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Saturday, May 15, 2010

गाँव में छत पर सोना...पुरूआ बयार....टूटता तारा....छूटता लुक्क....चंदा मामा... आरे पारे......ग्राम्य सीरिज....और मैं सतीश पंचम

  गाँव में खुले छत पर सोने का आनंद ही कुछ और होता है। आप छत पर पडे पडे आकाश में लटके सितारों को देख रहे हैं…..चाँद दिख रहा है….उसमें किसी का चेहरा ढूँढा जा रहा है….बचपन की लोरी याद आ रही है…चंदा मामा आरे आवा…पारे आवा…नदिया किनारे आवा…दूध भात लेहले आवा…घुटूँ….. और तभी ठंडी ठंडी हवा चल पड़ी ….…नजरें अब भी खुले आकाश की तरफ ….कोई लुक्क छूटा….तारा टूटा….…….इसी वक्त कुछ मांगना चाहिए…..…सुना है टूटते तारे को देख कुछ मांगने से वह पूरी हो जाती है…..मेरे लुक्क( टूटते तारों ने)…आज तक मेरी इच्छाएं पूरी नहीं की हैं…..हो सकता है मेरे अलावा और कोई भी अपनी छत पर सोता है….उसी ने मांग ली होगी  मुरादें…….मेरा टूटता तारा फिर मन मसोस कर रह जाता होगा……

         वो देखो, कोई छोटा सा जहाज जा रहा है….बत्ती जल बुझ रही है….……और वो सात तारों का तो जैसे हमेशा का नखरा है…..हमेशा एक ही पोसिशन लिए रहेंगे…..कभी इस ओर ….कभी उस ओर….लेकिन रहेंगे उतनी ही फिक्स दूरी पर……इसी चाँद को मुंबई में भी देखता हूँ…..बिचारे की चमक खो जाती है वहां…..जलती बुझती बत्तियों के बीच कोई देखने वाला नहीं रहता उसे…..फुरसत किसे है……पिछली बार चाँद को तब देखा था जब ग्रिड में खराबी के चलते पूरी मुंबई का बड़ा इलाका अँधेरे में डूबा था……आकाश में तब चाँद था और कईयों ने न जाने कितने सालों बाद उस चाँद को देखा …..गैलरी में खड़े हो कई दिनों बाद उस पाकेट रेडियो को चलाया था….एवरेडी पेंसिल सेल रिमोट में से निकाल कर…….पाकेट रेडियो  पर कोई गाना चल रहा था….वो चाँद खिला….तारे हंसे…ये रात बड़ी मतवाली है….बड़ा अच्छा लग रहा था……।  लाईट आई और वही सेल फिर चुप्पे से रेडियो से निकल कर रिमोट में समा गये थे। काश कुछ और देर लाईट न आई होती।
 
      अगले दिन छत पर जब सोकर उठता हूँ तो बड़ी देर तक उठने का मन नहीं करता। बड़ी देर तक बिस्तर में पडे रहता हूँ …..दालान आदि में बटोर बहार कर  कहीं  बाहर सूखी पत्तियां इकट्ठी कर एक जगह करकट आदि जलाया जा रहा है .....   उधर सूरज धीरे धीरे निकलता दिख रहा है…..एक नए दिन की शुरूवात……रात मे चमकने वाला चंदा पीतल की एक थाली सा आसमान में लटक रहा है….मानों कह रहा हो…जा रहा हूँ….बड़े भाई के सामने ज्यादा देर रहने पर वह कोई काम सौंप देंगे…..उधर बडा भाई सूरज भी जैसे जान रहे हों, इसलिए खुद भी धीरे धीरे निकल रहे थे मानों चाँद को संकेत दे रहे हों कि …… चल जा…..अब मैं आ गया हूँ…..दिन भर का काम अब मेरे जिम्मे……जाता क्यों नहीं…….और चाँद….धीरे धीरे आसमान से गायब हो जाता है।

      उधर छत पर आलम यह है कि बिस्तरा वैसे ही छोड कर नीचे उतर आता हूँ…दिन भर मटरगश्ती करता हूँ….आसपास के बच्चों के फोटो खिंचता हूँ….पेड पौधों के चित्र लेता हूँ…..और दोपहर जब बडके भईया यानि सूरज अपना असली रूप दिखाते हैं तब चुपचाप एक पेड की छांह में बैठ आते जाते लोगों को देखता हूँ…..। मडैया में खोंसे हुए किसी किताब को निहारता हूँ।

   शाम जब फिर छत पर पहुँचता हूँ तो देखता हूँ…. ओह…… भूल से बिस्तरा वहीं का वहीं पड़ा रह गया है…..किसी ने उठाया नहीं क्या।

अब….

  बिस्तरा तो गर्म हो गया है……सफेद चादर जो सुबह की हल्की ठंड और सिहरन से बचाती है, वैसे ही पड़ी है जैसे रखी गई थी। चादर हटाता हूँ….अरे यह क्या…..जहा जहां चादर पड़ी थी वहां नीले रंग का निशान बन गया है…….समझा…..दिन भर तेज गर्म हवाओं और लू के थपेडों से सफेद गद्दे के खोल में लगी नील उडन छू हो गई है और जहां जहां चादर ने ढंक रखा था वह हिस्सा उस गर्मी से बचे रहने के कारण अपने हिस्से का नीलापन बचा ले गया।

     दिमाग में तुरंत स्कूली दिनों का पर्णहरिम….फोटोसिन्थेसिस…..क्लोरोफिल वाला साईंस प्रैक्टिकल घूम गया। सूरज की रोशनी से बचाते हुए पत्तियों को ढके रहने पर कुछ समय बाद ढके हिस्से का रंग पत्ती के बाकी अनढके हिस्से से अलग हो जाता है।

      पत्तियां प्रकाश के अभाव में उस जगह भोजन नहीं बना पाती…….और उस जगह का रंग अलग हो जाता है …....पत्ती में जीवन….ओह……...तो मेरे इस बिस्तरे में भी जीवन है…… हाँ तभी तो जहां-जहां चादर से ढका था वहां का रंग बदल गया :) 
  
क्या वाहियात खयाल है…….ये मन भी न जाने क्या क्या सोच लेता है :)









- सतीश पंचम

स्थान – वही, जहां छत पर सोना नहीं हो पाता

समय – वही, जब आसमान में कोई तारा टूटे और तभी जमीं पर खडा कोई बच्चा अपनी मां से कहे  – मम्मी एक झोला दो…..वो तारा यहीं कहीं गिरा होगा….ले आता हूँ।


ग्राम्य सीरिज चालू आहे ......  

  

30 comments:

डॉ. मनोज मिश्र said...

बहुत बढियां ,आज सब पढूंगा,घर आयें हों तो मुलाकात हो जाये.

सतीश पंचम said...

मनोज जी,

फिलहाल तो वापस मुंबई में आ गया हूँ....लेकिन जल्द ही शायद फिर से जाना हो... ।

मिलूंगा...वापस गाँव आने पर :)

महफूज़ अली said...

Very good.......

गिरिजेश राव said...

अमाँ, पूरी तैयारी के साथ गाँव गए थे। नई नई बातें निखर कर आ रही हैं। नज़र चोखी..
बहुत आनन्द आया। चन्दा मामा आरे आव पारे आव ... लगता है आप के यहाँ मच्छर कम लगते हैं। बेचारों को कोई ज़गह नहीं दी लेख में !
ब्लॉग जगत की भनभनाहट से भन्नाय गए का, जो भूल गए ?
ई बताव तिनजोन्हिया (व्याध नक्षत्र) की हरवाहे (सप्तर्षि) से बातचीत सुने कि नहीं?

सतीश पंचम said...

गिरिजेश जी,

@ तिनजोन्हिया (व्याध नक्षत्र) की हरवाहे (सप्तर्षि) से बातचीत सुने कि नहीं?

नहीं, अब तक तो नहीं सुना....हो सके तो बताईये....न एक टटका पोस्ट हो जाय इस बारे में।

ब्लॉगजगत की भन्नाहट हम आप पर छोडते हैं...आप मडैया बंडेर से बांधिए मैं थून्ह सटाए हुए हूँ :)

अपने से तो नहीं होता ये दन्द फन्द....पता नहीं लोग इतना टाईम कैसे निकाल लेते हैं अनामी....बेनामी....सुनामी ठेलने के लिए :)

Sanjeet Tripathi said...

खुशकित्तई, सालों हुए छत पर सोए हुए…

Udan Tashtari said...

बड़ी बड़ी यादों में ढकेल देते हैं छोटी छोती बातों के साथ..बहुत शानदार!

भारतीय नागरिक - Indian Citizen said...

जलते हुये पत्तों ने मुझे भी अपनी नानी के यहां पहुंचा दिया.. उस के धुंये की महक (महक ही कहूंगा) अभी तक आ रही है..

Arvind Mishra said...

अहा ग्राम्य जीवन .....चित्र तो बहुत ही शानदार और जानदार हैं -आगे बढिए ....

Mithilesh dubey said...

भईया असली मजा ले रहे हो गाँव का ।

नीरज जाट जी said...

अजी अपन भी तो ऐसे ही हैं। नीम के नीचे सोते हैं मच्छरदानी लगाकर। आजकल नीम बौरा गया है। सबेरे जब मच्छरदानी हटाते हैं तो किलो भर बौर इकट्ठा हो जाता है मच्छरदानी पर।

अनुनाद सिंह said...

छत पर सोने का मजा ! सब कुछ तो बढ़िया-ही-बढ़िया होता है, बस मच्चर ....

प्रवीण पाण्डेय said...

क्या आनन्द है ऐसे सोने में । घर में ऐसे ही सोते है बहुधा ।

Vivek Rastogi said...

वाह वाह मज्जा आ गया, हम भी घर आये हैं, पर ये छत पर सोने का आनंद नहीं ले पा रहे हैं, मच्छर इतने हैं कि हमको उठा ही ले जायें, बस !!!

Vivek Rastogi said...

वाह वाह मज्जा आ गया, हम भी घर आये हैं, पर ये छत पर सोने का आनंद नहीं ले पा रहे हैं, मच्छर इतने हैं कि हमको उठा ही ले जायें, बस !!!

shama said...

Kaise kaise din yaad dila diye aapne!

kshama said...

Jise chhod aayi wo gaanv aaj bhi bulata hai...!
Man ki galiyaron me safar kara diya aapne!

महेन्द्र मिश्र said...

बहुत मनभावन रचना .. गाँव की याद तरोताजा कर दी ...आभार सर

मनोज कुमार said...

लाईट आई और वही सेल फिर चुप्पे से रेडियो से निकल कर रिमोट में समा गये थे। काश कुछ और देर लाईट न आई होती।
यही मुश्किल है, हम शहर में रहने वालों की।
लाजवाब संस्मरण।

मनोज कुमार said...

@क्या वाहियात खयाल है…….ये मन भी न जाने क्या क्या सोच लेता है
सब से अधिक आनंद इस खयाल में है कि हमने मानवता की प्रगति में कुछ योगदान दिया है। भले ही वह कितना कम, यहां तक कि बिल्कुल ही तुच्छ(वाहियात) क्यों न हो?

ashish said...

लगता है गाँव जाने से पहले मुझे बहुत सारी टिप्स मिल जाएगी आपके ग्राम्य सीरिज से , वैसे अगर छत पर सोते हुए . टूटे तारे देखते हुए , पॉकेट रेडियो होता और उस पर गाना चल रहा होता ",:नीले गगन के तले धरती का प्यार पले" . बस हम भी जल्दी ही पहुचने वाले है और छत पर सोकर रेडियो से गाना भी सुनेंगे. ,

ज्ञानदत्त पाण्डेय Gyandutt Pandey said...

गर्मी तेज हो तो मच्छर नहीं काटते शायद। गांव जाने में यही एक अड़चन है मच्छर की! :(

सतीश पंचम said...

देख रहा हूँ आप लोग मच्छरों से बहुत भयभीत लग रहे हैं :)

वैसे जब मैं वहां था तो पुरूआ हवा दो तीन दिन चली थी, मच्छर बिल्कुल नहीं लगे और सबसे बढकर बात यह थी कि मई की गर्मी में भी रात दो से चार के बीच ठंड पड रही थी, चादर ओढना जरूरी हो जाता था।

आभा said...

गाँव की याद ताजा हो गई...

अजय कुमार झा said...

जाईये अब आपको नहीं पढने आएंगे ......आपको अब यदि पढने आए तो फ़िर गांव जाए बगैर रुका नहीं जाएगा ......और दिल्ली से गांव जाने के लिए कितनी बडी जंग लडनी पड रही है .......देख रहे हैं न आज ...

सतीश पंचम said...

अरे अजय जी,

गाँव जाने के लिए एक ही दिन की दिल्ली में हुई जंग देखकर हार मान गए....कभी मुंबई की ओर भी तक लिया किजिए हुजुर-ए-आला...यहां बने रहने के लिए एक दिन की नहीं...हर दिन की जंग लडनी पडती है.....कभी लोकल की....कभी प्रांतवाद की....तो कभी आतंकवाद की।


लगता है हम माइग्रेटेड लोग अपनी किस्मत के पन्ने गदहे के फोद से लिखवा कर आए हैं :)

वाणी गीत said...

चाँद और सूरज दोनों को ही बाँध लिया बारी- बारी सुन्दर..इतने बढ़िया कमेंट्स के बीच कुछ आयं बायं भी झेल लीजिये ...
तस्वीरें लाजवाब हैं ...!!

सतीश पंचम said...

वाणी जी,

आज सुबह न्यूज में सुना कि रेल विभाग इसमें यात्रियों पर ही दोष डाल रहा है कि उनकी गलती है जो दिल्ली में भगदड हुई.....

सुनकर तो मन में कई किस्म के आंय बांय चलने लगे.... अब क्या कहा जाय इस तरह की बातों पर...कोफ्त होती है और जब कुछ न किया जा सके ऐसे टाईम पर तो यह अच्छा ही है कि आंय बांय सा कुछ बक लिया जाय....एक प्रेशर डिसाल्वर का काम करता है आंय बांय बकना।

अभिषेक ओझा said...

'गदहे के फोद से लिखवा कर आए हैं :)'
अब क्या कहें इस पर :)
जा रहे हैं हम भी जल्दी ही गाँव... छत पर तो सोयेंगे ही. ये नील वाला तो मस्त अवलोकन रहा. शाम को छत गर्म हो जाती थी तो ऊपर पानी ढो के छत धोये की नहीं? शाम को अपना नहान और छत का धुलान दोनों हो जाता है.

दीपक बाबा said...

@वो चाँद खिला….तारे हंसे…ये रात बड़ी मतवाली है..

सही में, अब तो छत नसीब नहीं होती, बेटे को बोला ..... चलो २-३ गाँव चलते हैं तुम्हे खूब तारे दिखायुन्गा........ बोला जब टाइम मिले तो नेहरु तारामंडल (हिंदी में लिख रहा हूं- पता नहीं अंग्रेजी में वो क्या बोला था) चल देना........ वहीँ सभी तारे दिखते हीं.

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