी गीत said...

चित्रलेखा मेरी पसंदीदा फिल्मों में से एक है ...
इसके गीत तो बहुत ही खूबसूरत हैं ...

लेख पर टिप्पणियां भी कम रोचक नहीं है ...पूरक ही है ...!!

गिरिजेश राव said...

इस फिल्म ने उपन्यास की 'हत्या' कर दी थी। न तो मीनाकुमारी में चित्रलेखा का तेज दिखता है और न कुमारगिरि के रूप में अशोक कुमार में वह 'घातक गुनाही सम्मोहन'। प्रदीप कुमार का अभिनय तो हमेशा छोटी सीमा में बद्ध रहा। श्वेतांक का चरित्र विदूषक निभा गया। उपन्यास प्रकाशित होने के 30 वर्षों के बाद इस विषय को छूने का साहस दिखा कर भी निर्माता बम्बैया फॉर्मुले में उलझ कर रह गया।
मैं कुछ अधिक कटु हो रहा हूँ। लेकिन मुझे ऐसा ही लगा।
हाँ, गीत और संगीत उत्कृष्ट से भी आगे की श्रेणी के हैं। सम्वाद जानने हों तो मूल उपन्यास पढ़ना चाहिए।
पोस्ट से अधिक टिप्पणियों में आनन्द आया। जै हो सतीश महराज!

गिरिजेश राव said...

@ मेरे यहां आज दुपहरीया आसमान में काले काले बादल जमा हो रहे थे। कुछ काले, कुछ श्यामल, कुछ उजले तो कुछ बेहद मटमैले। कुछ का आकार दैत्यों जैसा था तो कुछ पहाडों के होने का भ्रम दे रहे थे। एकाध को देख लग रहा था मानों कहीं आसमान में कोई आग जलाई गई है और उससे उठता धुआँ , उससे उठते गुबार ने समूचे आसमान को ढँक लिया है।

अभी थोडी ही देर हुई थी कि बारिश झमाझम होने लगी। लोग जो यहाँ वहाँ आ जा रहे थे तपाक से किसी दुकान की शेड आदि में जाकर खड़े हो गए। बाईक से जाने वाले बाईक साईड में लगा वहीं कहीं किसी छत के नीचे खड़े हो गए। कुछ लोग उपर से गुजरते पुल के नीचे बाईक खड़ी कर बारिश से बचने लगे। धीरे-धीरे वातावरण में ठंडक आ गई।

चित्र खींच दिया ! वाह!!

गिरिजेश राव said...

उस काल के वस्त्र, आर्किटेक्चर, वातावरण वगैरह का अनुभव लेना हो तो चाणक्य धारावाहिक देखिए। तब पता चलेगा कि राजा रवि वर्मा का नकारात्मक प्रभाव क्या है।

'अदा' said...

हे..भगवान्...
जी में तो आ रहा की मथवे कहीं बजड देवें...
ई फिलिम्वा तो हम देखबे नहीं किये हैं न...
बाकी सतीश जी आप फंटास्टिक लिखते हैं....ऐसा बुझा रहा था जैसे सब सीनवासन-सन पार हो रहा है आखीं के सामने से... सब सीन देखा रहा था....
अब चलिए हमहूँ जोगाड़ भिड़ाते हैं ....चित्रलेखा देखने का..मिल जाए तो देख लेंगे...
गिरिजेश जी तो पूरा मूड ऑफ करने में तुले हुए हैं...बाकी देखेंगे हम ज़रूर....उन्खा भरोसे रहता जो फिलिमवाला लोग तो एक ठो फिलिम नहीं बना पाता...
हाँ नहीं तो...!

Suresh Chiplunkar said...

उपन्यासों की "वाट" लगाने में तो मुम्बईया निर्माता माहिर हैं… कोई कम तो कोई ज्यादा। भंसाली की देवदास को देखकर शरत बाबू ने स्वर्ग में कितना सिर फ़ोड़ा होगा क्या जाने। लेकिन सतीश जी की बात से सहमत हूं कि फ़िल्म बनाई जाती है मनोरंजन के लिये इसलिये उसमें इस प्रकार की Flexibility ली जाती है।

चित्रलेखा फ़िल्म मुझे भी बहुत अच्छी लगी थी,

"ये पाप है क्या, ये पुण्य है क्या
रीतों पर धर्म की मोहरें हैं"

ये लाईने तो वाकई "मारू" हैं… "तोड़ू" हैं… :)

mukti said...

@ सतीश जी, गिरिजेश जी से मैं असहमत हूँ. मैंने पहले फिल्म देखी और बाद में उपन्यास पढ़ा. इसे पढते हुए सारे पात्र बिल्कुल फिल्म के जैसे लगे जबकि और उपन्यासों पर बनी फिल्मों के पात्र उपन्यास पढते समय याद ही नहीं रहते. सच है, हर विधा की अपनी सीमा होती है और इस सीमा के भीतर फिल्म काफी अच्छी है.
चाणक्य धारावाहिक जब आया था तब मैं बहुत छोटी थी, पर तब भी मुझे इतना क्लिष्ट नहीं लगा जितना आप कह रहे हैं. हर दृष्टि से बेजोड़ था वह.
आपकी इस कविता ने आपके पूरे व्यक्तित्व से साक्षात्कार करा दिया था. इसे कैसे भूल सकती हूँ. एकदम कौडे की मद्धिम आँच में भुनी आलू की ही तरह सौंधी है ये...

mukti said...

अपि च , यहाँ पुरुषगण जिस तरह ललचा-ललचाकर कच्ची अमिया की खट्टी बातें कर रहे हैं, उसे पढकर अब कोई ये नहीं कह सकता कि औरतें खट्टा खाने में ज्यादा आगे होती हैं.

Arvind Mishra said...

@सतीश जी ,
टाईटिल से याद आया -
बचपन में पचपन कैसा रहेगा ?

Arvind Mishra said...

@जवाब देने का पहला हक़ सतीश भाई का है -इसलिए हम बोल नहीं रहे हैं!
वैसे अमराई की यादें जरूर विचलित कर रही हैं मगर कोफ़्त यह कि अभिधा में कुछ कह नहीं
पा रहा हूँ और लक्षणा ,व्यंजना आप को पसंद नहीं !

rashmi ravija said...

बहुत पहले पढ़ी थी चित्रलेखा...आपकी पोस्ट ने सब याद दिला दिया...कहाँ से मिल जाती है आपको इतनी पुरानी फिल्मों की DVD...?? कई फ़िल्में हमने भी सोच कर रखी हैं कि देखनी है पर कहाँ ढूंढें यही सोच कर रह जाते हैं...किताबों की तरह इनका पता-ठिकाना भी दे दें...:)

rashmi ravija said...

किताबों पर बनी फिल्मों की चर्चा चल रही है तो....सोचा अपना अनुभव भी शेयर कर लूँ.......इतना तो तय है कि आजतक किसी भी कृति पर बनी फिल्म उसके साथ न्याय नहीं कर पायी है...हिंदी की हो या अंग्रेजी की पर वही बात है....फिल्मों की अपनी सीमाएं हैं और उन्हें उसके निर्माण पर लगे पैसे भी निकालने पड़ते हैं...(अगर मुनाफे की बात छोड़ दें)...पर एक पुस्तक अपवाद है Mistress of Spices यह पुस्तक बहुत बोरिंग थी...फिल्म, थी तो विशुद्ध आर्ट फिल्म, पर किताब से ज्यादा अच्छी थी...शायद इसलिए भी कि पुस्तक की नायिका..अस्सी बरस की थीं और फिल्म की नायिका थीं,ऐश्वर्या राय :)..(पर इसके सिवाय कथानक के साथ कोई छेड़छाड़ नहीं थी)....कभी एक पोस्ट लिखूंगी इस फिल्म पर

Pankaj Upadhyay (पंकज उपाध्याय) said...

अच्छा वो सीपी जैसी चीज़ जिससे अमिया को छीलते थे उसे 'सुतुही' कहते हैं :) क्या बात है.. आप लोगो ने भी क्या याद करवा दिया| :) मुक्ति को धन्यवाद इसके लिये|

'चित्रलेखा' फिल्म नहीं देखी है लेकिन किताब पढी हुयी है और मुझे तीनो पात्रो के मध्य संवादों ने बेहद प्रभावित किया था... :) नैतिकता और अनैतिकता, पाप और पुण्य को तर्कों के साथ कम्पेयर किया गया था, कई मायने और धारणाये इस नोवेल ने बदले थे... इस पर फिल्म भी है, ये मुझे नहीं पता था.. देखते हैं, तभी कह सकते हैं कि इन्साफ हुआ है कि नहीं...

आज मौसम यहाँ तो एकदम सुहाना है.. मन तो कर रहा है कि अदरक वाली चाय के साथ कमलेश्वर कि कहानियों कि किताब ख़त्म कर डालूँ.. अभी आधी पढ़ पाया हूँ.. लेकिन अपनी किस्मत भी.. ऑफिस में बैठा हुआ मूड को बूट कर रहा हूँ... बुहुहुबू :(

shikha varshney said...

आह हा मजा आ गया यहाँ आकर तो ..एक तो चित्रलेखा देख ली ..ओर दूसरी अमिया पर नमक लगा कर खाने का स्वाद भी ले लिया ..आपकी ये कविता बहुत ही खूबसूरत है सतीश जी !

वन्दना said...

takriban 25 saal pahle dekhi hogi ye movie aur aaj bhi jivant hai yaadon mein aur yahan aakar yaadein phir taaza ho gayin.........apne aap mein ek bahut hi badhiya film thi .

neelima sukhija arora said...

बादल तो आज जयपुर में भी खूब उमड़े घुमड़े लेकिन बरसे बाड़मेर जैसलमेर में। वैसे पोस्ट से ज्यादा मजा कमेंट में आया

देव कुमार झा said...

गज़ब... मजा आ गया चित्रलेखा देखकर
और यह तो बहुत ही सही लगा...

सन्सार से भागे फिरते हो
भगवान को तुम क्या पाओगे
इस लोक को भी अपना ना सके
उस लोक में भी पछताओगे

वाह वाह..

प्रवीण पाण्डेय said...

इस फिल्म के गाने बहुत भाते हैं ।

हिमान्शु मोहन said...

ऊल जलूल टिप्पणी ही देंगे। हटाइए आप।
अमिया की बात, चित्रलेखा की बात, साहिर लुधियानवी की बात।
और हम बस चुप रहें? हमेशा तो चले जाते हैं पढ़ के - बिना टीपे - आज नहीं। आज छेड़ ज़्यादा हो गई है और आज क्या - इन दिनों कोई बादल नहीं दिखा है।
बादल के माने अभी तो धर्मेन्द्र के परिवार के सदस्य के किसी घोड़े की याद दिलाता है - बारिश की नहीं।
और चित्रलेखा का सबसे ज़्यादा पसंदीदा गीत मेरा तो वही है - "तुम्हें याद करते-करते"
और ये गीत जो साहिर के हैं, सब उनके नहीं - जाँनिसार अख़्तर के भी हैं। ख़ासकर वही - जिसका आपने संदर्भ दिया -"संसार से भागे फिरते हो"
जाँनिसार ने काफ़ी नज़्में और कविताएँ साहिर को बेचीं - माहवारी तन्ख़्वाह पर लिखा उनके लिए - क्योंकि साहिर का नाम चलता था उन दिनों।
यह साहिर को नीचा दिखाने वाली बात नहीं, समझना चाहिए कि साहिर भी अपने दोस्त की मदद कर रहे थे - क्योंकि रचनाएँ बिक रही थीं जाँनिसार की, मगर उनके नाम से नहीं - क्योंकि तब वह नाम स्टार नहीं था। साहिर का लेखन उत्कृष्ट था, और दोस्ती भी यारों के यार वाली, सिर्फ़ प्रशंसा की अदम्य प्यास थी उनमें।
क्या ले बैठा! तो बात अमियाँ की है और जौनपुर की - और बनारस में मिलन की या बादलों की - या फिर इलाहाबादी खरबूजों की - पंचम जी, हमने भी आपकी प्रोफ़ाइल पूरी रट रखी है, और इतनी आकर्षक है कि आपके अनुसरण को प्रेरित ही हम उसी से हुए थे। लेख तो एक दो ही पढ़े थे तब तक।
उपन्यास और फ़िल्म में व्यावसायिक अंतर स्वीकार्य हैं, और "आँधी" पहले "काली आँधी" नाम से तथा "मौसम" पहले "आगामी अतीत" नाम से पढ़ चुके थे हम। कमलेश्वर और गुल्ज़ार की जुगलबन्दी कमाल रही। और "गाइड" के बारे में क्या कहेंगे? मुझे तो दोनों ही रूप ख़ूब रुचे -फ़िल्म भी - नॉवेल भी। कितने लोगों को पता / याद होगा कि धर्मवीर भारती के "गुनाहों का देवता" पर फ़िल्म बन रही थी "एक था चंदर - एक थी सुधा" जिसमें अमिताभ-जया थे। अमिताभ ने ख़ूब साइकिल चलाई उन दिनों थॉर्नहिल रोड पर, मैकफ़र्सन लेक की भी शूटिंग हुई और विश्वविद्यालय की भी। फिर साहित्य की सही प्रस्तुति न कर पाने और व्यावसायिक अपील में कमज़ोर पड़ने के सम्मिलित भय से यह फ़िल्म डिब्बा-बन्द हो गई। कभी सोचता हूँ कि ऐसी फ़िल्मों को खोज कर उन अंशों को यदि कुशल संपादन के साथ प्रस्तुत किया जाय तो कितनी रोचक डॉक्यूमेण्ट्री बन सकेगी!
अब काफ़ी ऊल-जलूल तो लिखा, पर लिंक कहाँ से लाऊँ सारी शर्तों को आज ही तोड़ने के लिए?
आइडिया - ये रहा लिंक भी - मेरी आज की पसंदीदा पोस्ट का http://safedghar.blogspot.com/2010/06/blog-post_06.html
जब आपकी प्रोफ़ाइल तक पहुँचे, तब तक अपनी प्रोफ़ाइल से "तीसरी क़सम" का नाम मिटा चुके थे हम। वजह? ज़्यादातर हमारे मित्र जो बने थे वो सभी नौजवान थे और हमें लगा कि इनको शायद ये फ़िल्में पसन्द न आएँ। आपने "बावर्ची" और "ख़ुश्बू" देखी हैं? और "ख़ामोशी" (पुरानी)? "काग़ज़ के फूल"? अगर "काग़ज़ के फूल" न देखी हो तो मेरा सुझाव मानकर देख लीजिए- काले-सफ़ेद में सेल्यूलॉयड पर कविता मिलेगी - वही एक कविता - जिसका वादा था मिलेगी मुझसे - डूबती नब्ज़ों में जब दर्द को नींद आने लगे -ज़र्द सा चेहरा लिए चाँद उफ़क तक पहुँचे…
इलाहाबाद में थोड़ा ठहर कर न भी जाएँ, वापसी किस ग़ाड़ी से है? मिलते हैं भाई!

डा० अमर कुमार said...


चलचित्र में हेरते फिरते हो,
किरदार कहाँ फिर पाओगे

कथासार के छायाँकन पर रीझे हो
उस युग की रीत न कभी पाओगे

हे पँचम, मैंनें अपने समस्त इन्द्रियों के जोर पर चित्रलेखा को हृदयँगम करने का महती प्रयास किया ।
पर हा वत्स.. यवनदेश के पारसी रँगमँच के हावभावों से चित्रलेखा के पात्र अतिनाटकीय हो, अतिरँजना की परमगति को प्राप्त ्होते भये ।
बरसात की झड़ी में मछुआरन भी रँभा लाग्यै, अप चित्रलेखा पर रीझे तो ऎसा रीझे कि बात अमिया नमक कचरने तक पहुँच गयी ?
नारायण नारायण

ajit gupta said...

चित्रलेखा को पुन: साकार करने के लिए आभार। मुझे लगा कि शायद गाना भी सुना रहे हैं। अच्‍छा होता कि सुना ही देते, संसार से भागे फिरते हो ---

Pankaj Upadhyay (पंकज उपाध्याय) said...

आपने जिस तरीके से बयान किया है, पैसा वसूल नोवेल लगता है.. जल्द ही उन पन्नो को ढूढिये और एक पोस्ट ठेलिये :)

थोडी हिमान्शु जी की बात भी कर लूं :) बडे प्यारे इन्सान है.. जिस अपनेपन और जोश से वो टिप्पणी करते है, कोई और हो तो एक दो पोस्ट ही ठेल दे.. ’कमलेश्वर’ से मेरा परिचय इन्होने ही करवाया है और मै ताउम्र इसके लिये उनका शुक्रगुज़ार रहूगा..

सतीश जी इलाहाबाद भी घूम आइये.. अच्छा लगेगा जब दो बेहतरीन और निराले अन्दाज वाले लोग मिलेगे... हम तो पढने के लिये बैठे है.. दोनो लोग एक दूसरे के बारे मे कुछ भी ठेलियेगा, हम कैसे भी दिल पर पत्थर रखकर पढ लेगे.. :)

आपकी यात्रा शुभ हो और 'मित्र बैठकी' मनोरंजक और सौहार्दपूर्ण हो.. :)

सतीश पंचम said...

हिमान्शु जी,

आपने तो मुझे गदगद कर दिया....एकदम विभोरहा हो गया हूँ :)

मैने कागज के फूल की सीडी डेढ-दो महीने पहले खरीद तो ली थी लेकिन अभी थोड़ा ही देखा था कि घर में बच्चे स्कूल से आ गए और लगे कार्टून वगैरह देखने । कागज के फूल की सीडी अभी भी तब से ड्रॉअर में रखी है जस की तस।

इसी बीच चित्रलेखा, आनंदाश्रम, अभिमान न जाने और कितनी देखता रहा और कागज के फूल वैसे ही पड़ी रही।

दरसल मैं साठ-सत्तर के दशक की फिल्में परदे गिरा कर, आराम से लेटकर, हल्के प्रकाश में देखता हूँ...चाय पीते हुए....नमकीन टूँघते हुए....बिना डिस्टर्ब हुए। यह मेरी एक तरह की नवाबी है जिस पर पत्नी झिडकती रहती है कि क्या पुरान धुरान बुढवन की फिल्में देखते हो :)

वैसे मेरी यह नवाबी भी तभी चलती है जब कोई चाय बनाकर देनेवाली हो...फिल्म देखने का मन भी तभी बनता है.....वरना फिल्म देखा जाय कि चाय बनाई जाय। अब पता चला कि फिल्म का आधा स्वाद तो श्रीमती जी की चाय की वजह से था:)

जल्द ही कागज के फूल भी देखूंगा।

और तीसरी कसम......इसके बारे मं क्या कहूँ....इतनी बार इस फिल्म को देख चुका हूँ कि पान खाए संईया हमार वाला गाना सीडी में घिस घिस कर दिखता है :)

सतीश पंचम said...

अमर जी,

कहावत है कि दिल लगा मेढ़की से तो पद्मिनी क्या चीज है :)

अपना दिल तो ऐसी ही मेंढ़कीयों पर रीझता है.....एक ही लट सुलझाने में गुलजार जब सारी रात गंवा सकते हैं तो फिर हम तो लट्टू ठहरे ऐसी अदाओं पर । अब वह पारसी थियेटर हो कि बंगाली अपने को कोई फर्क नहीं पड़ता :)

मुझे बिश्टी पड़े टापुर- टूपूर दुनिया देखे टुकूर टूकूर ....... भी उतना ही पसंद है जितना कि ढगात लागली कळ वाला मराठी गीत । ऐसे में ये मौसम भीगा भीगा...डम डम डीगा डीगा.....तो अच्छा लगेगा ही.

चित्रलेखा को आर्ट फिल्म के नजरिए से न देख कॉमर्शियल फिल्म के नजरिए से देखने पर ही फिल्म का असली मजा मिल सकता है।

सतीश पंचम said...

पंकज जी,

इलाहाबाद में पहले से ही कई बार आता जाता रहा हूँ कम्पटीशन की पढ़ाई के दौरान.....अब भी कभी कभी कुंभ में अपने पाप धोने चला जाता हूँ......मुझे डर है कि कहीं वहां मिलने जाउं और पता चला भाई लोग पकड़ लिए कि - क्या यहाँ लॉण्ड्री समझ रखा है जो बार बार यहाँ अपने पाप धोने आते हो:)

हिमान्शु जी,

इस बार बहुत कम समय के लिए जा रहा हूँ गाँव...अगली बार जब आउंगा तो जरूर मिलूंगा।
इस तरह का मिलना जुलना अच्छा लगता है मुझे भी।

सतीश पंचम said...

Ajit gupta ji,

चाहा तो मैंने भी था कि गाना ही सुनवा दूँ लेकिन आलस और कुछ तकनीकी दिक्कतों की वजह से नहीं सुना पाया।

यह रहा लिंक जिसमें कि चित्रलेखा के लगभग सभी गानों के विडियो हैं।

संसार से भागे फिरते हो गीत का लिंक ये रहा -

http://www.youtube.com/watch?v=pueoTXV6FLY


एक और लिंक है जिसमें चित्रलेखा से संबंधित लगभग सारे गीत है। ये रहा लिंक -


https://www.google.com/search?q=chitralekha+meena++youtube&hl=en&sa=G&prmd=v&source=univ&tbs=vid:1&tbo=u&ei=djUNTLGCKcWvrAfAjOm5Bg&oi=video_result_group&ct=title&resnum=1&ved=0CBoQqwQwAA

Sanjeet Tripathi said...

bhai mere, itna sab padhne ke bad kya kahu kucchh samajh me hi nai aa raha hai, bas yahi kah sakta hu ki aapki lekhni aur aapke uthaye muddo ka kayal hu,.........dekhte hai ki aapki yatra ke dauran kin kin se mulakat hoti hai, vivran padhna chahunga...

zeal said...

1- Chitralekha- A wonderful female character showing mirror to the so called saints in our society.

2- Last picture in the post is objectionable , as we have beautiful robes to hide the curves and contours of a woman.

Divya

soni garg said...

कहाँ से शुरुवात करे समझ नहीं आ रहा ............ये चित्रलेखा तो मैंने अभी तक देखी ही नहीं शायद थोडा पीछे रह गई पर पड़ कर अच्छा लगा अब जल्द ही देखूंगी भी ............और आखिर में मुक्ति जी बात से सहमत होते हुए कहूँगी कि वास्तव में अभी तक तो यही समझा जाता था कि कोई भी आम प्रतियोगिता करवा लो जीतेंगी कोई महिला ही पर यहाँ तो बड़े-बड़े आम खाऊ बैठे है ..........और एक बात आपका अनुसरण करना ही आपके प्रोफाइल कि कविता को देख कर शुरू किया था .........वो का है ना आम खाई के हम भी बड़े शोकिन हा ................

Shiv said...

बहुत गज़ब पोस्ट. जैसे किसी 'फिलिम' को देखकर कहते हैं पैसा वसूल हो गया वैसे ही. कमाल की पोस्ट.

स्वाति said...

आपके ब्लॉग पर चित्रलेखा फ़िल्म का सजीव चित्रण
देख लिया। धन्यवाद..

गिरिजेश राव said...

मुझे अंतिम चित्र कलात्मक लगा।
आप सभी पंच जनों से अनुरोध है कि उपन्यास को समय ले कर पढ़ डालिए। बहुत मोटा भी नहीं है। विश्वास कीजिए यदि लगन से पढ़ेंगे और उसके बाद फिलम देखेंगे तो हमरी बात से इत्तेफाक व्यक्त करेंगे।

सतीश पंचम said...

दिव्या जी, गिरिजेश जी,

मुझे भी अंतिम चित्र में कलात्मकता और एक तरह का रास-रंग, नाच गाने का माहौल समझाने का प्रयास लगता है। रंग महल शायद ऐसे ही होते होंगे।


मुझे लगता है अब तो किताब पढनी ही पडेगी।

zeal said...

'kala' ke naam ka 'aavran' bura nahi hai.

I can very well understand how the men folk are enjoying the 'kalatmakta' in the pic.

Unfortunately being a woman i find it offending to put revealing pics of women in the name of 'kalatmakta'

By the way if you have any 'kalatmak - penis', then kindly put it here for women folk to enjoy the kala in it.

regards

सतीश पंचम said...

दिव्या जी,

जब आप कलात्मक आवरण की बात कह रही हैं तो क्या खजुराहो को ढहा दिया जाय....क्या रवि वर्मा की पेंटिंग्स के नष्ट कर दिया जाय....क्या तमाम जो मंदिरों के प्रकोष्ठों, अटारियों पर जो मूर्तियां हैं उनको हटवा दिया जाय क्योंकि कहीं वह मुर्तियां भक्तों का ध्यान न भटका दें ?

मुझे याद है गिरिजेश जी की ही एक पोस्ट थी जिसमे उन्होंने यह प्रश्न उठाया था एक कविता के रूप में -


एक प्रश्न

आज कल एक प्रश्न बहुत सता रहा है - पुरुष शरीर पर उतनी कविताएँ क्यों नही हैं जितनी नारी शरीर पर ?
तुलसी टाइप नहीं ..ऐसी जो
बबूल के काँटों का राग रचें,
बाहु मांसपेशियों में मचलती मछलियों की रवानी के छ्न्द गढें,
मुक्त अट्टाहस में गूँजते प्रलय रव को सुनें सुनाएँ,
वक्ष की रोमावलियों पर कोमलता को सँभालती रुक्षता को पखावज नाद दें
.. क्यों नहीं हैं?


मैं पुरुष शरीर पर ऐसा कुछ रचना चाहता हूँ:
शत घूर्णावर्त तरंग भंग उठते पहाड़
जल राशि राशि पर चढ़ता खाता पछाड़
तोड़ता बन्ध प्रतिसंध धरा हो स्फीत वक्ष
दिग्विजय अर्थ प्रतिपल समर्थ बढ़ता समक्ष (निराला, राम की शक्ति पूजा)


जाने कब हो पाएगा ?
दिनकर ! तुम्हारी उर्वशी के छ्न्द कब इस आकाश में उतरेंगे?
-------------

यह सवाल अब भी मुझे मथ रहा है कि क्यों नारी देह के मुकाबले पुरूष देह पर कम क्यों लिखा गया है।

मेरे हिसाब से किसी चीज को देखने का नजरिया ही उसे कामुक या कलात्मक की श्रेणी में रखता है।

बाकी तो नारी देह, पुरूष देह पर बहस तो न जाने कितने सालों से चल रही है और न जाने अभी और कितने सालों चले इस तरह की बहस।

यदि आपको अब भी आपत्ति हो तो बताएं...मैं इस चित्र को हटा दूंगा।

सतीश पंचम said...

दिव्या जी,

यह रहा गिरिजेश जी की उक्त कविता का लिंक जिसमें उठाया गया प्रश्न उस वक्त भी प्रासंगिक था जब यह पोस्ट नहीं लिखी गई थी और आज जब आपने नारी देह और पुरूष देह पर एक चित्र के माध्यम से जो प्रश्नवाचक चिन्ह लगाया है उससे तो यह कविता मुझे बहुत सटीक और बेहद प्रासंगिक लग रही है ।

http://kavita-vihangam.blogspot.com/2010/05/blog-post_04.html

Arvind Mishra said...

खजुराहो को ध्वस्त कर दो !कामसूत्र को जला दो -हम नए तालिबानी हैं !

zeal said...

Satish ji,

We cannot change the past. Let's live in present. I do not have rights to ask to destroy the ajanta statues , nor i have the right to ask you to remove the pic. It's just freedom of expression. I expressed my views.

In society people raise voice against girls wearing, revealing clothes but ironically they admire the kalatmakta in nude pics.

Let's talk about Chitralekha...in which The gorgeous lady is beautifully dressed up and yet her beauty is irresistible by a saint even.

Do we have to go back to 'Adi-kaal' when we were not so civilized and used to live withing anything on us?

what is the meaning of civilization and 'manav-sabhyata' then?

What's wrong in M F husain's paintings then?. Poor fellow simple made so called 'Kalaatmak' paintings.

What crime did Priyabhashu committed , if he simple admired the 'Kalatmak-body of his beloved Nirupama ? After admiring the kalatmak figure of Nirupama...He made her pregnant.

What a kalatmak approach towards a woman !

"kalaatmak- pregnancy !

The kalatmak foetus ( 3 months old) died a kalatmak death.

Do we need to provoke the rush of testosterone ?

Coming to Girijesh ji-

Last month he wrote a post and was worried about how children are behaving in public places, openly kissing and touching each other. Even adults are involved in such shameful acts publicly.

Such revelations , objectionable robes in Bollywood and certain literature are responsible for such irresponsible and carefree younger generation.

@- यदि आपको अब भी आपत्ति हो तो बताएं...मैं इस चित्र को हटा दूंगा।..

Majority wins !

Since i'm the only one who has objection against the pic, so my voice can be easily ignored. I will gladly accept panchon ka nirnay.

I have read Chitralekha and have seen the movie few years ago. One of the best book i have ever read. I admire the two characters from the story- Chitralekha and Beejgupt !

In our society, we have more shwetaank and kumar type of saints

We need more Chitralekhas in our society , who have the capacity to purify a saint even by virtue of their beauty and brains.

A beautifully written post !

Badhaii !

zeal said...

without** anything.....[correction]

सतीश पंचम said...

दिव्या जी,

मुझे लगता है कि पुरूष होकर कलात्मकता की सराहना करना भी एक तरह से तोहमत का आमंत्रण है।

मुझे तो यही लग रहा है। बाकी तो प्रियभांशु आदि ने जो किया है उसका इंटेंशन देखा जाय पहले कि उसके इरादे क्या थे....उसने धोखा दिया या प्यार किया यह वही अच्छी तरह से समझ सकता है लेकिन किसी के गर्भपात को या किसी कि हत्या आदि को कलात्मकता तो किसी नजरिए से नहीं कहा जा सकता। इतना तो हम भी समझते हैं।

पुरूष होने भर से कलात्मकता सराहे जाने पर तोहमत लगाना कहां तक उचित है ?

वर्तमान में जीना तो हर कोई चाहता है लेकिन क्या कला को काट कर अलग कर दिया जाय। ठीक तालिबानियों की तरह जिन्होंने बामियान में बुद्ध की मूर्ति इसलिए ढहा दी क्योंकि अब वहां बौद्ध धर्म प्रासंगिक नहीं रह गया है...मूर्ति पूजा हेय है..आदि आदि।

फिर हममें और तालीबानियों में क्या फर्क रह जायगा। आप अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की बात कह रही हैं तो यह चित्र भी उसी चित्रलेखा फिल्म का है जिसमें रंगभवन दिखाया गया है।

अगर मंटो सामाजिकता के नाम पर, अश्लीलता के नाम पर बच बच कर लेखन करते तो क्या वह असर उनकी लेखनी में आता जो वह खुलकर लिखने के कारण ला पाए ? समाज के एक और अंधेरे सच को बेपर्द कर पाते वह ?

zeal said...

.
Respected Satish Pancham ji,

@-पुरूष होने भर से कलात्मकता सराहे जाने पर तोहमत लगाना कहां तक उचित है ? ..

I expressed my views. Kindly do not take it as an accusation ( Tohmat )

My respectable sisters here have no objection on the pic, so kindly don't bring gender bias here. The kalatmak-pic is accepted equally by both the genders.

@-बामियान में बुद्ध की मूर्ति इसलिए ढहा दी क्योंकि अब वहां बौद्ध धर्म प्रासंगिक नहीं रह गया है...मूर्ति पूजा हेय है..आदि आदि।

We are talking about revealing pics of woman, not about Lord Buddha. Let's not get distracted from the topic. Ye 'vishayantar' hai.

@-यह चित्र भी उसी चित्रलेखा फिल्म का है जिसमें रंगभवन दिखाया गया है।

The pic was suitable and required there to give the complete effect of 'Rang-bhawan' in the movie, But we do not need it here in the post. Such small changes can gradually bring small changes in the society , which is the need of the ERA.

@-लेकिन क्या कला को काट कर अलग कर दिया जाय।

I am not against any sort of art but but seeing art in a revealing pic of a woman is highly objectionable.

I admire the art in the painting-- "Monalisa"
The smile dancing on her lips is so mesmerizing.
Such kind of art should be encouraged.

@-अगर मंटो सामाजिकता के नाम पर, अश्लीलता के नाम पर बच बच कर लेखन करते तो क्या वह असर उनकी लेखनी में आता जो वह खुलकर लिखने के कारण ला पाए ?

This is the marketing strategy. Indeed a director/producer/writer needs some spice to maket his/her product. And nothing can be a better spice than such pics.

@-फिर हममें और तालीबानियों में क्या फर्क रह जायगा।

Just because i objected on a pic on your post i am accused to be a Talibani?

'Jhansi ki Rani ' keh diya hota !

Regards,
Divya

मीनाक्षी said...

काली घटाओं में चित्रलेखा की बिजली कौंधी..जिसका उजाला पोस्ट पर ही नहीं टिप्पणियों पर दिखाई दिया.. देर से आने का भी फायदा है ... लेख और उस पर आई प्रतिक्रियाओं का पूरा पूरा आनन्द मिला..आभार..

रंजना said...

फिल्म देखी तो न थी,पर आपके इस सरस जीवंत विवरण ने फिल्म देखने का आनंद दे दिया....साथ ही उत्सुकता भी चरम पर पहुँच गयी फिल्म देखने की...

सरस सुन्दर जीवंत इस पोस्ट के लिए बहुत बहुत आभार..

ज्ञानदत्त पाण्डेय Gyandutt Pandey said...

वाह! हिन्दी ब्लॉगजगत की आदर्श पोस्टों में से एक! जहां पोस्ट पर टिप्पणियां टपकाई नहीं गईं, सहजता से आई हैं।
असल में एक अच्छी पोस्ट के लिये सनक-सनक-सनकादिक (मैं चतुर् ऋषियों सनक, सनन्दन, सनातन और सनत्कुमार की बात नहीं कर रहा!) होना बहुत जरूरी है - चिठेरे का भी और टिपेरों का भी! :)

PD said...

मैंने सिनेमा भी देखी है और किताब भी पढ़ी है.. मगर इसा दुर्घटना को घाटे इतना समय बीत गया है कि इसके बाद के दुर्घटनाओं(बहुत सी किताबें पढ़ना और सिनामाओं को देखना) में सब घच्च-पच्च हो गया है..

मेरा मानना बस इतना ही है कि अगर हम किताब पहले पढते हैं तो किताबी चीजें सिनेमा में ढूँढने लगते हैं, और अगर सिनेमा पहले देखते हैं फिर किताब पढते हैं तो सिनेमा में देखी हुई चीजें किताबों में भी ढूंढते हैं.. किताब पहले पढ़ने के मामले में, अगर सिनेमा में कुछ भी अंतर हुआ तो(जो कि होना ही है) हमें सिनेमा में खामियां दिखती है.. सिनेमा पहले देखने के मामले में, अगर किताब सिनेमा से अलग भागने लगता है तो मन में एक खटका होता है और फिर याद आता है कि किताब पहले लिखी गई है फिर सिनेमा बना, और हम सिनेमा को गलियाना चालू कर देते हैं.. मुझे मनोविज्ञान कि समझ बहुत कम है, फिर भी यह दावे के साथ कह सकता हूँ कि यह पूरी तरह से मनोवैज्ञानिक मामला ही है.. बेचारा गुलफाम(सिनेमा) हमेशा ही मारा जाता है.. :D

बाकी पोस्ट और कमेंट्स सभी मस्त हैं.. :)

डॉ महेश सिन्हा said...

पूरी फिल्म ही दिखा दी :)
पोस्ट से लंबे कमेंट्स अपन तो बाइपास से इधर आ गए

E-Guru Rajeev said...

बहुत ही बकवास पोस्ट और बकवास टिप्पणियाँ !!
.
.
.
.
और सब के सब बुढ़ाय गये हैं. ;-(
.
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.
अब त हमहूँ फिलिम देख के ही बात करेंगे. कितबियो पढ़ी के ही आवेंगे. तब्बे न स्मार्ट लोगन की तरह टीपेंगे जी. ;-/

Himanshu Mohan said...

सतीश जी! मैं बहुत शर्मिन्दा था अपने आप से कि कैसे यह तकनीकी और तथ्यात्मक गलती हो गयी मुझसे - और इसीलिए आता था, पढ़ता था, बिना टीपे लौट जाता था।
गलती यह हो गयी कि मैंने अपनी टीप में "तुम्हें याद करते-करते" गीत का उल्लेख किया, न जाने किस झोंक में - चित्रलेखा के साथ, जबकि वह गीत "आम्रपाली" का है।
अब कॉन्फ़िडेन्स जागा है - यह भी तय पाया कि डर अकारण था - लोग जब पोस्ट ठीक से नहीं पढ़ते तो टिप्पणी क्या पढ़ेंगे!
मगर मैं तो अपनी नज़र में ग़लत था - सो किसी और के टोकने की ज़रूरत ही कहाँ थी?
ख़ैर, ग़लती को खुलेआम स्वीकार करने से कुछ हल्का महसूस कर रहा हूँ। अस्तु, आता रहूँगा।

सतीश पंचम said...

हिमांशु जी,

काहे शर्मिदा कर रहे हैं....मुझे। इस तरह की तकनीकी त्रुटियां कई बार हो जाती हैं। दरअसल जब आपने लिखा था यह गीत 'तुम्हें याद करते' वाला.... तभी मुझे उस समय क्लिक हुआ था कि यह गीत तो मेरी सीडी में था ही नहीं जबकि अभी अभी फिल्म देखा था और पोस्ट लिखा था....फिर यह सोच कर कि शायद सीडी में कुछ सीन काटे गए होंगे उसी में यह भी कट गया होगा मैंने ध्यान नहीं दिया।

दरअसल सीडी में कट कुट का ध्यान मुझे इसलिए आया क्योंकि उसके पहले सब टीवी पर चित्रलेखा दिखाई गई थी और उसमें महमूद को 'मारा गया ब्रह्मचारी' गाने के दौरान महिला की देहरी पर नाक रगड़ते दिखाया गया था और यह सीन मेरी सीडी में नहीं था।

बाद में एक दिन एफ एम पर यही गाना आम्रपाली वाला सुना तब समझ में आया कि 'आम्रपाली' और 'चित्रलेखा' शायद अपने पिरियड फिल्म के कारण एक सी प्रतीत हो रही हैं इसलिए ऐसी त्रूटि होना स्वाभाविक है।

कोई गिला नहीं.....एकदम दनदनाते हुए कमेंट किजिए :)

डॉ महेश सिन्हा said...

हिमांशु जी क्या कहें बड़े सेंटी निकले आप तो :)

PD said...

हम आज ही दोनों सिनेमा की सीडी लेकर लौटे हैं.. अगले साप्ताहांत पर देखा जायेगा.. :)
वैसे अभी पलट कर अपनी पिछले कमेन्ट को देखा तो पाया कि कई जगह हिज्जो की गलतियाँ थी.. :(

Er. Shilpa Mehta : शिल्पा मेहता said...

pranam hai satish ji aapko :)

सतीश पंचम said...

यह मूल पोस्ट लिखी गई थी जून 2010 में और आपका प्रणाम अब 2012 में पहुँचा :)

फोटो ब्लॉग 'Thoughts of a Lens'

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