सफेद घर में आपका स्वागत है।

Saturday, June 5, 2010

बिन-गौना हुए पर्स में रखी पत्नी की तस्वीर, घाटकोपर स्टेशन, रापचीक अल्हड़पन और गुदगुदाती यादें.............सतीश पंचम

        क्या कभी आपका कोई चोरी हुआ सामान वापस चोर ने लाकर रख दिया है ?  कुछ भी….चोरी हुआ  सामान जैसे…. मोबाईल, घडी, उस्तरा, छेनी, हथौडी……कुछ भी ?

   क्या कहा ? संभावना ही  नहीं इस बात की……हां बात आपकी भी सही है।

    भला कोई चोर……. चोरी का समान लौटा दे तो वह चोर कैसे कहलाए। चोरी करना ही उसकी यूएसपी है। इस यूएसपी के साथ हर पेशे में कुछ न कुछ इंडिकेटिव तत्व जुडा रहता है। इंडिकेटिव तत्व से तात्पर्य है  जैसे कि, नाई के पेशे में शेविंग करते हुए बातें करते रहना, हलवाई की दुकान में किसी मोटे आदमी का गल्ले पर बैठना , किसी योगी के कक्ष में पद्मासन मुद्रा चित्र लगे होना,  डॉक्टर के कमरे में शरीर विज्ञान को दर्शाती मांस पेशियों का चित्र लगे होना वगैरह वगैरह।

 एसा ही कुछ ब्रिटेन के साथ भी जुडा है।

ढिठाई….।

   हाँ जी , ढिठाई ही वह इंडिकेटिव तत्व है जो फिलहाल इंग्लैंड के साथ जुड़  सा गया है। पहले तो जम कर देश को लूट पाट कर ले गये…कहते गये कि हम तो आपको समृद्ध कर रहे थे। ब्रिटिश भारत में लोग सुखी थे…..हम न होते तो तुम ये होते ….वो होते…..वगैरह वगैरह। अब हालत ये है कि हम अपने चोरी चले गये कोहिनूर को मांग रहे हैं तो फिर वह अपनी वही पुरानी ढिठाई को तौलते हुए कह रहा है – ब्रिटिश कानून के हिसाब से वह इस तरह की किसी पुरातात्विक या ऐतिहासिक चीज को वापस या मूव नहीं कर  सकता। गजब ढिठाई है…..पहले तो चोरी की और अब उस चोरी पर कानूनी दांव पेंचों का कवर भी चढ़ा रहे हैं। 

    वैसे हमारे राजा वगैरह लोग भी बड़े  थोबड़हा टाईप थे। कम्बख्तों को एक दूसरे का थोबड़ा देख-देख आपस में लड़ने भिड़ने से फुरसत ही नहीं मिलती थी। पता चला कि महाराज कहीं बाग वगैरह में खड़े होकर अपने थोबडे़ का पोर्टरेट बनवा रहे हैं ……किसी रानी के थोबड़े को गुलाब से सहला रहे हैं…… फलां देश की राजकुमारी का थोबड़ा इतना पसंद आता कि पूरी सेना लेकर वहीं पिल पड़ते……...……..कुछ कुछ की नवाबी यहां तक चलती थी कि उसे फर्क ही नहीं पड़ता था कि किसी पुरूष से मेलमिलाप कर रहा है कि महिला से। नवाबी शौक । सालों ने आर्टिकल 377 का  पता ठिकाना ढूँढ निकाला था उस जमाने में।

    खैर, बात हो रही थी चोरी की, कि  कभी कोई चोरी हुई चीज वापस जल्दी नहीं मिलती। लेकिन एक वाकया ऐसा है जहां न सिर्फ चोरी की चीज मिली बल्कि  इस बात पर  अफसोस भी हुआ कि यार यह वापस ही क्यों मिली।

    बात दरअसल मेरे कॉलेज के जमाने की है। हम तीन दोस्त मुंबई के सत्यम सिनेमा में ‘बोल राधा बोल’ फिल्म देखने गए थे। वही जिसमें तू तू तू तारा रारा वाला गाना था…..स्वेटर पहने ऋषि कपूर……। वाह, क्या फिल्म थी। मजे में पॉपकॉर्न खाए….पेप्सी वगैरह पी……हंसी पडक्का किए। लौटानी में मेरे मित्र का पॉकेट किसी ने मार लिया। अच्छे खासे पैसे थे उसमें। पैसों के साथ कुछ एक प्रेम पत्र, एक किसी खास की फोटो…….और थोडे बहुत चिल्लर वगैरह।

    अब जरा मित्र के बारे में बताउं कि तब उस समय उनका विवाह तो हो गया था लेकिन गौना नहीं हुआ था। गौना यानि लड़की की विदाई नहीं हुई थी। घरवालों का कहना था कि पढ़ाई खत्म कर लो….कुछ काम धाम पर लग जाओ तो विदाई करवा लाना। यह गौने वाला दौर भी कभी चलता था। अब तो विवाह-विदाई सब साथ ही होता है।

      तो पर्स में जो प्रेम पत्र वगैरह थे, फोटो वगैरह थे…..सो  इन्हीं भाभी जी के लिखे हलफनामें थे….. जिनका कि गौना अभी नहीं हुआ था। दोनों ही मुंबई में रहते थे। उस वक्त सेलफोन आया भी नहीं था…सो प्रेमपत्र ही एक दूसरे से संपर्क का माध्यम थे और फोन…… जो कि किसी एसटीडी बूथ वगैरह से किए जाते थे।

          खास बात यह थी कि  इनके मिलने मिलाने का स्थान भी फिक्स था। घाटकोपर स्टेशन के प्लेटफार्म नंबर एक के इंडिकेटर के नीचे। भाभीजी का कॉलेज भी नजदीक ही था…..सो उनकी सुविधानुसार यह स्थान चुना गया था। प्लेटफॉर्म पर खडे़ खड़े किसे पता चलता है कि ट्रेन पकड़ने खड़े हो या किसी का इंतजार करते।   उस समय यह ‘प्लेटफार्म नंबर एक और इंडिकेटर के नीचे’ वाला जुमला हम लोग इतनी बार सुन चुके थे कि महाशय को इसी की याद दिलाते छेडा जाता था। घाटकोपर स्टेशन से यह लोग किसी रेस्टोरेंट वगैरह में जाते या फिर सर्वोदय वाले गार्डन वगैरह में।

तो बात हो रही थी पर्स चोरी की।

     अभी एक हफ्ते ही बीते होंगे कि मित्र के घर पर एक कुरियर आया। खोलने पर उसमें वही पर्स, भाभीजी की तस्वीर और प्रेम पत्र थे। जिस वक्त घर में कुरियर आया था उस वक्त तो महाशय कॉलेज में मेरे साथ क्लास में बैठे थे…..घर पहुंचने पर पता चला कि उस कुरियर को खोल-खाल कर उसका बाकायदा पोस्टमार्टम किया गया है। घर के सभी लोगों ने पढ़कर बाकायदा उसका पंचनामा किया है।

     मित्र के पिताजी भभक रहे थे कि एही कारन बबुआ के पढ़ाई खराब हो रहल बा …….जा रहे हैं ज्ञान लेने  और पता चला कि घाटके उपर इस्टेसन के नीचे…… पलेटफार्म नम्मर एक पर ज्ञान बाँट रहे हैं। क्या पढाई करेंगे….कैसे पढ़ाई करेंगे रामजाने।

     शाम तक घर पहुंचने पर घर के  सभी लोग एक भेदक नजरों से मित्र को देख रहे थे। मामला समझ ही नहीं आ रहा था कि क्या है….आखिर किस बात को लेकर लोग तंज हैं। खाने पीने के बाद जब महाशय सुस्ताने बैठे तो बमबार्डिंग शुरू हो गई।

    यही सब करने कालेज जाते हो…..सादी बियाह कर दिया कि एक न एक दिन यह होना ही है…..फिर नात रिसतेदार का जोर पड़ा तो बियाह कर दिया…….लेकिन हम क्या जाने बबुआ पढ़ने नहीं अपनी मौगी को मिलने जा रहे हैं।

    समझ लो बबुआ की महतारी…..अब लईका का कुछो नहीं हो सकता….जाओ विदा करवा कर ले आओ लईकी को……कम से कम घाट के उपर औ प्लेटफार्म नम्मर एक के नीचे तो शांति रहेगी। इसी लिए मैं लड़के का विवाह में जल्दबाजी नहीं कर रहा था लेकिन तुम ही थी जो अपने नात रिसतेदार का दबाव औ टेढगईली गाने लगी।

    मित्र जी शर्म से लाल…..लाल। समझ नहीं आ रहा था कि कहें तो क्या कहें। इधर बमबार्डिंग चालू थी  और उधर उस पॉकेटमार को कोस  रहे थे जिसने पैसे तो सारे ले लिए लेकिन पर्स और तमाम मटेरियल जस का तस पर्स में रखे कार्ड के आधार पर पार्सल कर दिया था। महाशय  खूब- खरी खोटी सुने। भाभी जी को भी  रिमोटली  सुनना पडा कि अब बबुआ को फांस लिया है….अब क्या हम लोगों के काबू में रहेगा वगैरह वगैरह।

    बाद में तो आखिर भाभीजी की कुछ दिन बाद विदाई भी हुई, धीरे धीरे घर गुलजार हुआ, बच्चे कच्चे भी हुए……..और घाटकोपर स्टेशन का प्लेटफार्म नंबर एक कुछ  शांत हुआ।

   यह सब देख कर मन कहता है कि भगवान….चोरी हो…..चोरी जमकर हो……लेकिन ऐसे चोर का किसी के पाला कभी न पडे कि   उसकी वजह से शर्मिंदगी झेलनी पड़े , बमबार्डिंग झेलनी पड़े :)

     हाल ही में अपने उसी मित्र से मिलकर आया हूँ……हम लोगों के बीच कई मजाकिया बातों में यह बात भी हुई कि भाई साहब……. अब विवाह के इतने सालों बाद कम से कम  घाटकोपर स्टेशन के प्लेटफॉर्म नंबर एक पर  फूल वगैरह रख  अगरबत्ती तो जला दो ……. आखिर वह तुम दोनों के लिए मिलनस्थली जो ठहरी :)

सचमुच, कुछ यादें बड़ी गुदगुदाहट लिए होती हैं.....अल्हड़पन की लाली लिए हुए  :)

 - सतीश पंचम

स्थान – वही, जहां पहले कभी प्लेटफार्म पर एक ही इंडिकेटर लगता था लेकिन लोकल के डिब्बों के ज्यादा जुडने से अब दो दो इंडिकेटर  प्लेटफॉर्म पर लगते हैं।
  
समय – वही, जब महिला मित्र के साथ रेस्टोरेंट में इडली-सांभर चाँपने के बाद पता चले कि जेब कट गई है और महिला मित्र खिलखिला कर कहे……अब तो चाय आनी चाहिए…..क्यूँ क्या ख्याल है। और महाशय तपाक से कहें……बर्तन यहां के कुछ ज्यादा ही काले लग रहे हैं……माँजते माँजते शाम हो जाएगी :)

( चित्र : इंटरनेट से साभार)

23 comments:

मनोज कुमार said...

ये इंडिकेटिव इंडिकेशन लाजवाब रहा!

निशांत मिश्र - Nishant Mishra said...

मैंने सुना है ऐसा सिर्फ बंबई में ही होता है कि पर्स और अटैची के साथ चोरी गए ज़रूरी कागजात (जो चोर के काम के नहें होते) डाक से घर पहुँच जाते हैं.

rashmi ravija said...

क्या खूब संस्मरण है....बहुत ही रोचक अंदाज़ में लिखा है...आपके मित्र की हालत सोचकर ही हंसी आ रही है पर बेचारे की शादी हो चुकी थी ऐसा हादसा किसी कुंवारे लड़के/लड़की के साथ हो तब??...आगे की सोचना भी मुश्किल...

वह तो तब की बात थी...आज भी गौने का प्रचलन है, सोच कर आश्चर्य होता है.....यहाँ मुंबई में पली बढ़ी एक लड़की का गौना यू.पी. के एक छोटे से कस्बे में कॉलेज में पढने वाले लड़के से हुआ है...वह लड़की एक ब्यूटी पार्लर में काम करती है, थ्री फोर्थ और टी शर्ट पहनती है....हम सहेलियां उसकी चिंता में घुले जा रहें हैं कि वहाँ कैसे एडजस्ट करेगी...

anoop joshi said...

saandaar sir, chor se bhi hamdardi hone lugi.

soni garg said...

Great Sir
nice post......

kshama said...

Aha! Bada maza aa gaya padhke!

गिरिजेश राव said...

हा हा हा । बाप महतारी की बातों को एकदम दुरुस्ती से बयाँ किया। वहीं कहीं छिपे थे क्या ?

धारा 277 नहीं 377। ...
- मेरे साथ ऐसा दिल्ली में हो चुका है। नकदी और पर्स के अलावा सब मिल गया। चोर ने फेंक दिया था - आइ कार्ड, ड्राइविंग लाइसेंस, क्रेडिट कार्ड सब थे सिवा फोटो या प्रेमपत्र के। मदनगीर के किसी सज्जन को मिले, उन्हों ने एक कॉंट्रैक्टर महोदय का नम्बर उन कागजों से निकाला, उन्हें इलाहाबाद फोन किया, इलाहाबाद से मेरे पास फोन आया और मैंने मदनगीर जा कर सब कुछ वापस लिया।

Udan Tashtari said...

सुन्दर और रोचक संस्मरण..मजा आ गया!! काश!! चोर अगर मिले तो ऐसा. :)

Arvind Mishra said...

कोई प्रेमी चोर रहा होगा ......कहीं यह आत्मकथा तो नहीं है ?

मनोज कुमार said...

बहुत अच्छी प्रस्तुति।
इसे 06.06.10 की चर्चा मंच (सुबह 06 बजे) में शामिल किया गया है।
http://charchamanch.blogspot.com/

सतीश पंचम said...

गिरिजेश यार,

277 हो या 377 क्या फर्क पडता है....जिस किसी को यह नवाबी शौक होगा ससुरा खुदै सही गलत चुन लेगा :)


अरविंद जी,

आपका इस तरह शक करना लाजिमी भी है कि कहीं यह वाकया मेरा खुद का ही तो नहीं है क्योंकि मुझे लग रहा है कि महतारी-बाबू के संवाद मैंने लिखा ही कुछ इस तरह से है मानों मेरे सामने की बात हो।

गिरिजेश जी ने भी कुछ इसी ओर इशारा किया है।

दरअसल इस डाँट-डपट वाले संवाद में मैंने अपनी कुछ कल्पना का भी इस्तमाल किया है.... अपने पिताजी के द्वारा खाई किसी-किसी बात पर होने वाली डाँट डपट को यहाँ लिखने में इस्तेमाल किया है। इस तरह की डांट मैंने भी खाई है। और मुझे लगता है हर वह शख्स जिस किसी की शादी पढ़ाई के दौरान हुई होगी इस डाँट डपट से गुजरा होगा।

रही बात मित्र की तो, मित्र को बहुत ज्यादा डाँट पड़ी थी और शायद दोनों समधी लोगों में कुछ समय तक बोलचाल भी बंद थी। शायद दोनों आपस में समझ बूझ रहे होंगे कि क्या किया जाय :)

सतीश पंचम said...

@ गिरिजेश

वैसे 277 से 377 सुधार कर दिया है :)

Mired Mirage said...

बहुत भला चोर था! May his tribe increase!
घुघूती बासूती

राज भाटिय़ा said...

चोर सच मै सायाना था, ओर पढा लिखा भी, वेसे हमारे यहां जेब तो नही कटती लेकिन कभी कोई समान खो जाये तो समान मिलने की आस बनी रहती है, पेसे चाहे ना मिले, बहुत सुंदर लगीआप की यह पोस्ट. धन्यवाद

भारतीय नागरिक - Indian Citizen said...

अब बेचारे चोर को क्या पता कि ऐसी गड़बड़ हो जायेगी..

अनूप शुक्ल said...

चोर की जय हो। पंचन सतीश को भी उसमें काम भर का हिस्सा मिले। :)

draradhana said...

क्या बात है ! रापचीक अल्हड़पन... गौने से पहले इसी तरह लखनऊ में छिप-छिपकर मिलने की मेरे एक चाचा की भी कुछ यादें हैं. वैसे शादी से लेकर गौने तक का ये टाइम रोमैंस का ही टाइम होता है, अगर मिलने की सुविधा हो तो... गौना गाँवों में तो अभी भी रखा जाया है, शहरों में ये चलन खत्म हो गया है.
चोर भी शायद कोई रोमैंटिक सा रहा होगा...
आपकी स्टैल तो गजबै है...उसके बारे में क्या कहें?

Mithilesh dubey said...

bahut khub

महफूज़ अली said...

रुकिए तनिक पानी पी आयें.... ह्म्म्फ़ ....हम्म्म्फ़.........हम्म्म्फ़..... थक गए हैं पढ़ते पढ़ते .... इतना लम्बा है .... कि,.....ऐसा लगा कि पांच किलोमीटर का दौड़ लगाये हैं.... वैसे भी हमरा गौना अभी नहीं हुआ है.....

आयें ज़रा फिर से....

Sanjeet Tripathi said...

bhaiya aisa hai ki sansmaran to ekdam hi shandar hai, mai jara kalpana kar raha hu aapke us mitra ki halat ka........my god...........
cant xplain this yar........

jab shadi fix hone ke bad ye hal tha, to vakai jaisa ki rashmi ji kah rahi hai ki kisi kuware jode ke sath aisa ho to kya hoga........ultimate....sochne ke liye khoob material....khair vaise bhi rashmi ji upanyaskar hai.

ek baat to kahunga bandhu, aapke blog par jab bhi aata hu, jameen se judaav mehsus karta hu bhale hi aapke aur meri jameen alag si ho lekin khushboo to ek hi deti hai na.....

shikha varshney said...

शानदार संस्मरण बहुत मजा आया पढकर :)

मुनीश ( munish ) said...

khooob rahi .

Pramod Kumar said...

बहुत खूब

फोटो ब्लॉग 'Thoughts of a Lens'

फोटो ब्लॉग 'Thoughts of a Lens'
A Photo from - Thoughts of a Lens

ढूँढ ढाँढ (Search)

© इस ब्लॉग की सभी पोस्टें, कुछ छायाचित्र सतीश पंचम की सम्पत्ति है और बिना पूर्व स्वीकृति के उसका पुन: प्रयोग या कॉपी करना वर्जित है। फिर भी; उपयुक्त ब्लॉग/ब्लॉग पोस्ट को हापइर लिंक/लिंक देते हुये छोटे संदर्भ किये जा सकते हैं।




© All posts, some of the pictures, appearing on this blog is property of Satish Pancham and must not be reproduced or copied without his prior approval. Small references may however be made giving appropriate hyperlinks/links to the blog/blog post.