इधर रोज सुबह पूजा करने के बाद ताम्र पात्र में रखे जल को उसी गमले में अर्पण कर दिया जाता जिसमें कि तुलसी के पौधे लगे हुए थे। एक दिन बीता दो दिन बीता। तीसरे या चौथे दिन देखा गया कि तुलसी का मुख्य पौधा मुरझाया हुआ है । समझ में नहीं आया कि आखिर क्या बात हो गई। पांचवे दिन तो पौधे का पता ही नहीं चल रहा था कि यहां पौधा था भी या नहीं। लेकिन संतोष इसी बात का था कि बाकी के दो पौधे सही सलामत थे।
दिन बीतते गये। रोज सुबह गमलों में ईश्वर को जल अर्पण किया जाता। पौधे बडे होते गये। एक दिन मैने ध्यान दिया कि यह पौधे दिख भले तुलसी जैसे रहे हैं लेकिन इनमें तुलसी के पौधों सी गंध नहीं है। आजमाने के लिये पौधे का एक पत्ता तोड कर उसे सूंघा…….लगा कि जैसे मैं इस गंध से पहले भी कभी वाकिफ हो चुका हूँ लेकिन याद नहीं आ रहा था कि कहां। तभी याद आया कि गाँव में जब हरी-हरी चरी या मक्के के डंठलों को चारा काटने वाली मशीन में डाला जाता है तो कटे चारे से एक विशेष प्रकार की घसियही गंध निकलती है, ठीक वैसी ही गंध इस पौधे की भी थी।
अब इसमें कोई शंका न रही कि यह तुलसी के पौधे नहीं है। अब, क्या किया जाय। जो तुलसी का पौधा था वह तो कब का साथ छोड गया। अब इन पौधों का क्या किया जाय। फेरीवाला भी पिछले कई दिनों से नहीं आ रहा था, कि उससे तुलसी का एक और पौधा खरीदा जाय। इधर गमले में लगे दोनों पौधे बडे होते जा रहे थे। उनमें छोटी छोटी सफेद कलगी सी निकल रही थी। घर में पूजा पात्र में रखा जल और कहां अर्पण किया जाता। यहां मुंबई में गाँव सरीखा तो खुला और कच्चा स्थान है नहीं कि जाकर कहीं धरती पर ही सूरज की ओर मुंह कर जल अर्पण कर दिया जाय। ले दे कर यह गमला ही था जिसमें कि ये दोनों पौधे आपस में हंसते खेलते बडे हो रहे थे। इधर ईश्वर के नाम अर्पित जल ने न जाने क्या असर दिखाना शुरू किया कि उन पौधों में काँटे निकलने शुरू हो गये। तुलसी का नया पौधा न होने की जिस मजबूरी के तहत इन पौधों को रोज जल चढाया जा रहा था उसमें से काँटे निकलने शुरू होने पर स्वाभाविक था कि श्रीमती जी चिंतित हो । सो कहीं से भी नया पौधा लाने के लिये कहा गया। इधर मुझे अलग से एक तुलसी का पौधा खरीदने के लिये जाना अपने आप में अजीब लग रहा था। सो टालता रहा …..टालता रहा । वैसे भी यह कांटेदार पौधे कोई नुकसान तो कर नहीं रहे थे। बल्कि हरियाली का एक छोटा सा कोना घर में समेटे हुए थे।
आज फुरसत में इन पौधों को देख रहा था और साथ ही साथ सोच भी रहा था कि इन नन्हे पौधों को तो ईश्वर के नाम पर अर्पित किये जाने वाले जल से सींचा गया है , इतने पर भी ये काँटेदार निकल गये। वैसे भी दोष इन पौधों का नहीं है, काँटेदार होना तो इन पौधों की प्रकृति ही है, उसमें भला बदलाव कैसे किया जा सकता था। दोषी तो मेरी उम्मीदें थीं जो कि काँटेदार पौधों से अलग किस्म के होने की उम्मीद लगाये बैठी थीं । कबीर का कहना कि - बोये पेड बबूल का तो आम कहां से पाय वाली उक्ति शायद ऐसे ही वक्त के लिये कही गई है।
खैर, संतोष इसी बात का है कि यही वे काँटेदार पौधे थे जिन्होंने ईश्वर के लिये रखे जल को नाले आदि में बहने से बचाया था और ईश्वरोपासना का माध्यम बने थे। यही कार्य तुलसी भी करती थी। वह भी ईश्वरीय आराधना का माध्यम बन जल स्वीकार करती थी, वह भी जल को नाले आदि में बहाने से बचाने का माध्यम बनती थी।
अब,
आज सोच रहा हूँ कि तुलसी का नया पौधा लाउं या रहने दूँ। बिना तुलसी के भी काम तो चल ही रहा है। एक अलग किस्म के पौधों को जिलाने का सूकून मिल रहा है। हरियाली का एक कोना बना ही हुआ है। वैसे भी हम शहरी बालकनी में एक गमला रख उसमें बाग बगीचे को ताक लेते हैं ।
फेरीवाले अभी कुछ दिन और न आना……..देखना चाहता हूँ कि यह काँटेदार पौधों की भक्ति मेरे ईश्वर को चुभती है या नहीं :)
- सतीश पंचम




13 Comments:
कृपया अपनी टिप्पणियों में विषय से इतर कोई लिंक न दें।