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Friday, May 28, 2010

ब्लॉगिंग ऐसी हीर है कि बस्स...... की दस्सां............सतीश पंचम

       कभी मुझे अपने लेखन पर इतना कॉन्फिडेंस था कि जब पोस्ट लिखने के कुछ देर बाद तक यदि कोई टिप्पणी नहीं आती थी........ तब एक टेस्ट कमेंट लिख चेक करता था कि कहीं टिप्पणी आदि के बारे में कोई तकनीकी रूकावट तो नहीं है :)

 हंस रहे हो.......हंस  लो यार..... लेकिन यह भी एक किस्म की चिलगोजई थी........एक मौज था......  सो होता था ऐसा भी कभी........  वो तो बहुत बाद में पता चला कि टिप्पणीयां मल्टीफैक्टोरल होती हैं। कई कई फैक्टर होते हैं टिप्पणियों के आने या  न आने के लिए।

   इन्हीं दो सालों के दौरान कई ब्लॉगरों से मिलना मिलाना हुआ.....कई लोगों के यहां जाना-आना भी हुआ.... .किसी से जान पहचान बढ़ी तो चैटियाना भी हुआ और होते होते ये भी हुआ कि कभी जिसे आप कह कर संबोधित करता था, धीरे धीरे घनिष्ठता बढ़ने पर तूम से संबोधित करने लगा।

   गिरिजेश के नाम के आगे अब जी नहीं लगाता.....हम लोगों में अब अमाँ यार.....तमाँ यार चलती है  :)

इस तू तड़ाक से याद आया कि स्कूली दिनों में एक बार मेरे प्रिंसिपल साहब और एक साथी शिक्षक के बीच कोई बात चीत चल रही थी। दोनों ही सिक्ख, और आपस में मित्र भी गहरे। साथ में एक और शिक्षक थे।  बातचीत करते करते  शिक्षक महोदय कह बैठे - तैनुं नईं पता ते गल्ला नां किया कर......मैं जाणदा हां सच की है।  शिक्षक महोदय की बात सुनकर प्रिंसिपल साहब ने साथ चल रहे एक दूसरे शिक्षक को कोहनिया कर कहा - वेख ऐनु, तूं तडाक नाल गल्लां करदा ए।

 प्रिंसिपल साहब की बात सुनकर शिक्षक महोदय ने कहा कि - तुस्सी अपणे आप नूं रब्ब तो वड्डा मन्नदे हो।
दोनों की समझ में न आया तब शिक्षक महोदय ने कहा कि - असी अरदास करन वेले कैंदे ने , एक  तू ही रब राखा। जे असी रब नू तू कै सकदें हां ता तुहानूं क्यूं नहीं ?

 इस घटना से याद आया कि हम भी अपने ईंश्वर को तू तड़ाक से ही संबोधित करते हैं। अमिताभ जैसे बंदे तो शंकर जी से सीधे संवाद करते हुए कहते हैं - खुश तो बहुत होगे तुम......

  चलिए, इस तू तड़ाक से विषय का भटकाव सा हो गया है। तो मैं कह रहा था कि अब मेरे और गिरिजेश में अमाँ यार, तमाँ यार चलती है। औपचारिकता अब मायने नहीं रखती। कई और लोगो से चैटिंग होती रहती है जिन्हें कि कभी मैं जानता तक न था, उनके ब्लॉग पढ़ कर देख ताक कर बेहिचक बातचीत हो लेती है।

 ऐसे ही मैं कभी कभी  अनूप जी को भी जब तब छेड देता हूँ। एक दिन ऑफलाईन थे महाशय।

मैंने एक चैट लिखा - टेस्ट।

मुझे लगा ऑफलाईन हैं, तो उनको क्या पता क्या लिख कर छोड़ गया हूँ.....यूं ही टाईम पास कर बैठा। अभी दो मिनट हुए कि जनाब अवतरित हुए....काहे का टेस्ट।

 मैं तो सकपका गया। जिसे मैं ऑफलाईन समझ रहा था वह तो ऑनलाईन है। मुझे याद आया मुंबई का बैंण्ड स्टैंड इलाका । वहाँ भी समुद्र किनारे खडे होकर देखने पर पत्थर ही पत्थर और समुद्र की लहरें दिखती हैं।  मौज लेने के लिए एक ढेला  आपने पत्थरों पर फेंका नहीं कि वहीं किसी पत्थर के पीछे से एक लडका खड़ा हो जाएगा......क्या है ......दिखता नहीं क्या ?   लग जाता तो ?

 हम केवल सॉरी सॉरी कह कर रह जाते हैं। और वह लडका फिर वहीं पत्थरों की ओट में गुम हो जाता है अपने किसी प्रेयसी के संग।

 तो ये तो हाल है हमारे ऑनलाईन - ऑफलाईन का......अनूप जी उम्मीद है बुरा नहीं मानेंगे। और हां,   प्रेयसी बोले तो सचमुच की प्रेयसी नहीं ओए........तुस्सी लोक वी नां.......मेरे कैण दा मतलब ऐ है कि अपना काम भी एक ऑफिशियली अलाटेड प्रेयसी की तरह ही है....उसे नाराज कर दें तो घर में महाभारत मच जाय । काम काम होता है, ऐसे वक्त किसी को चैट आदि कर डिस्टर्ब नहीं करना चाहिए। अनूप जी आप को जो टेस्ट चैट लिखा था उसे वापस लेता हूँ :)

    इसी दौरान कई बार मजाकिया या कोई इन्फार्मेटिव मेल वगैरह कहीं से फॉरवरड होकर आता तो उसे अपने मेल लिस्ट में रहे कई ब्लागरों को भी फॉरवरड करता रहा। अब जब आप टिप्पणीयां कर सकते हैं तो मेलबाजी भी तो कर ही सकते हैं। सो यह भी होता रहा। अब तो कम या नहीं के बराबर मेल फॉरवार्डिंग करता हूँ :)

 कई लोगों को पढ़ता हूँ........कई अन्य लोगों को पढ़ना चाहा लेकिन विचार पता नहीं कब कैसे गोल हो गए कि पढ़ने  से बिदक जाता हूँ। कभी कभी किताबों की ओर  मोहित हुआ तो कभी विचारों की ओर। सब ओर अभिव्यक्ति ही अभिव्यक्ति है।

 अभी आज विनीत जी के गाहे बगाहे में पढा कि उन्हें अब लिखने की कम इच्छा हो रही है। पढ़ते जरूर हैं। यह स्थिति अपने साथ भी होती रहती है अक्सर। लेकिन फिलहाल तो अपना मन लिखने और पढने दोनों ओर लगा है और हो भी क्यों न। श्रीमती जी गांव में हैं। न सब्जी लाना है और न दूध - दही। टिचन्न होकर पढता लिखता हूँ।

और हाँ, एक और बात -

          इन दो सालों में ब्लॉगिंग के बहुत सारे रंग देखे। कभी तुनुक तुनुक तुन तारा रा तो कभी ढेन टें ढेन वाले मिजाज भी देखे। अनामी फनामी, सुनामी, पनामी जैसों से ब्लॉगजगत अब भी दो चार हो रहा है। यह ब्लॉगजगत का खर पतवार कब ठहरेगा, कब बंद होगा..... कोई नहीं कह सकता।

   लेकिन इस बीच टंकी पर चढ़ने वाले भी देखे, टंकी पर से उतरने वाले भी देखे......कुछ लोग देर तक चढ़े रहने के बाद अचानक सरपट उतरे.....तो कुछ लोग रूक रूक कर उतरे.....इसी दौरान  कुछ लोग बगल में  'आप लोगों का  स्नेह'  नाम का थैला लटकाए हुए भी उतर आए तो  :)

सो......

इतने लोगों का आना जाना दो सालों में पढ़-देख चुका हूँ कि मुझे ब्लॉगिंग पर अहसास फिल्म का गाना एकदम फिट लग रहा है -



कितने राँझे देख के तुझे बैरागी बन गए......... 
बैरागी देख के तुझे....... अनुरागी बन गए।







ब्लॉगिंग.......द सोशल फिनामिना.....  




इसी मई महीने में पूरी हुई अपनी  दो साला ब्लॉगरीय सफर को  याद करते हुए मैं  - सतीश पंचम

स्थान - वही, जिसे कभी दहेज में दे दिया गया था।

समय - वही, जब हीर और राँझा  मुंबई के समुद्र किनारे के बैण्ड स्टैंड पर साथ साथ बैठे हों, उधर  राँझा अपनी हीर से प्रेम जताते हुए कभी आसमान से तारे तोड लाने का वायदा कर रहा हो, कभी  समुद्र सुखा देने की बातें कर रहा हो .........कि तभी समुद्र के गंध मारते, काई लगे पत्थरों के बीच से कोई केकड़ा निकल कर राँझे को काट ले और हीर कहे - झूठ बोले कौवा काटे तो सुणिया सी मेरे राँझड़े......... केकड़ा कट्टण दा हाल पैली वार वेखदी हां :)
   

( दूसरा और तीसरा चित्र - इंटरनेट से साभार )

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22 comments:

मो सम कौन ? said...

लो जी, असी आ गये, वड्डे रांझे।
तुहानूं टेस्ट कमेंट करन दी कोई लोड़ नहीं है जी।

आप तो सतीश जी पंजाबी भी बहुत बढ़िया लिखते हैं।
और कोई बम रह गया हो तो वो भी फ़ेंक दो।

अल्पना वर्मा said...

ब्लॉग की सालगिरह मुबारक हो .
शुभकामनाएं
दो साल के अनुभव खूब लिखे हैं.

उन्मुक्त said...

दो साल पूरे करने की बधाई।

Arvind Mishra said...

दो साल हो गए इत्ती जल्दी -काश यह वाक्य पंजाबी में कह पाता ..आती नहीं न ...और वो ऑफ लाइन वाली बात इन्ही बातों की समझ से आप और गिरिजेश जी बेतकल्लुफ हुए हैं ...ऑफलाइन की अंतर्कथा और पथरों की धमक से नमूदार होता इक चेहरा -क्या अनालाजी है भाई !
आगे भी साथ रहें ....बहुत शुभकामनाएं !

वाणी गीत said...

ब्लॉगजगत में 2 साल पूरे होने की बहुत बधाई ...!!

kshama said...

Do saal kee bahut,bahut badhayi..ham to saal,mahine gin lena hee bhool gaye!
Yah qissa goyi badi ranjak lagi!

सतीश पंचम said...

भई बधाईयां तो मुझे आप लोगों को देनी चाहिए जो दो साल तक मुझे झेलते रहे :)

shama said...

Kee dassan! kee dassan!

Sanjeet Tripathi said...

भई पहले हम आपको बधाई देते हैं फिर भले ही आप हमें देते रहना ;)

बाकी सब बातें आपने सही लिखी, शुरुआती दौर में यह होता ही है कि कमेंट की प्रतीक्षा रहती है से लेकर ईमेल तक।

हां यह भी सही कहा कि जिन्हें जानते नहीं थे ब्लॉग के चलते उनसे संबंध भी बन गए हैं।

बाकी रही ब्लॉगिंग के रंग की बात, तो ये सब तो चलता ही रहेगा। अनंतकाल तक, सब इश्टायल रहेंगे, टंकी रहेगी, बहाने से चढ़ने और फिर उतरने का बहाना ढूंढने की प्रक्रिया भी चलती रहेगी।

उम्मीद है भाभी जी के लौट आने के बाद भी जारी रहेगा आपका लिखना, शुभकामनाएं।

zeal said...

Howdy Pancham?

Do saal ho gaye...bade nahi hue?

[ arrey baba i'm just jesting..why serious? ]

I love the game- "Hide and seek"

[Online-offline.]

डॉ .अनुराग said...

गोया सेक्सी पोस्ट है .....एक दम मस्त...ये मूड बना रहे

rashmi ravija said...

बहुत बहुत बधाई...आज 'सफ़ेद घर' दो साल का हुआ...पर ये क्या बात हुई...इस घर की रौनक भाभी जी के जाने के बाद बढ़ाई ,आपने....दुआ है उनके आगमन के बाद भी यह घर पोस्टों से वैसे ही गुलज़ार रहेगा...शुभकामनाएं

बी एस पाबला said...

'ਸਫੇਦ ਘਰ' ਦੇ ਰੰਗੀਨ ਰਾਂਝੇ ਨੂੰ ਹੀਰ ਬ੍ਲੋਗਿੰਗ ਦੇ ਨਾਲ ੨ ਸਾਲ ਹੋਣ ਦੀ ਲਖ-ਲਖ ਵਧਾਈਆਂ

ਬੀ ਏਸ ਪਾਬਲਾ

soni garg said...

आपका दो साल का तजुर्बा पद कर अच्छा लगा कुछ सीखने को मिला क्युकी मैं तो इस क्षेत्र में बिलकुल नयी हूँ .............

Udan Tashtari said...

दो साल के हो गये..बधाई हो जी. मिठाई??

जारी रहो...शुभकामनाएँ.

Raviratlami said...

'सफेद घर' दे रगीन रांझे नू हीर ब्लोगिग दे नाल २ साल होण दी लख-लख वधाईआं

सतीश पंचम said...

पाबला जी ते रवि जी, मैं वी तु्हानु अपणे वल्लों करोड-दो करोड दियां वधाईंया दिंदा हां (मैंनुं दो साल तक चेल्लण वास्ते) ......

ऐस मौके दे नां कल शामी टंकी ते अस्सी सारे मिलदे ने

उमीद ए तुसी ओथे ही मिलोगे दो चार लार्ज ग्लांसा फड़े होए :)

चखणे वखणे दा इंतजाम समीर अंकल वल्लों :)

dhiru singh {धीरू सिंह} said...

बधाईया जी बधाईया

बेचैन आत्मा said...

दो साल हो गये...!
अभी तक लगातार ऐसे ही लिखे जा रहे हैं..!!
तब तो देनी ही पड़ेगी..
लख-लख बधाइयाँ.

अनूप शुक्ल said...

१.कभी मुझे अपने लेखन पर इतना कॉन्फिडेंस था शुरू में होता है ऐसा। अज्ञानी का आत्मविश्वास तगड़ा होता है।

२. पोस्ट पढ़ने के बाद से ज्ञानजी की आई.डी. और पासवर्ड खोज रहा हूं। मिल जाता तो उनकी अनुपस्थिति में उनके ब्लॉग पर कल पोस्ट ठेलता- कौन बेहतर ब्लॉगर सतीश कि पंचम कि ....?

३. टेस्ट और काहे का टेस्ट करके आपने जो इज्जत हमको बक्सी उससे मन तो किया कि उठा के बक्सिया मुंबई भागे चले आयें और वहीं से आपको पत्थर में बांधकर एक ठो नोटिस का कागज भेजें जहां कि आपने हमको गुम होकर काम में संलग्न हो जाने की बात कही है। अब यह भी क्या बताना कि उस नोटिस में यह भी लिखा होगा कि आपकी पोस्ट के स्नैप शॉट हमने ले रखे हैं।

तो आप अब टेस्ट पोस्ट वाली बात तो भूल ही जाइये!

४. वैसे किसी मजाक पसंद व्यक्ति के साथ इससे बड़ा मजाक और त्रासदी कोई नहीं हो सकती कि उसको मजाक भी बता-बता के करना पड़े। यह बात हम मजाक में नहीं कह रहे हैं, सच कह रहे हैं!

५. ब्लॉगिंग में तात्कालिकता, ताजी पोस्ट,बासी पोस्ट की बहुत बात होती है। लेकिन मुझे लगता है कि ब्लॉगिंग में भी देर सबेर आप अपनी पसंद तय कर ही सकते हैं। एक बार पसंद तय कर किये फ़िर तो आप धांसकर उसको बांच सकते हैं।

६. दो साल पूरे हुये आपके! ब्लॉगिंग में। बधाई! आपकी तमाम सारी पोस्टें अनपढ़ी हैं। अब शुरू से देखा जायेगा मामला।

पलक said...

सच ! अभी पुरुष में इतनी ताकत नहीं, जो मेरा सामना करे, किसमें है औकात ? http://pulkitpalak.blogspot.com/2010/05/blog-post_31.html मुझे याद किया सर।

Pankaj Upadhyay (पंकज उपाध्याय) said...

बहुत सुन्दर पोस्ट.. बैन्ड्स्टैन्ड का सीन बडा सलीके से बयान किया आपने :)

फोटो ब्लॉग 'Thoughts of a Lens'

फोटो ब्लॉग 'Thoughts of a Lens'
A Photo from - Thoughts of a Lens

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