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Sunday, May 23, 2010

तोर रूप गजब...... धान के कटोरे की महक पहुँचाती एक अनुपम कृति

     कुछ उपन्यास ऐसे होते हैं जो कि कथा-कहानी की मान्य लकीरों को लगभग काटते हुए  सनसनाते हुए  निकल लेते हैं और जब तक कि आप समझें कि क्या हुआ, वह उपन्यास आगे किसी खेत में खड़ा मिलता है, हंसते हुए, अपने पीछे बुलाते हुए और इस बात का लालच देते हुए कि अभी तुमने देखा ही क्या है……आओ मेरे पीछे-पीछे……और एक चीज दिखाता हूँ। पुन्नी सिंह रचित तोर रूप गजब इसी तरह की रचना है जो धान का कटोरा कहे जाने वाले छत्तीसगढ़ की पृष्ठभूमि पर अपना धानी रंग बिखेरती चली जाती है।

      कहानी की शुरूवात होती है मूलत: शिकोहाबाद, उ.प्र.  के रहने वाले शिक्षक पुनीत से जो कि छत्तीसगढ़ ( तब संयुक्त  म. प्र)  के एक कॉलेज में अर्थशास्त्र पढ़ाने के लिए नियुक्त किया जाता है। तालाब और हरियाली के बीच बसे उस कॉलेज में उसकी नियुक्ति संस्थान के निदेशक महोदय करते हैं। यहां पुनीत को कई नए किस्म की बातों से दो चार होना  पड़ता है। ज्वाईनिंग कागजात पर उसके बांए हाथ की पांचों उगलियों के निशान लिए जाते हैं। इस सर्वथा नये किस्म के कागजी कामकाज से पुनीत को आश्चर्य होता है।

       साथी शिक्षकों से धीरे धीरे पुनीत का मेलजोल बढ़ता है। कई नए किस्म के वाद उसे  कॉलेज कैंपस में दिखाई पड़ते हैं। कुछ शिक्षकों की गुटबाजी चलती है। कुछ शिक्षक निदेशक महोदय के हां में हां मिलाते अक्सर पाए जाते हैं और निदेशक महोदय इस बात में मगन रहते हैं कि ज्यादा से ज्यादा शिक्षक उनसे जुड़े रहें और जब कभी खेमेबाजी आदि की कोई बात हो तो वह बीस पड़ें। इसी बीच निदेशक महोदय के केबिन के बारे में भी पुनीत जानने लगता है कि महाशय की खिड़की जनानाघाट की ओर खुलती है और अक्सर नहाती, कपड़े बदलती महिलाओं को जनाब घूरते भी हैं।

      इस बीच शहर में कहीं एक कवि सम्मेलन का आयोजन हुआ । पवन शर्मा नाम के शिक्षक के साथ पुनीत भी वहा जा पहुँचा। वहां पहले से ही निदेशक महोदय और कई शिक्षक तीसरे रो में बैठे थे । भीड काफी थी और पुनीत का मानना था कि बेकार ही आना हुआ । न खडे होने की जगह न बैठने की। उधर कवि सम्मेलन मे पुनीत की क्लास के कुछ स्टूडेंट भी थे जो कि कवि सम्मेलन की देख रेख कर रहे थे। उन्हीं में से एक लड़के ने पुनीत को पहचान लिया और पवन शर्मा सहित पुनीत को सबसे आगे की रो में बैठा दिया। ना नुकूर करते हुए आखिर पुनीत को पहली लाईन में बैठना पडा और उधर तीसरी लाईन में बैठे निदेशक महोदय और चाटुकार शिक्षकों को कुछ अबूझा सा जान पड़ा।

     इधर पवन शर्मा और लाल साहब के साथ स्टाफ क्वार्टर में ही चुप्पे से तीन लोगों का पीने पिलाने का एक छोटा कार्यक्रम हुआ। अभी यह सब खतम हुआ ही कि अगले दिन निदेशक महोदय की ओर से बुलावा आ गया। शंकित मन लिए वह निदेशक के कमरे में गया जहां पहले से ही तीन शिक्षक निदेशक गुट के बैठे थे। तभी निदेशक महोदय ने बात करते करते और जनाना घाट की ओर ताकते हुए ताकीद दी कि  शिक्षक लाल साहब से चौकन्ना रहो । बाद में दूसरे स्त्रोतों से  वजह जानने पर पता चलता है कि लाल साहब का चक्कर  इसी संस्थान की एक पंजाबन शिक्षिका मोनिका से चल रहा था। दोनों ही एक दूसरे को चाहते हैं लेकिन मोनिका के घर वाले जबर्दस्ती उसे अपने साथ ले गए। अब लाल साहब अकेले रह गए हैं। 

     इधर पुनीत को लाल साहब में कोई ऐब नहीं दिखा, बल्कि भले आदमी मालूम पड़े । उन  लोगों की गहरे छनने लगी। और तभी एक दिन लाल साहब एक खत को लेकर परेशान हो उठे जिसमें उनकी प्रेमिका द्वारा जबलपुर से लिवा ले जाने का आग्रह था। लाल साहब का आग्रह था कि पुनीत जबलपुर जाकर उसके घरवालों से बात कर मामला सुलझाए, उन्हें समझाए……… और बाबू साहब तैयार भी हो गए।    

     जबलपुर पहुंचने पर पुनीत किसी तरह मोनिका का घर तलाश कर पाया। लेकिन असली मुसीबत शुरू हुई जब मोनिका के पिता ने बातों बातों में बंदूक की नली पुनीत के सीने से सटा दी। इसी दौरान एक घूंसा पुनीत को पड़ा और वह कसमसा कर रह गया। साथी शिक्षक की जिंदगी की बात थी सो वह शांत रहा। बाद में किसी तरह लाल साहब और मोनिका के रिश्ते की मंजूरी मिली और अब मोनिका ने फिर अपनी नौकरी पकड ली।  दोनों ही उस संस्थान में कमाने लगे।

    इधर पुनीत को अकेलापन महसूस हो रहा था। उसकी पत्नी और तीन बच्चे गाँव में संयुक्त परिवार में रह रहे थे। भरा पूरा घर था।  पुनीत ने अपने बड़े भाई को लिखा कि अबकी वह दिवाली में घर आकर अपने बीवी बच्चों को लिवा आएगा लेकिन  उसके बड़े भाई का कहना था कि पहले वह स्थाई तौर पर नियुक्त हो ले तब ले जाय बीवी बच्चों को । लेकिन एक साथी शिक्षक दुबे ने पुनीत को ज्ञान देते हुए समझाया कि वह खुद भी यू पी से हैं और वहां के लोगों कि एक पृवत्ति होती है कि जब घर का बेटा परदेश कमाने चला जाय तो उसके परिवार को यहीं गाँव में ही रोके रखा जाय ताकि बेटा कमाकर परिवार को दिया करे।

     ज्ञान प्राप्ति का असर कहें या पुनीत की मनस्थिति, वह अपनी गाँव की अनपढ़ पत्नी को लिवा आया। दो बेटे एक बिटिया भी साथ थी। कैंपस में जहां अन्य शिक्षकों की पत्नियां बढ़ चढ़ कर आधुनिक घरेलु, सामयिक चहल पहल पर बातें करती वहां पुनीत की पत्नी उन्हें बस टुकुर टुकुर ताका करती। धीरे धीरे पुनीत की पत्नी के मन में हीन भावना ने जड़ जमाना शुरू किया। उसे लगता कि वह लोग कितने बड़े हैं जो बड़ी बड़ी चीजों के बारे में बात करते हैं, सोफा -  ओफा , मेज – कुर्सी, रोज ही सेब खाना वगैरह वगैरह। इधर पुनीत चाहता था कि उसकी पत्नी भी और शिक्षकों की पत्नीयों की तरह बोला डोला करे। अपने मन में हीन भावना न लाए। बच्चे भी ढंग से रहें । लेकिन मामला था कि फिसलता जा रहा था। एक दिन पुनीत की पत्नी ने अपनी हीन भावना का जिक्र पुनीत से किया तब पुनीत ने एक तरह से उसे समझाते हुए कहा कि वह औरतें जो कुछ कहती हैं सब सच नहीं होता। वह लोग भी हमारे जैसे ही हैं बस बातें बड़ी बड़ी करती हैं। तुम चाहो तो वह चीजें तुम्हे भी हासिल हो सकती हैं। सोचने में क्या जाता है। वह लोग भी केवल अपनी हीन भावना को छिपाने के लिए सोच सोच कर निहाल होती हैं और वही बक देती हैं। इसमें तुम्हें परेशान होने की जरूरत नहीं। बल्कि अगर तुम चाहो तो अपने पिता के बारे में बताओ जो कि सचमुच के औसत दर्जे के जमींदार थे । उनकी बड़ाई किया करो।

      और यह युक्ति काम कर गई। पुनीत की पत्नी ने धीरे धीरे अपनी बतकौवल से सब पर प्रभाव सा जमाना शुरू किया। उसने अपने पिता के साथ साथ अपने ससुर यानि पुनीत के पिता को भी एक छोटा मोटा जमीदार बताया और उनकी उदारता आदि का बखान किया। जबकि पुनीत के पिता एक औसत दर्जे के काश्तकार से ज्यादा कुछ न थे।

    यहां लेखक ने पुनीत की पत्नी की मनोभावनाओ को ज्यादा विस्तार नहीं दिया है जबकि यहां रोचकता और एक ठेठ देहात को दर्शाने का यहां काफी स्पेस बनता था। उसके मायके वालो के उदारता के सिलसिले में एक दो उदाहरण बताते समय बाकी शिक्षकों की पत्नियां  जमींदारी की बात से जिस प्रकार रिएक्ट करतीं वह भी अपने आप दिलचस्प  होता। यहां लेखक ने इस मामले में थोडी कंजूसी बरती है यह स्पष्ट दिखता है।

      इस बीच कॉलेज पॉलिटिक्स जोरों पर चलती है। शिक्षकों की बातचीत इस ओर ज्यादा रहती कि किस बात से निदेशक महोदय के करीब होने का एहसास हो, उन्हें खुश कैसे किया जाय। वर्तमान निदेशक से पहले जो निदेशक थे वह अब मंत्री बन गए थे। उधर गर्मी की छुट्टी बिता कर पुनीत जब दो महीने बाद संस्थान वापस आता है तो उसे एक चपरासी लिफाफा थमाता है जिसमें कि लिखा गया है कि उसका कार्य ठीक नहीं है और उसका प्रोबेशन पिरियड एक साल और बढ़ाया जा रहा है। पढ़ते ही सन्न। क्योंकि छुट्टी के पहले ही निदेशक महोदय ने कहा  था कि उसकी नियुक्ति पक्की समझे। उसके कार्य में कोई त्रुटि नहीं है। अब यह सब पढ़ वह निदेशक महोदय के कमरे मे गया तो वह कोई  रजिस्टर पढने में मशगूल थे। पूछने पर खिंसे निपोर कर कहने लगे कि यह तो केवल कागजी फारमेलिटी है बाकि अगर कुछ हो होवा गया तो वह तो हैं ही यहां पर संभाल लेंगे।

       अब पुनीत एक दूसरे शिक्षक के साथ संस्थान के एक बोर्ड मेंबर से जाकर मिलता है। वहां जाकर पता चलता है कि उसकी नियुक्ति तो स्थाई की जा चुकी है और प्रोबेशन जैसी कोई बात नहीं है। इधर बोर्ड मेंबर खुद इसमें हस्तक्षेप करते हैं और पुनीत को कन्फर्म होने का लेटर मिलता है। निदेशक और पुनीत के बीच अब शीत युद्ध शुरू हो गया। जहां सभी चा़टूकार शिक्षक रोज शाम कैंपस में निदेशक के आसपास कुर्सी डालकर बाहर बैठे रहते वहीं पुनीत अपने क्वार्टर में अपनी कहांनिया लिखता नाटक लिखता। यहां विशेष बात यह भी है कि पुनीत को अपनी इस विधा के बारे में साथी शिक्षकों को बताते हुए संकोच होता है क्योंकि ऐसा ही कोई और भी लिखता पढ़ता था और उसका नाम कथागुरू रख दिया गया ।
  
      समय बीतता गया और उधर पुनीत ने आसपास के छत्तीसगढी समाज के बारे में गहरी दिलचस्पी लेना शुरू किया। वहां की आदतें, वहां के लोक व्यवहार, वहां के रीति रिवाज। यहां से उसे अपनी कहांनियों के लिए ढेर सारी सामग्री मिल जाती थी।

     अब यहां पुन्नी सिंह ने अपनी लेखनी का असल जादू दिखाना शुरू किया। ग्राम्य इलाके का सजीव वर्णन । अक्सर बारिश होने और उससे उपजी उमस और गर्मी का सशक्त चित्रण, धान के खेतों के बीच से गुजरते हुए आसपास के घरों और लिपे पुते द्वारों का बखूबी  
रेखांकन किया है लेखक ने।

     अपने स्टूडेंट्स के गाँव घरों तक भी पुनीत का आना जाना होने लगा। उनके दुख सुख से वह धीरे धीरे गहराई तक परिचित होता गया। इसी बीच एक कैंप लगा और उसी सिलसिले में उसे जंगली इलाकों में जाकर लोगों से संपर्क करने का मौका मिला। इसी सब के दौरान एक स्टूडेंट मिला जो कि अपनी सिलाई की दुकान का उद्घाटन पुनीत से करवाना चाहता था। पुनीत तैयार भी हुआ और बातचीत में पता चला कि यह दरअसल एक किस्म की बैंक और सरकार से रूपए झटकने का जरिया है। सिलाई काम के नाम पर फोटो आदि खिंचवा कर बैंक आदि मे लोग इसी तरह पैसे लेते हैं और उससे अपना काम निकालते हैं। लोभी बैंक वाले भी खुश, सरकारी अधिकारी भी खुश कि विकास हो रहा है और जो पैसे ऐठ रहा मूल निवासी है वह भी खुश  कि चलो पैसा तो मिल रहा है।

       उधर सरकारी अधिकारीयों, पुलिस वालों द्वारा बैगा जनजाति के एक शख्स की पिटाई की जाती है यह कहकर कि उसके द्वारा जो लकडी, पत्ते वगैरह तोडे जा रहे हैं, इकट्ठे किये जा रहे हैं वह जंगल का विनाश कर रहे हैं। इस दृश्य को पुनीत को छुप कर देखना पड़ता है क्योंकि उसके साथ चल रहा स्थानीय निवासी जो मार्गदर्शक का काम कर रहा है, किसी मुसीबत में नहीं पडना चाहता।

      यहां लेखक की तारीफ करनी होगी कि कई चीजें जो उपरी तौर पर नहीं दिखती उन्हें लेखक ने छू दिया है। बैगा जनजाति के लोगों और दूसरे लोगों के बीच पनपे वैर हो या सरकारी अधिकारीयों की हिकारत भरी नजरें…….. नक्सलवाद का बीज ऐसी  ही किसी प्रक्रिया से अंकुरित हुआ होगा।         

      पुनीत जंगल में घूमते हुए कई चीजों से रूबरू होता है। एक झोपडे में जाने पर बहुत स्वागत सत्कार मिलता है, भूख मिटती है, आदिवासी की आँखो में खुशी और स्नेह का भाव मिलता है । ऐसे ही कई अनुभवों को लेते हुए पुनीत के मन में भाव आता है कि इतनी लहलह धान की फसल यहां होती है, धान का कटोरा कहा जाता है यह फिर भी लोग भूखे क्यों रहते हैं……ऐसे ही तमाम प्रश्नों के बीच कहानी आगे बढ़ती है।

     इधर संस्थान को सरकारी स्वामित्व में लेने की कोशिशें चल रही होती हैं। दुर्गम राजनीति का एक अलहदा किस्म का  जीता जागता उदाहरण। दरअसल इस संस्थान के पूर्व निदेशक जो कि अब मंत्री बन जाते हैं चाहते हैं कि अब भी संस्थान की नकेल उनके हाथ में रहे। और उसी को लेकर राजनीति खेली जाती है। वर्तमान निदेशक के चाटुकार अब निदेशक से दूर होने लगते हैं और सरकारीकरण का पक्ष लेने लगते हैं। एक झटके में निदेशक अकेले पड जाते हैं।

       लोग अपने अपने नफा नुकसान के बारे में सोचने लगते हैं। सब के मन में यह भाव आता है कि एक बार सरकारी स्वामित्व में आ जाने पर सभी लोग खुद ब खुद सरकारी कर्मचारी हो जाएंगे।  नौकरी की चिंता खतम। पेंशन मिले सो अलग।  कुछ लोग यह सोचने लगते हैं कि एक बार सरकारी घोषित होते ही अपने ही जिले में कहीं ट्रांसफर ले लेंगे।  पुनीत भी इसी उधेड बून में रहता है। लेकिन उसकी चिंता अलग किस्म की रहती है। रहते रहते पुनीत लेखक संघों का अध्यक्ष बन गया होता है और उसके द्वारा लिखे नाटक लोगों के बीच जनजागृति का एक अहम हिस्सा बनते जा रहे होते हैं। उसी में कई लेख जो मुर्गीवाला आदि बहुत चर्चित हो उठते हैं और पुनित धीरे धीरे एक इलाके का जाना माना नाम हो जाता है। लोगों से उसकी घनिष्ठता बढ़ती जाती है। अक्सर वह  गांवो की ओर जाकर कई कई दिन बिता चुका है और लोगों से उसकी गहरी छनती है।

      इस सब को एकाएक छोडकर जाना कुछ अजीब सा लगता है उसे। इधर संस्थान के वर्तमान निदेशक द्वारा टालमटोल किया जाता है हस्तांतरण में और उधर राजनीति का पांसा ऐसा फेंका जाता है कि निदेशक महोदय का ट्रांसफर बस्तर कर दिया जाता है जहां पर कि अच्छे अच्छों के तेवर ढीले पड जाते हैं।

     यहां लेखक ने कैंपस राजनीति को लगता है गहरे से देखा है और उसी कारण इस मुद्दे को करीने से हर एक स्टेप के बाद समझाते और बताते चले गए है।

     अब हालत यह है कि सरकारी घोषित होते ही सभी वर्तमान कर्मचारी तो सरकारी मान लिए जाते हैं लेकिन कुछ ऐसे भी थे जोकि न्यूनतम मान्य योग्यताओ को पूरा नहीं करते थे, बस केवल जैसे तैसे रख लिए गए थे। अब सरकार उन्हें कर्मचारी मानने से इनकार कर रही थी। इन्हीं में से एक होते है संस्कृत पढ़ाने वाले   रामनिहोरन शास्त्री। बी ए को संस्कृत पढ़ाते थे लेकिन उनका चुनाव बड़े अजीब ढंग से हुआ था।

    दरअसल रामनिहोरन शास्त्री अपना देश छोडकर इस शहर में आ गए थे और किसी होटल में रोटी बनाने का काम मिला था। तब उन्हें संस्कृत पढ़ने और शास्त्रार्थ करने का बड़ा शौक था। इसी कारण वह कुछ कुछ विद्वान माने जाते थे। एक दिन किसी गाहक ने तरस खाकर उन्हें एक टुटपुंजिया मंदिर में पुजारी का काम दिला दिया। किसा तरह दिन चल रहे थे।

   अब हुआ यह कि एक दिन मंदिर के पिछवाडे मोरी में एक गंदी सी लंगोटी बांधे और उपर से एक फटा लाल रंग का अंगोछा लपेटे बर्तन माज रहे थे। काली तली वाली बटलोई के तले को पत्थर से रगड रहे थे कि तभी एक चपरासी सामने आ खड़ा हुआ। तब संस्थान नया नया था। चपरासी को देख बटलोई पर पत्थर रगड़ना भूल गए।

   चपरासी पहले तो उनकी हालत देखकर सकुचा गया और बाद में बोला – महाराज, कॉलेज में नौकरी करने का मन है क्या ? जो मन हो तो फौरन हमारे साथ चलो। वहाँ हाई स्कूल में साहब बैठे हैं। संस्कृत वाले कौनो आचार्य की तलाश है।

   उसने कहा तो फौरन हाथ धोकर उठ खडे हुए और बोले – चलो भाई, लगता है भोले बाबा ने सुन ली।

     जब वह उसके साथ चलने को तैयार हुए तो चपरासी का ध्यान एक साथ उनकी कई बातों पर गया। उसने देखा कि उनकी कमर पर लपेटा अंगोछा बहुत मुश्किल से उनके गंदे लंगोट को ढँक पा रहा है, उनका जनेऊ और भी मैला था जिसमें किसी टुटपुंजिया ताले की चाबी लटक रही थी…..मैल से पैर भी कुछ ज्यादा ही काले पड़ गए थे। वे लगभग नग्न अवस्था में संस्थान में प्राध्यापक पद की नौकरी के लिए लुभियाते हुए से आगे बढ़े जा रहे थे और देख देख कर चपरासी को हंसी आ रही थी। एक बार तो उसके मन में आया कि उन्हें ऐसी हालत में लेकर वहां न जाए क्या पता साहब बिगड़ जांय।

वे इस संस्थान के बिल्कुल प्रारंभिक दिन थे।

     उस हालत में साहब ने जब उन्हें देखा तो पहले उनकी त्यौरियां चढ़ गईं। और फिर कुछ सोचकर हंसने लगे।
 कहो, कहाँ के रहने वाले हो ? सकुचाओ मत, हम सब समझते हैं। अपने देश से जो इधर आता है उसकी यही हालत रहती है।

रामनिहोरन शास्त्री ने खींसे निपोर दीं।

 कोयों पर पान की पीक टपकने को हुई, इसलिए उँगलियों पर लेकर कमर में लिपटे अंगोछे से पौंछ ली। वे कुछ कहना चाहते थे लेकिन कह न पाए।

बी ए में संसकृत पढ़ानी पड़ेगी महाराज।

हाँ साहब पढ़ा लूँगा।

तो फिर जाओ, आज से तुम इस संस्थान के संस्कृत विभाग के सर्वे-सर्वा हुए। परंतु एक बात याद रहे, कल से जब घर से बाहर निकलो तो धुले हुए धोती-कुर्ता और पैर में जूता जरूर होना चाहिए…..और यह जनेऊ भी बदल लेना। ………पढ़ाई लिखाई से संबंधित जो भी प्रमाण पत्र हों उन्हें जमा कराना। वे नहीं हों तो भी चलेगा……..

  उस समय तो सब कुछ चल गया लेकिन अब आकर खाँचे में गाड़ी का पहिया अटक गया है।

 शासन से जो स्वीकृत होकर स्टाफ की सूची आई है उसमें रामनिहोरन शास्त्री का नाम नहीं है और अब वह हाथ पैर मार रहे हैं।

     इसी तरह के कई संस्थानिक बातों को लेखक ने बखूबी शब्दों के जरिए उकेरा है।  एक बात और नजर आती है कि कैंपस की हर एक चीज को अपना मान कर पहले उसका ख्याल रखने वाले रहिवासी लोग अब कैंपस की हर चीज से उतना जुडाव नहीं महसूस करते। अब वह चीज सरकारी हो गई है और आसपास के चरवाहे बेधड़क कैपस में घुस आते हैं, कोई रोकने वाला नहीं। चपरासी जो पहले चौबीसों घंटे अनकहे ही खुद ब खुद संस्थान की ओर देख रेख कर लेता था वह अब अपने घड़ी के हिसाब से काम करता है।  कहीं कोई ईंट गायब हो रही है तो कहीं कुछ। पता चल रहा था कि वाकई सरकारी संस्थान बन चुका है यह कैंपस।

     धीरे धीरे इस संस्थान के और आसपास के माहौल में आए बदलाव और प्रवाह के बीच पुनीत ट्रांसफर ले लेता है और उसका फैसला काफी उहापोह के बीच होता है। यहां लेखक ने पुनीत की मनोस्थिति और उसके आसपास के गाँवों से लगाव आदि को बखूबी  उकेरा है।

    जिस दिन पुनीत रेल्वे स्टेशन पर गाड़ी पकड़ कर रवाना होने को है उस दिन उसे विदाई देने आने वाले लोगों से पूरा स्टेशन भर गया। गाँव वाले भी हैं, संस्थान के कर्मचारी भी हैं और कुछ देखे अनदेखे चेहरे भी है। इतने लोग उसे चाहते हैं, जानते हैं……. इसकी उम्मीद पुनीत को नहीं थी।

 उसी बीच उसे छत्तीसगढ़ी गीत का वह मुखडा़ सुनाई पड़ता है कि -

 तोर रूप गजब……मोला मोह डारे…….

 छत्तीसगढ़ की धानी चादर, उसके जंगल,  विरोध के स्वर, सार्वजनिक जीवन में हो रहे तमाम सांस्थानिक कवायदें, अधिग्रहण की राजनीति और उससे उपजे तमाम प्रश्नों की ओर एक विहंगम दृष्टि है पुन्नी सिंह रचित 'तोर रूप गजब'।


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- सतीश पंचम
  
तोर रूप गजब
लेखक - पुन्नी सिंह
प्रकाशक - नेशनल पब्लिशिंग हाउस
337, चौड़ा रास्ता, जयपुर - 302 003
फोन - 0141-2575258, 2577548

प्रधान कार्यालय
23, दरियागंज, नई दिल्ली - 110002
फोन - 011-23274161,23275267

मूल्य : 300 /-

( सभी चित्र इंटरनेट से साभार)

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17 comments:

Arvind Mishra said...

निश्चित रूप से एक जोरादार सामयिक रचना है -मगर प्रेम प्रसंग नहीं है -तोर रूप गजब ?

सतीश पंचम said...

अरविंद जी,

प्रेम प्रसंग के नजरिए से देखा जाय तो यह कृति कुछ शुष्क है क्योंकि इसमें एक जनजातिय जोडे का जो प्रेम प्रसंग बताया गया है वह भी डरा डरा सा है...भागा भागा फिर रहा है....पुनीत से उस जोडे की मुलाकात भी होती है....पनाह भी दी जाती है और इसी भागदौड में लडके की ओर से बताया जाता है कि उसे अकेले नींद नहीं आ रही।

जंगल में एक झोपडे में पनाह मिलने पर भी एक प्रकार का प्रेम प्रसंग है पर वह निश्छल और मान मनौवल का एक अंश कहता हरियर प्रेम है।

यहां 'तोर रूप गजब' से तात्पर्य छत्तीसगढ़ी समाज, छत्तीसगढ़ की जीवन शैली, वहां बिताए पुनीत के चौदह साल के अनुभव और सीधे सरल लोगों के बीच नए नए पनपे सरकारी नजरअंदाजी के कोलाज से है...... जिसकी परिणती शायद अब हम दंतेवाडा जैसे हादसों के रूप में देख रहे हैं।

यहां पुनीत का यह प्रश्न अब भी मथता है कि धान का कटोरा कहे जाने वाले इस प्रदेश के लोग भूखे क्यों हैं ?

Arvind Mishra said...

निसंदेह यह एक उत्कृष्ट कृति है!

वाणी गीत said...

@ वह लोग भी केवल अपनी हीन भावना को छिपाने के लिए सोच सोच कर निहाल होती हैं और वही बक देती हैं...
मध्यम वर्ग पर कटाक्ष नजर आ रहा है ...कटाक्ष कहना भी ठीक नहीं , वास्तविकता ही है ...

कॉलेज की पोलिटिक्स भी सर्वव्यापी है ...

कुल मिलकर पुनीत की कहानी बहुत जानी -पहचानी सी लगी...जैसे इस पात्र से पुराना परिचय हो ..!!

डॉ. मनोज मिश्र said...

वाकई जोरदार कृति.

प्रवीण पाण्डेय said...

सारी कहानी आपने ही सुना दी । निश्चय नहीं हो पा रहा है कि पुस्तक खरीदी जाये या नहीं । नहीं, खरीद कर पढ़ी जाये ।

सतीश पंचम said...

प्रवीण जी,

दरअसल यह उपन्यास बहुत बड़े कैनवास पर लिखा गई है और मैंने केवल उसके कुछ शेड्स की चर्चा की है।

इसका असली मजा आता है जब छत्तीसगढ़ के जंगलों, धान के खेतों और लोगों के बीच की जो बातचीत होती है, वह पढ़ने में। एक दो जगह छत्तीसगढी गीत धान रोपते हुए बताया गया है।

आप को याद होगा एक डेल्ही सिक्स का गीत था ससुराल गेंदा फूल ( मूल रूप से छत्तीसगढ़ी गीत से लिया हुआ) ....उसी से मिलता जुलता एक और गीत की चंद लाईनें भी इसी किताब में हैं।

उपन्यास का टाईम स्पैन सत्तर के दशक के आसपास का है।

चतुर गीतकार होगा तो अब भी लपक लेगा :)

ashish said...

अच्छी मीमांसा. तोर रूप गज़ब , मैंने सोचा भोजपुरी साहित्य है. वर्तमान परिप्रेक्ष्य में एकदम सटीक साहित्य. जैसा कि डॉ मिश्रा ने लिखा , मै भी येही सोच रहा था कि कोई प्रेम साहित्यहोगा.

anitakumar said...

vaise pataa nahi kab padhna hota is jordaar kriti ko...aap ne yahin padhwaa diyaa dhanywaad...aabhaar

Sanjeet Tripathi said...

सबसे पहले तो आपको शुक्रिया कि आपने हम सबको पढ़वाने के लिए इतना कुछ टाइप कर यहां दिया। यह कृति वाकई शानदार लग रही है। इसे पढ़ना ही होगा। ढूंढता हुं यहां के पुस्तकालयों में।
नहीं मिलेगी तो मंगवाया जाएगा। पुनीत का वह प्रश्न तो अब भी यक्ष प्रश्न की तरह मुंह बाए खड़ा ही है।

"तोर रुप गजब… मोला मोह डारे" यह गीत मैने नहीं सुना है, हालांकि मैने बहुत से छत्तीसगढ़ी लोकगीत नहीं सुने हैं। मोह पर आधारित एक और लोकगीत है जो कि ससुराल गोंदा फूल से अलग है। छत्तीसगढ़ी में गेंदा फूल को गोंदा कहते हैं।

"का तै मोला मोहनी डार दिए गोंदा फूल,
का तै मोला मोहनी डार दिए ना
रूपे के रूखवा म चढ़ि गये तैं हा
मन के मोर मदरस ला झार दिए गोंदा फूल
का तै मोला मोहनी दार दिए ना"

अन्य छत्तीसगढ़ी लोकगीतों के लिए संजीव तिवारी जी के ब्लॉग की यह पोस्ट देखें
http://aarambha.blogspot.com/2008/03/fagun-on-chhattisgarh.html

फिर से शुक्रिया इस उपन्यास की समीक्षा पढ़वाने के लिए।

hem pandey said...

उपन्यास निश्चित रूप से पठनीय लग रहा है. इसका प्रमाण यह है कि इतना लम्बा लेख पूरी रोचकता से पढ़ा. यह भी सम्भव है कि समीक्षा ही इतनी दमदार रही हो कि बिन पूरा पढ़े रहा नहीं गया.छत्तीसगढ़ के आदिवासियों के भोलेपन का मैं साक्षी रहा हूँ.

Shiv said...

बहुत बढ़िया पोस्ट.
जिन-जिन शेड्स की चर्चा की है आपने, बहुत रोचक लगे और उपन्यास को पढने के लिए उकसाते से प्रतीत होते हैं. ब्लॉग न पढ़ने और टिप्पणी न करने का ये फायदा हुआ कि आपने न सिर्फ उपन्यास पढ़ा बल्कि उसकी चर्चा के लिए इतनी बढ़िया पोस्ट लिखी.

महफूज़ अली said...

बहुत बढ़िया पोस्ट.

रंजना said...

आपकी इस समीक्षा ने ही जब इतना रोमांचित किया तो रचना तो सचमुच ही गजब की होगी...

लेकिन आपकी यह संक्षिप्त विवेचना भी कम सरस और सुखदायी नहीं.....
बहुत बहुत आभार...

बेचैन आत्मा said...

... पढ़ना पड़ेगा.

संजीव तिवारी .. Sanjeeva Tiwari said...

धन्‍यवाद सतीश जी, उपन्‍यास के कुछ शेड्स की चर्चा करके इस उपन्‍यास में रूचि बढ़ा दी है. पुन्नी सिंह जी से हमारा परिचय एक कथाशिल्‍पी के रूप में रहा है. इस उपन्‍यास को हम भी पढ़ना चाहेंगें, खासकर इसलिए क्‍योंकि इसकी पृष्‍टभूमि छत्‍तीसगढ़ की है.
उपन्‍यास का नाम जिस गीत के बोल पर रखा गया है वह उपन्‍यास लेखन के समयावधि 70 व 80 के दसक में छत्‍तीसगढ़ के लोकगायकी में धूम मचाता हुआ गीत था. तोर रूप गजब मोला मोहि डारिस. इसका आडियो मिलेगा तो इसे अपने ब्‍लॉग आरंभ पर लगाउंगा, इस उपन्‍यास के लिंक के साथ. पुन: धन्‍यवाद.
पुन्‍नी सिंह जी के छत्‍तीसगढि़या कथालेखक मित्रों की ओर से शुभकामना सहित.

rashmi ravija said...

यह पोस्ट ,इत्मीनान से पढना चाहती थी,इसीलिए इतनी देर भी हो गयी...बहुत अच्छी समीक्षा की है,आपने...और उपन्यास के महत्वपूर्ण अंशों को समेट लिया है...एक खाका खींच गया आँखों के सामने कि इस उपन्यास में क्या क्या होगा...पर पूरा रसास्वादन तो उपन्यास पढ़ कर ही लिया जा सकता है...
और उपन्यास का नायक जब तीन बच्चों का पिता हो तो गहराई से किसी प्रेम प्रसंग की गुंजाईश कहाँ रह जाती है....थोड़ा बहुत टच तो है ही...लाल एवं मोनिका और...किसी जनजातीय जोड़े के प्रेमकहानी की...ज्यादा विस्तार देने से वह जबरदस्ती का उल्लेख लगता...उपन्यास में गुंथा हुआ नहीं...
बहुत बहुत शुक्रिया...इतने सुन्दर उपन्यास से परिचित करवाने का.

फोटो ब्लॉग 'Thoughts of a Lens'

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