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Friday, May 7, 2010

आँचलिक पोस्ट - अबे तू लड़की से लभ करता है तो बोल दे उसको...... सैंडिल का नम्मर ईयाद है...... गजे-गज्ज अरहर..... ....सतीश पंचम


 ( एक चीज मैंने देखी है कस्बे-कूचों की  बोलीयों में कि यहां रफ़ बोलने के पैसे नहीं लगते और टफ़ बोलने पर पैसे नहीं मिलते.....सब को मिला-जुलाकर चला जाता है......उसी इलाके की और उसी मानसिकता को ध्यान में रख लिखी गई है यह कोलाज......एक आँचलिक पोस्ट...... )

     
     कबसे कह रहा हूँ कि टायर में हवा कम है साहेब.........फिर   भी लादे जा रहे हैं लोग त
 बताईये मैं क्या करूं...... लाईसेंस........ई ल्यो चाह पा ......ट्रैफिक हवलदार न हुए परधानमंतरी हो गये ...........सालों को कुकुरउछी लगी रहती  है......थोड़ा डराईबर सीट से फरके बैठो यार....गियर बझता है........ तुम सब इसकूली लड़का लोग अकराता हो एकदम......भागो इहां से..........लेना एक न देना दो....फिर भी दाम पूछोगे अदबदाकर...........एक ठो मीठा पान बनाना....नहीं चून्ना तनिक कम ......अबे तो बोल न उसको कि तू भी लभ करता है.....बूढ़ा हो जाएगा ऐसे ही......वो तेरे को लभ करती है कि नहीं.........लड़की के सैंडिल का नम्मर इयाद है बकि अपनी चड्ढी का नम्मर नहीं इयाद है साले को.....देखो तो......अरे ए भाई जरा बगलिया के.....टेसन तक का भाड़ा है..............पांच रूपिया में करधन बनवा ल्यो.....पां....


         जाने दो यार तुम क्यों मुंह लगते हो उसके.........लफंडू है साला.......जहां एक हाथ लगा तो आँख उज्जर हो जाएगी बच्चू की.........अपने आप ही बटुर जायगा.............देखो तो कैसे भगा पुल की ओर.....सीढ़ी चढ़ रहा है.........आगे आगे थुलथुल मोटकी औरतीया सीढ़ी चढ़ रही है.......पीछे-पीछे तेवारी .......अरे का तेवारी......जलडमरूमध्य देख रहे हो.....देखो देखो.....कहे हैं मजरूह सुलतानपुर वाले कि तेरी आँखों के सिवा दुनिया में रक्खा का है..........जियो रे मजरू ......का लिक्खा है......करेजा काट......ऐ बे दो किलो बेसन.....अरे पनरह रूपिया का एतना ही उलटोगे...... लूट मची है.....चाचा हम बोल रहे हैं......भिजवा देना खियाल से.....बड़की की बिदाई है.......बाकि धोनीया तो ऐसा बल्ला घुमाता है कि हां तो इधर लगा नहीं कि गेंद तारा बनी .......

         एम् आकाशवाणी...सम्प्रति वारताह श्रुयंताम.....प्रवाचकह बलदेवानंद सागरह.....ऐ बैजू.....कल का दो बोरा धान की लदनी नहीं मिली अब तक.........अरहर तो गजे गज्ज है............भउजाई नहीं दिख रही हैं......का बात है.......बहुत उलटी ओलटी हो रहा है भऊजी के......जिया राजा...........अब तो नाऊन घड़ी पाएगी......



- सतीश पंचम

स्थान वही, जहाँ इस तरह की बोली सुनने के लिए कान तरस जाते हैं.....

समयवही, जब गार्डन में बैठे दो प्रेमी एक दूसरे से सटे प्रेमालाप में मग्न हों और तभी हवलदार आकर कहे......आज मंगलवार है।

 
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19 comments:

यशवन्त मेहता "फ़कीरा" said...

मजा आ गया बांच कर.......स्वादिष्ट पोस्ट

shikha varshney said...

:) rochak..

Shiv said...

"गियर बझता है..."

पिछली दुइ-तीन पोस्ट से अइसन लिख दिए हैं कि कहिये मत... जिय~~ राजा.

मो सम कौन ? said...

"..लड़की के सैंडिल का नम्मर इयाद है बकि अपनी चड्ढी का नम्मर नहीं इयाद है साले को.....देखो तो.."
गज़ब है कोलाज़ पोस्ट आपकी,
बाकी रफ़ लैग्वेज़ सुनने का भी अपना अलग ही मजा है।

आभार।

महफूज़ अली said...

Very good....

Udan Tashtari said...

जिया राजा.

-बेहतरीन!!!

mukti said...

कुकुरौंछी...बड़े दिन बाद सुना है... जब हमारे इहाँ देसी कुक्कुर पलते थे तो इनका बोलबाला होता था... कभी-कभी हमलोगों को भी पछिया लेती थीं. बिलायती क्क्कुर पे इ माछी नहीं लगतीं, पता नहीं काहे.
सच में दो-तीन पोस्ट से बड़ी ऐसी-वैसी बोली सुना रहे हैं. लगता है घर की खुमारी रहेगी कुछ दिन तक.

पं.डी.के.शर्मा"वत्स" said...

बोल तो नहीं पाते लेकिन पढने सुनने में ये बोली हमेशा ही आनन्द दे जाती है.....मजेदार्!

अनूप शुक्ल said...

मज्जेदार! झकास!

अभिषेक ओझा said...

जा झार के ! त भूलिए गए आप.

डा० अमर कुमार said...


आरे.. हम तुम्ह से मोहोबत करतै सलम, रोवतहूँ रहे हँसतहूँ रहे... आरे हम हम तुम्ह से मोहोबत ओं होंऽ होंऽ सलम हुँ हुँ, हुँ हुँ सलम.. राम राम भईया.. अउर सब्ब ठिकठाक.... ओं होंऽ होंऽ सलम हुँ हुँ, हुँ हुँ सलम..

क्या रॉबचिक ठेला है.. अब यह बताओ कि आज शाम किस पारिक में मिलोगे ?
आऽऽ तऽ, मॉडरेशन काहे नहीं लगाया रे, बुरबक ?

फ़िरदौस ख़ान said...

बेहतरीन...

सतीश पंचम said...

अमर जी लगता है कि एकदम मूड में हैं :)

हमने एही कारन माडरेसन नहीं लगाया काहे सि कि हमरे पास का है जो कोई हमार लई लेगा...हम त खुद पुअरा पे सोने वाले हैं झनखै वह जो बेला चमेली का सेज बिछाये :)

सतीश पंचम said...

.....अउर मिलने का का है, अमर जी...... कभी भी, कहीं भी तइयार हैं...देसी कोंहड़ा की तरह....जिस किसी में पड़ जाउं समझ लो पूड़ी जरूर छनेगी :)

E-Guru Rajeev said...

पूड़ी छनात ह होSSSSSSSSS
अरे जिया सेर जिया...
छाना रजा छाना.
इहाँ त कुल संकटे बा हो.....
का खाईं, का पीहीं... अsss का ले परदेस जाईं !!

Mithilesh dubey said...

बहुत खूब लगल हमका भी ।

ज्ञानदत्त पाण्डेय Gyandutt Pandey said...

क्या अऑब्जर्वेशन है! लाजवाब।
सफेद घर है एक ब्लॉगिंग फिनॉमिना!

P.N. Subramanian said...

बहुत मजा आया Sthaneey bolchaal ki shaili achhi lagti hai lekin use hoobahu duhra pana kathin hota hai. Aap ka jawaab nahin.

P.N. Subramanian said...

बहुत सुन्दर यह हमार पेट वर्डवा है. जलडमरूमध्य तो इम्पोस्टर है

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