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Saturday, March 6, 2010

हिरन, चाँद, सूरज, तारे आदि के निशान उकेरे गये पत्थरों के कोल्हू....कहीं आपके गाँव में भी तो नहीं हैं .....सतीश पंचम

           मैंने अपने गाँव में बडे बडे आकार के गोल पत्थरों वाले कोल्हू देखे हैं। उन पर इंसानों, जानवरों, चाँद, सितारों, हिरन आदि की आकृतियां बनी हैं। मैं  हैरान होता हूँ कि इसे कैसे बनाया जाता होगा, सडक, परिवहन के अभाव में इसे कैसे गाँव में ढो कर लाया जाता होगा। क्या यह किसी की व्यक्तिगत सपंत्ति होती थी या पूरे गाँव की ? यही सब प्रश्न मेरे मन में इन पत्थरों को देख कर उठते थे।
 
               गाँव में किसी से पूछने पर बस इतना पता चलता था कि इनसे गन्ने की पेराई होती है। इसका इतिहास, भूगोल कुछ पता न था किसी को। लेकिन हाल ही में मैंने विवेकी राय जी की लिखी एक किताब कालातीत को पढते हुए इसके एक लेख में इन कोल्हुओं के बारे में कुछ जानकारी पाई है। सीवान का कोल्हू नामक इस लेख में विवेकी राय जी लिखते हैं कि -

          पथरीया माने कोल्हू।…..पुराने जमाने में आज से सौ पचास वर्ष पहले इन्हीं पत्थर के भारी भरकम कोल्हूओं से ईख पेरने का काम लिया जाता था। गाँवों में ये यत्र तत्र बिखरी बेकार पडी रहती हैं। खुरपा-गँडासा रगडकर तेज करते हैं लोग। चरवाहे बैठकर भैंस चराते हैं। लडके खेलते हैं। कोई नाच तमाशा हुआ तो उस पर बैठकर देखते हैं। जो जहां पडी हैं बस वहीं पडी हैं। कौन उन्हें इधर उधर करे।

     कोल्हूओं के गांव में लाने योग्य परिवहन के बारे में विवेकी राय लिखते हैं कि लोग हाथोंहाथ उठाकर एक गाँव से दूसरे गाँव करते डगरा लाते थे। कहीं पहाड से आती थीं यह बनकर।
  
     आगे विवेकी राय जी लिखते हैं कि जिन लोगों को पथरीया की जरूरत होती थी वे पहाड पर जाकर उसे गढवाते थे। और ऐसा भाईचारा था लोगों के बीच कि एक गाँव से दूसरे गाँव तक लोग ढकेल कर पहुँचा देते थे। जिस गाँव में पथरीया पहुँच जाती थी उस गाँव के लोगों की जिम्मेदारी हो जाती थी कि ढकेल कर अगले गाँव में पहुँचा दें। किसी का कोल्हू गाँव में रह जाना पूरे गाँव के लिये लज्जा की बात मानी जाती थी।
 
               इन पथरियों पर पहचान के लिये सूरज, चाँद, हिरन  आदि की आकृतियां बनी होती थीं। अब हर समय तो कोई इतने लंबे समय तक इन कोल्हूओं के साथ नहीं चल सकता था। सो एक गाँव से दूसरे गाँव, दूसरे से तीसरे……निशान के आधार पर कोल्हू सरका दिया जाता था। जिसका कोल्हू गाँव में पहुँचता था, वह इन निशानों को देख कर उसे ले लेता था।
      
         वैसे, बदलते समय के साथ, लोगों में आये दुराव के साथ एक मुहावरा भी बना है – ‘सीवान का कोल्हू होना’ -    माने ऐसा काम जिसमें सब लोग पूरी तरह सहयोग नहीं करते। किसी सामूहिक काम में जब कोई आधे मन से बल लगाता दिखता है तो कहा जाता है कि क्या सीवान ( गाँव) का कोल्हू टारने ( हटाने) आए हो।
फिलहाल तो यह चित्र मेरे ही गाँव के हैं जहां पर कि ये कोल्हू यूँ ही पडे हैं। इन पर कपडे सूखाये जाते हैं। इन पर बच्चे खेलते हैं तो कभी कभी इन पर खुरपा-गंडासा भी तेज किया जाता है।

- सतीश पंचम

स्थान – वही, जहां की चाय  ‘पेशल….मलाई मारके’ नाम से जानी जाती है।

समय- वही, जब पत्थर के कोल्हूओं को गाँव वाले सरकाते समय जोर लगाके……हईश्या बोलते हैं और बगल के ही किसी रेडियो पर गीत बजता है –   गीत गाया पत्थरों ने…….

18 comments:

हिमांशु । Himanshu said...

हाँ, यह आकृतियाँ पहचान के लिये हों, ऐसा हो सकता है, पर मेरे गाँव वाले घर के आँगन में गड़ी ओखरी, हाथ की चाकी (जो बहुत पुरानी हैं, और आज जिनका कोई उपयोग नहीं, पर एक बुढ़िया फुआ के कारण सुरक्षित हैं) आदि पर भी ऐसे ही अनेकों चित्र खुदे हैं ! ये चीजें तो इधर-उधर नहीं जाती होंगी ! शायद ये सजावट रही हो ।

Suman said...

nice

Udan Tashtari said...

लगता तो अपना सा है..विवेकी राय जी ने जो भी चित्रित किया हो..हमारे तो गांव अब रहे नहीं. पुरानी फोटू देख लेते हैं.

आपको पढ़ा, अच्छा लगा.

विगत कुछ दिनों से व्यस्तता के चलते सक्रियता में व्यवधान हुआ है, क्षमाप्रार्थी हूँ, जल्द ही सक्रियता पुनः हासिल करने का प्रयास है.

अनेक शुभकामनाएँ.

Arvind Mishra said...

हाँ सतीश जी लगभग सभी गावों में है ये कोल्हू -मैं तो सोचता था इसी में सोम लताएँ पीसी जाती होंगी ! हा हा!

Vivek Rastogi said...

वाह गाँव की मिट्टी की सौंधी सी खुश्बू आ गई, और कोल्हू के बारे में ज्ञानवर्धन हुआ, हमने पहली बार सुना, काश कि वापिस से गांव का जमाना आ जाये।

दिनेशराय द्विवेदी Dineshrai Dwivedi said...

इन्हें संभाल कर रखा जाए। कहीं संग्रहालय में कुछ दिनों में ये ऐंटीक होने वाले हैं।

अनूप शुक्ल said...

सुन्दर लेख!

Satish Pancham said...

@ हिमांशु जी, आप की यह बात कि इन पत्थरों पर कई चित्र सजावट के लिये भी उकेरे जाते होंगे से पूरी तरह सहमत हूँ।
@ दिनेश जी,
जी हाँ, यह एन्टिक पीस तो बन ही चुके हैं। अब कोई इन से गन्ने की पेराई नहीं करता।

Shiv Kumar Mishra said...

सतीश जी, विवेकी राय जी द्वारा दी गई जानकारी बहुत बढ़िया लगी. हमारे गाँव में भी ऐसे कोल्हू सालों से पड़े हैं. बचपन से देखता आया हूँ. कई बार मन में आता है कि ये चलता कैसे था? अब हशिया, खुरपी, और टगारी वगैरह चमकाने के काम आती है. कभी-कभी इसी पर बैठकर कोई-कोई स्त्री-विमर्श भी कर देता है.

डॉ. मनोज मिश्र said...

हम लोंगो की (मतलब हमारे -आप के गांव )तरफ चुनार से ही लाये जाते थे.

अविनाश वाचस्पति said...

पंचम जी

चमाचम जानकारी

चकाचक चित्र

मन झमाझम हुआ।

पंकज said...

रोचक. देखने से तो ये पुरातत्विक महत्व के लगते हैं. पता नहीं बच पायेंगे कि नहीं.

महफूज़ अली said...

आपको पढ़ा, अच्छा लगा.

rashmi ravija said...

ये नयी जानकारी थी,मेरे लिए.शायद यू.पी. के गाँव में होता हो...बिहार के गाँव में तो नहीं देखा.पर लुढका कर इस गाँव से उस गाँव तक पहुंचाने की कथा,बहुत रोचक है.इतने निश्छल लोग होते थे,तब.

rashmi ravija said...

चित्र बहुत ही सुन्दर लग रहें हैं.ऐसी हरियाली और निर्जनता,हम मुंबई वालों को बहुत तरसाती है.

सिद्धार्थ शंकर त्रिपाठी said...

मैने तो लोहे वाले कोल्हू ही देखे हैं। अपने गाँव में । अपने खेत से गन्ना लाकर इन कोल्हुओं में पेरना और रस पीना या रसियाव बनवाकर खाना बहुत मजेदार अनुभव रहा, जो शायद हमारे बच्चों को नहीं मिलने वाला।

आपकी पोस्ट बहुत रोचक है।

अभिषेक ओझा said...

मैंने तो नहीं देखा ऐसा कभी ! .... मलाई मार के पेशल चाय वाली जगह का होने के बावजूद... बढ़िया लगी ये जानकारी.

रंजना said...

आपके इस प्रविष्टि के चित्र और विवरण ने मन को गाँव के महक से महका दिया....मन एकदम सोंधा सोंधा हो गया....
आभार आपका....

सहयोग की भावना हालाँकि अब गाँवों में भी बहुत ही कम हो गयी है...पर आज भी शहर से कई गुना अधिक है....

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