सफेद घर में आपका स्वागत है।

Thursday, May 20, 2010

किताबे पढ रहा हूँ ....फिलहाल ब्लॉगजगत ठेलायमान है.....सतीश पंचम

  किताबों पर वक्त लगा  रहा हूँ....फिलहाल तो मुझपर पुन्नी सिंह रचित 'तोर रूप गजब'  किताब अपने जलवे बिखेर रही है ....एक सूकून मिलता है ऐसी किताबों को पढने से।

      छत्तीसगढ की पृष्ठभूमि पर एक कस्बाई  कॉलेज में नए नए ज्वाईन हुए एक शिक्षक की बातों को, उसके अनुभवों को पढ़ते हुए मन हिलोर हो उठता है। एक जगह हास्य बिखेरते लिखा है कि फलां शिक्षक चलते तो अकड कर हैं लेकिन संस्थान निदेशक से दोनों हाथ जोड कर प्रणाम करते हैं, दूसरे शिक्षक एक हाथ से सलामी भर  करते हैं और तीसरे तो बस मुस्करा कर निकल जाते हैं...न सलाम न दुआ....। पहले वाले A ग्रेड के, दूसरे बी ग्रेड के और तीसरे सी ग्रेड के :)

 ऐसी ही ढेरों रोचक और मजेदार बातों से लबरेज एक सहज कथा है 'तोर रूप गजब'।  अभी  कुछ समय तक अपना टेम पास ऐसे ही करने का इरादा है।

      बेसिर पैर कि एक दूसरे पर बेमतलब आक्षेप लगाती पोस्टे, कानूनी नोटिस थमाती पोस्टें, जलजला, पिलपिला, ढपोर, चपोर, हल्ला गुल्ला टाईप तमाम पोस्टों की झडी पढने से बेहतर है कुछ समय तक किताबों को पढ़ा जाय।

फिलहाल ब्लॉगिंग करते हुए बहुत कुछ चुनना पडता है कि इसे पढूं या नहीं, पता नहीं क्या आंय बांय लिखा होगा बंदे ने।  और एक ही नहीं झडी की झडी चलती है ऐसे पोस्टों की।

      अभी एक मजेदार बात अदालत ब्लॉग की  पोस्ट पर पढा कि सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीश ने किसी बहस के दौरान कहा यदि आप अपने पूरे दिन को तरोताजा रखना चाहते हैं तो सुबह तडके कम से कम दो घंटे तक अखबार न पढ़ें।


 इस पर गिरिजेश जी ने  मजेदार टिप्पणी लिखी कि - कुछ दिनों में ब्लॉगों का भी यही हाल होने वाला है। 


   तो बंधुवर, अब अपन भी ब्लॉगिंग से  साईलेंट मोड पर चलने का मन बना रहे हैं। थोडा थोडा पढना....ज्यादा नहीं ( वैसे भी कौन सा ज्यादा पढ रहा था, शीर्षक देख कर..... कैचे पढकर ही कई जगह से खिसक लेता था :) 


 फिलहाल तो थोडे दिन तक छत्तीसगढी़ गीत की तर्ज पर साहित्य के बारे में यही कहूँगा कि .......तोर रूप गजब...मोला मोह डारे  :) 

 - सतीश पंचम

स्थान - वही, जहां से टोला, चेहरे दर चेहरे, तोर रूप गजब, सलामी जैसी किताबें बटोर लाया हूँ।

समय - यही कोई सात-ओत बजे होंगे :)

 सूचना :  लगता है ब्लॉगर पर कोई समस्या चल रही है, कमेंट पब्लिश करने में काफी समय ले रहा है या कमेंट दिखाता भी है तो रूक रूक कर। उधर कमेंट करने के तुरंत बाद  जीमेल पर कमेंट  आ तो रहा है पर ब्लॉग पर दिखने में समय ले रहा है......यानि ब्लॉगस्पॉट कहीं सचमुच ठेलायमान तो नहीं हो चला :)

 ( चित्र :  इंटरनेट से साभार )

31 comments:

गिरिजेश राव said...

पढ़िए। उम्मीद है कि जिस तरह से आप ने मुझे विवेकी राय का फैन बना दिया वैसे ही पुन्नी सिंह का भी फैन बना लेंगे।
बहुत दिनों से बाउ कथा की अगली कड़ी लिखने की सोच रहा था - 'नेबुआ के झाँखी'। ब्लॉगों को पढ़ना कम कर दिया है । कथा लिख ही देनी चाहिए अब तो।

निशांत मिश्र - Nishant Mishra said...

बहुत अच्छी पोस्ट है सतीश जी.

बीस-पच्चीस साल पहले हमारे यहाँ हाट-बाज़ार में ठेले लगते थे जिनमें खिलौने से लेकर छोटे-मोटे गृहस्थी के सामान 'हर माल आठ आना' के रेट पर बिकते थे. चाहे जो ले लो. हर माल आठ आना. अब लगता है यहाँ भी हर पोस्ट आठ आना के रेट पे लग रही है.

अपन तो सुबह उठने और रात को सोने जाने के प्रोग्राम में तब्दीली करने जा रहे हैं. यहाँ कोई सोना नहीं लुटा रहा है जो अपने दीदा फाड़ कर पोस्टें पढ़ते-पढ़ते खुद को हलकान कर लें.

प्रवीण पाण्डेय said...

बहुत अच्छे । अब तो उतरना पड़ेगा इन पुस्तकों में ।

Arvind Mishra said...

तोहार रूप गजब तो सार्वभौमिक रचना लग रही है ...खालिस जौनपुरी भी !

सतीश पंचम said...

गिरिजेश जी,

बाउ की अगली कडी का इंतजार है।

Shiv said...

कालजयी रचनाओं और टिप्पणियों को खराब बताना कहाँ तक जायज है? हिंदी ब्लॉग-जगत में जो कुछ भी लिखा जा रहा है वह कालजयी है. आपका यह कहना कि;

"बेसिर पैर कि एक दूसरे पर बेमतलब आक्षेप लगाती पोस्टे, कानूनी नोटिस थमाती पोस्टें, जलजला, पिलपिला, ढपोर, चपोर, हल्ला गुल्ला टाईप तमाम पोस्टों की झडी पढने से बेहतर है कुछ समय तक किताबों को पढ़ा जाय।"

ब्लॉग जगत का घोर अपमान है. और इसके लिए आपके खिलाफ वैधानिक कार्यवाई की जा सकती है. मैं यही कहूँगा कि;

हिंदी ब्लॉग-जगत अपमान
नहीं सहेगा हिन्दुस्तान

ब्लागों को जो बुरा कहेगा
हिंदी ब्लॉगर नहीं सहेगा

जब तक सूरज-चाँद रहेगा
तब तक हिंदी ब्लॉग चलेगा

हिंदी ब्लॉगर तुम संघर्ष करो
हम तुम्हारे साथ हैं

हिंदी की ये सेवा है
नहीं आम और मेवा है

आशा है आप अपने वक्तव्य वापस लेकर तुरंत हिंदी ब्लॉग-जगत में आई पोस्ट पढना शुरू कर देंगे. अगर ऐसा नहीं हुआ तो वैधानिक कार्यवाई के अलावा और कोई रास्ता न रहेगा....:-)....:-)

Mahfooz Ali said...

हमने तो अब पोस्ट पढना ही छोड़ दिया है.... सिर्फ "very good" टाइप कर के कॉपी कर लेते हैं..... फिर सब बिना पढ़े ही....CTRL+V दबाते चले जाते हैं.... इतनी वाहियाती ब्लॉग जगत पर देख ली है कि अपना लेवल डाउन करना अच्छा नहीं लगता है.... किताब पढने से वाकई में बहुत सुकून मिलता है.... आजकल मैं भारत का इतिहास रूस कि नज़र में पढ़ रहा हूँ.... इस किताब को रूसी इतिहासकारों ने लिखा है..... एक अलग ही नजरिया दिखाई दे रहा है.... और कई अच्छी चीज़ें भी नॉलेज बैंक बढ़ा रही हैं.... अब से वैरी गुड देना छोड़ दिया है.... पर अब कहीं वैरी गुड नज़र आएगा... तो समझ जाईएगा कि बहुते वाहियात पोस्ट है.... और थोडा मुस्कुरा दीजियेगा.... वैसे ...मैं आजकल ब्लॉग पर टाइम में वेस्ट करने से अच्छा क़िताबें ही पढता हूँ... और हम सुबह तरोताज़ा होने के लिए कमोड़ पर ही अखबार पढ़ते हैं....और तरोताज़ा हो जाते हैं... उ जज ... अखबार वालों से बहुते लात खाया होगा... तभी खुंदक में ऐसा बोला.... ही ही ही ही .... आपकी इस पोस्ट पर वैरी गुड देते नहीं बना... और सच्ची कह रहे हैं.... पूरा पोस्टवा पढ़े हैं..... कमेन्ट से लग रहा होगा आपको.... ही ही ही ही ..... अब हम चलते हैं.... बहुत काम है.... आजकल फुरसत नहीं है.... हम Distributive Trades theory पर काम कर रहा हूँ न.... बहुत रिसर्च बाकी है अभी.... कउन Methodology आज लगायें यही सोचना है.... तो हम चलते हैं.... सोचने.... सुबह थोडा टाइम मिल जाता है... फिर तो हम रात को ही कमेंटिया पाते हैं..... वैसे वैरी गुड देने का एक अलग ही मज़ा है.... आप भी दे कर देखिये.... ही ही ही ही ......

kshama said...

Achhee kitaben,achhe dost kee tarah hoti hain! Hamesha saath nibhane ke liye haazir!

shikha varshney said...

सोलह आने सच्ची बात कही है सतीश जी ! पुस्तकों से अच्छा साथी कोई नहीं.

अनूप शुक्ल said...

वैसे तो हम कभी शिवकुमार मिश्र से सहमत होने की न जहमत उठाते हैं न अहमत लेकिन फ़िलहाल हड़बड़ी मे हूं इसलिये उनसे सहमत हो लेता हूं। आपसे अनुरोध है कि अपन वक्तव्य फ़ौरन वापस ले लीजिये वर्ना हमें भी कुछ सोचना और लिखना पड़ेगा और इस समय टाइम की किल्लत है और काम कुछ है नहीं लिहाजा बहुत बिजी हूं।

आपके हित में ही है कि आप वक्तव्य वापस ले लें वर्ना हमको मजबूरन कुछ न कुछ करने की सोचना पड़ेगा जिसमें कि हम कुछ भी न करने की हद तक भी जा सकते हैं।

आपकी सहायता के लिये सुझाव दे रहे हैं कि आप इस वक्तव्य को वापस लेकर फ़िर चाहे इससे और निराशाजनक और अपमानजनक वक्तव्य जारी कर दीजिये। फ़िर हम कुछ कहें तो बताइयेगा। :)

ज्ञानदत्त पाण्डेय Gyandutt Pandey said...

सहमत! आपसे कुछ। टिप्पणियों से बहुत कुछ।

Mired Mirage said...

यह स्थान मुझे भी बता दीजिए। माँ के लिए कुछ पुस्तकें बटोरनी ही हैं।
घुघूती बासूती

Satish Pancham said...

शिवजी,

मुझे अंदेशा था कि मेरे खिलाफ वैधानिक कार्रवाई हो सकती है इसलिए मैं तो चला कोरट - अस्टे लेने.....और जाउंगा भी उसी ज के पास जिसने अखबारों के बारे में यह कहा है जिससे कि मेरा काम आसान हो जाय और आप के इरादे धरे धरे अचार बन जांय :)

अनूपजी, का कमेंट पढने पर लग रहा है कि वह बहुत आहत हैं और आज खाना आदि नहीं खाएंगे....पानी भी नहीं पिएंगे। मैं आपकी भावनाओं को समझने की कोशिश तो कर रहा हूँ लेकिन रह रह कर मेरी समझ नागौरी चाय वाले के यहां तफरीह करने चल देती है और एकाध हिंदी सेवा आदि से संबंधित पोस्ट मैंने नागौरी चाय वाले के यहां बैठे बैठे ही ठेली थी तब से वह मुझसे 'बैठा-चार्ज' मांग रहा है। कह रहा हूँ कि मैं तो हिंदी की सेवा कर रहा था लेकिन वह है कि अडा हुआ है । अपना 'बैठा-चार्ज' का तगादा करते रहता है।

और इसी खुंदक में मैं अनाप शनाप बक गया हूँ...इससे अगर आपकी भावनाएं आहत हो गई हों तो कृपया रिप्लेसमेंट करवा लें आजकल तो खुल्ले में फेफड, किडनी, और पता नहीं क्या क्या मिल जा रहा है तो आपकी भावनाओं का रिप्लेसमेंट क्यों न मिलेगा :)

खाना खा लिजिए, चाय वगैरह भी पी ही लिजिए...क्या करेंगे भूखे रहकर आप.... लोग आजकल हिंदी की सेवा करना ही नहीं चाहते :)

Satish Pancham said...

महफूज जी,

यह जानकर अच्छा लगा कि आप वेरी गुड के आलाप से निकल कर अंतरे पर आ गए हैं :)

और जहां तक विदेशी इतिहासकारों की नजर से भारत का इतिहास जानने की बात है, इस बात की मुझे भी दिलचस्पी रही है कि बाहर के लोग हमारे इतिहास को किस नजर से देखते हैं।

यहां के इतिहासकार स्वाभाविक है कि कुछ कुछ गुडी गुडी इतिहास लिखेंगे ताकि उनके समुदाय या सरकार की ओर से कोई अनावश्यक दबाव न झेलना पडे। कोई एतराज न करे लेकिन विदेशी इतिहासकारों पर वह दबाव नहीं होता।

मुझे आलोक पुराणिक जी की एक टिप्पणी कुछ कुछ याद आती है कि भारत के लोगों को इतिहास पढना नहीं आता या सही इतिहास लिखने की हिम्मत नहीं है...( ऐसा ही कुछ लिखा था) । उनकी बात मुझे बहुत पसंद आई और सच कहें तो भारत के लोगो के मन में अपने अतीत को लेकर जो एक श्रद्दा भाव का मुलम्मा है वह सही इतिहास लिखने ही नहीं देता इतिहासकारों को। जरा सा कुछ अपने अतीत से अलग लिखा हुआ दिखा कि लगेंगे तोड फोड मचाने। यह भूल जाएंगे कि इतिहास लिखना भी एक वैज्ञानिक दृष्टिकोण की मांग करता है और उसी अनुसार लिखना उचित होगा।

पढिए, पढिए और हमें भी अवगत कराईए कि रूसी इतिहासकार भारत के बारे में क्या सोचते हैं, उनका दृष्टिकोण कैसा है।

Satish Pancham said...

घूघूती जी,

मुंबई में हिंदी की लाईब्रेरी जहां से मैं इतनी सारी किताबें ले आता हूँ वह है - जीवन प्रभात विमला पुस्तकालय। ( विलेपार्ले में)

संचालक श्री एस एन मिश्रा जी हैं और फोन नंबर है - 9769109760

यहां से ढेरों किताबें सर्कुलेटिंग बेसिस पर मिलती है। खरीदना या मंगाना चाहे तो भी सस्ते रेट पर मंगवा देते हैं।

कभी उनकी लाईब्रेरी में जाईये..एक से एक किताबें मिलेंगी...ममता कालिया, कमलेश्वर, राजेंद्र यादव, मन्नू भंडारी ऐसे तमाम लेखकों की किताबे वहां ढेरों हैं।

Satish Pancham said...

अरविंद जीं,

@ तोहार रूप गजब तो सार्वभौमिक रचना लग रही है ...खालिस जौनपुरी भी ।

जी हां आपकी सार्वभौमिकता वाली बात सच है। इस तरह के कालेजयीन उठापठक और छींटाकशी वाला तौर तरीका लगभग हर कॉलेज-महाविद्यालय में देखने मिलेगा जहां लडके शिक्षकों को किसी विशेष नाम से बुलाते हैं, शिक्षकों की आपसी तनातनी, कौन कितना संस्थान के निदेशक के करीब है, विभागाध्यक्ष उनसे क्या बतिया रहे होंगे, पोल पट्टी आदि आदि।

rashmi ravija said...

सतीश जी , आपने जबाब घुघूती जी को दिया और भला मेरा हो गया...सच में, अच्छी किताबें हैं वहाँ,हिंदी की??...क्या बात है...फोन न. भी दे दिया,...भगवान भला करे आपका :)...जल्दी ही वहाँ के चक्कर लगाने वाली हूँ...साहित्य से तो दूर नहीं रही...पर हिंदी साहित्य पढ़े ज़माना हो गया...बहुत बहुत शुक्रिया..
और आप दूर कहाँ रहेंगे ब्लॉग्गिंग से...कुछ रोचक पढेंगे तो हमसे शेयर करेंगे ही

ज़ाकिर अली ‘रजनीश’ said...

किताबें इंसान की सच्ची दोस्त हैं, पढिए कोई न कोई ज्ञान की बात हीमिलेगी। लेकिन बाद में हमें बताना न भूलिएगा।
--------
क्या हमें ब्लॉग संरक्षक की ज़रूरत है?
नारीवाद के विरोध में खाप पंचायतों का वैज्ञानिक अस्त्र।

डॉ. मनोज मिश्र said...

भइया जी आप समय का सार्थक उपयोग कर रहे हैं.

मो सम कौन ? said...

जाओ सरकार, आप भी जाओ।
दो साल पहले जब मैं इस शहर में पहुंचा तो ओफ़िस से एक दिन छुट्टी लेकर यहां की एकमात्र लाईब्रेरी में गये, सदस्य बनने के लिये, वहां का हाल देखकर जितना मन दुखी हुआ बता नहीं सकता। जो दो चार किताबें दिखी भीं, सब पंजाबी में। अब सब खरीद कर तो पढ़ नहीं सकते, पुस्तकों की तलाश में यहां तक आये और गिरिजेश जी और आप सरीखों तक पहुंचे थे।
और अब आप भी जा रहे हैं, फ़िलहाल ही सही?
क्या कहें।

सतीश पंचम said...

अरे संजय जी,

मैं कहीं जा नहीं रहा बल्कि चूजी ब्लॉगिंग करने की ओर अग्रसर हो रहा हूँ।

सीमित ब्लॉगिंग बस।

पहले अक्सर ब्लॉगवाणी और चिट्ठाजगत को सुबह शाम निहार लेता था अब उस पर थोडी लगाम लगा रहा हूँ। बडी उठापठक रहती है।

काफी कुछ मेरे गुगल रीडर में ही आ जाता है, और आप लोगों के ब्लॉगरोल से ही बहुत सारा अच्छा कंटेंट मिल जाता है। चूंकि ब्लॉग रोल सोच समझ कर बनाए जाते हैं इसलिए वहां से अच्छे कंटेंट मिलने की आशा ज्यादा रहती है। मनोज मिश्र जी के ब्लॉग रोल और कबाडखाना के ब्लॉग रोल का तो कई बार इस मामले में लाभ उठा चुका हूँ।

अब आप कहेंगे कि तब मैं अपने ब्लॉग रोल को क्यों नहीं सेट करता। तो दरअसल इसमें मेरी एक तरह से काहिली या लापरवाही ही है। शुरू शुरू में सफेद घर ब्लॉग में बहुत उत्साह से सजाना संवारना करता था लेकिन बाद में धीरे धीरे आलस घेरने लगा और वह उत्साह नहीं रहा।

अपने ब्लॉग रोल को भी समृद्ध करूंगा...देखिए कब तक हो पाता है।

बाकी तो किताबें पढना उसी तरह बदस्तूर जारी रहेगा और झुकाव उसी तरफ ज्यादा है फिलहाल :)

और फिर वो टंकी बनी ही नहीं है कि जिस पर चढ कर अपने जाने की घोषणा करूं ....कबूतरो की तरह आ जा आ जा कहलवाउं....लू लू लू....करवाउं तब जाकर लौटूं ....यह कहते कि मैं आप लोगों का प्रेम देख गदगद हूँ... इसलिए लौट आया हूँ ....वगैरह वगैरह :)

चिंता नको, हम इदर ईच है बॉस....

Hindiblog Jagat said...

सबसे अच्छे ब्लौग पढना चाहते हैं?
हिन्दीब्लौगजगत सबसे अच्छे ब्लौगों का संकलन है.
यह सबसे उत्कृष्ट और व्यापक ब्लॉगरोल है.
आपका ब्लौग भी है वहां.
आकर देखिये.

Sanjeet Tripathi said...

bhai aap jo bhi padhenge vo hame bhi yaha uska saar padhwayenge yahi aasha hai.
baki rahi pustkalaya ki bat to apne blog me kabhi maine apnse shahar ke sabse purane pustkalaya ka bhi jikra kiya hai vivekanad pustkalaya ka jo ki ramkrushn mission chalata hai, vaha kya dikkat yah bhi maine likha tha, baki tension nai lene ka ki aap kam dekh rahe ho blogvani ya chhithajagat, agar blogs me kuchh accha likha jaayega to aap padhoge hi bina in dono jagah par jaaye, ye mai apne anubhav se kah raha hu...

jaari rahe yah yatra...

Sanjeet Tripathi said...

are han 'तोर रूप गजब'' ko mai bhi padhna chahunga, agar yaha milti hai to, dhundhta hu kal se hi..

सतीश पंचम said...

संजीत जी,

पढिए ...पढिए एकदम चटक अंदाज है लेखक पुन्नी सिंह जी का। धीरे धीरे किताब आपको घेरते चली जाती है अपनी कथा यात्रा के साथ।

पहली बार उनकी लिखी कोई किताब पढ़ रहा हूँ और एकदम मस्त।

Udan Tashtari said...

पढ़ जाईये सब किताबें धकापेल..फिर तो जो भी लिखेंगे वो और उत्कृष्ट हिन्दी की सेवा में सहायक होगा. वैसे भी आप तो सेवा करते ही रहते हैं. :)

निर्मला कपिला said...

तो चलिये हम भी अब कम्नेट छोड कर किताब पढते हैं। धन्यवाद और शुभकामनायें

Pankaj Upadhyay (पंकज उपाध्याय) said...

बॉम्बे में हिंदी किताबें ढूंढ के थक गया.. क्रास्वर्ड्स... जस्ट डायल... ये लोग भी नहीं बता पाए की कहाँ पे मिलेंगी फिर एक दोस्त ने कुछ किताबें भेजी और साथ में यह भी बताया की हुतात्मा चौक के पास 'पीपल्स बुक शॉप' पर बहुत अच्छी किताबें मिल जाती हैं.. एक दिन गए थे.. बड़ी मुश्किल से तो ढूंढ पाए उस दूकान को.. वो भी एक कहानी है पूरी.. खैर.. अब आपने विले पार्ले में ही कुछ बता दिया.. अच्छा रहा हमारे लिये... आभार..
आजकल कमलेश्वर की कहानियाँ पढ़ रहा हूँ... सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बहुत पहले से मैंने अखबार पढना छोड़ रखा है.... चंद ब्लोग्स पढ़ लेता हूँ.. बस.. वैसे अच्छा है जाइये.. और फिर एक मारू से लेख के साथ आइये.. कहिये तो एक दो ठो पोस्ट हम आपके नाम पर लिख दें, जिससे आपको जाने में आसानी हो.. :) (just kidding..)

सतीश पंचम said...

पंकज जी,

अभय तिवारी जी ने मुंबई में हिंदी किताबें मिलने के ठिकानों पर एक बहुत ही बढिया पोस्ट लिखी थी जिसमें मुंबई के कई स्थानों का जिक्र है ।

यह रहा उस पोस्ट का लिंक।

घूघूती जी और रश्मि जी,

आप लोग भी अभय जी के इस ब्लॉग लिंक पर एक बार देख लिजिए। हो सकता है आप लोगों के घर के पास ही कहीं का जिक्र हो इस लिंक में।

http://nirmal-anand.blogspot.com/2007/04/blog-post_24.html

anitakumar said...

सतीश जी आप के इस आधा टंकी पर चढ़ने से हम मुंबई ब्लोगरों का फ़ायदा हो गया। मैं भी आप के दिये लायब्रेरी के ठिकानों के चक्कर लगाती हूँ। फ़ोन नं देने का शुक्रिया। ये पुन्नी सिंह को तो पढ़ना पढ़ेगा।

सतीश पंचम said...

एक सूचना : पुन्नी सिंह रचित 'तोर रूप गजब' उपन्यास पोस्ट आज पब्लिश कर दिया हूँ । एक नजर देख लिजिए।

http://safedghar.blogspot.com/2010/05/blog-post_23.html

- Satish Pancham

फोटो ब्लॉग 'Thoughts of a Lens'

फोटो ब्लॉग 'Thoughts of a Lens'
A Photo from - Thoughts of a Lens

ढूँढ ढाँढ (Search)

© इस ब्लॉग की सभी पोस्टें, कुछ छायाचित्र सतीश पंचम की सम्पत्ति है और बिना पूर्व स्वीकृति के उसका पुन: प्रयोग या कॉपी करना वर्जित है। फिर भी; उपयुक्त ब्लॉग/ब्लॉग पोस्ट को हापइर लिंक/लिंक देते हुये छोटे संदर्भ किये जा सकते हैं।




© All posts, some of the pictures, appearing on this blog is property of Satish Pancham and must not be reproduced or copied without his prior approval. Small references may however be made giving appropriate hyperlinks/links to the blog/blog post.