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Friday, April 2, 2010

देसी मोरनी की शादी विदेशी मुर्गे से तय क्या हुई कुकड खाँ 'हुल्ल' की ट्रैक टू डिप्लोमेसी परवान चढने लगी है........सतीश पंचम

          इधर  मोरनी की शादी एक विदेशी मुर्गे से तय होते ही दोनों पक्षों में गजब की खदबदाहट चल रही है।  मुर्गा पक्ष के लोग खुश हैं कि इसी बहाने हम मोरनी पा गये वहीं मोरनी पक्ष के लोग इसलिये खुश हैं कि उन्हें एक इंटरनेशनल कोलेबरेशन का हिस्सा बनने का मौका मिल रहा है। लेकिन मोर पक्ष के कुछ तथाकथित महान शुभचिंतकों का  कहना है कि हमारी बिरादरी के लोग क्या मर गये हैं जो मोरनी की शादी एक विदेशी मुर्गे से करवाई जा रही है। हम यह हरगिज नहीं होने देंगे। यह देश के स्वाभिमान का प्रश्न है। 

      आज जाकर पता चला कि देश का स्वाभिमान एक मोरनी की शादी वाले खूँटे से बंधा था और हम उसे महान वीरों, सपूतो और कर्णधारों  के आस पास ढूँढ रहे थे। स्वाभिमान मिले तो कैसे।

     
    उधर मुर्गा पक्ष के लोग मोरनी से शादी तय होने की बात पर ऐसे उछल रहे हैं मानों जग जीत लिया हो। उन्हें पहले तो विश्वास ही नहीं हो रहा कि उनका फाजिल मुर्गा कभी किसी मोरनी को भी फांस सकता है। मुर्गे के चचा कुकड खाँ ‘हुल्ल’ का कहना था कि जिस दिन मेरे मुर्गे का मोरनी से निकाह हुआ, उस दिन मैं मारे खुशफहमी के बांग देना ही भूल गया। इस चक्कर में कुछ कौवे जो कि बर्फ पिघलने के बाद एकदम तडके ही बार्डर क्रास करने वाले थे, वह लोग मेरी बांग न देने के कारण उठ नहीं पाये और उजाला हो गया। दो कौवे तो मोरनी के गाँव वालों के हत्थे चढ गये।
  
     बचे हुए कौवे वापस आ कर उसी इलाके में फिर छुप-छुपा गये। थोडी देर में जब मैं वहां से गुजरा तो एक ने मुझ पर अपनी  चप्पल फेंक दी। बताओ यह भी कोई बात हुई। अरे मुझे क्या पता था कि कश्मीर की एक हजार साला जंग मेरी बांग के भरोसे लडी जा रही है।  बांग न हुआ बिगुल हो गया……..
   
    कुकड खाँ ‘हुल्ल’ की बातें सुन पडोस में रहने वाली कुकडी बेगम ‘सिटका’ बोल पडीं – अरे तुम बांग देने की बात करते हो, मैं तो उस दिन मारे खुशफहमी के अंडा देना ही भूल गई। जब याद आई,  तो मैं चल पडी अपने दडबे में अंडा देने……जाकर क्या देखती हूँ मेरे मिंयां अपने पिछवाडे पर झाडू फैलाकर बांध रहे हैं। बताओ, इसके आगे भी कोई खुशफैल हो सकता है भला।
   
      बहुत देर से चुप बैठा मुर्गा ‘मशकी’ खाँ भी बहस में शामिल होते हुए बोला – लेकिन एक बात है बेगम ‘सिटका’। मोरनी जब ब्याह कर आएगी तो अपनी आदत के मुताबिक पंख फैला कर नाचेगी जरूर। और किसीका पंख उठाकर नाचना हम लोगों की बिरादरी में ठीक नहीं माना जाता। पैर का ज्यादातर हिस्सा दिखता है। तुम क्या कहती हो इस बारे में।
     
     कुकडी बेगम ‘सिटका’ को मशकी मुर्गे की बात से कुछ खटका हुआ। समझ गईं कि जब मोरनी मुर्गा मोहल्ले में आकर पंख उठाकर नाचना शुरू करेगी तो सारा बदन दिखेगा। ऐसे में लश्कर-ए-कौवा तो उसकी जान लेने पर तुल जाएंगा।
   
     उधर मोरनी ने अपने मुहल्ले में विवाह का विरोध करने वालों के लिये सांत्वना देने वाला बयान दिया कि वह भले ही विदेशी मुर्गे से ब्याही जा रही है, लेकिन जब बारिश का मौसम आएगा तो वह जरूर अपने मोर प्रजाति का प्रतिनिधित्व करेगी और पंख उठाकर नाचेगी। मोरनी की इस बात पर कई लोगों को विश्वास नहीं हो रहा था। उनका कहना था कि यह कैसे हो सकता है। जब बारिश आती है तो मुर्गे हमेशा अपने दडबों में रहते हैं और मोरनी बारिश में नाचती है। यह विपरीत ध्रुवों का मिलन है। नहीं, यह शादी नहीं हो सकती।  इसमें जरूर कोई अंतरर्राष्ट्रीय साजिश है।
    
      उधर कई और लोग थे जोकि मोरनी के इस विवाह से कुछ ज्यादा ही आहत महसूस कर रहे थे।  मोरनी के पोस्टर वगैरह बनाकर उसे जला रहे थे। उनका कहना था कि क्या हमारे मुहल्ले के लोग मर गये हैं जो मुर्गे और कौवों से यारी गाँठी जा रही है।  और हमने तो यह तक सुना है कि मुर्गा पहले से ही शादीशुदा है।  हम यह शादी नहीं होने देंगे। यह रवायत के खिलाफ है।  
      
     अभी यह सब नाटक चल ही रहा था कि तब तक दोनों ओर से वीजा के आवेदन आने शुरू हो गये। मोर मुहल्ला और मुर्गमोहल्ला के बीच वीजा लेन वाले लोगों की संख्या बढ जाने से शामियाने तान कर सरकारी अफसर दिन रात इसी काम में लगे थे कि सबको समय पर वीजा मिल जाय। उन अफसरों के  हिसाब से यह दोस्ती की एक ट्रैक टू डिप्लोमैसी है जिसे दोनों मुल्कों के बीच खुशहाली और अमन के लिये बिछाया जा रहा है। और वैसे भी शादियों में जब तक कोई रूठे ना, कोई मनाए ना, तब तक वह शादी अधूरी अधूरी सी लगती है। आखिर यह विरोध करने वाले तो उसी रस्म की अदायगी कर रहे हैं। 

     इधर मोरनी और मुर्गा आपस में गीत गाए जा रहे थे -

अब चाहे सर फूटे या माथा मैने तेरी बांह पकड ली
अब चाहे घर छूटे या सखियां
अब चाहे रब रूठे या दुनिया यारा मैंने तो हां कर दी……

- सतीश पंचम

 स्थान – वही, जहाँ असल मोरनी देखने के लिये चिडियाघर जाना पडता है।

समय – वही, जब बर्फ पिघलने के कारण कौवे बार्डर क्रॉस करने को हों और कौवों का सरगना कहे …… अपन तो रह गये कौवे के कौवे,  मोरनी को तो मुर्गा ले उडा और हम साले रॉ और ISI मार्क रॉकेट लांचर कंधे पर रख   बर्फ पिघलवा रहे हैं............थू है ऐसी जिंदगी पर  :)




16 comments:

गिरिजेश राव said...

ग़जब भैया ग़जब !
सब कुछ उघार दिया - मोर, कौवा और मुर्ग खानदानों के बहाने। लेकिन अभी बारिश आने में देर है। तब तक मोरनी मुर्गों की रवायत सीख लेगी और नाचना भूल कर बगियाने लगेगी।
लुप्त होते गौरैया खानदान (वही जो दारू सलाम की लड़ाई में घाटी से खदेड़ दिए गए और अब उन घोंसलों में रह रहे हैं जिन्हें पुनर्वास कहा जाता है।) के बारे में अडेंडम की दरकार है।

ज्ञानदत्त पाण्डेय Gyandutt Pandey said...

भोलुआ टम्पू वाले का रिकार्ड रोज चिंचियाता है - सानिया कट नथुनिया जान मारेला!

अब बन्द कर देगा यह गाना भगवान के लिये! :)

Arvind Mishra said...

कुछ भी नहीं छोड़ा -कहीं मुर्गी हलाल न हो जाय या फिर कुड़क न हो जाय !

Arvind Mishra said...

कुछ भी नहीं छोड़ा -कहीं मुर्गी हलाल न हो जाय या फिर कुड़क न हो जाय !

Satish Pancham said...

@ सानिया कट नथुनिया.....

वाह, लिखने वाले ने गजब की शब्द रचना की है :)

ऐसे गीतकार को'ब्लॉग भरोसे हिंदू होटल' की ओर से दू गो पान और एक पांच रूपिया हरियर नोट इनाम दिया जाता है :)

Dinesh Saroj said...

वाह भई मोरनी और मुर्गे कि क्या जुगलबंदी राचाई है आपने.... वाकई हृदय प्रफुल्लीत हो उठा...

पर सवाल अब भी है कि मोरनी और मुर्गे क क्या मेल..... मुर्गे कि तो चाल पदी पार मोरनी को भला क्या हुआ ....
कुछ महिने पहले एक मोर मिला तो था पर शायद भाया नही तो मुर्गे के फेर में पड गायी होगी शायद....
खैर इतनी आजादी तो हिंदुस्तान का नागरिक होने पर मिल ही जाता है.... मर्जी मोरनी कि.....

Shiv Kumar Mishra said...

कमाल की पोस्ट.

"ट्रैक टू डिप्लोमैसी.."

यह क्या इसलिए कि मोरनी और मुर्गा दोनों स्पोर्ट्स वाले हैं और ट्रैकशूट से लैस रहते हैं?

Satish Pancham said...

@ ट्रैक टू डिप्लोमेसी..... क्या इसलिए कि मोरनी और मुर्गा दोनों स्पोर्ट्स वाले हैं और ट्रैकशूट से लैस रहते हैं?

देखिये 'सानिया कट नथुनिया' से 'ट्रैकसूट' वाले ट्रैक टू तक कितने जबर्दस्त कॉन्सेप्ट मिल रहे हैं :)

VICHAAR SHOONYA said...

behtarin. bahut gahrai se socha hai apne. maja aa gaya padh kar. sath is sath apka khud ka parichay bhi behad shandar laga.

Anil Pusadkar said...

gazab kar diya,desi-videsi,murga-morani,chhaa gaye ji.

Dr D.P Rana said...

बहुत ही शानदार !! वाह , आपका क्या कहना, थु: है एसी जिन्दगीपर बिल्कुल ठीक कहा है आपने,

दिल मिलाओ , गले मिलो , शादी करो , .................. भले ही वो यहां आकर हमे मारे, विस्फ़ोट करे, बेगुनाओ को मारे, एक जवान को मारे, भले ही एक जवान सारी रात बोर्डर पर बर्फ़ मे सीना तान कर खड़ा रहे और सीने पर गोली खाए, बसें चलती रहे, समझोता एक्सप्रैस चलती रहे , और उसमे भारतीय नकली नोट आते रहे । फ़िर भी हाथ मिलाते रहो, उनकी शादी करते रहो . वाह!!!! क्या बात है

ajit gupta said...

मुझे तो यह मुर्गा भी नहीं लग रहा है, मुर्गा तो कलंगी वाला, अकड़कर चलता है। यह तो चमगादड़ टाइप का मामला है। उल्‍टा लटका हुआ है।

मुनीश ( munish ) said...

शरद जोशी की याद आ गयी . टक्कर की बात है. . बने रहो भाई . ग़ज़ब ढाते हो , क्या खाते हो ?

rashmi ravija said...

क्या बात है....सब कुछ ही लिख दिया पर अलग ही रंग में...कमाल की पोस्ट

Ashok Pandey said...

अब देखना यह है कि मुर्गे से शादी के बाद मोरनी मोरनी ही रहती है या मुर्गी बन जाती है।

anitakumar said...

excellent

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