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Saturday 20 March 2010

हरा लिहाफ ओढे हुए मेरा यह तुलसी-बिरवा और कच्ची जमीन को छूती मेरी आराधना.........सतीश पंचम

     मेरे घर में काफी  पुराना तुलसी का पौधा सूख जाने पर,  पिछले दिनों हमने तुलसी का एक नया पौधा लगाया। यह पौधा एक फेरीवाले से लिया गया था जो कि अक्सर मेरी बिल्डिंग में अपने सिर पर फूल-पौधों के छोटे छोटे पौधे एक टोकरी में रख कर बेचने आता था। जब यह तुलसी का पौधा लिया गया, तो उसी प्लास्टिक के पन्नी में ही तुलसी के पौधे के साथ  दो और छोटे तुलसी के पौधे संलग्न थे। एक साथ तीन तुलसी के पौधे सस्ते दामों में जान हमने खरीद लिये। बडे प्यार से बच्चों ने मिट्टी आदि का जुगाड कर गमले में उन पौधों को लगा दिया।

         इधर रोज सुबह पूजा करने के बाद ताम्र पात्र में रखे जल को उसी गमले में अर्पण कर दिया जाता  जिसमें कि तुलसी के पौधे लगे हुए थे। एक दिन बीता दो दिन बीता। तीसरे या चौथे दिन देखा गया कि तुलसी का मुख्य पौधा मुरझाया हुआ है । समझ में नहीं आया कि आखिर क्या बात हो गई। पांचवे दिन तो पौधे का पता ही नहीं चल रहा था कि यहां पौधा था भी या नहीं। लेकिन संतोष इसी बात का था कि बाकी के दो पौधे सही सलामत थे।
 
        दिन बीतते गये। रोज सुबह गमलों में ईश्वर को जल अर्पण किया जाता। पौधे बडे होते गये।  एक दिन मैने ध्यान दिया कि यह पौधे दिख भले तुलसी जैसे रहे हैं लेकिन इनमें तुलसी के पौधों सी गंध नहीं है। आजमाने के लिये पौधे का एक पत्ता तोड कर उसे सूंघा…….लगा कि जैसे मैं इस गंध से पहले भी कभी वाकिफ हो चुका हूँ लेकिन याद नहीं आ रहा था कि कहां। तभी याद आया कि  गाँव में जब हरी-हरी चरी या मक्के के डंठलों को चारा काटने वाली मशीन में डाला जाता है तो कटे चारे से एक विशेष प्रकार की घसियही गंध निकलती है, ठीक वैसी ही गंध इस पौधे की भी थी।
 
       अब इसमें कोई शंका न रही कि यह तुलसी के पौधे नहीं है।  अब, क्या किया जाय। जो तुलसी का पौधा था वह तो कब का साथ छोड गया। अब इन पौधों का क्या किया जाय। फेरीवाला भी पिछले कई दिनों से नहीं आ रहा था, कि उससे तुलसी का एक और पौधा खरीदा जाय। इधर गमले में लगे दोनों पौधे बडे होते जा रहे थे। उनमें  छोटी छोटी सफेद कलगी सी निकल रही थी। घर में पूजा पात्र में रखा जल और कहां अर्पण किया जाता। यहां मुंबई में  गाँव सरीखा तो खुला और कच्चा स्थान है नहीं कि जाकर कहीं धरती पर ही सूरज की ओर मुंह कर जल  अर्पण कर  दिया जाय। ले दे कर यह गमला ही था जिसमें कि ये दोनों पौधे आपस में हंसते खेलते बडे हो रहे थे।   इधर ईश्वर के नाम  अर्पित जल ने न जाने क्या असर दिखाना शुरू किया कि उन पौधों में काँटे निकलने शुरू हो गये।

                        तुलसी का नया पौधा न होने की जिस मजबूरी के तहत इन पौधों को रोज जल चढाया जा रहा था उसमें से काँटे निकलने शुरू होने पर स्वाभाविक था कि श्रीमती जी चिंतित हो । सो कहीं से भी नया पौधा लाने के लिये कहा गया। इधर मुझे अलग से एक  तुलसी का पौधा खरीदने के लिये जाना अपने आप में अजीब लग रहा था। सो टालता  रहा …..टालता  रहा । वैसे भी यह कांटेदार पौधे कोई नुकसान तो कर नहीं रहे थे। बल्कि हरियाली का एक छोटा सा कोना घर में  समेटे हुए थे।

        आज फुरसत में इन पौधों को देख रहा था और साथ ही साथ सोच भी रहा था कि इन नन्हे पौधों को तो ईश्वर के नाम पर अर्पित किये जाने वाले जल से सींचा गया है ,  इतने पर भी ये काँटेदार निकल गये। वैसे भी दोष इन पौधों का नहीं है, काँटेदार होना तो इन पौधों की प्रकृति ही है, उसमें भला बदलाव कैसे किया जा सकता था। दोषी तो मेरी उम्मीदें थीं जो कि काँटेदार पौधों से अलग किस्म के होने की उम्मीद लगाये बैठी थीं । कबीर का कहना कि - बोये पेड बबूल का तो आम कहां से पाय वाली उक्ति शायद ऐसे ही वक्त के लिये कही गई है।
  
      खैर, संतोष इसी बात का है कि यही वे काँटेदार पौधे थे जिन्होंने  ईश्वर के लिये रखे जल को नाले आदि में बहने से बचाया था और    ईश्वरोपासना का माध्यम बने थे। यही कार्य तुलसी भी करती थी। वह भी ईश्वरीय आराधना का माध्यम बन जल स्वीकार करती थी,  वह भी जल को नाले आदि में बहाने से बचाने का माध्यम बनती थी।
    
     अब,

 आज सोच रहा हूँ कि तुलसी का नया पौधा लाउं या रहने दूँ।  बिना तुलसी के भी काम तो चल ही रहा है। एक अलग किस्म के पौधों को जिलाने का सूकून मिल रहा है। हरियाली का एक कोना बना ही हुआ है। वैसे भी हम शहरी बालकनी में एक गमला रख उसमें बाग बगीचे को ताक लेते हैं ।
    
   फेरीवाले अभी कुछ दिन और न आना……..देखना चाहता हूँ कि यह काँटेदार पौधों की भक्ति मेरे ईश्वर को चुभती है या नहीं  :)

- सतीश पंचम
 


  

    

13 Comments:

  1. दिल को छू लेने वाली पोस्ट.
    पता नहीं क्यों लेकिन तुलसी (मेरी पत्नी इसे "तुलसी जी" लिखती) के पौधे अधिकांशतः अल्पजीवी होते हैं.
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  2. इस बार की पोस्ट कुछ अलग अंदाज़ में थी.....थोड़ी भावुकता लिए हुए...अच्छी लगी
    आबाद रहें वो आपकी बालकनी का हरियाला कोना...:)
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  3. तुलसी का पौधा आना चाहिये - जरूर। पर ये घसियहवा भी जिन्दा रहना चाहिये।
    अब देखिये न, गट्टुकी शर्मा हमारे घर में ऐसे पसरा रहता है जैसे उसके बाप का घर हो!
    भगवान सभी में हैं।
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  4. ज्ञान भाई सूफ़ियों की ज़बान बोल रहे हैं - हमा ओ अस्त। मार्मिक पोस्ट!
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  5. लेकिन सवाल यह है कि वह तुलसी जैसा दिखने वाला पौधा क्या है?जो इतने दिनों तक भरमाता रहा.
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  6. सचमुच बड़ा धर्म संकट आन पड़ा ये तो !
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  7. विशुद्ध ब्लॉगरी । इतने संवेदनशील !
    गमले में तुलसी दुबारा रोप दीजिए। तीनों को पोसिए। समय तय कर देगा किसका क्या होना है :)
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  8. दुविधा तो है.. लेकिन अब आप उससे ही तुलसी समझकर मागे, क्या पता है ’गाइड’ मूवी की तरह आपका विश्वास रन्ग ला जाय और ये ’घसियहवा’ भी तुलसी सरीखा कुछ दे जाय..
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  9. "जाको राखे साईया मार सके न कोय "
    "मानो तो देव नही तो पथर "
    ये हि उक्तीया याद आई आपकी इस (तुलसी ) आस्था से से भरी पोस्ट पर |
    सिंचन किया है तो हरियाली तो है हि |
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  10. तुलसी का पौधा भी ले आइए और इन्हें भी रहने दीजिए। हरियाली तो जितनी फ़ैले उतनी ही अच्छी, है न?देखने में तो तुलसी जैसे ही लग रहे हैं। बहुत बड़िया लिखा है।
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  11. आज सुबह इन पौधों को फिर से जल देते समय पोस्ट के साथ सात आप लोगों की बातें याद आ रही थी :)

    ईश्वर भी कहेंगे कि क्या अहमक इंसान हूँ...जल चढाते समय भी ढंग से ईश्वर को याद नहीं करता।

    इधर श्रीमती जी कह रही हैं कि - हम लोग कांटे को सेय ( पाल ) रहे हैं, ये कोई अच्छी बात थोडी न है। मैं हंस कर टाल जाता हूँ।

    फिलहाल तो इन पौधों को यूं ही फलने फूलने देने का मन बना लिया है। तुलसी के लिये अलग गमले का इंतजाम करने की सोची है ।

    आज भी फेरीवाला नहीं आया। लगता है मेरी ओर से ईश्वर के प्रति कंटीली चुहलबाजी अभी और चलेंगी :)
    थोडे दिन
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  12. तुलसी का पौधा तो ले ही आइये. बाकी इस पौधे ने किस्मत पायी है तो आप उसका क्या बिगाड़ लेंगे, तपस्या करिस होगा पिछले जन्म में :)
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  13. गहरी संवेदनशीलता ! पोस्ट तो गज़ब है ! पुरनकी टेम्पलेट के लग जाने पर इतनी खूबसूरत पोस्ट निकल आयी !
    आभार ।
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