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Sunday, April 11, 2010

और मेरे मित्र ने मुंबई को हमेशा के लिए छोड़ दिया...............सतीश पंचम

  

        वैधानिक चेतावनी : इस पोस्ट में कुछ शब्द अश्लील हैं इसलिए उन्हें तारांकित कर पेश कर रहा हूँ। यार दोस्तों के बीच ऐसी ही बातें होती हैं इसलिये शाब्दिक पवित्रता के आग्रही, इस पोस्ट में किसी अश्लीलता के आने पर थोड़ा बख़्श दें :)
    
       कल शाम जब अभय तिवारी जी के यहाँ से लौट रहा था तो ट्रेन में ही मेरी पिछली कंपनी में काम कर चुका मेरा एक पुराना साथी 'बापी'  मिल गया। हाय हैलो होने के बाद हम दोनों में बतकौवल शुरू हुई। कहाँ कैसे से बात शुरू हुई और बातें खुलती गईं। फिलहाल बापी के ही शब्द मैं उसकी ही स्टाईल में लिख रहा हूँ। यार दोस्तों के बीच जो बेतक्कल्लुफ हो कर बातें होती हैं कुछ वही अंदाज है………. बंबईया बोली………बंबईया मिजाज :) 

- मैं तो बॉम्बे छोड़ रहा हूँ यार। कल ओड़ीसा जा रहा हूँ हमेशा के वास्ते।

- क्यों, क्या बात है ?
- बात कुछ नई रे, बस सोच लिया कि नई रेहने का तो  नई रहने का।

- अरे, तो कुछ तो हुआ होगा कि ऐसे ही निकल रहा है।

- अरे वो क्या है कि मेरा माँ पिताजी गाँव में है, अबी वो लोग का उमर भी हो रहेला है, तो क्या कोई उधर भी देखने को मांगता कि नईं।

- लेकिन तू करेगा क्या उधर जा के।

- करने को तो सोच लिया कि अबी खुद का कुछ करना मांगता…..बेहनचो* बोत तेल लगा लिया……..बस्स ।

- अबे, लेकिन करेगा मतलब………….. क्या करेगा। कुछ कैलकुलेशन तो किया होगा। कुछ तो सोचा होगा।

- देख, सोचने का क्या है कि पिछला मेना (महिना) से मैं सोच रहा था कि मैं इदर बांबे में किसके लिये इतना सुबे से शाम तक मरवा रहा हूँ…….साला अकेला के लिये तो अपना ओड़ीसा में बी उतना ही कमा के रेह सकता हूँ। फिर काएको दूसरे के लव* को तेल बील लगाते बैठने का।

-हाँ लेकिन कुछ आगे पीछे सोच के ही डिसिजन लिया है ना।

- हा रे, वो क्या - कि मैं सोचा ये प्राईवेट नौकरी करके कितना तक कमा सकता हूँ…..साला एक तारीक को जेब फुल्ल तीस तारीक को खाली…….इसकी मां की कितना भी करो, दोडो बीडो……..तेल लगाओ……बैंचो* वही उदर का उदर। इदर साला साठ क्रॉस होएंगा तो बेनचो* गाँ* पे लात मार के निकालेगा…….औऱ अपना प्राईबेट बिरबेट में पेंशन बिंशन भी नई है। जो है वो कितना है, साला नाम का वास्ते है। है कि नहीं ?

- हाँ वो तो है। लेकिन बिजनेस कर पाएगा क्या ?

- अरे करने का क्या है। इदर साला दूसरे के लिए काम करता था उदर जाके खुद के लिए काम करेगा……किसी का आगे हाथ बांद के तो खड़ा नहीं रहेगा ना। और अबी क्या है अबी मेरा मा पिताजी का हाथ पैर चलता है, थोडा बहुत हेल्प बिल्प लेकरके अपना एक छोटा बिसनेस ट्रेडिंग का करेगा…….ईधर एक्सपोर्ट इम्पोर्ट करता था उदर ओड़ीसा में जाके लोकल लेवल पे करेगा……अपना कुछ पुराना एक्सिपिरिएंस पे अक्कल बिक्कल लगाके चालू करने का सोचा है। क्या होगा ज्यादा से ज्यादा…..एक साल….दो साल लगेगा जमने में लेकिन धीरे धीरे खुद का तो कुछ कर लेगा कि नईं।

hmm..........

-अबी क्या है कि गाँव में मैं साठ साल के बाद अगर जाएगा तो कोई साला पैचानेगा बी नईं। अरे अबी गाँव जाता हूँ तो सबके बताना पड़ता है कि अरे मैं उनका लड़का हूँ। साठ के बाद जाएगा तो क्या कोई घण्टा पैचानेगा। और फिर बिजनेस में क्या है कि तू मैला कपड़ा बी पहन के बैठ, तेरे पास पैसा है तो चार लोग सलाम ठोक के जाएगा…..इदर साला नौकरी मैं टाई बीई लगा के रहता है पन जेब में देखेगा तो पूरा फुक्कस, एकदम एम्टी ।

-  हां नौकरी में  तो यही हाल है, साला कितना भी करो…….पूरा ही नहीं पड़ता।

- अबी उदर मेरा मां पिताजी तीन-एक साल से बोल रहेला था कि इदर आ के रैह, हमारे को भी हेल्प हो जाएगा और तू भी कुछ सेटल हो जाएगा…..लेकिन मेरा गां*मस्ती………नईं इदरइच रहने का है। इदरइच सब करने का है। अरे क्या उखाड़ लिया मैं इदर रै के…….। उदर गाँव में देखता हूँ तो साला मेरा दोस लोग जो किसी  का लाइक नईं वो लोग फोर वीलर रखता है और आराम से कम ज्यादा कुछ ना कुछ कमा बी रहा है और इदर मैं साला रोज ट्रेन ब्रिन में चढ बिढ के लटक बिटक के जा रहा है……साला मेरे से जास्ती तो वो लोग का लाईफ हैप्पी है। फिर इदर काएको मरवाने का।…………. यई सब सोच के ये डिसिजन लिया अउर पिछला बोत दिन से दिमाग में ये चल रहा था………… अबी सोच लिया कि थोडा ही लगाउंगा पहले, थोडा जम जाउंगा तो आगे हाथ बढ़ाउंगा….।   अबी इस एज में कुछ कर लिया तो ठीक है हमेशा का वास्ते अच्छा हो जाएगा……बाद में उमर बीतने पे ये सब नईं हो सकता……..और खाली सोचते बैठेगा कि एक दिन मेरे पास पइसा आएगा तब मैं कुछ करेगा तो अइसा तो नईं होने वाला……बेंनचो*  कितना भी मरवाते रहो। हइ कि नईं। और नौकरी का क्या है दो साल चार साल बाद बी अगर नईं चला तो अपना एक्सपिरियंस पे फिर से लग सकता है लेकिन अबी अगर ये एज में कुछ खुद का नईं किया तो बेनचो* किदर का नईं रहेगा…….ना गाँव वाला पैचानेगा ना बेन भाई……… अउर माँ पिताजी तो कबसे बोल रहेला था कि क्या इदर ओड़ीसा में सब भूखा मर रहेला है क्या…….अरे मटन चिकन नईं तो नईं कम से कम घास तो मिलेगा………उस्से ही काम चलाने का………थोडा कम कमाएगा लेकिन बेनचो* जिंदगी तो हैप्पी होएगा………..लाईफ तो सेटल होएगा…….…हई कि नईं।

 अबी कल सुबे का ट्रेन है जाता हूँ पैकिग बिकिंग करने का है………….

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          मैं बापी की बातों से थोड़ा हतप्रभ हूँ, थोड़ा रोमांचित भी…….सोच रहा हूँ कि बापी ने कितना सही डिसीज़न लिया है या  कितना गलत। बहुत संभव है कि बापी अब मुंबई न आए । सोचता हूँ कि शायद हर माईग्रेटेड की यही स्थिति है। उसके मन में भी यह बातें आती होंगी कि अपने गाँव, घर के आसपास ही अपनी जिंदगी की चहल पहल  बनाये रखे। विदेशों में काम करने वाले को लगता होगा कि वह भारत आ जाय…….यहीं कुछ कर ले, और यहाँ भारत के किसी शहरी को लगता होगा कि वह गृहजिले या गाँव लौट जाय, वहीं कुछ कर ले, और गाँव में रह रहे लोगों को लगता है कि जरा शहर चला जाय। कुछ पैसे कमाये जांय। हो सके तो दिल्ली कलकत्ता चला जाय……वहां से विदेश……….यह चक्र तो चलता ही रहता है ।
    
       लेकिन एक रिवर्स माईग्रेशन को अपनी आँखों से देखने का सूकून कुछ अलग ही ताज़गी दे रहा है मुझे। बापी के लिये मेरी शुभकामनाएं है।  आज सुबह पोस्ट लिखते वक्त शायद बापी प्लेटफॉर्म पर पहुँच चुका होगा। बापी की सोच और उसके जज्बे को सलाम। न जाने बापी जैसी हिम्मत मुझमें कब आएगी………..शायद न भी आए………..अकेले होने और परिवार वाला होने पर डिसीजन मेकिंग में फर्क जो होता है।

-  सतीश पंचम

स्थान – वही, जहाँ से बापी लौट कर वापस उड़ीसा जा रहा है हमेशा के लिए।

समय – वही, जब बापी ट्रेन में चढ चुका हो, ट्रेन चलने को हो और तभी बापी को  अपने मोबाईल के डिस्प्ले  पर कॉल आता दिखे………CUTTACK   CALLING………….

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23 comments:

गिरिजेश राव said...

सेंटी नहीं होने का ! क्या !!
अपने गाँव वाले भी गाँ* पर लात मारे बिना नइ छोड़ते ! इस्टैल अलग होता है। हाय हाय करते बी नइ बनता।

Suman said...

nice

Arvind Mishra said...

गिरिजेश की बात गाँठ बाधने की

मो सम कौन ? said...

सतीश साहब, बापी की बातों में दम है। मजा आ गया पढ़्कर। ट्रेन की डेली पैसेंजर, दोस्तों की बिंदास बातें सब याद आ गई हमें भी।
लेकिन गिरिजेश साहब की टिप्पणी ने तो दम ही निकाल लिया।
बहुत अच्छा लगा।
आभार।

सतीश पंचम said...

गिरिजेश जी की बात को अच्छी तरह समझ रहा हूँ.....गाँव में भी कम उत्पात नहीं है....वहाँ पर भी तमाम खर्चे रहते हैं.....तमाम उठाव पठाव लगा रहता है......औऱ फिर बापी जैसा डिसिजन लेने के लिये उसका अकेले होना भी शायद उसका प्लस प्वांईट है। बच्चे कच्चे हो जाने पर इस तरह का हार्ड कोर डिसिजन........ना भई....अपने से तो यह नहीं होने वाला शायद।

और गिरिजेश जी ने तो खुल कर कह ही दिया है कि - अपने गाँव वाले भी गाँ* पर लात मारे बिना नइ छोड़ते ! इस्टैल अलग होता है। हाय हाय करते बी नइ बनता :)

Dinesh Saroj said...

हर जगह की अपनी-अपनी सुविधा एवं दिक्कतें होती हैं, कोई भी जगह अच्छी या बुरी नहीं होती, बस हमारा नजरिया अलग-अलग होता है|

दुनिया के किसी भी कोने में जा बसें अगर नजरिया सही नहीं है तो बस वहां से तुरंत ही भागने को जी तड़पने लगेगा... चुनौतियों से भागने से कोई हल नहीं निकालता, चुनौतियाँ तो सर्वोपरि है, उन्हें सुलझाने से हर राह आसन हो जाती है... उपर्युक्त मुद्दा तो सहज है, महानगरों में तो हर किसी का यही हाल है...

हिमांशु । Himanshu said...

"अकेले होने और परिवार वाला होने पर डिसीजन मेकिंग में फर्क जो होता है।"
हाँ, ये बात है जो फर्क पैदा करती है !
शानदार पोस्ट !

अनूप शुक्ल said...

बापी पुराण बांच कर सुबह की शुरुआत हुई। लात तो हर जगह मौजूद रहती है। पड़ ही जाती है किसी न किसी बहाने! :)

मुनीश ( munish ) said...

अधिकाँश समस्याओं का मूल 'अर्थ' है . अर्थोपार्जन के साधनों को देश भर में विकेन्द्रित किये बिना गांड-पदाघात से मुक्ति नहीं . अच्छा कहा .

Udan Tashtari said...

जरा देखना...छः महिने में वापस मुम्बई में न नजर आये बापी..यहाँ से भी हम तमन्ना पाले कई बार लौटे और फिर ट्प्पा खा कर वापस. ये जिन्दगी एइसाइच है रे!! बोले तो गोल गोल!!

बी एस पाबला said...

गाँव में मैं साठ साल के बाद अगर जाएगा तो कोई साला पैचानेगा बी नईं। अरे अबी गाँव जाता हूँ तो सबके बताना पड़ता है कि अरे मैं उनका लड़का हूँ। साठ के बाद जाएगा तो क्या कोई घण्टा पैचानेगा।

ये कसमसाहट तो रह्ती है

रही बात कि लात तो हर जगह मौजूद रहती है। पड़ ही जाती है तो भई यह तो चाहने वाले पर निर्भर है कि वह मरवाना चाहता है क्या? :-)

ज्ञानदत्त पाण्डेय Gyandutt Pandey said...

मां*** ब*** अपार्ट, ये बापी हम सा ही सोच रेला है।

डॉ. मनोज मिश्र said...

वाह,अद्भुत वार्ता-चित्रण.

प्रवीण पाण्डेय said...

सोच में दम है । उसका प्रश्न था और उसने उसका उत्तर ढूढ़ने का सच्चा प्रयास किया । कटक को लाभ होगा ।

Indian The Great people said...

Kuchh sal pahle ham bhi socha karte the ki bahr jakar kuchh better karna hai but metros ka life to god knows very hards now we are maintiang our own work with little earning, me happy to bapi`s decision, Bhai seedha hai, jahan jagah mile wahan settle karo time weast nahi hona chahiye, bas..................

दिनेशराय द्विवेदी Dineshrai Dwivedi said...

पलायन तो जगत का नियम है। मनुष्य को ही नहीं किसकी भी जंतु को इस से छुटकारा नहीं है। मेरे तो परिवार का इतिहास रहा है कि हर दूसरी पीढ़ी ने स्थान छोड़ दिया है। जो पीछे रह गए वे मिट गए। चार पीढ़ी पहले परिवार कहाँ था यह तो किसी को याद तक नहीं।

डॉ महेश सिन्हा said...

हिम्मत तो जुटाई बापि ने
रिर्वस migration भी जरूरी है

Vivek Rastogi said...

अपुन भी कुछ बापी की माफ़िक ही सोचरेला है और शायद जल्दी ही उस पर अमल भी करीच डालेगा। भौत हो गया गां*घिसाई।

ई-गुरु राजीव said...

आदमी जितनी जल्दी सैटल हो जाय उतना ही अच्छा है, बापी को अभी देर नहीं हुई है, जो भी होता है अच्छे के लिए ही होता है. आखिर उसे माँ-बाप मिल गए और माँ-बाप को बापी. :)

डॉ .अनुराग said...

लात के लिए सुरक्षा टोकरी पैदा होते ही बाँध दी जाती है ...या कोलेज से पास होते ही....सो बापी से कहिये स्टोक रखे

Pankaj Upadhyay (पंकज उपाध्याय) said...

ये ख्याल बडे कामन है साहब.. मेरे कुछ दोस्त रेजिगनेशन देकर अपना कुछ करने के लिये लखनऊ वापस चले गये.. अभी तक कुछ खास नही कर पाया लेकिन लगा हुआ है.. बस शायद अब जो आक्सीजन लेता है वो काफ़ी काफ़ी अपनी है.. दोस्त जी तो चुराते होगे.. बिना पैसो के इन्सान से सब जी चुराते है..

मेरा भी मन करता है कि भाग जाऊ.. पर एक डर रहता है.. हार गया तो.. नही भी हारा तो घरवालो के कई सपनो को हरा दूगा.. :(

इसीलिये देखिये शायद कभी..

anitakumar said...

विचारणीय पोस्ट्। बापी जैसे हिम्मती लोग और हो गये तो?

मसिजीवी said...

इससे कुछ छोटे स्‍तर का शानदार रिवर्स माइग्रेशन दिल्‍ली विश्‍वविद्यालय में होता था पता नहीं अब परंपरा का क्‍या हाल है- अपने चारों अटैंप्‍ट एक्‍ज्‍हास्‍ट कर चुका कोई सिविल सेवा का एस्‍परेंट जब हमेशा के लिए वापस घर का रुख करते था तो इसी मॉं***/ बै*** इस्‍टाइल में उसके साथी उसे विदा करने स्‍टे
शन तक जाते थे...हैप्‍पी रिटायर्ड लाइफ की शुभकामनाएं तथा वापसी में ये मूल्‍यांकन कि ठीक किया कि नहीं।

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