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Saturday, May 8, 2010

सन्तों के चरण छूते हुए चिकोटी काटने का मन हो रहा है....कहीं आप का भी मन लहक रहा हो तो बढ़ आओ... देर किस बात की...सतीश पंचम

     जहँ जहँ चरण पड़े सन्तन के, तहँ तहँ बंटाढार……यह बात मेरे गाँव के पोखरे के लिए सटीक बैठती है। ठीक दो साल पहले का ये चित्र हैं और ठीक दो साल बाद के ही सूखे पोखर वाला चित्र है जिसमें बच्चे क्रिकेट खेल रहे हैं…..नरेगा का भरपूर उपयोग हुआ है…..पैसा पानी की तरह बहा है….लेकिन विडंबना यह कि पानी ही नहीं है पोखर में…….

        पहले बरसात होने पर चारों ओर से ढाल पाकर पानी इस पोखर में जमा हो जाता था…..इतना कि  पोखरे में गर्मी के समय भी थोड़ा बहुत पानी रह जाता था…….अब नरेगा के जरिए ऐसी चौहद्दी बन गई है कि  अगर जमकर बरसात हो भी गई तो पोखर के किनारे किनारे जो चहारदीवारी बनवाई गई है वह फिजूल का  पानी आने से रोक देगी…….पोखर भरे तो कैसे…….सरकारी काम भी तो रोक छेंक के बगैर नहीं होता……ये पोखर की दीवारें उसी सरकारी माहौल की याद दिला रही हैं कि जो काम खुद ब खुद ढंग से हो रहा हो…..वहां लाइसेंस लागू करो……जो पानी खुद ब खुद बहकर पोखर में जमा हो जाता था….अब उसे पोखर में पहुंचने के लिये अगल बगल खड़ी चारदीवारीयों से परमिशन लेनी पडेगी…….पानी भरे तो कैसे……अब हालत यह है कि उसमें बच्चे क्रिकेट खेल रहे हैं, धूल उड़ रही है….बैठ रही है…….छन रही है।

इस पोखरे को देख मुझे विवेकी राय जी का लिखा एक लेख बड़ी शिद्दत से याद आ रहा है…..जिसमें  विवेकी राय जी ने लिखा था कि

     अब वे दिन सपने हुए हैं कि जब सुबह पहर दिन चढे तक किनारे पर बैठ निश्चिंत भाव से घरों की औरतें मोटी मोटी दातून करती और गाँव भर की बातें करती। उनसे कभी कभी हूं-टूं होते होते गरजा गरजी, गोत्रोच्चार और फिर उघटा-पुरान होने लगता। नदी तीर की राजनीति, गाँव की राजनीति। लडकियां घर के सारे बर्तन-भांडे कपार पर लादकर लातीं और रच-रचकर माँजती। उनका तेलउंस करिखा पानी में तैरता रहता। काम से अधिक कचहरी । छन भर का काम, पहर-भर में। कैसा मयगर मंगई नदी का यह छोटा तट है, जो आता है, वो इस तट से सट जाता है।

    
       विवेकी राय जी मंगई नदी को गांव की मां कहते हैं और लिखते हैं कि -
  
       हम थके मांदे बाहर से आते, यह निर्मल नीर लिये राह-घाट छेंक सदा हाजिर, घुटने तक, कभी जांघ तक पैर धो देती, शीतल आँचल से पोंछ देती, तरो ताजा कर देती। हम खिल जाते। मुंह धोते, कुल्ला करते, हडबड-हडबड हेलते, उंगली से धार काटते और कुटकुर किनारे पर पनही गोड में डालकर भींगे पैरों की सनसनाहट के साथ धोती हाथ से टांगे अरार पर चढते तो एक अनकही-अबूझी आनंदानुभूति होती थी ….
  
      गरमी के दिन में लडके छपक छपक कर नहा रहे हैं। सेवार और काई के फुटके छत्ते धार के साथ बह रहे हैं। लडके उन्हें उठा-उठाकर एक दूसरे पर उछाल रहे हैं। झांव- झांव झाबर।   एक दूसरे पर हाथो –हांथ पानी उबिछ रहे हैं, हंस रहे हैं, किलकारी भर रहे हैं। हाथ पैर पटक कर अगिनबोट बन तैर रहे हैं। हाडुक-बाडुक। नहाते नहाते ठुड्डी और मूंछ वाले स्थान पर हलकी काई जम गयी। कोई बुडुआ बनकर दूसरे का पैर खींच रहा है। कोई पानी में आँखें खोलकर तैरता है। अच्छा देखें कौन देर तक पानी में सांस रोककर डूबता है। खेल शुरू। एक पट्ठा रिगानी (चालाकी)  कर जाता है। सिर काढ कर साँस ले रहा है और तब तक उपर उठने के लिये कोई सिर मुलकाता है, तब तक डम्भ। साँस ले रहा लडका पानी में घुस जाता है। दिन भर नहान। न जाने किस पुण्य प्रताप से यह नियामत मिली। आज कल के लडके तो अभागे निकले। चुल्लू भर पानी के लिये छिछियाते फिरें। कुएं पर खडे खडे लोटे से देह खंघार लें बस।
  
       उधर दादा दोनों हाथों से मार-मार फच्च फच्च धोती फींच रहे हैं। कहते हैं कि उनके कपडे कभी धोबी के घर नहीं जाते। परंतु क्या मजाल कि कोई कहीं धब्बा मैल या चित्ती देख ले। एक जिंदा दृश्य। मानों यह मंगई का तट ही गाँव के लिये सिनेमा, थियेटर, मनोरंजन पार्क, क्लब, क्रीडागार स्थान है।
  
      लेकिन अब वो बात नहीं रही। स्वतंत्रता के समय जो मंगई नदी कल कल बहती थी, अब सूख गई है। गाँव में घुसने से पहले उसी का महाभकसावन सूखा, गहरा, लेटा हुआ कंकाल लांघना पडता है। मिजाज सन्न हो जाता है। बंसवारि खडी है, पेड खडे हैं। घर खडे हैं। मगर वह रौनक कहां है। अखर गया है।
  
     एक वह भी समय था जब चैत रामनौमी के दिन अछत कलश भरने का काम शुरू होता। किसी कलश को घी से टीककर, तो किसी कलश को घी से ही राम-नाम लिखकर अंवासा गया है। माता मईया की गज्जी कचारने, सिरजना और पीढा धोने का काम रात भर चलता है।
  
      मंगई के तट पर नहान उतरा है। जिनको माता मईया की पूजा करनी है, जिन्हें कडाही पर बैठना है, वे नहा रही हैं। पहले दौर में सोझारू औरतों ने और लडकियों ने स्नान किया। जब रात भीन गयी और राह-घाट सूनी हो गयी, तब लजारू बहुरीया लोग निकलीं।
  
     अब वह बात कहां रही। नहान की बेला में अबकी बार सियार फेंकरते रहे। फटे दरारों की शतरंजी पर भूत-प्रेत बैठकर सत्यानाशी खेल खेलते रहे। मनुष्य का स्वभाव माहुर हो गया है, देवता उन्हें दंड दें, लेकिन उसके लिये जीव जंतुओं और मवेशियों को क्यों दंड दिया जाय। अब भैंसे कहां घंटों पानी में बैठकर बोह लेंगी। अब दंवरी से खुलकर आये बैल कहां पानी पियेंगे। कहां उनकी गरमाई हुई अददी खुरों को जुडवाने के लिये पाक में हेलाया जाएगा। खेह से भठी हुई उनकी देह कहां धोयी जाएगी। दिन में चरने वाले जानवर और रात-बिरात दूर-दूर से टोह लगाते आये सियार-हिरन आदि अब कहां पानी पियेंगे। कुछ समझ नहीं आ रहा।
  
      जेठ-बैसाख में जिनकी शादी होगी, उनका कक्कन कहां छूटेगा । मौर कहां पर सिरवाया जाएगा। कहां पर
खडी होकर औरतें गाएंगी -

 अंगने में बहे दरिअइया
हमारे जान नौंसे नहा लो
कोठे उपर दुल्हा मौरी संवारे,
सेहरा संवारे ओकर मईया
हमारे जान नौंसे नहा लो…….

        अब हालत यह है कि खेतों के लिये दौडो, पंपिंग सेट जुटाओ,ट्यूबवेल धंसाओ….मगर मंगई के लिये क्या करोगे। ऐसे लुरगिर कमासुत लोग जनमें कि आपस में वैर, विद्वेष, रगरा-झगरा से फुरसत नहीं । बरमाग्नि उठी कि आकाश धधक उठा। दुख दाह से नदी का करेजा दरक गया है।

     मंगई का करेजा तो देर से फटा है, क्या गांव का करेजा बहुत पहले नहीं फट गया। चुनाव आया एक गांव के कई गांव हो गये। सुख शांति में आग लग गई है। गोल-गिरोह और पार्टीयां बन गई हैं। राजनीतिक पार्टीयों ने वह सत्यानाशी बीज बोया कि गाँव गाँव दरकते चले गये। जूझ गये एक दूसरे से लोग, खून के प्यासे, स्वार्थी-लोलुप और एक विचित्र किस्म के कामकाजी हो गये। उनका सारा ध्यान सरकार पर और अँखमुद्दी लूट पर लग गया। यह लूट उसी प्रकार सत्य रही जिस प्रकार सूरज। मंगई का पानी इसी में सूख गया। कितना सहे। नदी सत्त से बहती है। आसमान सत्त से बरसता है। आदमी का सत्त चला गया। जो किसी युग में नहीं हुआ वह इस युग में हो गया।

      मंगई का पानी था तो आधा पेट खाकर भी गांव में तरी थी। वह तरी पुरानी थी, परंपरागत और सांसकृतिक थी। सो इस कनपटी पर विद्रोही काल ने ऐस थप्पड मारा है कि चटक गयी है। अब इसका खाली पेट जनता के खाली पेट का प्रतीक हो गया है। चहल  पहल माटी हो गयी है। माटी दरार हो गई और इस तिकोनी चौकोनी कटी दरारों के बीच की बरफी पर गदहे घूम रहे हैं, बकरीयां उछल-कूद कर रही हैं। दरारों में मुंह चिआरकर सीपियां पडी हैं, जिनमें से अपना खाना ढूँढते कौए आतुर हैं।

      लोग जूता फटकारते आ-जा रहे हैं। बैलगाडियां बे रोकटोक पार हो जा रही हैं। अरार पर से उतरने वाले संस्कारवश एक बार घूरकर देखते हैं कि कहीं जूता तो नहीं उतारना है। लेकिन अब जूता क्यों उतारा जाय, मंगई तो सूख गई है।

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    तो ये तो विवेकी राय जी ने लिखा था मंगई के बारे में, असत की काली परछाईं को चिचोरती मंगई……मुझे डर है कि  नरेगा से जो असत् की धारा बही है…..कहीं वह मेरे गाँव के पोखरे को एक और मंगई न बना दे……..क्योंकि पैसा खूब बहा है……खूब बहा है और बहुत जगह अब भी बह रहा है।

 इतना सारा पैसा बहाने वाले सन्त जन धन्य हैं  ….कहा है कि .... जहँ जहँ चरण पड़े सन्तन के, तहँ तहँ बंटाढार…  इस पोखरे को देख वही साक्षात दिख रहा है.....

 मन करता है सन्तन के पैर छूते हुए उनके चरणों में चिकोटी काटूँ ........

 
  - सतीश पंचम

स्थान – वही, जहाँ  के दो भाई बड़े धन्ना सेठ  हैं और बड़मनसाहत के तौर पर बड़ी अदालत में एक दूसरे से  फरियाने ( मामला साफ करवाने)  गये थे।

समय – वही, जब एक भाई ने कोर्ट में केस जीत लेने पर कहा – तनिक पंडित जी को कहना कल मेरे यहां भाई के खिलाफ केस जीतने के उपलक्ष्य में अखंड रामायण का पाठ है। जरूर आयें...........

 वही रामायण.....जिसमें भाई-भाई का प्रेम दर्शाया गया है.......

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23 comments:

ज्ञानदत्त पाण्डेय Gyandutt Pandey said...

चिकोटी काटे क्या असर होना मोटी गैंडा-खाल में!?

सलीम ख़ान said...

ha ha ha

honesty project democracy said...

सतीश जी गंभीर विषय उठाने के लिए धन्यवाद / ऐसे ही पोस्ट से ब्लॉग की महत्ता बढ़ेगी / दरअसल बात ये है की आज संत हैं कहाँ, ये तो सत्ता के दलाल और लोभी-लालची कुत्ते है ,जिनको अगर आपने कुछ भी दिया तो वो कुपात्र को दिया दान ही कहलायेगा / आज कल के इस संत की वजह से भी भ्रष्टाचार चरम पर है /

प्रवीण पाण्डेय said...

बताईये, यह तो बंटाधार से भी बढ़कर बंटाभ्रष्ट है ।

Vivek Rastogi said...

और पता नहीं कित्ते बहने वाले हैं, आप तो केवल एक ही पोखर देखे हैं, गर देस के गिने तो ... नरेगा के सन्तों को प्रनाम..

सतीश पंचम said...

इधर शिव जी का भी कहना है कि चिकोटी काटने से क्या होगा.. टॉम एण्ड जेरी वाले किस्से में जैसे जैरी हथौडा मारता है टॉम के पैर पर वैसा कुछ करना होगा ......टांगssss :)

सतीश पंचम said...

विवेक जी,

सचमुच यह एक पोखर में ही पता चल जा रहा है कि कितना तर माल लपेटा जा रहा होगा....पोखर की गहराई दिखाने के लिये वहीं थोडा सा खोद खाद कर चहार दीवारी की उंचाई लपालप बढ़ा दी गई है...बिना इस बात की परवाह किये कि चहारदीवारी की बढती उंचाई आसपास के फालतू पानी के ढरक कर पोखर में आने में रूकावट है....गहराई और उंचाई की ऐसी इंजिनियरिंग चल रही है कि बड़े से बड़े इंजिनियर बगले झांकने लगें :)

और तुर्रा यह कि चहारदीवारी के उपर ही सीमेंट की सीटें लगा दी गई हैं सुशोभीकरण के लिए....आओ बैठो और क्रिकेट देखो....यह फोटो उसी दर्शक दीर्घा पर बैठ कर खींचा हूँ....

सतीश पंचम said...

चित्र को डबल क्लिक करने पर दो बेंचे भी दिखेंगी जो कि दर्शक दीर्घा का कामं कर रही हैं।

मो सम कौन ? said...

अब साहब नरेगा स्कीम आगे भी तो चलनी है(इलेक्शन पर्व हर पांच साल में तो आना ही है, जल्दी न भी आये तो)। पहले नरेगा फ़ंड्स के इस्तेमाल से पोखरे को चारदीवारी से ढंका गया है, फ़िर आप जैसों की राय को सम्मान देते हुये और वायबेलिटी फ़ैक्टर को देखते हुये चारदिवारी हटा दी जायेगी - कर्टेसी नरेगा फ़ंड्स।
बहुत उर्वर दिमाग हैं जी हमारे नेताओं के, ऐसे ही लोग बाग गरियाते रहते हैं बेचारों को।
ये योजनायें कहां बनती, पास होती हैं?
स्थान - वहीं जहां हमला होने पर जिन्हें निपटना चाहिये था, उनका बाल बांका नहीं हुआ और जिन्हें रहना चाहिये था वि खुद तो निपटे ही, परिवार को और मंझधार में छोड़ गये।
समय - जब वेतन भत्ते बढ़ाने में सभी एकमत हों, और उसी समय चिक्न बिरयानी की प्लेट बीस बाईस रुपये में मिलती हो(कैंटीन सब्सिडी)।

लिग हैं कि फ़िर भी महंगाई और इसका उसका दुखड़ा रोते रहते हैं।

मो सम कौन ? said...

क्षमा चाहता हूं ’लिग हैं कि फ़ि....’ को "लोग हैं कि.........? पढ़ा जाये।

सतीश पंचम said...

संजय जी,

इस तरह की मात्रा या लिखावट वाली त्रुटियाँ इंटरनेटीय माध्यम में अब कम ही मायने रखती हैं....बाकी तो बात समझ में आ जानी चाहिए...कौन सा हम लोगन को हिंदी के पुरोधा बनना है :)

और जो हिंदी के तथाकथित चिंतक हैं वह कौन सा शुद्ध घी चांप रहे हैं....फिक्र नॉट.....अपन इस तरह की लि और लो त्रुटि वाली लिखावट को अपने हिसाब से ढालने में उस्ताद हैं :)

और आपने बहुत सही अनुमान लगाया कि - बाद में वायबेलिटी फ़ैक्टर को देखते हुये चारदिवारी हटा दी जायेगी - कर्टेसी नरेगा फ़ंड्स।

गिरिजेश राव said...

विवेकी राय + सतीश पंचम
सौ प्रतिशत अपनापन वाला लेखन। कहीं कोई मिलावट नहीं, शुद्ध अनुभव, अपनी बात - भोगा हुआ/जा रहा यथार्थ।
पुनर्जन्म की मान्यता में कुछ सचाई सी लगने लगी है :)

मनोज कुमार said...

गंभीर एवं विचारणीय पोस्ट।

मो सम कौन ? said...

सतीश जी,
मात्रा, व्याकरण में त्रुटि के लिये अभय देने के लिये धन्यवाद, भाव बेभाव की त्रुटियों की अभय अब खुद ही ले लेंगे। पहुंचा पकड़ने में हम उस्ताद हैं :)
ये भी सही कहा कि कौन सा हमें पुरोधा बनना है, कतई नहीं बनना है जी। और हम तो ऐसे वज्र हैं को कोई बनाना भी चाहे तो फ़िर तो बि्ल्कुल न बनें।
आम हैं और आम ही रहेंगे, अभी तो वैसे भी आम का मौसम है, कटने का और चूसे जाने का।

Mithilesh dubey said...

बहुत खूब बड़का भईया ।

सिद्धार्थ शंकर त्रिपाठी said...

बहुत सच्ची चिकोटी काती है आपने। लेकिन असर नहीं होगा। गुरुदेव ज्ञानदत्त जी से सहमत।

अनूप शुक्ल said...

जबसे पोस्ट पब्लिश हुई है तब से धरी है हमारे सामने। आज बांची। पढकर बहुत अच्छा लगा और बहुत खराब भी। कुछ कुछ आपके पोस्ट में लगे तालाब के फ़ोटुओं जैसे- नरेगा के पहले, नरेगा के बाद!

ashish said...

सतीश जी , आपको पढने में मुझे बहुत मज़ा आता है और मै अपने गाव पहुच जाता हूँ आपको पढ़ते हुए, इ वाली भाषा पढ़ के बड़ा नीक लागेला हमरा के., वैसे एगो बात बताई हम रउरा के , हम विवेकी राय के बड़का बाबु कहिला, हो सकत है आप जानत होइब की विवेकी राय , गाजीपुर में सोनवानी गाव का रहे वाला हवे .हमार गाव मगाई नदी की किनारे बसल बा.जेवन की एकदम सुख गईल बा. एकदम बवाल लिखत बाड तू. ऐसेही लिखत रह, शुभकामनाये.

सतीश पंचम said...

आशिष जी,

देशज भाषा का अपना ही रस होता है और मैं उसे घोर घोर कर पीता हूँ :)

विवेकी राय जी से दो महीने से ज्यादा हुए बात हुए....अब सोचता हूँ फोनिया ही लूं....जीते जागते रेणू और मुंशी प्रेमचंद से बात करने का अलग ही अनुभव है।

ये ब्लॉगिंग का एक अलग ही आयाम है कि देखिये मंगई नदी के आप जैसे रहिवासीयों के साथ साथ जो देश विदेश में बसे हैं वह भी मंगई गाथा को पढ़ पा रहे हैं।

मंगई नदी की कोई तस्वीर हो तो नेट पर डालिए....देखने की इच्छा है।

Pankaj Upadhyay (पंकज उपाध्याय) said...

लखनऊ मे था तो सुनता रहता था कि वर्ल्ड बैक से गोमती सफ़ाई के लिये पैसा आया है और उस पर जोरो शोरो से काम भी जारी थी.. पता नही कि गोमती साफ़ हुयी की नही लेकिन वर्ल्ड बैक का पैसा तो साफ़ होता दीखता है..

किसी ने गाजीपुर का जिक्र किया गया तो मुझे भी अपना गाव याद आ गया.. अच्छा लगता है मिट्टी से जुडी बाते पढना..

Pankaj Upadhyay (पंकज उपाध्याय) said...

एक गज़ल है न कि
चार पैसे कमाने मै आया शहर,
गाव मेरा मुझे याद आता रहा..

ताऊ रामपुरिया said...

बहुत सटीक बात कही है आपने, अब पूरे कुयें में ही भांग पडी हो तो चिकोटी क्या बडा चिकोटा कातने से भी कुछ नही होने वाला.

रामराम.

दीपक बाबा said...

@तथाकथित चिंतक हैं वह कौन सा शुद्ध घी चांप रहे हैं....फिक्र नॉट.....अपन इस तरह की लि और लो त्रुटि वाली लिखावट को अपने हिसाब से ढालने में उस्ताद हैं

वाह :)

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