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Saturday, April 17, 2010

सड़क....बैनर....देखो गधा मू........टन्न्....कच्चा आम...औरत का मन....शर्तिया....खट्टा......एक 'मन्नाद'....

         

     सड़क पर चला जा रहा हूँ.............सारिका साड़ी सेन्टर............महमूद गैरेज.......इंडियाना जोन्स रेस्टोरेण्ट.......सामान बेचते दुकानदार...... कोई सब्जीवाला ......... कोई फ़ल वाला........कोई पान वाला......एक मोची दिख रहा है.......कीलें ज़मीन पर गिराकर सही कील ढूँढ़ रहा है........एक गुटके का रैपर गिरा है........गोवा गुटका.......टन्न्........ मंदिर में किसी ने घंटी बजाई है........गन्ने के जूस वाले ने अपनी जूस मशीन में घुंघरू बांधे हैं.......... वही बज रहे हैं शायद..........कोई ग्राहक जूस पीने आया होगा.........बर्फ मत डालना.............ये अख़बारों की सजी धजी कतारें...........हेडलाईन में थरूर.........कोई अहम खबर है शायद............ग्लैंमर वाली खबरे पढ़ रहा है अखबार वाला........जानता नहीं........... एक शैंपेन पर ख़बरें मुलम्मेदार हो जाती हैं......पढ़ रहा होगा शिल्पा को फलां ने किस किया..........राखी को गुस्सा आया........शाहरूख बोले..........अमिताभ ने.........

  वो कौन खड़ा है.........दीवार पर तो लिखा है देखो गधा......पिशाबी गन्ध.....फ्लैक्स बैनर......नेताओं के बड़े बड़े चेहरे लगे हैं......... देख कर डर लगता है..........इन्हें ऐसी जगह पर लगे होने में शर्म....... नहीं..............बदबू खैर क्या आती होगी.............सुलभ के ठीक उपर ही तो लगा है.... हंसता हुआ नेता  का चेहरा..................................पार्टी चिन्ह भी है..........धार मारने वाले  का फोर्स उतने  उपर  क्यों  नहीं जाता.................टन्न्.......भगवान.........मंदिर में आरती शुरू हो गई है.........ओम जय जगदीश......ह.........................नगर पालिका की गाड़ी आ गई....... चोर गाड़ी आ गई.......अवैध दुकानदारी.........भाग..................समेट ............ठेलेवाले ने भागते समय टमाटर गिरा दिया .......गाय टमाटर की ओर बढ़ रही है...........पान वाला सबसे आगे भाग रहा है......बचा ले गया...........सब्जीयां चढ़ाई जा रही हैं गाड़ी पर........अंगूरी लड़ीयां बिखर गई हैं.......गज़रा बेचती औरत जल्दी कर रही है............कर्मचारी...... फुर्तीदार हैं.......... ........आईस्क्रीम वाले का खोमचा पकड़ा गया.........डिलाईट कुल्फ़ी.......गाड़ी में ठेले के चार पहिये उपर की ओर ............केले जमीन पर गिर पड़े ......... बच्चे उठा रहे हैं............सेब वाला हाथ जोड़ रहा है............लोहे की अंगुठी.......एक शनि के लिए..........एक गुरू के लिए...........मंगल फेर................सारिका साड़ी सेन्टर........दुकानदार चाय पी रहा है........अरे खीरे की टोकरी लेकर दुकान में कहाँ आ रहा है .......टोकरी ज्यादा अंदर मत रख..........उधर रखेगा तो भी चलेगा...........नहीं पकड़ेगा.........बोलो बहनजी..........कुँवर अजय वाली साड़ी कल ही आई है......दिखाऊँ...खटाउ........ पहनने में नरम रहती है.............चिंगुरेगी नहीं...........
चिंगुरेगी नहीं........नहीं नहीं.........

   ऊँ..........शांति शांति............शांति.......

( यह हैं मेरे मनकी कुछ 'मन्नादें'........यानि मन की आवाज़ें जो अक्सर चलती रहती हैं......कहती रहती हैं........कह कर भूल जाती हैं....और कभी कभी तो गूँगी भी हो जाती हैं)


- सतीश पंचम


स्थान – वही, जहाँ अक्सर नगरपालिका की गाड़ियाँ सड़क किनारे सामान बेचते खोमचे वालों, ठेलेवालों की धड़कनें बढ़ा देती हैं.......

समय – वही, जब कोई नगर पालिका की गाड़ी रेड कर रही हो और ठेले पर बिक रहा कच्चा आम कहे ......आज तो नगर पालिका के कर्मचारी के घर बेगार लिखा है..............उसकी घरवाली का मन है......... खट्टा खाने का.........

( चित्र - कबीर जी के स्थान लहरतारा ( बनारस) में बनी एक इमारत का भीतरी दृश्य है जिसे मैंने पिछले साल अपने कैमरे  में कैद किया था )

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21 comments:

मो सम कौन ? said...

हमेशा की तरह अंदर तक हिल गये हैं आपकी पोस्ट देखकर।
आपमें और गिरिजेश जी में गज़ब की साम्यता है, चीजों को गहरा देखने की और अपने भाव व्यक्त करने की।
आभार।

ई-गुरु राजीव said...

धार मारने वाले का फोर्स उतने उपर क्यों नहीं जाता..............!!!

ई-गुरु राजीव said...

बड़ी ही तेज़ धूप है यार !!

कहाँ घूम रहे हैं !!

लू लग जायेगी. :)

ई-गुरु राजीव said...

ई सारिका साडी सेंटर की दो दुकाने हैं या आप घुमते हुए वापिस लौट आये थे !
(दो बार नाम आया है, एक बार शुरू में और एक बार बीच में)

Pankaj Upadhyay (पंकज उपाध्याय) said...

:) पोस्ट करने के बाद जरूर थोडी सी शान्ति मिली होगी... थोडी देर की बस..

Mired Mirage said...

ठेलों को उठाकर ले जाने वाली पुलिस की गाड़ियाँ, ठेले भगाकर ले जाते हुए ठेलेवाले, ये दृष्य ८० से ८३ तक की मुम्बई में बहुत देखे थे। तब बाहर जाती थी, शायद इसलिए। पुराने दिनों की याद इस नई पोस्ट ने दिला दी।
घुघूती बासूती

डॉ. मनोज मिश्र said...

लेखन का एक नया अंदाज़,मस्त हुए,आभार.

सतीश पंचम said...

@ मनोज जी,

यह नया अंदाज नहीं है......बस मन की फुरकत है...कुछ कुछ इसी तरह का ऑब्जर्वेशनल पोस्ट नेशनल पार्क में से गुजरते वक्त भी लिखा था.....

http://safedghar.blogspot.com/2009/12/blog-post_08.html

@ राजीव जी,

सारिका साड़ी सेंटर के दो बार आने में मन की घुमउनी है.....वहां भी चला जाता है जहाँ कभी मैं नहीं गया होता और कभी कभी तो जहाँ जा चुका होता हूँ.....मन कभी वहां जाना नहीं चाहता......इसलिये सारिका साड़ी सेंटर एक बार या कई बार....क्या फ़र्क पड़ता है :)

@ मो सम कौन...

अरे भई गिरिजेश जी और मैं हम दोनों ही लगभग एक ही उम्र के हैं और ग्राम्य जीवन को करीब से जानते हैं......गिरिजेश जी के यहां बाउ और सिद्धर हैं तो मेरे यहां सदरू भगत और रमदेई....

समानता तो कुछ हद तक मैं भी मानता हूँ लेकिन फिर भी गिरिजेश जी की लेखनी का अपना अलग ही मजा है जहाँ लगता है कि मैं नहीं पहुंच पाउंगा.....बाउ को पढ़ने पर आप समझ सकते हैं कि कितनी शिद्दत से गिरिजेश जी उस काल का बयान करते हैं........मुझसे शायद वह न हो......

उसके लिये गिरिजेश ही होना पड़ता है और गिरिजेश ही लिख सकते हैं ऐसी शानदार रचना।

Udan Tashtari said...

मन्नादों की नाद...बड़ी जोर की गूँजी भाई..जय हो ऐसी लेखनी को!!

गिरिजेश राव said...

बहुत खूब! अपनी बिना विराम वाली कविताएं अौर झिरी से झांकने वाली पोस्ट याद अा गईं। लेकिन यह तो खासमखास ट्रीटमेन्ट है - बेजोड़।

संजय जी, इनकी विनम्रता पर न जाइए। इनकी लेखनी का रंग इस बारात वर्णन में देखिए - अतुलनीय।
http://safedghar.blogspot.com/2009/06/blog-post_19.html

अब खिसकता हूं यहां से - अाप लोगों ने कुछ अधिक ही तारीफ कर दी है।
इतना मान देने के लिए धन्यवाद।

Vivek Rastogi said...

ऊँ..........शांति शांति............शांति...

मुनीश ( munish ) said...

nice collage , very credible n' colourful indeed .

सुमन'मीत' said...

मन की बातें काफी कुछ कह गई

Arvind Mishra said...

झन्नाटेदार अंतर्नाद

अभय तिवारी said...

बहुत सुन्दर!

मो सम कौन ? said...

मुझे जैसा लगा, वैसा लिख दिया। सतीश जी और गिरिजेश जी, आप दोनों ही एक से बढ़कर एक हैं।
एक की तारीफ़ को दोनों की तारीफ़ ही समझना जी।

बहुत पहले से ही मेरी याहू मेल पर ’पेटीपैक’सब्स्क्राईब थी, अत: सतीश जी के सारे पात्रों से व सभी पोस्ट्स से पूर्वपरिचित हूं।
और गिरिजेश जी, आप खिसक पायेंगे क्या? कोशिश कर देखिये।
मुश्किल से तो पकड़ में आने शुरू हुये हैं आप लोग, हम नहीं छोड़ने वाले हैं।

प्रवीण पाण्डेय said...

मन की फुरकन भा गयी ।

अनूप शुक्ल said...

गजनट कोलाज!

वन्दना अवस्थी दुबे said...

शानदार पोस्ट.

भारतीय नागरिक - Indian Citizen said...

धार मारने वाले का फोर्स उतने उपर क्यों नहीं जाता..

यही सबसे अधिक बढ़िया है..

बी एस पाबला said...

दे दनादन...

फोटो ब्लॉग 'Thoughts of a Lens'

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A Photo from - Thoughts of a Lens

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