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Sunday, May 9, 2010

सतीश पंचम : ये देखिये खुल्ले में नहा रहा हूँ.....हरियाली के बीच....अपन तो बस ऐसे ही हैं....ग्राम्य सीरिज चालू आहे :)



         क्या कभी आपने खुले में नहाया है ? पोखर में, नलकूप पर, बाल्टी लेकर रास्ते में ही, या सींचे जा रहे खेत में  पाईप से.......कभी नहाया हो तो उसका आनंद भी पाए होंगे जरूर।

    यहाँ देखिए मैं गाँव में खुले में नहाने का आनंद उठा रहा हूँ.......धूप खिली है, आसपास हरियाली छाई है, खेतों में भी एक हरितिमा लहक रही है.......एक प्लास्टिक की बाल्टी.....एक लोटा.....लिए मैं जा पहुँचा इस नल पर.......। अभी नहाने जा ही रहा था कि एक बर्फ वाला आ गया। पास में ही एक बच्चा खड़ा था.....बर्फ वाला बुला लिया गया। चलो यार...नहाना अब बाद में होगा....पहले बरफ खाया जाय। कुछ बर्फ लिया गया.....कुछ दिया गया........हंसी ठिठोली.........। बर्फ वाला रूक कर छंहाने लगा।
              नहाने चला तो जिस बच्चे को बर्फ दिलाया उसी ने हैंडपंप से बाल्टी भर दी। लो नहाओ जितना नहाना है। अभी नहाना शुरू ही किया था कि न जाने कहां से और ढेर सारे बच्चे आ गये। बर्फ वाला खड़ा ही था। अब उन्हें भी बर्फ चाहिए। जिस बच्चे ने बर्फ खाते हुए पानी भरा था उसने कहा कि पानी भरो फिर बर्फ मिलेगी।
 फिर क्या था, एक हैंडल और तीन चलवार......बाल्टी का पानी भरा जाने लगा।  बर्फ वाले से कहा, इन्हें बर्फ दे दो.....नहाने के बाद पैसे देता हूँ...तब तक रूको।

बर्फ वाले को भी जैसे कोई जल्दी नहीं।

पहले ये लोग पानी भर के तुम्हें नहला दें, तब  मैं इन लोगों को बर्फ दूंगा....अभी नहीं। ( ऐसे मजाकिया बर्फ वाले शहरों में न मिलेंगे )

 बच्चों ने हैंडपंप और तेज चलाना शुरू किया।  बर्फ वाला मजे ले रहा था इस धींगामुश्ती का।

एक हैंडल,
तीन तीन चलवार.....
खिली खिली धूप में ठंडी ठंडी धार....
उपर से पुरवा  ठंडी बयार.............

यार ये तो कवित्त हो गया  :)

 उधर और भी ढेर सारे बच्चे जमा हो गये........जमा होते गये...........जहां चार पांच बर्फ लिया जाना था.........करीब पंदरह बीस बर्फ लिया गया.... छोटी मोटी बर्फ पार्टी..

 मैं गाँव जाने पर इस तरह के  हल्के फुल्के क्षण मस्त होकर जीता हूँ।

    यहाँ के बाजार में दो रूपये की चार पानी पूरी मिलती है, स्वाद में एकदम मस्त......चाट चटपटी भी सिर्फ तीन रूपये में, इमरती , समोसे भी सस्ते ही......और जब चाय वाले की दुकान पर आप बैठेंगे तो यह मान कर कि यह तो अपनी दुकान है.....


   .....तनिक अमर उजाला बढ़ाओ यार.........क्या लिखा है........प्रधानमंत्री वार्ता के लिए तैयार.......दोनों के बीच उच्च स्तरीय बातचीत.............धन्नो......ओ धन्नो.......अपनी तो जैसे तैसे........चल चमेली बाग में झूला झुलाएंगे..........फिरतू की कुतिया गाभिन है......भैंस का दूध मोटा होता है......बकरी पालने में ज्यादा फायदा होता है.........प्रधानमंत्री से कहो यहां मेरी इस दुकान में आकर बतियाएं....वार्ता सफल होगी

    अब यह सब एन्जॉय करने, अपनों से जुड़ने, अम्मा बाबू से मिलने के लिए गाँव न जाउं तो मुझसे बड़ा बेवकूफ शायद ही हो........


मेरे लिये मेरा गाँव ही कश्मीर है   :) 


   मैं गाँव इसी नॉस्टॉल्जिया को जीने जाता हूँ......आप भी हो आईये..........।


 - सतीश पंचम

स्थान - वही, जहाँ से यह ग्राम्य सीरिज लिख लिख आप लोगों को पका रहा हूँ....

समय - वही, जब  खुल्ले में नहा रहा होउं और उसी वक्त प्रधानमंत्री का हवाई जहाज  उपर से गुजरता हुआ जाय। अगले दिन अखबारों में सुर्खीयां हों कि - प्रधानमंत्री ने हवाई दौरा किया, खुले में नहाते लोगों को देख उन्हें दुख हुआ....अब सरकार लोगों के लिए बाथालय बनवाने जा रही है  :)

( सभी चित्र मेरे पर्सनल कलेक्शन से - डल झील सरीखा लुक देता चित्र दरअसल गोमती नदी का है ( पिछले साल ही मैंने शाम के समय खींचा था,    कुल्हड़ वाली दुकान वहीं गाँव के बाजार की है....और लोटा- बाल्टी जिससे मैं नहा  रहा हूँ.....अब मेरा इंतजार कर रहे है कि मैं फिर कब दुबारा आता हूँ  :)


ग्राम्य सीरिज चालू आहे  :)

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26 comments:

Hindiblog Jagat said...

अच्छा लिखा है आपने.
क्या हिंदी ब्लौगिंग के लिए कोई नीति बनानी चाहिए? देखिए

गिरिजेश राव said...

मजा आय गवा। उस कवित्त को बाल कविता का रूप दे दीजिए। हिट हो जाएगी।
मैं तो गाँव में पम्पिंग सेट के पानी से नहाया हूँ कई बार। हैंड पम्प से तो आज भी इसी तरह नहाता हूँ। बस घूसखोर बच्चे नहीं होते - नल चलाने को।
ये शहरी भी बड़े बदमाश होते हैं, नरेगा सरीखी योजना से बड़े तो सदाचार सीख चुके हैं लेकिन बरफ के बहाने बच्चों को सदाचार सिखा रहे हैं।
वकील साहब (द्विवेदी जी ) श्रम पर कुछ लिखे हैं । श्रम की कीमत वसूलना सदाचार है।...
ई शहरी बड़े बदमाश ! हर बात में पॉलिटिक्स। अरे! बरफ खाए, भैया को नहलाए। तमाशा खत्तम। अब इसमें भी बौद्धिक ! हद है !!
ऐसे ही बाथालय बनते रहें तो गली गली खेत खेत हगालय बन जाँय। हमरा हिन्द बहुत बड़ा शौचालय जो है (हम नहीं ऊ कोई नयपा कहा रहा)

डल झील सी गोमती गम्भीर कर गई। यहाँ नखलौ में माया के चंगुल में कराह रही है।

सतीश पंचम said...

गिरिजेश जी,

अगर बच्चों को बर्फ की घूस न देता तो बच्चे सामने रखे गेहूँ के बोरे में से एक दो मुट्ठी निकाल ले जाएंगे और आपके सामने ही बार्टर सिस्टम के तहत बर्फ वाले से गेहूँ के बदले बर्फ ले आएंगे :)

गेहूँ के रूप में ज्यादा जाने से अच्छा है थोडा ले देकर ही संतोष किया जाय और फिर यदि मैं उन्हें बर्फ की उम्मीद न बंधाता तो बच्चों की उछल कूद का मजा कैसे उठाता....रूठना, मनाना, भागना, पकड़ना, लोट पोट हो लेना....इन सब का एक अलग ही आनंद होता है गाँव में:)

यह गंवई बार्टर सिस्टम बड़ों के लिए भले अब महत्व न रखता हो पर बच्चों के लिए यह बड़ा मायने रखता है.....

अजय कुमार said...

शानदार अंदाज में लिखा गया । बहुत कुछ याद दिला गया ।

महेन्द्र मिश्र said...

बहुत बढ़िया प्रस्तुति ..
माँ तुझे सलाम

मो सम कौन ? said...

अपन तो जी खुले में तभी नहाते हैं, जब सरकार बनाने की जिम्मेदारी अपने सिर होती है(ईलेक्शन ड्यूटी आज तक शहर में नहीं लगी)।
शैंपेन का फ़व्वारा छोड़ कर पार्टी में जो मजा है, वो बल्ख बुखारे का मजा है और आपकी बर्फ़ पार्टी का मजा चौबारे का मज़ा।
जो मजा चौबारे में,
वो बल्ख में न बुखारे में।

उच्च स्तरीय वार्ता का नतीजा क्या होना है, पता है जी। अब के मार के दिखा, अब के मार के दिखा और सख्ती से निबटेंगे - तीसरा डायलाग आ जाये तो बताना।

चालू रहो जी, इधर हम भी मजा लेना चालू रखेंगे।

सतीश पंचम said...

@ संजय जी,

जो मजा चौबारे में,
वो बल्ख में न बुखारे में।


क्या बात कही ...बहूत खूब।

और ये वाला तो एकदम नरभसा गया....जबर्दस्त....

उच्च स्तरीय वार्ता का नतीजा क्या होना है, पता है जी। अब के मार के दिखा, अब के मार के दिखा


मजेदार कमेंट है। वाह।

अमरेन्द्र नाथ त्रिपाठी said...

इस ग्राम्य- सम्बद्ध गिरा में कहाँ काव्य नहीं है !
कवित्त तो आद्यंत है ! चार पंक्तियों को ही क्यों कहें !
बस आनंद लेने आता हूँ आपकी पोस्ट पर ! सुन्दर लिखाई !

Ratan Singh Shekhawat said...

वाकई गांव का तो मजा ही कुछ और है , हमें भी अपने गांव में एसा ही महसूस होता है |

गांव में पहले कुँए की मोटर चला उसके पाइप के नीचे नहाते थे अब खेत में लगे फव्वारों के नीचे नहाने का मजा लेतें है |

Vivek Rastogi said...

गद्य और पद्य दोनों का आनंद एक साथ, कब गद्य के साथ पद्य शुरु हो जाता है पता ही नहीं चलता है, प्रवाह देखते ही बनता है, ऐसे क्षण ही तो जिंदगी की अमूल्य पूँजी होते हैं। आप आज भी जी लेते हैं, अच्छा है नहीं तो शर्म के मारे आज बताओ कितने लोग कपड़े उतारकर ऐसे हैडपम्प पर नहाते हैं।

बधाई हो "ग्राम्य सीरिज चालू आहे :)" की

Mired Mirage said...

हम्म!
घुघूती बासूती

ताऊ रामपुरिया said...

असली मजा ले रहे हो आप तो, लिये जाईये.

रामराम.

Shiv said...

मन तो कर रहा है कि अभी गाँव चले जाएँ. तुरंत. और मलाई-बरफ खाकर आ जाएँ.
बहुत बढ़िया पोस्ट है. गोमती नदी की फोटो तो बहुत ही बढ़िया.

सतीश पंचम said...

शिव जी,

देर न करें.....शुभस्य शीघ्रम :)

वरना बर्फ गलने की आशंका है...

ashish said...

ऐसे खुले आम नहाना तथाकथित manners के खिलाफ है , हा हा हा , लगता है तथा कथित नारीवादियो की नजर नहीं पड़ी आप के हरित स्नान पर. इससे अच्छा तो ये होता की आप पोखरा में नहाते.

सतीश पंचम said...

आशिष जी,

तथाकथित मैन्नर्स की परवाह गाँव में नहीं कर सकता....खेतों की धूल-मिट्टी, हिल्ला-पाक से सने पैर लेकर पक्के बने बाथरूम की ओर जाना ही अपने आप में बेहूदगी मानी जाएगी....लोग तुरंत कटाक्ष कर देंगे कि आये बड़े लाट साहब....इनको बाथ रूम चाहिये ससुरौ के......

वैसे भी खेती किसानी वाला मोटा काम होता है....यहां खुले में इस तरह नहाना किसी शर्म की बात नहीं मानी जाएगी....हां...बड़े बड़े शहरों में एसी में बैठ कर लैपटॉप पर यदि यह चित्र देखा जाएगा तो जरूर यह एक किस्म की बेहूदगी लगेगी :)

इस खेती किसानी वाले मोटे काम से याद आया कि विवेकी राय जी ने एक जगह लिखा था कि कितनी भी धूप हो.... खेत में कभी भी छाता लगा कर नही जाना चाहिए....इससे बैल बिदकते हैं और इस मोटे काम में छाता तानना अनुचित माना जाएगा...।

ऐसे में जब एसी में बैठा लैपटॉप टपटपाने वाला शख्स गाँव में आएगा तो उसे भी उसी माहौल में ढलना पड़ेगा...यानि बगैर छाता लगाये खेतों में भ्रमण करना होगा....

और वैसे भी पोखरा में पानी कहां रहा है... जो वहां नहाउं :)

प्रवीण पाण्डेय said...

बहुत आनन्द आता है खुले में नहाने में । सेंसर बोर्ड से बच के रहिये पर ।

rashmi ravija said...

चालू रहें ये ग्राम्य सिरीज़....बहुत ही रोचक विवरण मिल रहें हैं ...पढने को..
और वो नाव वाली सीनरी तो इर्ष्या जगा गयी..
वैसे भी हमारे गांव में नदी नहीं, नहर था...इसलिए यह बस कल्पनाओं में ही था कल भी..आज भी...
हाँ , ये दृश्य शरतचंद्र के उपन्यासों की याद दिला गया...उनमे बहुत जिक्र होता था और कुछ ऐसी ही तस्वीर बनती थी आँखों के समक्ष

'अदा' said...

वाह वाह !!
जीवन का असली आनंद तो आप ही ले रहे हैं....
गाँव के जीवन की बात ही कुछ और है..आपने जिस तरह से प्रस्तुत किया है यकीन मानिए मुझे भी अपन बुढ़ापा अब गाँव में ही बिताने की इच्छा हो गयी है...
आपकी किस्मत से एक बार को तो रश्क हो ही गया...
आपका आभार...

Udan Tashtari said...

मेरे लिये मेरा गाँव ही कश्मीर है

-सच में..शायद हम सभी के लिए.

बर्फ पाल्टी सॉलिड रही और साथ में बम्बा स्नान...गांव की याद सताने लगी.

अभिषेक ओझा said...

बचपन में पम्पिंग सेट और हैण्ड पम्प पर नहाके सुदर्शन चक्र की तरह गीली हाफ पैंट घुमाते दुआरे से घर आते थे. एक बार मास्टर जी ने देख लिया... नंगे. दूसरी या तीसरी क्लास में.... अब आगे नहीं बताऊंगा ;)

वाणी गीत said...

ग्राम्य जीवन भी क्या खूब है ...
इस नॉस्टॉल्जिया से गुजरते पलो से दूसरो का भी साक्षात्कार करवाना ...
बड़े पुण्य का काम है ...लोग बुढ़ापे की सोचने लगे हैं ...:):)

सतीश चंद्र सत्यार्थी said...

आनंद आ रहा है.. :)

ज्ञानदत्त पाण्डेय Gyandutt Pandey said...

दो दशक पहले एक फिर्ंगी मेरे श्वसुर जी के गांव पंहुचा था। बनारसी ठगों ने उसका जूता-पैसा सब हर लिया था।
श्वसुर जी का गमछा पहन खुले में नहाया तो बहुत आनन्द में था अनुभव ले कर!

डॉ. मनोज मिश्र said...

असली चित्रण,वाह.

हरि शर्मा said...

अब का करे सतीश बबुआ, हम कभू ऐसे गाम मे रहे नई. जब कोई रिश्तेदारी मे गाम जाये और रुके एकाध दिन तो सोच के जामे के नहवाई धुवाई तो खेत के कुआ की मोटर पे ही करिन्गे. वामे मज़ा व्होत आवे.

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