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Monday, April 19, 2010

इस्तिफित मंत्री करूर और उनके ड्राईवर के बीच की एक्सक्लूसिव बातचीत - सर, चिंता नको...

           मंत्री करूर अपना इस्तीफा देने के बाद जल्दी जल्दी मीडिया से नज़रें बचाते हुए अपनी गाड़ी में जा बैठे। ड्राईवर को कहा चलो जल्दी कहीं रोकना मत। मीडिया वालों के सामने तो कत्तई मत धीमे होना.....फर्राटे से निकलना।

    ड्राईवर ने इस्तिफित मंत्री करूर का कहना मान तो लिया लेकिन अपना टेपरिकार्डर चालू रखा।

- सर, आप के साथ बहुत बुरा हुआ। मुझे तो लगता है इस तरह अगर चलता रहा तो दुनिया से लोगों का नेकचलनी से विश्वास उठ जायगा।

- उठ जायगा मतलब, अरे उठ गया समझो कि.........कम्बख्तों ने कहीं का नहीं छोड़ा।

- नहीं सर जहाँ तक छोड़ने की बात है.......छोड़ा तो बहुत कुछ है आपके लिये...ये लकदक कपड़े, ये कार, ये फैशनेबल इमेज.....सब तो छोड़ दिये सिवाय आपके इस्तीफे के। अब क्या है न सर कि इस्तीफे का महत्तव तभी तक है जब तक वह हुआ न हो। अब हो गया तो उसका महत्व बढ़ गया है। अब सर इस महत्व बढ़ाने के कार्य में आपका भी तो योगदान है न सर।

- हाँ सो तो है.....वैसे तुम ड्राईवर बड़े पॉजिटिव किस्म के हो....नेगेटिव बात में भी कुछ न कुछ पॉजिटिव सोच रखते हो। अच्छा है।
- क्या अच्छा है सर, चंदा खुश्कर जी से न तो आप मिले होते, न आप क्रिकेट वालों से भिड़े होते और न आज यह हालत होती कि बिना बत़्ती वाली गाड़ी से चलना पड़ता। वैसे सर बत़्ती बुझने से याद आया कि महान कवि और समाज सुधारक श्री गोविंदा जी का कहना था कि खाओ, खुजाओ, बत़्ती बुझाओ। तो सर अब तो बत़्ती भी बुझ गई है, इसका मतलब आप पहले के दो मानदंड पूरे कर चुके हैं शायद।

- कौन से दो मानदंड।

- वही, खाने और खुजाने के.....उसके बाद ही तो आपकी गाड़ी की बत़्ती गुल हुई है ना सर।
- तुम हो तो ड्राईवर लेकिन बहूत दूर की सोचते हो। जरा गाड़ी रोकना तो।
- क्यों सर थोडी देर रोक लिजिये, बस अब घर पहुंचने ही वाले हैं।
- अरे मैं उसके लिये नहीं रोकवा रहा हूँ, दरअसल सामने कुछ बच्चे क्रिकेट खेल रहे हैं। जानना चाहता हूँ कि कहीं कुछ अवैध तो नहीं हो रहा।
- सर जाने दिजिए, अवैध-फवैध के चक्कर में पड़ेंगे तो बेबात के जूते पड़ेंगे और आजकल तो जूते भी क्लासिक वाले होते हैं, बेभाव के पड़ते हैं और स्वभाव से मिलते-जुलते हैं।
- अच्छा, यानि अगर मैं उनके खेल में कुछ पूछताछ करने जाउंगा तो वह लोग मुझे चलता-फिरता कर देंगे।
- सर, ये बच्चे आईपीएल वाले नहीं हैं जो कि आपसे सीधे सीधे भिड़ जांय, वह तो गल्ली क्रिकेटर हैं जो कि सीधे न भिड़कर इनडायरेक्टली भिड़ते हैं । कार के शीशे तोड़ने में और टायर से हवा निकलवाने में ये उस्ताद होते हैं।
- अच्छा, तो यहीं कैटल क्लास हैं शायद.....
       अभी ड्राईवर और इस्तिफित मंत्री करूर जी के बीच बातचीत चल ही रही थी कि एक गेंद करूर जी के कार को आ लगी और शीशा चकनाचूर हो गया। गुस्से में करूर जी कार रूकवाकर बाहर आये, सौम्य और खुशमिज़ाज सा चेहरा कठोरता की तरूणाई गाने लगा। लगे डांटने उन बच्चों को जो क्रिकेट खेल रहे थे। अभी डांटा-डांटी चल ही रही थी कि कार के सभी टायरों से सूँ सूँ की आवाज निकलनी भी शुरू हो गई। अब, ड्राईवर ने करूर जी से कहा, सर लगता है आपके डांटने से बच्चे बिदक गये हैं और उन्होंने खुन्नस में सभी टायरों को पंक्चर कर दिए है। आप किसी और साधन से चलिए तब तक मैं कार ठीक करवा कर ले आता हूँ।

      करूर जी को विश्वास नहीं हो रहा था कि यह भी दिन आ सकता है। मन मारकर करूर जी चल पड़े टैक्सी ढूँढ़ने। कोई टैक्सी वाला तैयार नहीं था, इन्कम टैक्स के छापे अभी जारी थे, मीडिया वैसे भी इस्तिफित मंत्री को कवर करने के लिए हर वक्त कैमरे सटाये रखती थी। यही सब कारण थे जो कि टैक्सी वालों द्वारा करूर जी को इन्कार में जवाब मिल रहा था। मजबूरन करूर जी को बस स्टॉप पर आना पड़ा। बगल में खड़े एक बस का इंतजार करने वाले से अक्षय कुमार की स्टाईल में पूछा

- ये छब्बीस नंबर की बस यहीं से जाती है
- सामने वाले ने कहा, क्यों क्या किसी लड़की के बटन खुले हैं यह देखने जा रहे हो ? या देख ताक कर अंत में फिट्ट है बॉस कहोगे ?
- अरे नहीं, तुम मुझे गलत समझ रहे हो.......मैं तो बस अपने घर जाना चाहता हूँ।
- तो ग्यारह नंबर की बस पकड़ लो।
- ग्यारह नंबर की बस मेरे घर के यहाँ जाती है।
- करूर जी, ग्यारह नंबर की बस वह बस है जो पूरी दुनिया में कहीं भी कैसे भी जाती है। यह यूनिवर्सल बस है।
- मतलब ?
- मतलब ये कि दो टांगों से पैदल जाने को ही ग्यारह नंबर की बस कहा जाता है। अब आप और किसी बस से तो जाएंगे नहीं, क्योंकि आपकी नज़रों में इस तरह की सवारियां कैटल क्लास की होती हैं। इसलिये आप से कह रहा हूँ कि ग्यारह नंबर पकड़िये, आपके लिए वही ठीक रहेगा।
- नहीं नहीं, मैं इतनी गर्मी में चल नहीं पाउंगा, हाँफ जाउंगा...... दरअसल मैं अपनी ज्यादातर ज़िंदगी कोल्ड प्लेसेस में गुज़ारता रहा हूँ...कोल्ड एसी, कोल्ड कार, कोल्ड रूम, कोल्ड पीना, आई मीन कोल्ड ठंडा वगैरह वगैरह....
- वह कुकुर भी ठंडक की तलाश में ही गीली जमीन पर दुबका हुआ है करूर जी। और देखिए जीभ बाहर निकाल कर हाँफ भी रहा है ताकि शीतलता ग्रहण कर सके। बताईये, यही पैमाना रहा तो इंसान और जानवर में फर्क क्या रह जाएगा। आप तो क्लास पीपल में से आते हैं... आई लाईक दिस क्लासिक फ्लेवर, आई लाईक क्लास शैंपेन, आई लाईक हाई क्लास लाईफ़स्टाईल। क्लास ढोने में ही आप लोगों की ज़िंदगी निकल जाती है। इसलिए इस तरह की बातें कहने से पहले थोड़ा सा सोच समझ लिया किजिए करूर जी। इतना भी गरूर ठीक नहीं है।

     अभी यह बातें चल ही रही थी कि करूर जी का ड्राईवर कार लेकर आ गया.......सर कार ठीक हो गई है, चलिए.....। उपर  वाले का शुक्र मनाते हुए करूर जी अपनी कार के अंदर जा समाये और लैपटॉप खोलते हुए जल्दी से ट्वीट किया –

Cattle Class is the ‘Class of the people’, who hate the ‘class’ people.


- सतीश पंचम

स्थान - वही, जहाँ पर बत़्तीयाँ बुझने को तरसती हैं।

समय - वही, जब कोई मंत्री अपना इस्तीफ़ा किसी खास नज़दीकी के कारण देकर लौट रहा हो और उसी वक्त कार में गाईड फिल्म का यह गीत बज रहा हो.......क्या से क्या हो गया....बेवफ़ा तेरे प्यार में..........

( चित्र - पिछले साल मैंने यह तस्वीरें खींची थी।  मेरे ही गाँव के कुछ बच्चे हैं जो गन्ने के खेत में रखवाली करने के साथ उन गन्नों पर हाथ भी साफ कर रहे थे,  वह तो ठहरे बच्चे...पर उनका क्या जो हमारे कर्णधार हैं)

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12 comments:

गिरिजेश राव said...

झकास.
कवि गोविन्द की जय.
मात्रा अशुद्धियों को दूर करें.

पंच लाइन तो जबरदस्त है. क्या से क्या हो गया sss
Cattle Class is the ‘Class of the people’, who hate the ‘class’ people.

...चमड़े के घर हैं और कुत्ते रखवाले हैं...

Udan Tashtari said...

इस्तिफित मंत्री -हा हा!! नया पोर्टफोलियो!

प्रवीण पाण्डेय said...

हा हा हा । आनन्द आ गया । अगले दिन की दिनचर्या भी लिखिये ।

Shiv said...

बहुत मजेदार. थोडा समय जाने दीजिये, करूर जी फिर से पुष्कर का मेला लगवाएंगे.

Pankaj Upadhyay (पंकज उपाध्याय) said...

हे हे.. वाह, क्या कहने..

Shiv said...

एक बात लिखना भूल गया. जैसे हर महान कवि और समाज सुधारक के कथन को अलग-अलग तरीके से इन्टरप्रेट किया जाता है वैसे ही महान कवि श्री गोविंदा जी के भी कथन को ड्राईवर ने गलत इन्टरप्रेट किया है. अपनी रचना में महान कवि और समाज सुधारक श्री गोविंदा कहते हैं;

"अबे हटा सावन की घटा, खाज खुजा बत्ती बुझा के सो जा, नींटुक ले पिंटुक ले, शंटी पे खड़े रयेली है अंटी, बजा रयेली है बार-बार घंटी. कुल्हा घुमा के पच्छिम को पलट ले. फुट ले, वट ले, स्याणा बन..चल."

सतीश पंचम said...

@ शिव जी,

मतलब करूर जी से बहुत सी ऐसे क्रिया कलाप आदि हैं जो छूट गये हैं :)

अब फुरसत से करूर जी वह सारी क्रियाएं दोहरा तिहरा सकते हैं जो महान कवि और समाज सुधारक श्री गोविन्दा जी के श्रीमुख से निकले हैं :)

ePandit said...

बहुत खूब, वैसे देखते हैं कि करूर जी अब भी वैसे ही क्लासिक बने रहते हैं क्या?
खैर अब वे आराम से ट्विटिया सकते हैं :-)

Sanjeet Tripathi said...

shandar, maja aa gaya

Meenu Khare said...

बहुत मज़ेदार.

मो सम कौन ? said...

मैं तेरे प्यार में क्या क्या न किया पुश कर,
जाने ये ये पी यम, जाने ये ड्राई वर।

ज्ञानदत्त पाण्डेय Gyandutt Pandey said...

कमी रह गयी! कैटलवा पर चढ़ा दिये होते! :)

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