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Wednesday, March 24, 2010

चहबच्ची......इसराफील........और मैं ..............सतीश पंचम



चहबच्ची                                  

वो चहबच्ची अब कहां से खोद लाउं
छिपाये जिसमें थे दिन अमनों- सूकून के
अब तो वह जमीन भी बंट चुकी है
नपी है चहबच्ची भी जमकर जरीब से


**चहबच्ची = जमीन में गड्ढा खोद कर उसमें कुछ छिपाने वाली जगह

**जरीब =  जमीन की पैमाईश हेतु  लोहे की जंजीर

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इसराफील 



सुना है मैंने
कि कयामत के दिन इसराफील इक बिगुल बजायेगा
उफ्
तुम  ये शोख अदाएं लिये क्यूँ चली आईं मेरे करीब
वो देखो
बिगुल बजने लगा है


** इसराफील = इस्लामी मान्यताओं के अनुसार इसराफील ( ईश्वरीय चरित्र ) कयामत वाले दिन एक बिगुल बजायेगा।

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 ( 'चहबच्ची' वाली लाईनें भारत पाक बंटवारे पर बनी फिल्म पिंजर देखने के बाद लिखीं थी। बहुत अच्छी लगी थी पिंजर।  'इसराफील' की  यह चंद पंक्तिया मैंने अपने कॉलेजीय जीवनकाल में लिखी थी, आज सोचा अपने चंद उर्दू आशार (देवनागरी में ही)  आप सबके सामने पेश करूँ :)


- सतीश पंचम

स्थान - वही, जहां कंक्रीट बिछने के कारण चहबच्ची नहीं खोद सकते।


समय - वही, जब इसराफील कयामत के आने का संदेश देता बिगुल बजाने को हो और उसी वक्त ईश्वर कहे, ठहरो...... कोई और भी आ रहा है, कयामत उसके बाद आएगी :)

15 comments:

अविनाश वाचस्पति said...

बखूबी खूब कही है
पंचम सुर महक रहे हैं

कृष्ण मुरारी प्रसाद said...

इस तरह के पोस्ट बचपन की याद दिलाते हैं.....
.......
विलुप्त होती... नानी-दादी की बुझौअल, बुझौलिया, पहेलियाँ....बूझो तो जाने....
.........
http://laddoospeaks.blogspot.com/2010/03/blog-post_23.html
लड्डू बोलता है ....इंजीनियर के दिल से....

Udan Tashtari said...

वाह!! बहुत खूब कहा.

पिंजर तो जितनी बार देखते हैं, और ज्यादा पसंदीदा हो जाती है.

-

हिन्दी में विशिष्ट लेखन का आपका योगदान सराहनीय है. आपको साधुवाद!!

लेखन के साथ साथ प्रतिभा प्रोत्साहन हेतु टिप्पणी करना आपका कर्तव्य है एवं भाषा के प्रचार प्रसार हेतु अपने कर्तव्यों का निर्वहन करें. यह एक निवेदन मात्र है.

अनेक शुभकामनाएँ.

गिरिजेश राव said...

@ तुम इन शोख अदाएं लिये - इन की जगह ये कर दीजिए।

आज ईर्ष्या हो रही है :)

ठहरो...... कोई और भी आ रहा है, कयामत उसके बाद आएगी :)

इस्लामी मिथक मान्यता का बेहतरीन प्रयोग। माशाअल्ला कुफ्र की बातें क्या खूब करते हो !

Pankaj Upadhyay (पंकज उपाध्याय) said...

वाह, बहुत खूब.. आप तो बहुमुखी प्रतिभाओ के धनी है साहब
क्या कत्लेआम मचाया है..जबरदस्त..

सतीश पंचम said...

@ गिरिजेश जी,

ध्यान दिलाने के लिये शुक्रिया....अभी कुछ जगह नुक्ते वगैरह की गलतियां भी हैं शायद ।

सतीश पंचम said...

नुक्ते वगैरह फिर कभी ठीक करूंगा :)

लवली कुमारी said...

खूब कहा. :-)

अजय कुमार झा said...

इतनी उम्दा कि हम जैसों के लिए अभी इतनी कूव्वत नहीं कि सिवाय इसके कुछ कह सकें ...वाह वाह ..क्या बात है ..चहब्च्ची तो हम भी ढूंढते हैं
अजय कुमार झा

हिमांशु । Himanshu said...

हमारे शब्दकोश में चहबच्ची शामिल करने का शुक्रिया !
जबर्दस्त ! आभार ।

RaniVishal said...

Waah !! bahut behatreen....Aabhar!

डॉ. मनोज मिश्र said...

क्या खूब वर्णित है-गागर में सागर,भाई वाह.

अभिषेक ओझा said...

कमाल ! पहला खूब पसंद आया जब दूसरा पढ़ा तो पहले से ज्यादा...

जितेन्द़ भगत said...

सुंदर भाव।

ज्ञानदत्त पाण्डेय Gyandutt Pandey said...

वाह! इस पोस्ट ने पहले मेरी वोकेबुलरी समृद्ध की। फिर सोचने को मसाला दिया।

फिर दिया आपके प्रति प्रशंसा का अहो भाव। ऐसे ही और ठेलना मांगता!

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