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Saturday, May 22, 2010

देख रहे हो लॉर्ड कर्जन......तुम्हारी बात सच हो रही है....सतीश पंचम


देख रहे हो लॉर्ड कर्जन
कभी तुमने कहा था
ठीक धरती की तरह
मंथर गति से हौले-हौले
भारत में फाईलें घूमती हैं
इस टेबल से उस टेबल  
उस टेबल से इस टेबल 

वो देखो अफजल की फाईल
वह भी घूम रही है
राज्य और केन्द्र के बीच
केन्द्र और राज्य के बीच
ठीक बनारसी सांड की तरह

जब चाहे तब कहीं खडे हो जाय
जब चाहे तब कहीं बैठ जाय
और नहीं कुछ करे तो भी
विदेशीयों के कैमरों से
अपनी तस्वीर तो खिचवा ही ले
बैठे बैठे, उठे उठे, या फिर
सड़क पर घूमते हुए ही

अपने यहां वापस जाकर
विदेशी चहक कर बताते हैं
सांड़….द इंडियन बुल

इधर एक चलन और हुआ है
बुल फाईल को दबाने वाले
दिमागी तौर पर ही सही
खुद को भी बुल मान बैठे हैं

तभी तो

एक फाईल सरकाता है
दूसरा उसकी सरकन नापता है
और तीसरा आगे बढ़ कर
बुल को वापस बुलाता है

एक बुल दूसरे बुल पर  फिदा है
दूसरा बुल तीसरे पर फिदा है
बुल और बुलों की ये जुगलबंदी
अब परवान चढ़ रही है कर्जन

सुना है जमाना तीन सौ सतहत्तर का है ।


( लॉर्ड कर्जन ने कभी कहा था कि भारत में सरकारी फाईलें मंथर गति से धरती की तरह गोल गोल घूमती हुई, धीरे धीरे सरकती हुई चलती हैं। वह वस्तुस्थिति आज भी बनी हुई है जिसके कि हम सभी लोग आदि बन चुके हैं। यह कविता उसी बात को इंगित करते हुए लिखा है जिसमें कि अंत में समलैंगिकता कानून यानि कि आर्टिकल 377 का बंद अंत में लगाया है :)


- सतीश पंचम


स्थान - वही, जहां एक कैदी पर रोजाना लाखों रुपए खर्च हो रहे हैं।


समय - वही, जब  कसाब जेल में बैठे बैठे सोच रहा हो  - काश रस्सी बाजार में आग लग जाय...........हम बच जाएंगे............फांसी की रस्सी जलने की वजह जानने के लिए एक नई फाईल बनेगी......द रोप फाईल.......अटेस्टेड बाय कर्जन। 


******************
अपडेट : पुन्नी सिंह रचित 'तोर रूप गजब' की कहानी वहां तक  पढ़ चुका हूँ जहां तक कि  नया नया ज्वाईन हुआ शिक्षक पुनीत तमाम कालेज पॉलिटिक्स के बीच अपनी पत्नी और बच्चों को साथ लेकर रहने के लिए कैपस निवास में आ गया है और उसकी देहात में पली पढी पत्नी बाकी शिक्षकों की पत्नियों की बातें  सुन कर  खुद को कुछ हीन भावना ग्रसित पाती है कि वह लोग बहुत बडे लोग हैं उनसे मेरा क्या मुकाबला आदि...आदि।


  तो मित्रों, जैसे ही किताब खत्म होगी.....उसकी समीक्षा, विवेचना के साथ यहां फिर तैयार मिलूँगा।
**************
  
(सभी चित्र इंटरनेट से साभार )

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Keywords - Lord curzon, Banaras,saand,files move,earth rotation,india,bull,book reading,blogging

21 comments:

Arvind Mishra said...

पहले वाले मुद्दे की चर्चा नहीं करूंगा -सुबह सुबह मूड खराब नहीं करना है -हाँ मुझे तोर रूप ...में रूपमती के बारे में जानने की जिज्ञासा है ! समीक्षा में यह पहलू छूट न जाय इसलिए अभी से चेता रहा हूँ !

सतीश पंचम said...

अरविंद जी,

आपकी चेतावनी सर आँखों पर। जरूर इस बारे में चर्चा करूंगा।

बहुत रोचक स्टेज पर कहानी चल रही है। फिलहाल एक दूसरे शिक्षक की पत्नी द्वारा अपने पति की ओर देखकर मुस्करा भर लेने की बात से पुनीत की पत्नी हलकान है। पता नहीं पुनीत को आज भोजन मिलेगा कि नहीं, पढने के बाद ही पता चलेगा :)

गिरिजेश राव said...

वारे गए नफासत पर ! सीधे सीधे कह देते कि हम हिन्दुस्तानियों का और हमारे सिस्टम का और हमारे बुद्धिजीवियों का सारा ध्यान आपसी _ड़मरउवल पर बहुत अधिक है और काम के काम पर बहुत कम।
बेचारे साँड़ को इस मुआमले में घसीट कर अच्छा नहीं किए। मैंने आज तक साँड़ों को _ड़मरउवल करते नहीं देखा।
दोहाई भोलानाथ ! बालक नादान है। इसकी भूल को क्षमा करना।

मो सम कौन ? said...

बाकी चीजों की तरह फ़ाईलों का निष्पादन भी मुंह माथा देखकर ही किया जाता है। सांसदों की वेतन वृद्धि, भत्ते बढ़ोतरी जैसे मुद्दों पर कभी कोई शोर शराबा, बहस ध्यान में आती है आपके। सभी दल, सभी वाद उस समय एकजुटता का प्रदर्शन करते हैं। जब कि इसी संसद में पता नहीं कितना समय इस बात पर जाया हो चुका है कि रेलवे कैटरिंग में परोसा जाने वाला गोश्त झटका होता है या हलाल।
पुस्तक समीक्षा का हम भी इंतजार करेंगे।
आभार।

सतीश पंचम said...

@ डमरउवल,

नये किस्म का एक और रापचिक नाम पता चला :)

वैसे, सांड, के बारे मे कई जगह साहित्य में काफी कुछ लिखा गया है, जैसे उदय प्रकाश जी रचित 'वारेन हेसिटिंग्स का सांड' या प्रेंमचंद रचित एक कथा में एक युवक द्वारा एक सांड को खदेडते खदेडते अंत में अपनी जान दे देने की घटना हो।

लगता है मुझे अभी और भी सांड पुराण पढ़ना पडेगा :)

दिनेश शर्मा said...

वो देखो अफजल की फाईल
वह भी घूम रही है
राज्य और केन्द्र के बीच
केन्द्र और राज्य के बीच
ठीक बनारसी सांड की तरह||

बहुत खूब।

zeal said...

एक बुल दूसरे बुल पर फिदा है
दूसरा बुल तीसरे पर फिदा है...

Brother Satish,

Duniya Gol hai. saand aur aadmi mein khaas farak nahi lagta.

Priybanshu ke baare mein kya khayal hai ? ... Kutta hai?, bhediya hai? ya fir saand?

It's good that files are moving at a slower pace. Just imagine what will happen if bulls start running at a faster speed?.

Puneet's wife must specialize in some field , so that she 'll not feel inferior in any way. If a lady smiled at her husband, she must understand the reason and appreciate the pious smile. It's her ignorance and feeling of insecurity that's making her 'halakaan'.

Its Puneet's duty to make her feel comfortable among educated lot and give her more importance over others. After all she is his jeevan-sangini.

डॉ. मनोज मिश्र said...

बहुत पुरानी बात की सुधि दिलाय दिए भईया .

मनोज कुमार said...

फाइलें इसलिए गोल-गोल घूमती है कि
या तो, सच्‍चाई को दबाना चाहते हैं।
या फिर कुछ कमाना चाहते हैं।

ज्ञानदत्त पाण्डेय Gyandutt Pandey said...

वाह! यह बुलबुलें हमारे यह गुलसितां हमारा। फाइलों में खेलती हैं, जिसके हजारों नदियां ---
बुल से बुलबुल तक का सफर बहुत सुन्दर है!

महफूज़ अली said...

जबरदस्त प्रस्तुति....

वन्दना अवस्थी दुबे said...

अरे वाह!! लॉर्ड कर्ज़न का वक्तव्य और आपकी कविता!!! बहुत सुन्दर.

Sanjeet Tripathi said...

jabardast link-up kiya hai.

lekin bandhu je tor rup gajab ko mai padhna chahunga, pata nahi yaha milegi ya nai.
koshish karta hu dhundhne ki. nahi milegi to aapse hi kahunga ki mehnat karein aur hamein padhwayein
;)

वाणी गीत said...

एक बुल , एक और बुल ...और भटकती फाईलें ...
आखिरी पंक्ति में व्यंग्य की धार गज़ब है ...

योगेन्द्र मौदगिल said...

आप की रचना और 'मो सम कौन' की टिप्पणी दोनों बढ़िया हैं.... साधुवाद...

Satish Pancham said...

योगेन्द्र जी,

मो सम कौन असल में संजय जी हैं और इनकी टिप्पणीयां काफी डैशिंग होती हैं, एकदम खरोंच कर लिखते हैं.... जैसे कि यहीं देखिए कि उन्होंने फाईलों के चलने न चलने को लेकर उससे जुडे हुए सांसदों की वाहियात हरकतों की ओर काफी प्रभावशाली ढंग से ध्यान खींचा है ।

Satish Pancham said...

@ Zeal,

प्रियभांशु के बारे में कहने के लिए असमर्थ हूँ। लेकिन जब टीवी पर निरूपमा की मां को सिर पर पल्लू रखे हुए पुलिस वालों के बीच चलते देखता हूँ तब काफी कुछ तकलीफ होती है। मुझे वह किसी एंगल से अपराधी नहीं लग रही हैं। बाकि तो सच क्या है अभी बाहर आना बाकी है।

इधर तोर रूप गजब पढ लिया हूँ और जल्द ही समीक्षा लिखने जा रहा हूँ ।

Satish Pancham said...

संजीत जी,

किताब के बारे में पूरी जानकारी अपनी समीक्षा पोस्ट में दे रहा हूँ।

sangeeta swarup said...

आपकी ये पोस्ट चर्चा मंच के लिए ली गयी है

http://charchamanch.blogspot.com/2010/05/163.html

Indranil Bhattacharjee ........."सैल" said...

इस मंथर गति के कारण हमारी प्रगति एक 'बुलबुला' बन चुकी है !

स्वप्निल कुमार 'आतिश' said...

ek dum chaukas rachna hai ...

फोटो ब्लॉग 'Thoughts of a Lens'

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