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Wednesday, May 12, 2010

मेरे पिया गये रंगून....लुंगी कौन पहनता है बे......नवाबिन से पूछो.... मूर्ति बनवा दूँ......क्या बकता है ..लछमी दासिन....सतीश पंचम


एक कोलाज :  फिल्म और साहित्य

लोग अब जहर बोते हैं बाबू...... मेरे पिया गये रंगून..... किया है टेलीफून..... तुम्हारी याद .......मोबाईल की अम्मा......अब कौन लुंगी में घूमता है रे.......पैंट पहन कर चलने में नवाबी फटकती है.....चप्पल फटकारते हुए चलोगे.......क्या प्रेमचंद के जूते याद नहीं.....फोटू भी खिचवा रहे थे तो फटे जूते के साथ......क्या कहा जाय.....लेखक लोग होते ही ऐसे हैं.......बताओ भला.....एक टेंडर की ही तो दरकार थी.....अबे मुर्ती लगवाने में पैसे फूंके जा रहे हैं......इहां तुम को नवाबी झलक रही है......जरा नवबाईन से पूछो कि उनकी भी मुर्ति लगवा दें........मैला आंचल लिए कहां जा रहे हो पंडत........धूसर देहात में पोथी पतरा........लछमी दासिन....तनिक गिनिए तो मठ में आज केतना मुर्ति लोग हैं......सब का भोजन बनवाओ............महंत रामदास के मुंह से लार चूता है......बालदेव जी तो हिंसाबाद से परहेज करते हैं....अपने नाम के साथ डंडा भी नहीं लगाते.....बालदेव जी.......चन्नपट्टी गए थे कि नहीं.......अमानुष बना के रख दिया है......सागर कितना मेरे पास है....फिर भी......ओ बंसी भईया....ही ही..ही...ही....ओ मोरे राजा बड़े जतना से सींचू रे मैं तेरी फुलवारी......आदत से बाज नहीं अईहो.....मेरे हाथ अब कट गये हैं पूनम.....मैं लाचारगी की गहरी खांई में गिर गया हूँ......हो न हो....यह वही है......बहारो फूल बरसाओ मेरा......ठाकुर साहब....आप कभी अपने घर में भी तो झांक कर देखिए.........मेरा नाम अरजुन सिंह वल्द भीम सिंह.....नमक का दारोगा......आ गया दाढ़ीजार......पिया तोसे नैना लागे रे.....लागे रे....आँख के बदले आँख......नजरिया की मारी मरी मैं तो गुईंया.....कोई जरा जाके बैदा बोलाओ...धरे मोरी नारी.......हाय राम....नजरिया की मारी......जितने के गांजी मिंयां नहीं उतने का लहबर.....क्या कहते हो घोष बाबू.....आज कल पान में हरी पत्ती नहीं पड़ती.....हां बाई की उमर भी तो हो गई है....अब हरी पत्ती बाजार में नहीं आती......क्या बकते हो......अपलम......चपलम....चप लाई रे.....मैं पिया की गली छोड़.......पनघट की मारी.......भर भर पिचकारी......रूक जाओ अभिमन्यु.......मैं कहता हूँ.....गोली चला दूंगा......है हासिल उसी को दुनिया जो...........कई रात से जाग रहा हूँ.....अब नहीं जाग सकता.......ढिबरी से कितना हाथ सेंकोगे बाबू......वो देखो कालिख दीवाल पर चढ़ती जा रही है.......मैं हर फिकर को धुएं में उड़ाता चला गया.....उड़ाता चला गया......



- सतीश पंचम

स्थान – वही, जहां साहित्य और फिल्म कभी गलबंहिया डाले घूमते थे।

समय – वही, जब फिल्म का लेखक प्रेमी प्रेमिका के बिछड़ाव का सीन लिख रहा हो और दुख का माहौल बना रहा हो, उसी वक्त फिल्म का डायरेक्टर कहे – सीन मजेदार होना चाहिए ....लड़की ट्रेन में बैठ कर चली जा रही है.....लड़का प्लेटफार्म पर हाथ हिलाता रह जाता है और एक पंजाबी रॉक गाना शुरू होता है....होय होय होय... रोक न पांवा अक्खां विच्चों गम दियां बरसातां नुं.........इश्क तेरा तड़पावे.....होय होय...होय ...इश्क तेरा तडपावे

रोना भी डिस्को की धुन पर.........होय होय

12 comments:

मनोज कुमार said...

उत्तम!

Vivek Rastogi said...

अद्भुत !!!

Udan Tashtari said...

बेहतरीन!!




एक अपील:

विवादों को नजर अंदाज कर निस्वार्थ हिन्दी की सेवा करते रहें, यही समय की मांग है.

हिन्दी के प्रचार एवं प्रसार में आपका योगदान अनुकरणीय है, साधुवाद एवं अनेक शुभकामनाएँ.

-समीर लाल ’समीर’

डा० अमर कुमार said...


पिया जी को कहाँ रँगून पहुँचा दिये, हो पँचम ?
ऊ त अभी गाज़ियेपुर में बँद हैं, चल के छोड़वाओ ।
" जात रहँव गोरू चरावै.. गोरू चर गइल धनवाँ..
खेतिहरवा अइलस आऽ पकड़लस हुनके कनवाँ
ठुम्मुक ठुम्मुक नाचत गइलन गाज़ीपुर के थनवाँ
कवन ज़ुलुम केऽ हाथ में हथकड़ी रहॅल गोड़ में लगनॅवाँऽ
होऽ..ठुम्मुक ठुम्मुक नाचत गइलन गाज़ीपुर के थनवाँ "

तो भईया, उनको गाज़ीपुर के थाने से तो निकलवाओ
तुम्हारा दो रात और तीन दिन का रँगून पैकेज़ फ़्री, फ़्री, फ़्री !

सतीश पंचम said...

@ तो भईया, उनको गाज़ीपुर के थाने से तो निकलवाओ
तुम्हारा दो रात और तीन दिन का रँगून पैकेज़ फ़्री, फ़्री, फ़्री !



अफसोस अमर जी,

मेरे हाथ कट गए हैं वरना मैं उसी कागज पर दस्तखत करता जिस कागज पर गाजीपुर जेल बनी है और ढहा देता उन दरों- दीवारों को....उखाड़ देता उन छज्जों को जो एक बलम को उसके सजनी से सिर्फ इसलिए रोक दें कि एक भैंस ने किसी के खेत मे मुँह मार दिया.....पूछता मैं उस जेलर से कहां है तुम्हारे जहन की अस्मत और कहां है तुम्हारी बंदिशों की फेहरिस्त.....क्या यही है इस मुल्क का कानून ?

लेकिन ये दुनिया बड़ी जालिम है अमर जी....

अफसोस मेरे हाथ लैपटॉप में न बझे होते...तो आज मैं ईंट से ईंट बजा.......ट्रेन में गा रहा होता....मैं बन की चिड़िया बन बन डोलूँ रे.....अल्ला के नाम पे दे दे.... :)

रंजना said...

लगा जैसे चिड़िया कभी किस डाल तो कभी किसी डाल फुर्र फुरती हुई उड़ रही है और उस आँखें गोदे हुए हैं कि कितने ही डालें फल फूल आँखों के आगे घूमे जा रहे हैं...

और तुलना तो लाजवाब किया है आपने...
आभार...इतने सारे किरदारों का स्मरण करने के लिए...

मो सम कौन ? said...

सतीश जी, घुमा कर रख दिया आज तो आपने।
और ये गाजीपुर जेल की कहानी भी बताओ जी कभी। उत्सुकता होने लगी है।

सतीश पंचम said...

गाजीपुर जेल की कहानी तो अमर जी ही बेहतर बता सकते हैं क्योंकि वही ऐसे रोचक गीत को लेकर आए हैं....इसका भावार्थ यह है कि - सजनी अपने पिया के बारे में बताते हुए कह रही है कि पिया मेरे भेंस चराने जा रहे थे...भेंस ने किसी के खेत में मुँह मार दिया और उस खेत के मालिक ने पिया को थाने पकडवा दिया और फिलहाल वह गाजीपुर जेल में हैं...

इस तरह के लोकगीत जिसमें पिया पर कटाक्ष किया जाता है, अक्सर छेड छाड वाला भाव लिए रहते हैं जैसे मेरे बलम बच्चे जैसा...साथ चलन शरमाऊं...ऐसे ही....।

बाकी तो अमिताभ बच्चन द्वारा गाया जिसकी बीवी मोटी उसका भी बड़ा नाम है( मूल रूप से एक लोकगीत) वाला गीत शादी ब्याह में एक पक्ष के लोग दूसरे को गरियाने में करते हैं जिसमें कि दूल्हा जब आँगन में बैठता है तो वधू पक्ष के लोग गाती हैं कि - मेरे अंगने में तुम्हारा क्या काम है।

तो यही सब लोकगीतावलीयां हैं जिन्हें अमर जी की पैनी नजर और सरस भाव से हमें पढने मिल जाता है :)

बाकी तो इस तरह की हल्की फुल्की टिप्पणियां सिर भारी नहीं होने देती....दुराव नहीं बढ़ाती...वही खासियत हैं :)

दिगम्बर नासवा said...

Kamaal ki post hai ... bahut pech liye par fir bhi seedhi ..

ज़ाकिर अली ‘रजनीश’ said...

गजब ढा दिया आपने इस कोलाज में।
बधाई स्वीकारें, दिल से।
कैसे लिखेगें प्रेमपत्र 72 साल के भूखे प्रहलाद जानी।

डॉ. मनोज मिश्र said...

गजब भाई जी ,गजब.

pramod gupta said...

चन्नपट्टी गए थे कि नहीं.... ye to hamare yahan padata azamgarh me kya aap wahi se ho

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