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Sunday, May 16, 2010

डिस्कवरी के Man v/s Wild कार्यक्रम से कई बातें सीखी जा सकती हैं....जरा ध्यान से देखें अबकी बार.....सतीश पंचम

      टीवी पर तमाम बेतुके, गैर जरूरी और नासमझी भरे तमाम कार्यक्रमों के बीच ही डिस्कवरी चैनल पर एक बहुत ही रोचक और एडवेंचर से लबरेज, इंसानी जज्बे को दिखाता  एक कार्यक्रम आता है Man v/s Wild. ( इसे Born Survivor: Bear Grylls  or Ultimate Survival के नाम से भी जाना जाता है)   उसके किरदार हैं Bear Grylls.  कभी वह रेगिस्तान में दिखते हैं, कभी बर्फ के पहाड़ चढ़ते दिखते हैं तो कभी किसी घने जंगल में किसी जानवर का शिकार कर रहे होते हैं। इतना ही नहीं, जरूरत पडने पर जंगली झाडी और पेड की छाल का काढ़ा बनाकर भी पी लेते हैं।

       टीवी की तमाम उटपटांग हरकतों के बीच यह कार्यक्रम मेरा सबसे पसंदीदा कार्यक्रम है। इसकी वजह भी है। इस कार्यक्रम की वजह से मुझे कुछ अप्रत्यक्ष फायदे भी हुए हैं। जी हाँ फायदे।  अब आप कहेंगे कि आज के जमाने में टीवी को देख कोई फायदा कैसे ले सकता है ?  और वह भी जंगल झाडी, बर्फ, रेत, सांप, कच्चा मांस आदि देखकर  फायदा  ? और इन बातों का हमारे रोजमर्रा की बातों से क्या सरोकार....  इधर किसी को घर से आफिस, आफिस से घर इतने में ही फुरसत नहीं मिल पाती तो भला कोई क्योकर जायगा ऐसे जंगलों में, ऐसी जगहों पर ?  और क्योंकर देखेगा इस तरह के जंगल झाडियों वाले प्रोग्राम ? 
  
        बात आपकी वाजिब हो सकती है कि ऐसे कार्यक्रम भला कोई क्योंकर देखे जिसका रोजमर्रा की जिंदगी से कोई वास्ता न हो, कोई सरोकार न हो।  लेकिन यहां मेरा मानना है कि जरूरी नहीं कि हमारा वास्ता जीवन  में जंगल झाडियों से ही पड़े, यह भी जरूरी नहीं कि हमे इस हद तक भुखमरी घेर ले कि जंगलों में चूहे, खरगोश, साँप आदि मारकर खाया जाय।  लेकिन इतना जरूर है कि हमें हर रोज बढ़ते तनाव, बढ़ती भाग दौड और तमाम प्रतिस्पर्धा के चलते ऐसे वाकयों से दो चार होना पड़ता है जब बहुत हिम्मत की जरूरत पड़ती है, हौसला बनाए रखना पडता है, किसी प्रिय का निधन, किसी की बीमारी, किसी के कहे दुर्वचन और ऐसी तमाम बातें जो हमारे हौसलों को तोड़ती जान पड़ती हैं वह किसी भी हालत में Bear Grylls के जंगल के हालात से कम नहीं हैं। 

            वहां भी इंसानी हौंसलों को तोड़ती उमस रहती है, गर्मी रहती है, बियांबान भांय भांय करता माहौल रहता है, सांप, बिच्छू..... विभिन्न प्रकार के जीव जंतु रहते हैं जो हर ओर से अच्छे भले इंसान को पागल कर दे। अमूमन यही हाल आफिस गोअर की भी रहती है, समय पर काम पूरा करना है,  बॉस की झिडकी है, मेल है, काँट्रैक्ट है, टेंडर है, पास न हुआ तो क्या होगा, रिसेशन है, नौकरी है तमाम खर्चे हैं, समय पर यह सब न हुआ तो क्या होगा....। 
  
   औऱ ऐसे में ही Bear Grylls अपनी जीवटता का परिचय देते हैं। वह बिना अपना हौसला खोए कुछ न कुछ उपाय करते नजर आते हैं ताकि जहां वह फंसे हैं वहां से निकल सकें।  कभी वह भूख से बचने के लिए  सांप खाते हैं, कभी जंगली झाडियां, कभी पहाड पर चढते हैं तो कभी बरफीली नदी पार करते हैं।  वह अपना हौसला नहीं खोते। कैमरा क्रू के साथ वह जंगल में अपने सीमित साधनों से वहां से सकुशल निकलने के लिए भिड़े रहते हैं। उनके पास भी आफिस गोअर की तरह वक्त की पाबंदी होती है....शाम होने से पहले निकल जाना है.....न निकल पाए तो जंगल में ही रात बिताने का उपाय करना है....जंगली जानवरों से बचाव करना है वही जंगली जानवर जो भेस बदल कर शहरों में तमाम हौसलों को पस्त करने में लगे रहते हैं कभी रिसेशन के रूप में, कभी कम्पटीशन के रूप में तो कभी बेतहाशा आगे बने रहने की अबूझी दौड के रूप में। 

 कई बार Bear Grylls को गलीज से गलीज चीज खाते देखा है, कभी वह याक की आँख निकालकर खा रहे हैं , कभी किसी जानवर के अंडकोष, तो कभी किसी कीडे को सीधे ही निगल रहे हैं। हमारे रोजमर्रा के जीवन में भी कभी न कभी किसी न किसी रूप में गलीज से गलीज इंसानों से पाला पडता होगा....जानते हैं कि यह इंसान बहूत बेहूदा है...बहुत ही गंदा है लेकिन चूँकि हमें किसी तरह सर्वाईव करना है, सो हम उसको Bear Grylls की तरह झेल जाते हैं। यदि न झेलें तो कभी वह आफिस में हमारे खिलाफ कुछ गलत सलत बातें फैला देगा या फिर पारिवारिक जीवन दुश्वार कर देगा या ऐसा ही कुछ अनाप शनाप कर देगा। ऐसे में जरूरत होती है ऐसे गलीज चीजों से बिना डरे हुए उनका अपने लिए इस्तेमाल करने की।  ठंड औऱ भूख से बचना है इसलिए याक मारकर खा सकते हैं, उसके अंग अंग का इस्तेमाल अपने जीवित रहने के लिए कर सकते हैं, यदि जिवित बच गए तो वही गलीज चीज हमारे लिए अमृत के समान है...इसलिए हर एक चीज का सही समय पर उपयोग करने का संदेश यह कार्यक्रम देता है।  

 यहां मैंने देखा कि रेगिस्तान में दिन में जहां पारा पचास तक पहुंच जाता है. उमस और बेबसी की इंतहा होती है, ऐसे में Bear Grylls एक उंट मार देते हैं। उसके मांस को कच्चा खाते हैं, उसके भीतर के पानी को अपने पीने के लिए इस्तेमाल करते हैं और जब शाम हो जाती है , रात हो जाती है...ठंड कंपकपा देती है तो उसी मरे हुए उंट के पेट में जा सोते हैं मांस, मज्जा और अंतडियों के बीच। लेकिन वह ठंड से बच जाते हैं और अगले दिन फिर अपनी यात्रा पर चल पडते हैं। हममे से कितने लोग हैं जो ऐसी विपरीत परिस्थितियों से दो चार होते हैं ?  लेकिन यहा Bear Grylls का काम देखिए। उनकी नौकरी को देखिए। वह भी हम और आप जैसों की तरह ही एक इंसान हैं। उन्हें भी अपने घर को चलाने के लिए यह सब शो आदि करना पडता है। उन्हें भी परिवार की जटिलताओं को सुलझाना पडता है और ऐसे में हमारी और आपकी यह शिकायत कि हमें अपनी नौकरी मे बहुत काम करना होता है, श्रम का उचित मूल्य नहीं मिलता, काम का माहौल सही नहीं है वगैरह वगैरह....यह सब बातें धरी की धरी रह जाती हैं। 
  
  उनसे मुझे प्रेरणा मिलती है कि गलीज से गलीज इंसान के साथ काम करते हुए, उसका सामना करते हुए जरा भी नहीं घबराना चाहिए और न तो अपना हौंसला खोना चाहिए । संक्षेप में कहूं तो मुझे अप्रत्यक्ष रूप से कुछ  फायदे भी हए हैं इस कार्यक्रम को देख कर - 

1- जहाँ तक मैं महसूस कर सकता हूँ कि अपने काम के प्रति उपेक्षा या हीनभावना अब नहीं रखता, या कम रखता हूँ। जब भी हीन भावना आने लगती है तो Bear Grylls को याद करता हूँ कि उनके काम से तो अच्छा ही है जहां जंगल-जंगल, तूफान, गर्मी, बर्फ और रेगिस्तान के बीच चलना पडता है। सांप, बिच्छू खाना पड़ता है। 

2- दूसरी ओर यह लगता है कि किसी विपरीत परिस्थिति के आने पर मैं शायद अपना हौसला पहले की अपेक्षा अब शायद कुछ ज्यादा देर तक बनाए रख सकता  हूँ।  उमस, गर्मी, ठंडी, बारिश आदि के बीच जिस तरह Bear Grylls अपना हौसला बनाए रख जंगल से बाहर निकलने की जुगत में लगे रहते हैं वह  काबिले तारीफ है।

 हांलाकि Bear Grylls के साथ जंगल में उनका कैमरा क्रू होता है लेकिन जहां नदी, पर्वत या बर्फीली झील में कूदना होता है तो खुद Bear Grylls को ही कूदना होता है, कैमरा क्रू केवल संबल प्रदान कर सकता है, एक आश्वस्ति दे सकता है कि हां हम भी है यहां....ठीक हमारे अपनी सोसाईटी, समाज की तरह की आप जूझो...हम तो हैं न यहां :) 


3- एक अलग किस्म का फायदा यह हुआ है कि अब मैं सब्जी लेते समय दो दिन पुरानी गोभी और पिचके टमाटर देख आगे नहीं बढ़ जाता। अब मन में यह भाव आता है कि अरे इतना तो चलता है :) 

4- एक सबसे अलहदा फायदा मेरी श्रीमती जी को भी हुआ होगा कि शायद अब मेरी ओऱ से भोजन में नमक कम या ज्यादा होने जैसी शिकायतें कम से कम होती गई होगी :) 

 - सतीश पंचम

स्थान - वही, जहां कंक्रीट का एक जंगल है और मैं उसमें रहता हूँ। 

समय - वही, जब टीवी पर Bear Grylls किसी जानवर को मारकर खा रहे हों और भूख से परेशान कैमरा क्रू का कोई मेंबर कहे कि भाई साहब - थोडा मुझे भी....... ऑफ दी ट्रैक .......। 

 ( चित्र : साभार  Bear Grylls की साईट से ) 

21 comments:

काजल कुमार Kajal Kumar said...

नि:संदेह यह मेरा भी पसंदीदा कार्यक्रम है बस कभी कभी यह वीभत्स की सीमा पार कर जाता है

माधव said...

i like it aa well . informative and interesting

http://madhavrai.blogspot.com/


http://qsba.blogspot.com/

ज्ञानदत्त पाण्डेय Gyandutt Pandey said...

डिस्कवरी चैनल पसन्दीदा चैनल है। बाकी, आजकल देखना नही हो पाता! :(

नीरज जाट जी said...

सतीश जी,
आजकल तो इसका नाम बदल दिया है। man vs wild की जगह कुछ और नाम रख दिया है।
वैसे यह है बहुत ही मस्त कार्यक्रम।

सतीश पंचम said...

नीरज जी,

इसे Born Survivor: Bear Grylls or Ultimate Survival के नाम से भी जाना जाता है।

चूंकि Man v/s Wild ही ज्यादा प्रचलित है, सो उस कारण ही यहां इस तरह से लिखा गया है। मूल पोस्ट में आप के बताए अनुसार सुधार कर रहा हूँ।

प्रवीण पाण्डेय said...

मैंने भी कई बार देखा है । ऐसी जीवटता तो अनुकरणीय है यदि व्यवहारिक न भी हो ।

Udan Tashtari said...

बहुत मस्त कार्यक्रम है यह!

डॉ. मनोज मिश्र said...

सही कह रहे हैं.

मनोज कुमार said...

मेरा भी पसंदीदा कहा तो झूठ होगा।
मैं तो कौमेडी सर्कस के बाद लापतागंज पसंद करता हूं।

महफूज़ अली said...

मैन वर्सस वाइल्ड मैं रेगुलरली देखता हूँ...

अनूप शुक्ल said...

यह मेरे बड़े बच्चे का पसंदीदा कार्यक्रम है। जब आता है लगा देता है और मैं भी देखता हूं। आपके जो फ़ायदे हुये उनमें से चौथा वाला दोनों लोगों के लिये बनाने वाले के लिये भी और खाने वाले के लिये भी।

मो सम कौन ? said...

सतीश जी, इस कार्यक्रम के जो लाभ आपने बताये हैं उन पर कोई शुबहा नहीं है, लेकिन मुझे व्यक्तिगत तौर पर ऐसा लगता है कि ऐसे कार्यक्रम संवेदनाओं को प्रभावित करते हैं। विशेषकर यदि दर्शक बहुत ज्यादा परिपक्व टाईप के नहीं हों तो। हालांकि आज के युग में जीने के लिये आदमी यदि इस कार्यक्रम से प्रेरणा ले तो सफ़ल होने के चांस ज्यादा हैं, पर मैं अपने बच्चों को इसे देखने के लिये कभी सजेस्ट नहीं कर पाता हूं, काश कर पाता।
शायद पहली बार आपकी तारीफ़ नहीं लिखी है :)

p.s. - खुली छत, तारों भरी रात वाली आपकी पिछली पोस्ट पर इतने दिल से कमेंट लिखा था, पर शायद मेरे यहां नेट की कुछ दिक्कत होने से पोस्ट नहीं हो पाया था। और आज देखिये, एकदम से छपेगा। हा हा हा

गिरिजेश राव said...

इस दृष्टि से तो कभी सोचा ही नहीं। रोज रोज 'सर्वाइवल' के लिहाज से ऐसी सोच रखना लाभदायक है।
धन्यवाद।

सतीश पंचम said...

@ लेकिन मुझे व्यक्तिगत तौर पर ऐसा लगता है कि ऐसे कार्यक्रम संवेदनाओं को प्रभावित करते हैं।

संजय जी,

आपका मानना सही है कि ऐसे कार्यक्रम कहीं न कहीं हमारी संवेदनाओं को चोट पहुंचाते हैं....और यही वजह है कि कई बार मैं वीभत्स दृश्य आने पर इस प्रोग्राम के चैनल बदल देता हूँ .... दूसरे चैनल पर जाने पर भी फूहड किस्म की विभित्सता दिखती है...समाचार मे जाने पर जॉन बिपाशा कथा चल रही होती है...ऐसे में घूम फिरकर फिर वहीं आ जाता हूँ इस प्रोग्राम को देखने :(

खैर,

और आपने ये क्या लिखा है कि पहली बार मैं आपकी तारीफ नहीं कर रहा हूँ...

अरे भई, तारीफ, निंदा आदि सब चलेगा अपुन को....दो चार गाली भी दे देंगे तो कौनो फर्क नहीं पडेगा.....चमडी की मोटाई उम्र के समानुपाती होती है इसलिए अब ढलता जा रहा हूँ :)

बेहिचक लिखिए...जो लिखना हो।

और वो छत पर सोने वाला कमेंटवा जरा फिर से छापिए तो न मैं आपके यहीं आ जाउंगा और छत का इंतजाम आपको ही करना पडेगा...हां नहीं तो.....( अदा जी की स्टाईल से साभार :)

Sanjeet Tripathi said...

kya nazar dali hai bandhu, man gaye.

TV na dekhne ki aadat ke chalte kafi kuchh dekhna nahi ho pata, han kai bar dekha hai bhatijo ko yah program dekhte huye...

matlab ye ki bhabhi jee is program ko dekhne se aapko kabhi mana nahi karengi kynki is se aap me sudhar jo aa rahe hain ;)

Mithilesh dubey said...

मुझे बहुत पसंद है ।

रंजन said...

मस्त हे.. हम भी देखते है.. जब नजर पड़ जाए..

बेचैन आत्मा said...

Bear Grylls को देखा तो मैंने भी है टी वी में लेकिन आपकी तरह कभी सोचा नहीं था...कमाल कि सोच है...और एकदम सही.
..प्रेरक पोस्ट के लिए आभार.

Parul said...

man v/s wild har dilajij hai ji :)

Shiv said...

बहुत बढ़िया पोस्ट!!!

मैं नियमित तो नहीं देखता लेकिन कई एपिसोड देखे हैं. बढ़िया कार्यक्रम है.

वैसे जब सरवाईव करने की बात होती है तो मैं जेरी माऊस से सर्वाइवल का पाठ सीखता हूँ. अपने चारों तरफ के वातावरण को अपनी बुद्धि और स्किल्स से सर्वाइवल के लिए बदलना (फिर वो चाहे पोलिटिक्स से हो या फिर किसी और तरीके से) मुझे जेरी ने खूब सिखाया है. हमेशा एज पर रहने वाला एक करेक्टर हर बार सरवाईव कर जाता है और दूसरों को प्रेरित भी करता है.

Pankaj Upadhyay (पंकज उपाध्याय) said...

Aise serials humein jeene ki prerna dete rahte hain.. positive energy types jiski mere jaise negative insaano ko bahut jaroorat hai.. mujhe 'boogie woogie' bhi achha lagta hai jahan bina foohadta ke achhe achhe mazaak chalte rahte hain.. dil khush kar dene wale..

fir shayad NDTV par ek serial aata tha 'Jai Jawan' jismein celebrities ko kisi army camp mein le jaate the aur wahan ke jawano se milwate the.. wo bhi achha laga.. hain kuch aise serial jo jaise kuch sikha jate hain.. baki to TV jaisa dabba ek idiot box hi hai..

P.S. Roman mein type karne ke liye kshama.. office se hindi mein type ekrna ho nahi pata aur bina kuch kahe raha nahi jata :P

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