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Saturday, April 10, 2010

ख़बरों में आज का यह दौर है कि.........ज़रा रूको भी.......मुंह उस तरफ़ फेर लेने दो.........सतीश पंचम



'ख़बरनवीसी' का है ये आलम,
शहीदों के घर था मातम
रो रही थी संगिनी,
रो रहे थे बच्चे
मईया बिलख रही थी,
गईया भी चुप खडी थी
थी देहरी भी सूनी-सूनी,
रस्ते भी चुप पडे थे

और

ख़बरें चल रही थीं
बहुत तेज़ चल रही थीं
कुछ दौड़ रही थीं
कुछ हाँफ रही थी

सेहरा कब बँधेगा,
डोली कब उठेगी,
शहनाई कब बजेगी
मिठाई कब बँटेगी,
अहा सानिया, आहा शोएब,
आहा जि़दगी

पूछा जो हमने उनसे कि
'यह' कैसा 'दस्तूर' है
सदमें में है सारा आलम
और ख़बरों में 'फितूर' है

कहने लगे पलटकर
अरे 'यह',
 
'यह' तो 'ग़ज़क़' है ।

 
ख़बरनवीसी = ख़बरें देना, रिपोर्टिंग
          ग़ज़क़ = वह चीज जो शराब पीने के बाद मुँह का स्वाद बदलने के लिये खाई जाती है।
 

- सतीश पंचम

स्थान – वही, जहाँ पर कहते हैं कि सितारे जमीं पर रोज़ उतरते हैं।

समय– वही, जब रात में जमीं पर उतरे सितारे सुबह देर तक मुँह ढँपे रहने पर अखरते हैं।

********************

11 comments:

Vivek Rastogi said...

तमाचा है यह इस व्यवस्था को

Arvind Mishra said...

ऐसे ही विपर्ययों के आदी हैं हम

गिरिजेश राव said...

'पंच' कविता।
सारे नरेशन के बाद जब अंतिम वाक्य में 'ग़ज़क़' आता है तो अर्थों का अम्बार सा खुल जाता है। पाठक स्तब्ध रह जाता है और फिर धीरे धीरे तीव्रता पकड़ता है प्रश्न जनित कोलाहल ...देर तक खदबदाता रहता है।

डॉ. मनोज मिश्र said...

पूछा जो हमने उनसे कि
'यह' कैसा 'दस्तूर' है
सदमें में है सारा आलम
और ख़बरों में 'फितूर' है

कहने लगे पलटकर
अरे 'यह',

'यह' तो 'ग़ज़क़' है ।...
गजब ,बेहतरीन,आपनें तमाचा मार दिया.

मनोज कुमार said...

बहुत अच्छी प्रस्तुति।
इसे 11.04.10 की चर्चा मंच (सुबह ०६ बजे) में शामिल किया गया है।
http://charchamanch.blogspot.com/

Udan Tashtari said...

जबरदस्त रचना!

Udan Tashtari said...

गजक उसे भी कहते हैं यह आज जाना! आभार!

प्रवीण पाण्डेय said...

इस दुनिया की खबर देते देते अपनी बेखबर दुनिया बसा ली है ।

ज्ञानदत्त पाण्डेय Gyandutt Pandey said...

गज़ब चीज़ है यह गज़क भी!

वन्दना said...

बहुत ही ज़बर्दस्त तमाचा जडा है…………………।करारा जवाब्…………उम्दा लेखन्।

Shekhar kumawat said...

sahi he


bahut khub

http://kavyawani.blogspot.com/

shekhar kumawat

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