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Monday, May 31, 2010

ये ओढ़निया ब्लॉगिंग का दौर है गुरू......ओढ़निया ब्लॉगिंग.....समझे कि नहीं........सतीश पंचम

       आज कल ओढ़निया ब्लॉगिंग की बहार है। ओढ़निया ब्लॉगिंग नहीं समझे ? तो पहले समझ लो कि ओढ़निया ब्लॉगिंग आखिर चीज क्या है ?

   कभी आपने गाँव में हो रहे नाच या नौटंकी  देखा हो तो पाएंगे कि नचनीया नाचते नाचते अचानक ही किसी के पास जाएगी और भीड़ में से ही किसी एक को अपनी ओढ़नी या घूँघट ओढ़ा देगी। आसपास के लोग तब ताली बजाएंगे और लहालोट हो जाएंगे। कुछ के तो कमेंट भी मिलने लगेंगे जिया राजा, करेजा काट, एकदम विलाइती।

      और जो ओढ़नी के भीतर ओढ़ा दिया होगा वह अंदर ही अंदर नचनीया पर मुस्की मार रहा होगा और मुस्की मारते हुए जेब से पांच दस रूपए अपना नाम बताते हुए दे देगा। एकाध बार ओढ़नी के भीतर ही भीतर गाल-ओल भी सहला देगा। नचनीया फिर नाचते नाचते अपने स्टेज पर पहुंचेगी, हारमोनियम मास्टर तान पर तान छेडे रहेगा और इसी बीच वह घोषणा करेगी कि – ढेलूराम टेलर, केराकत चौराहा वाले की ओर से दस रूपईया इनाम और एही के लिए मैं अगला गीत उन्हें समर्पित करती हूँ कि – गर्मी के महीना, बाली उमरिया...... टप्प टप्प चुए पसीना बलम तनि पंखा चलाय द हो.......इतना कहना होगा कि भीड़ एकदम लहालोट.....सीटी बजने लगेगी, पानी की पिचकारी भीड पर फुहार कर रही होगी और जिसका नाम स्टेज पर से घोषित होगा और जिसके नाम पर गीत समर्पित होगा वह ढेलूराम टेलर अंदर ही अंदर मगन होगा कि चलो इसी बहाने मेरी दुकान का प्रचार हो रहा है।

       कुछ यही हाल ब्लॉगिंग में भी चल रहा है। नाच शुरू होने से पहले होठों की तस्वीर के साथ  घर घर जाकर ब्लॉग का पर्चा थमाया जाएगा कि – बदन का उभार देखो, ये देखो वो देखो और जाने पर पहले पता चलेगा कि किसी नारी का अधनंगी तस्वीर लगी है। एक दो जन एतराज करेंगे तो तस्वीर हटा ली जाएगी और तब कविता के नाम पर नारीवादी गीत पेश होगा कि आँखें है और पाँखे हैं और बांके हैं वगैरह वगैरह। उपर से एक एक कविता ब्लॉगरजन के नाम समर्पित भी की जाएगी कि मेरी यह कविता फलां सर के नाम, अगली कविता ढेकाने सर के नाम। 

अब,

बडे बूढे गमछा हिलोरते हुए ऐसे वक्त सबसे आगे स्टेज पर बैठे मिलेंगे। ढेरो कमेंट देते। कहीं हमारे नाम से भी एकाध कवित्त हो जाय चाहते हुए।  ऐसे वक्त गमछों की उछाल ब्लॉगिंग में आती हिलोरों से ज्यादा उंची हो जाती है। तरह तरह के कमेंट वाह वाह, क्या बात कही, सुंदर कविता कही वगैरह वगैरह। ढेर सारे फॉलोअर के रूप में पिछलगुआ भी मिल जाएंगे। साईकिल की घंटी भी कुछ ज्यादा ही घनघनाने लगेगी...... पूरे शामियाने में हलचल सी मची रहेगी। वाह वाह, क्या खूब के कहकहों के बीच।

     तो भई, ये ओढ़निया ब्लॉगिंग का दौर चल रहा है। जैसे सारे दौर चले वैसे यह भी दौर चलेगा....अब देखिए कब तक चलता है।

- सतीश पंचम


पहले तीन चित्र : साभार  इंद्र गोपाल फोटोग्राफी और नेट से,  आखरी चित्र मैंने मोटर साईकिल से जाते हुए एक बाजार के बीच से गुजरते समय खींचा था।।

65 comments:

rashmi ravija said...

आज तो बिलकुल जुदा अंदाज़ है....नए रंग में डूबी दीखी,आपकी लेखनी...

Shiv said...

जिया राजा...

एकदम सही कहे हैं. ई सच्ची में ओढ़नियाँ ब्लागिंग का दौर है. कैसी-कैसे कविताओं को क्या बता दिया जा रहा है कि कहिये ही मत. महादेवी वर्मा और सुभद्रा कुमारी चौहान अगर पढ़ लें तो एक बार फिर से मर जाएँ. उस तरह का है कि; "नई झुलनी की छैयां पिया दुपहरिया बिताइ ल हो"...टाइप. पिया लोग भी लगे हुए हैं और नई झुलनी को राजस्थानी रजाई तक करार दे रहे हैं.

ललित शर्मा said...

बहुत बढिया कहे दिल की बात
"ओढनिया ब्लागिंग" जय हो सतीश जी।

M VERMA said...

सही पकड़

ओढ़नियाँ ब्लागिंग' चलो एक और प्रवृत्ति का पता चला. सच में सब अईसे में लट्टू काहे न हों.
बहुत मस्त पोस्ट .. आँख भी खोल दिया.
हमहूँ गये थे सलाह देने कि अईसन चित्रवा मत लगाओ.

माधव said...

nice

डॉ .अनुराग said...

बडे बूढे गमछा हिलोरते हुए ऐसे वक्त सबसे आगे स्टेज पर बैठे मिलेंगे। ढेरो कमेंट देते।.......
सही कहा

एक ओर बात है .यहाँ आदमी को मापने का एक ही पैमाना है ........जो टिप्पणी दे वो अच्छा है ......जो ना दे वो बुरा....

kshama said...

Yah gaanv me honewala 'show' kabhi dekha nahi..aaj pata chal raha hai,ki,aisa hota hoga!
Khair! Badi anoothee tulna!

Sanjeet Tripathi said...

आपने तो बचपन में देखे "नाचा" की याद दिला दी।

बाकी लपेटा खूब है इस ओढ़निया ब्लॉगिंग के बहाने आपने ऐसे लोगों को।

soni garg said...

वाह सर क्या लिखा है बल्कि कहे कि क्या बखिया उधेडी है ..........हालाँकि ऐसा नाच कभी देखा नहीं और ना ही ऐसी कोई कविता जिसका जिक्र आपने किया लेकिन हाँ तुलना आपने बहुत अच्छी कि है .......और एक बार फिर आपसे सिखने को मिला है ..............क्योकि मुझे तो अभी ब्लोगिंग का "बी" भी ठीक से समझ नहीं आया .......इस क्षेत्र मैं नई जो हूँ .......

Suman said...

nice

कविता वाचक्नवी Kavita Vachaknavee said...

आइ ....बोsss..काटा.....ssssss.

महफूज़ अली said...

अरी! बाप रे..... एद्दमें अलगे अंदाज बा....

राज भाटिय़ा said...

हम भी गये तो उस ऒढ्निया वाली जगह.... आप ने सही कहा आप से सहमत है

Udan Tashtari said...

अगला गीत समर्पित है श्री संतीप पंचम, सफेद घर वाले के नाम.... :)

रचना said...

पिछले ३ दिन मे कम से ३ ब्लॉग तो मैने भी देखे हैं जहां तारीफों के पुल बांधे गए हैं समर्पिता को कौन ना टीप देगा । वैसे ना जाने क्यूँ वितिश्ना होती हैं ये सब देख कर । लिखना चाहती थी मे भी इस पर ना जाने क्यों शब्द विमुख हो गए शायद नारी हूँ इस लिये नारी पर ना तंच कस पाई जबकि लिखना चाहिये था । आप ने लिखा बहुत अच्छा लगा ।

बी एस पाबला said...

ये कमेंट आया है संतीश पंचम, सफेद घर वाले के नाम.... :)

मो सम कौन ? said...

सतीश भाई, मध्य प्रदेश पर्यटन की ad देखी है क्या, अपने को तो वो याद आ गई, या फ़िर दुश्मन फ़िल्म का गाना, ’दिल्ली का कुतुब मीनार देखो।’
थूक दो महाराज गुस्सा, लो फ़िर से कुछ याद आ गया, पैप्सी की विजञापन फ़िल्म,’मेरा नंबर....?’
हा हा हा, हमें तो बढि़या लगा ये प्रकरण, आपका एक और अंदाज देखने को मिला।

Suresh Chiplunkar said...

मान गये गुरुदेव… मलमल के कपड़े में लपेटकर जूता मारना तो कोई आपसे सीखे… :)

सच कहूं तो हिन्दी ब्लॉगिंग में 2-4 लोगों से मुझे बहुत ईर्ष्या होती है… क्योंकि मैं उन लोगों की तरह कभी नहीं लिख सकता, एक हैं शिवकुमार मिश्रा, दूसरे हैं आलोक पुराणिक, तीसरे हैं कीर्तीश भट्ट और अब चौथे आप :)

यह बात मैं दिल से कह रहा हूं, विश्वास न हो तो शिव भैया से पूछ लीजिये…

काजल कुमार Kajal Kumar said...

अच्छा है... भिगो-भिगो कर दे दना दन

Arvind Mishra said...

गजबै गुरु गजबै -छा गये -जा निसार किया ...हम यिहई बतिया उहाँ ऐसन नाई कहि पाए ...वाह रे कलेजा !
अगर हिरिजेश गुरु भी लिख्तैं तो यहीं स्टाईल में ..मिल के ता नाही लिखे दुनू मनई लोग !
तनिक ओढ़नियाँ क कोरौ पकडाई देहे रहा होत महराज ....

Arvind Mishra said...

*गिरिजेश

सतीश पंचम said...

सुरेश जी,

लगता है अब आप एक औऱ शुकुल-समीर टाईप बमचक मचवाना चाहते हैं :)

जिस तरह से आपने तारीफ की है, सच कहता हूँ जिस चने के झाड पर मैं चढ़ा था वह झाड आपकी बातें सुन अचानक बढ कर ताड हो गया है .....और मेरी मुश्किल ये है कि उतरूं कैसे :)

ढेरों ब्लॉगर हैं सुरेश जी जो सचमुच बहुत बढिया लिखते हैं। शिवजी का हलकान विद्रोही और आलोक जी का सनसनाता सटायर तो है ही, इसके अलावा गिरिजेश का दुपहरीया वाला टिकिर टिक हो या नीरज रोहिल्ला का मेराथन लेख, अनुराग जी की त्रिवेणीयां हों या विनीत का गाहे-बगाहे....किस किस को याद करूँ। सभी लोग एक से बढ एक हैं।
इधर रश्मि रविजा जी और घूघूती जी के साथ साथ कई अन्य महिला ब्लॉगर हैं जिनकी लेखनी दमदार है :)

इसका यह अर्थ नहीं कि बाकी के ब्लॉगर अच्छा नहीं लिखते या खराब लिक्खाड हैं....लिखते वह भी हैं लेकिन जिस लेख से अपनी बात जुड जाय, मन लग जाय तो वह लेख खुद ब खुद अच्छा हो जाता है।

बाकी तो उठा पटक, हत्त तेरे की धत्त तेरे की हर जगह लगा ही रहता है। हुँआ हुँआ में भी एक किस्म का संगीत है जो यदि न हो तो रात का सन्नाटा और गहरा हो जाय :)

निशांत मिश्र - Nishant Mishra said...

वो मारा पापड वाले को!

मैंने आज ही सोचा था ऐसी एक पोस्ट कहीं ठेलने का लेकिन हिन्दीज़ेन पर अलग तरह की पोस्टें लगतीं हैं इसलिए चुपाई मारे बैठा रहा.

मेरी अगली पोस्ट सतीश सर आपको ही समर्पित होगी. आप असली मर्द हैं सतीश सर.. मूंछें नहीं हैं तो क्या हुआ! सतीश सर प्लीज़ मुझे अपना नंबर दें. मुझे तो ऐसे ही मर्द पसंद हैं. मैं अपनी अगली पोस्ट आपको ही समर्पित करूगा. अगर नंबर देंगे तो बात कर लूंगा, नहीं तो सीधे समर्पित कर दूंगा. किसी की परवाह नहीं करने वाला. जिन्हें मेरे तेवर नापसंद हों वे नाम से कमेन्ट करके तो देखें. मैं आपको फोन करके शाबाशी देने के लिए बेचैन हूँ.

rashmi ravija said...

@सतीश जी ,
खींच ही दी लकीर...महिला ब्लॉगर और पुरुष ब्लॉगर के बीच..:)...दोनों के अलग अलग विषय भी निर्धारित हैं क्या :) :)

shikha varshney said...

वाह वाह वाह फंटास्टिक पोस्ट है एकदम बोले तो झक्कास.
अच्छा- बुरा... वो तो सब ठीक है पर प्रतिभा और क्षमता के बीच महिला - पुरुष की रेखा मत खिचिये पिलीज़

सतीश पंचम said...

अरे बाबा मैं कोई लकीर वकीर नहीं खींच रहा हूँ... ...... आप लोकी नां ऐंवे ही खामखां पिच्छै पै जांदे हो.....हां नहीं तो।

अभी अदा जी भी कान खींचने आती होंगी कि उनकी हां नहीं तो चुरा रहा हूँ उपर से बडा मर्द बन रहा हूँ :)

जहां तक विषय के अलग होने की बात है उसमें कुछ हद तक सच्चाई है औऱ यह तो नैसर्गिक है। महिलाएं चूंकि घर चौके से ज्यादा जुडी रहती हैं तो जाहिर है उनके सांसारिक अनुभव, उनकी बातें अलग होंगी।

आभा जी का अपना घर नामक ब्लॉग हो या वन्दना अवस्थी दुबे जी का किस्सा कहानी या आप ही के कई कहानियों को देख लिजिए, वहां ज्यादातर बेहद सरल और सहज ढंग से यह सब बातें एक स्त्री पात्र के नजरिए से रखी गई हैं। सोचिए कि सरोगेसी वाला लेख किसी पुरूष ने क्यों नहीं लिखा आपने ही क्यों लिखा उसे। उधर मनीषा पांडे जी के लेख जिसमें स्त्रियों द्वारा सार्वजनिक स्थानों पर शौचालय आदि के उपयोग में हिचकिचाहट आदि जैसी बातें थी.. हम पुरूष तो नहीं लिख पाएंगे....उतनी शिद्दत से और सलीके से हम वह बात न रख पाएंगे।

मुझे वह बड़की वाली कहानी याद आ रही है किसने लिखा था याद नहीं जिसमें बडी बहू अक्सर घर के काम करती है और छोटी का पति ज्यादा कमाता है तो उसे बाहर जाने आने की छूट होती है, इसी सब से जूझते हुए बडकी अपना पंजाबी सूट बहुत हिम्मत करके निकालती है....इस तरह की कहांनिया क्या हम पुरूष लिख सकते हैं ?

पुरूष या महिला के हिसाब से विषय के मामले में कुछ हद तक तो भिन्नता है यह मैं मानता हूँ।
बाकि आरक्षण, महंगाई, कविता ये सब तो कॉमन सब्जेक्ट हैं :)

और पुरूषों की पोस्टे थोडा राजनीतिक विषयों की ओर झुकाव लिए रहती हैं यह भी एक सच है।

सैयद | Syed said...

वाह वाह ! पढ़ कर मन पुलकित हो गया :)

सतीश पंचम said...

निशांत जी,

लगता है समर्पण लेख आप लिखेंगे और घर में बेलन से तर्पण मेरा हो जायगा :)

Sanjeet Tripathi said...

fir se aaya mai, aur dekh raha hu ki comments me ghamaasaan machaa hua sa hai, lekin jis safai se satish pancham ji ne apni baat rakhi hai us se sehmat hu, dikkat yahi hai ki nariwadiyo ki jaha rekha khinchti hui dikahi na de vaha bhi dkh hi jati hai, baki koi wanda nai ab chahe mere pichhe lag jayein ;)

पं.डी.के.शर्मा"वत्स" said...

:-)))

दीपक 'मशाल' said...

सई बात.. खूबईं हूल-गदागद मची हिनाँ ब्लोग्संसार मा भाई.. मैंने अपने जीवन में एक ही नौटंकी देखी थी बचपन में.. अब रोज ही देख रहा हूँ .. मजेदार टांगखिंचाऊ लेख..

rashmi ravija said...

सतीश जी ,मुझे पता है, आपने जानबूझकर अलग से उल्लेख नहीं किया...इसीलिए मैने भी मजाक में ही कहा.
जहाँ तक बात अलग -अलग विषयों की है...यह सीमा भी अब धूमिल पड़ गयी है...किशोर चौधरी ने 'अंजलि' नामक कहानी में अंजलि की मनःस्थिति का बड़ी संजीदगी से वर्णन किया है. मेरी कहानी 'कशमकश ' भी एक बेरोजगार युवक की कहानी है. चौदह किस्तों वाला लघु उपन्यास, "आयम स्टिल वोटिंग फॉर यू,शची," भी एक पुरुष पात्र,'अभिषेक' के नजरिये से लिखा गया है...और अभिषेक की मनःस्थिति का वर्णन पसंद आया सबको...मैने 'सरोगेसी' पर लिखा तो' मोबाइल के अधिक उपयोग से उत्पन्न' होने वाले खतरे के विषय में भी लिखा...ऐसे ही बहुत सी महिलायें स्त्री सम्बन्धी विषयक के साथ साथ अलग अलग विषयों पर भी लिख रही हैं.
अक्सर आदतवश लोग महिला ब्लॉगर्स का अलग से उल्लेख कर जाते हैं...किसी मंशा के तहत नहीं...पर यह आदत भी अब बदलनी चाहिए...इसीलिए मैने इस तरफ ध्यान दिला दिया...और कोई बात नहीं

गिरिजेश राव said...

सुकिरिया आदा करती करती करती हूँ (ढम ढम ढम-ढम-ढम .... ) वो तबले वाली आवाज़ मन में जोड़ कर पढ़ लेना भाई !(लिंग विवेचन न करें)

अपने कविता ब्लॉग पर 'उनकी' टिप्पणी देख कर 'वहाँ' गया तो सारा मुआमला समझ में आया (उनकी और वहाँ का प्रयोग ओढनिया ब्लॉगिंग के सन्दर्भ में), फोटो हटा दी गई थी, निराशा हुई ;)।
दुबारा आ कर पढ़ा तो आनन्द दुगुना हो गया। सच्ची बौत मज़ा आया। ऐसा सिरफ और सिरफ सतीश भाई ही लिख सकते हैं। भाई बोले तो ...

वैसे मेरे मन में खुजली हो रही है। काश कोई मुझे भी समर्पित करती कोई कविता रचता/ती :)...
पुरुष महिला जैसा कुछ नहीं, अच्छा लिखने वाले हर लिंग, आयु, पृष्ठभूमि से हैं। नंगई करने वाले भी हर लिंग, आयु, पृष्ठभूमि से हैं। ;)

मनोज कुमार said...

एक अंगरेज़ी फ़िल्म (शीर्षक ही सही) का गाना गाने का मन कर गया इसे पढने के बाद
होठों को कर के गोल
सीटी बजा के बोल
"...ऑल इज़ वेल..!"
@समीर जी

निशांत मिश्र - Nishant Mishra said...
This comment has been removed by the author.
L.Goswami said...

हिंदी ब्लोगिंग को यही दिन देखने शेष थे ..उफ़

उन्मुक्त जी का कहा मानिये आपलोग ..ऐसी चीजों पर ध्यान देने का मतलब उसे प्रोत्साहन देना ही है ..अन्यथा न लीजियेगा सतीश जी ..

सतीश पंचम said...

लवली जी,

मैं भी इस तरह की उठापटक पर ध्यान नहीं देता लेकिन जब मेरे ब्लॉग पर आकर मोहतरमा ने कमेंट करना शुरू किया कि उभार देखो ये देखो वो देखो तो थोडा लगा कि कुछ लिखना चाहिए इस पर और यह छोटी सी मैंग्रोव पोस्ट लिख डाली।

मैंग्रोव पोस्ट से तात्पर्य है कि जिस तरह से समुद्र के किनारे किनारे या डेल्टा आदि में जो मंझोली आकार की झाडियां तेज लहर आदि में हल्की फुल्का प्रतिरोध दर्शाती हैं उससे हैं । और मैंग्रोव शब्द में एक मजेदार मतलब भी निकलता है मैन ग्रोव...यानि कब तक इंसान इस तरह की चीजों में बच्चा बना रहेगा...थोडा तो ग्रो अप हो और सधी हुई सोच रखे।

मैंने इस मैंग्रोव पोस्ट को इसी मंशा से लिखा था क्योंकि देख रहा था कि लोग बडी तेजी से आंय बांय बके जा रहे हैं और यूं ही वाह वाह, क्या खूब कह बकवाद को बढ़ावा दिए जा रहे हैं। शायद अब जो बडे बूढे किस्म के ब्लॉगर हैं ललना टाईप लिंकों से सावधान रहेंगे :)

बाकी तो अपने मन की लिखता हूँ....बेमतलब की उठापटक अपने को भी अच्छी नहीं लगती। और वैसे भी ब्लॉगिंग पर बातें आजकल ज्यादा होती है ब्लॉगिंग कम होती है। वही हाल है कि मंच का एक पाया थोडा छोटा है, बैनर का पीन निकल गया है, उपर शामियाने से धूप आ रही है वगैरह वगैरह। अरे भई मंच का उपयोग किया जाय, उसके मीन मेख क्यों निकाल कर समय नष्ट किया जा रहा है।

अब प्रवचन बहुत दे लिया हूँ...ऑफिस के लिए निकलता हूँ न बॉस मेरे लिए सुनामी बन जाएगा और बचाने के लिए आप लोगों में से कोई न आएगा :)

जी.के. अवधिया said...

वाह! एकदम निराले अन्दाज में लिखी गई पोस्ट! पढ़कर मजा आ गया। साथ ही बहुत पहले देखे गये छत्तीसगढ़ी गम्मत (नाचा) भी आँखों के सामने साकार हो गये।

पलक said...

thankyou hai pancham sir ji. aap bhi mobile namber do na pl. vaise me agli post kisko samarpt karungi abi nahin bata sakti. chahati to hoon ki udantastari sir ko karu. par sir unhone meri tippani pakad lee hai, kaise ? नहीं बताउंगी मैं तो शुकुल सर को ही कल कविता समर्पित करूगी।आपने मेरा एड अपने ब्‍लोग पर दिया। आपका भी नंबर आए सर। धीरज रखिएगा सर। अगेन थेंक्‍यू सर।

Pankaj Upadhyay (पंकज उपाध्याय) said...

सोचा क्या लिखू, सबने तो लिख ही दिया है बहुत कुछ.. फ़िर देखा आप ’दस-बारह किलो का धन्यवाद’ दे ही रहे है तो सिर्फ़ धन्यवाद लेने के लिये की गयी टिप्पणी...

ज़िया राजा ;)

Suresh Chiplunkar said...

सतीश जी,
बमचक वगैरह मचवाने का अपना कोई इरादा और औकात नहीं है… :)
जिन ब्लॉगरों के नाम आपने गिनाये हैं मैं सभी का प्रशंसक हूं, मैं सिर्फ़ हास्य-व्यंग्य विधा के बारे में बात कर रहा था, कि वह मुझे कभी नहीं आयेगी। :) मराठी होने के बावजूद।
असल में, हास्य-व्यंग्य लेखन के लिये एक विशेष प्रकार सेंस ऑफ़ ह्यूमर चाहिये होता है, जो मुझमें नहीं है, सिर्फ़ यही स्वीकार किया है मैंने… कोई गलत अर्थ न लगायें… :)

अमरेन्द्र नाथ त्रिपाठी said...

देखिये मशाल जी कह रहे हैं - '' ... मजेदार टांगखिंचाऊ लेख.. '' . !
आप टांग भी खींचते हैं ?

Manoj K said...

this is my first visit to your blog, i am stunned with the flow of your language.

best
Manoj K

PD said...

हम कुच्छो नय कहेंगे.. एक ठो डरल आदमी कह भी का सकता है जी आपे बताईये? नयका बिलोगर बूझ के ढाढस बंधाने चले गए थे हुवां, उनके पहिले पोस्ट पर.. से जे दे दनादन ई देखिये, त उ देखिये बला कमेन्ट आने लगा.. हमको त अपना सामियाना उखाड(Unsubscribe follwing comments) के हुवां से भागना पड़ा.. फेनो चैन ना मिला उनको, और हमरे पोस्ट पर भी आ कर ई देखिये, त उ देखिये लिख गई..

अब त इहे लग रहा है कि या तो उ कोनों नयका बिलोगर नय हैं, कोई पुरनका बिलोगर नायका नाम से लिख रहे हैं.. या फिर नयका बिलोगर पूरा होमवर्क करके कूदे हैं मैदान में.. :)

सतीश पंचम said...

@ PD

अब त इहे लग रहा है कि या तो उ कोनों नयका बिलोगर नय हैं, कोई पुरनका बिलोगर नायका नाम से लिख रहे हैं.. या फिर नयका बिलोगर पूरा होमवर्क करके कूदे हैं मैदान में.. :)

मुझे भी यही लग रहा है।

सतीश पंचम said...

पलक जी,

आप की ही कमी थी। जिसके लिए इतना पंवारा पढा गया जब वह ही न आए तो खटकर्म आधूरा सा लगता है :)

खैर,

आप अपने ब्लॉग पर जो चाहे लिखिए...पर इस तरह से लिंक दे देकर कृपया तंग मत किजिए। अभी तक मैंने अपने ब्लॉग पर कहीं कोई चेतावनी या सूझाव आदि न लिखे थे कि कृपया टिप्पणीयां समझ बूझ के लिखें या आरोप आदि लगाते हुए न लिखें वगैरह वगैरह।

लेकिन आप का लिंकित कमेंट आया नहीं कि मन बिदक गया और एक पोस्ट लिखनी पडी। उसका असर यह पडा कि जिसे अब तक मैं Comment Box समझ रहा था वह Confession Box बन गया है :)

सतीश पंचम said...

सुरेश जी,

आप हास्य व्यंग्य की विधा की बात मत किजिए....यह बहुत खतरनाक बिमारी है। जिस किसी को लग जाती है फिर वह घर में भी व्यंग्य करे बिना नहीं रह पाता और इस चक्कर में बिगाड कर बैठता है। उसकी घरवाली भी धीरे धीरे व्यंग्य सीख लेती है।

अपना दुख बताउं तब आप समझ सकते हैं कि यह विधा कितनी खतरनाक है -

मेरी श्रीमती जी से जब मैंने कहा कि बैंगन की सब्जी मत बनाओ मुझे अच्छा नहीं लगता तब श्रीमती जी बोली -

- अच्छा....लेकिन अखबार में तो नहीं छपा ।

बताओ, ऐसी घणी बीमारी है कि पत्नी भी व्यंग्य कसने से नहीं चूकी। अपने मन का खा भी नहीं सकते..... उपर से आप इस बीमारी के लिए लालायित हो :)

चण्डीदत्त शुक्ल said...

इतनी तड़प क्यों है? खिन्नता है इसकी वज़ह या कुछ और? ख़ैर, व्यंग्य की धार अच्छी लगी.

अल्पना वर्मा said...

क्या बात!
क्या बात!!
क्या बात!!

बहुत अच्छी कवरेज की है...सामान्य परिस्थितिओं में इस नौटंकी परंपरा के बारे में लिखते तो शायद ज्यादा पाठक नहीं मिलते परन्तु हिंदी ब्लॉगजगत के अजीबो [गरीब ]हालातों में इस नौटंकी वालों के बारे में बताया..
इसे कहते हैं एक तीर से दो निशाने!

विनीत कुमार said...

बहुत अच्छा,भाषाई विमर्श के लिहाज से एक बिल्कुल ही अलग किस्म की पोस्ट। खासकर सतीशजी कमेंट के जरिए जो आपने मैनग्रोव का विश्लेषण किया है। पोस्ट तो जोरदार है ही।..

विनीत कुमार said...

बहुत अच्छा,भाषाई विमर्श के लिहाज से एक बिल्कुल ही अलग किस्म की पोस्ट। खासकर सतीशजी कमेंट के जरिए जो आपने मैनग्रोव का विश्लेषण किया है। पोस्ट तो जोरदार है ही।..

L.Goswami said...

@सतीश जी - :-)

आशा है सुनामी से बचे रहेंगे मैंग्रोव की बदौलत ...

वैसे प्रशांत भईया की बात से हम भी सहमत हैं ...

सतीश पंचम said...

चंडीदत्त शुक्ल जी,

शायद रूपा फ्रंटलाईन बनियान पहने हुए आप ही ने सबसे पहले वहां टिप्पणी दी थी :)

ये एक द्वंद्व भी है, सच भी और नियति भी. स्त्री की देह और पुरुष का प्रेम...वगैरह वगैरह........

लगता है एक स्त्री का दुख जान एकदम कातर हो उठे थे आप, आधा पौना किलो तक शायद भावविह्वल भी हो गए थे......इसिलिए रह नहीं पाए और सबसे आगे हो टिप्पणी भी कर दिए :)

अब जरा इस पोस्ट में सबसे उपर लगे एक महिला के भेष मे पुरूष नर्तक का चित्र देखिए और सोचिए....कहीं इसी के लिए तो आप को आधा पौना किलो भाव विह्वल नहीं होना पडा था :)

कोई बना रहा है और लोग बन रहे हैं.....बनिए बनिए....आजकल बनने का भी एक शगल जो चल निकला है.....

एक दढि़यल सी कविता में मरियल सा प्रेंम ढूँढना भी एक कला है शायद :)

Pankaj Upadhyay (पंकज उपाध्याय) said...

bas ji PD se sahmat hone aaye.. waise humhoon inke blog par gaye the par dekhke hi lag gaya ki koi bhaari mauj chal rahi hai...

wo dedicate dedicate bhi khela ja raha tha :)

aapki tippaniyan bhi padhin fir se.. rauwan bindaas lekhan.. jee haal gayil ho.. :) baki hum to aate hi rahte hain.. kauno nauka blogger thode na bani.. :)

शिशुपाल प्रजापति said...

शुक्रिया अदा करता हूँ... करता हूँ. करता हूँ.
जय हो....

हिमान्शु मोहन said...

ऐसी ही एक पोस्ट पर पहुँचे हम आज। टिप्पणी आदतन अपनी तरह की कर आए कि - "रचना समझना शेष है। स्वागत है।" क्योंकि मई से शुरू था वह ब्लॉग।
सतीश जी, आपका आभार - क्योंकि उस पोस्ट का अर्थ भी समझ में आ गया अब हमें।

ashish said...

आज ही गाँव से लौटा , और ये ओढनिया वाला नजारा मैंने भी एक दो बार देखा है. हमरे ओढनिया की छैय्या बालम दुपहरिया बिता ला हो . हा हा हा , अच्छा है जी, ब्लॉग्गिंग में ओढ़नी का क्या उपयोग है वो मुझे नहीं पता, क्योकि मैंने कभी उसको देखने की कोशिश नहीं की. बाकि उन ब्लोग्गेर्स जिनका नाम आपने लिया है , मै सहमत हूँ आपसे . ऐसेही लिखत रह.

चण्डीदत्त शुक्ल said...

वाह आरडी...बोले तो पंचम...मस्त है भाई...ही ही ही ही ही!!!! काश, हमारे भी ऐसे मसल्स होते, तो हम भी रूपा पहनते...

चण्डीदत्त शुक्ल said...
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Stuti Pandey said...

चलिए....हमारी सभ्यता से ओझिल होती हुई ओढ़नी कहीं तो बची हुई है! बहुत अच्छा लेख है!

Pyaasa Sajal said...

main intezaar kar hi raha tha ki kahaan mujhe "us blog" ka javaab milega...vivaad aur gehraayenge ye baat jitni door jaayegi...

aise lekh bahut samjhdaari bhara likha hai..par shayad kuchh mudde is baat me reh gaye hai..is chhetakanshi me asli mudde jo hai wo chhoot gaye hai

सतीश पंचम said...

@ प्यासा सजल 's - इस छींटाकशी में जरूरी मुद्दे छूट रहे हैं

अरे यार प्यासा सजल जी,

कहां आप भी मेरी इस ठिगनी पोस्ट में जरूरी मुद्दे ढूँढने लगे हो दोस्त....ब्लॉगजगत की वाहियात हरकतों पर इतना ध्यान देने लगोगे तो दिमागी तारों में शार्ट सर्किट होने लगेगा :)

असल- मूल वाले मुद्दे , सूद-ब्याज वाले मुद्दे, टिप्पणीयों के गुणा भाग वाले मुद्दे ये सब एक तरह की हड़बोंगई है और इन्ही सब बातों पर यह अदनी सी चिल्लरमय पोस्ट है बस्स....इसे इतना सीरियसली मत लो ।

दोस्त, जिंदगी Wants happiness

इसलिए बिनमुद्दों की मुद्दई छोड़ो और खुश-रहो... मस्त रहो...बस इतना ही कहूंगा :)

संगीता स्वरुप ( गीत ) said...

अरविन्द मिश्र जी की पोस्ट के माध्यम से यहाँ आना हुआ....

हांलांकि काफी देर हो चुकी है....पर फिर भी देर आये दुरुस्त आये ..

आपके लेखन में बहुत ताकत है...उस ब्लॉग को पढ़ सच ही ऐसा ही कुछ आभास होता था...पर कभी ऐसी नौटंकी के बारे में सुना नहीं था तो सोच भी नहीं सकती थी...लगता था कि शायद ऐसे ही फिल्मों में डाल देते हैं...आज कुछ ज्ञान में वृद्धि हुई. :):)

ज़बरदस्त लिखा है...ओढनिया ब्लोगिंग .. हा हा हा

डा० अमर कुमार said...

.
हई देखऽऽ लोगन.. अईसन ओढ़निया पोस्ट छुट्टल कईसे हो ?
सतीसवा त आज बड़का बड़का के ओढ़ा के मार दिहलस हो !
सबका पूरा ऊहे उतार लिहिस.. ऊ का कहते हैं जि अथिया को ?
ईज्जऽऽत .. आ देखीये कि लोग आपना इज्जतो उतरवा के कईसन ही ही ठी ठी कर रहे हैं ।

संतोष त्रिवेदी said...

सतीश जी ,ऊ ओढ़निया का दौर अभी भी चालू आहे...हाँ अब टंकी-मचान का भी सहारा लिया जाने लगा है,नौटंकी के लिए !.
डॉ. अमर कुमार की टीप आज भी उतनी ही प्रासंगिक है.उन्हें पुनः नमन !

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