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Saturday, February 20, 2010

चालीस साल बाद बडे परदे पर आराधना देखते हुए लोग अपने मोबाईल कैमरे से इन लम्हों को क्या कैद करते……लम्हों ने इन लोगों को खुद ब खुद कैद कर लिया....सतीश पंचम

     हाल ही में 1969 की फिल्म आराधना देखने मुंबई के रीगल सिनेमा हॉल में गया था। नॉस्टॉल्जिया पूरे शबाब पर था।आखिर चालीस साल बाद फिर वही फिल्म बडे पर्दे पर जो थी। रेडियो मिर्ची ने यह शो आयोजित किया था पुरानी जीन्स कार्यक्रम के तहत। आर जे अनमोल ने बेहद सधे अंदाज में शो शुरू होने से पहले एंट्री की। परदे के पीछे खडे हो जब अनमोल ने फिल्म आराधना के शुरू होने के लिये बताना शुरू किया तो बैकग्राउंड में आराधना फिल्म का टाईटल ट्रैक अपनी धुन बिखेर रहा था और लोग थे कि बस जैसे इस लम्हे को जी लेना चाहते थे, गूँथ लेना चाहते थे समय की इस माला में।

       फिल्म शुरू हुई उससे पहले अनमोल ने कहा कि चूंकि यह फिल्म 1969 यानि चालीस साल पुरानी है, लिहाजा अपना मोबाईल फोन बंद रखें ताकि हम उस समय की ओर लौट सकें जब मोबाईल फोन नहीं हुआ करता था, तब किसी ने नहीं सोचा था कि इस फिल्म में ही एक डॉयलॉग है जो उन्हें इस गुजारिश का मतलब समझायेगा।

     खैर फिल्म शुरू हुई। शर्मिला टैगोर को जेल में डाल देने वाला सीन है। खिडकी के बाहर धुआँ उठते दिखाया गया और फ्लैश बैक में फिल्म चलने लगी। पहाडी सडक का सीन शुरू हुआ, एक जीप आती दिखाई दी, बल खाती मनोरम पहाडीयों के बीच  सांप सी सरकती रेल दिखी, और अपने पूरे रवानी के साथ माउथ ऑरगेन बजता एक गीत शुरू हुआ – मेरे सपनों की रानी कब आएगी तू……बस इतना सुनना था कि  लोगों ने सीटियां बजानी शुरू की…….कुछ लोग पीछे की सीटें छोड आगे की चंद खाली सीटों में जा समाये…..कुछ लोग तालीयां बजाने लगे…….कुछ लोग मंत्र मुग्ध से टकटकी लगाये देखते रहे और कुछ लोग अपनी सुनहरी यादों में खो गये।

     पूरे गाने को मैं टकटकी लगाए देखता रहा।  सब जैसे  ठहर सा गया था। गीत खत्म होने पर लोग थोडे संयत हुए। अगला सीन दिखा जब शर्मिला टैगोर किसी से खफा हो उस पर बाल्टी भर पानी फेंकती हैं और वह पानी राजेश खन्ना पर जा गिरता है। बाल्टी लिये शर्मिला टैगोर को देख राजेश खन्ना कहते हैं – इस समय बाल्टी लिये हुए  मैं तुम्हारी गजब की तस्वीर खींचता लेकिन क्या करूं मेरे पास कैमरा नहीं है।

तब…..

     तब लगा कि हां, हम 1969 में सचमुच पहुंच गये हैं। लोग इस डॉयलॉग पर वाह वाह से कर उठे….और मैं सोच में पड गया कि वाकई  इस फिल्म का पूरा मजा लेना हो तो मोबाईल बंद रखना पडेगा। वरना आज कल तो हर मोबाईल में कैमरा है। और यह दिखा भी खूब। लोग इस लम्हे को अपने कैमरे में कैद करने के लिये उतावले से हो उठे। ढेरों मोबाईल निकल आए और लोगों ने बडे परदे को  अपने छोटे कैमरे में कैद करना शुरू किया।

 सीन बदला। अब राजेश खन्ना के कपडे जो कि गीले हो चुके थे उसे बदलने का दृश्य दिखाया जा रहा था। राजेश खन्ना से शर्मिला ने कहा कि तुम्हारे कपडे गीले हो गये हैं। उन्हें बदल डालो। मैं अभी प्रेस से सुखा कर देती हूं तो अगला सीन तो जैसे आज की फिल्मों पर चालीस साल पहले लिखा एक व्यंग्य सा लगा।

        राजेश खन्ना ने बनियान पहने होने के बावजूद लडकी के सामने शर्ट उतारना ठीक नहीं समझा और दूसरी ओर पीठ फेर कर  झिझकते हुए अपना शर्ट उतार कर दूसरी ओर मुंह करके खडी शर्मिला टैगोर के हाथों में दे दिया ।

    कहां हो सलमान…….कहां हो राखी सावंत…….और कहां हो मल्लिका ए सहरावत……….यह सिहरन, यह अदाएं…….यह शोख अदाएं……..अब इतिहास  तो हो ही गये हैं।

    खैर, फिल्म आगे बढती है। और शुरू होता है एक और गीत ……..


हेss हे
हे हे ..
हेहेहे हुँ हूँ
हु हुँ हूँ हुहूँ हुहूँ s s s

कोरा कागज था s s s ये मन मेरा ss
मेरा s s मेरा ss s
लिख दिया ना ssम उस पे तेरा ss
तेरा ss तेरा s s s...


मोबाईल कैमरे फिर हवा में लहराये।

  लोग मोबाईल कैमरे से इस लम्हे को कैद क्या करते……लम्हों ने इन लोगों को खुद ब खुद कैद कर लिया।

लम्हें आज लोगों को बांध रहे थे और लोग थे कि  खुशी खुशी बंधे जा रहे थे।

  गीत खत्म हुआ और लोग फिर उस दुनिया में लौट आए जहां से अभी उठे थे। मोबाईल कैमरे अंदर हो गये। कुर्सियों के हत्थों पर थिरकती उंगलियां थम सी गयीं। एक सहलाता नॉस्टॉल्जिया गुजर सा गया।

     मैं लोगों के अंधेरे में झांकते चेहरों को पढने की कोशिश कर रहा था। किसी पर अपने पसंदीदा हीरो को देखने का सुकून था तो किसी पर अपनी पसंदीदा अदाकारा शर्मिला टैगोर को यूं सामने पा लेने सा सुख। मैं रह रह कर शर्मिला जी के बालों में लगे फूलों को देख मुग्ध हो रहा था। कितनी खूबसूरती से सजाया गया था उन फूलों को। और कान में पहने हुए नीले रंग के झूमते बल खाते सुंदर बूंदों की लडी सा पहनावा….वाह…….।
  
     बगल में बैठी श्रीमती जी मेरी ओर देख थोडा मुस्करायीं तो समझ गया कि ये क्या देख कर मुस्करा रही हैं। साडी । बेहद खूबसूरत साडी में लिपटी शर्मिला  जी की साडी को देख कोई भी भारतीय परिधानों को पसंद करने वाली महिला शायद उसी तरह मुस्कराये जिस तरह मेरी श्रीमती जी मुस्करा रही थीं। हां ये अलग बात है कि उस तरह की साडी का नाप, जेब की नाप से बहुत बडा होता है।

    यह नॉस्टॉलिजिया पूरी फिल्म तक चलता रहा। एक के बाद एक मोहक गाने, एक के बाद एक सुंदर दृश्य। पूरी फिल्म जिंदगी की एक कैनवास सी लगी जिसे सुनहरे फ्रेम में मढ दिया गया हो। खूब छक कर इस फिल्म का मजा लिया। खूब रच कर फिल्म को महसूस किया, उसे अपनी यादों की कंदराओं में ढंक सा लिया।  संक्षेप में जनाब  अहमद वसी के इन शब्दों में कहूँ तो   -

पानी की तरह बह गयीं सदियां कभी -  कभी
अक्सर हुआ है यूँ भी कि लम्हा ठहर गया।
 
   आराधना देखते हुए यही एहसास हुआ। रेडियो मिर्ची और उनकी टीम को इस सार्थक कदम के  लिये मेरी ओर से बहुत बहुत धन्यवाद देना चाहूंगा और उम्मीद करूंगा कि इस तरह के प्रयास और भी जारी रहेंगे।

 - सतीश पंचम

18 comments:

Vivek Rastogi said...

वाकई क्या गजब फ़िल्म है, हम भी दीवाने हैं, मोबाईल ने तो जिंदगी ही बदल दी है...
मान गये..

डॉ. मनोज मिश्र said...

पानी की तरह बह गयीं सदियां कभी - कभी
अक्सर हुआ है यूँ भी कि लम्हा ठहर गया।..
बहुत सही ,बेहतरीन पोस्ट .

बी एस पाबला said...

यादगार लम्हों की सराहनीय पोस्ट।
कहीं जाना है भाग रहा , लौट कर आता हूँ

संगीता पुरी said...

पुरानी फिल्‍मों की बात ही कुछ और है !!

मनोज कुमार said...

फ़िल्म क़ाबिले-तारीफ़ है।

राज भाटिय़ा said...

बहुत सुंदर लिखा आप ने , ओर ऎसी फ़िल्मे हजार बार भी देखो दिल नही भरता, ओर आज की फ़िल्म का नाम सुन कर ही घिन्न आती है

गिरिजेश राव said...

हेss हे
हे हे ..
हेहेहे हुँ हूँ
हु हुँ हूँ हुहूँ हुहूँ s s s

कोरा कागज था s s s ये मन मेरा ss
मेरा s s मेरा ss s
लिख दिया ना ssम उस पे तेरा ss
तेरा ss तेरा s s s...

सतीश पंचम said...

@ हेss हे
हे हे ..
हेहेहे हुँ हूँ
हु हुँ हूँ हुहूँ हुहूँ s s s

कोरा कागज था s s s ये मन मेरा ss
मेरा s s मेरा ss s
लिख दिया ना ssम उस पे तेरा ss
तेरा ss तेरा s s s...

गिरिजेश जी,

पोस्ट में यह लाईनें इसी तरह लिखना चाहता था, लेकिन सरल सपाट सा एक लाईन लिख रह गया। आपने जब लिख दिया है तो उसे अभी अपडेट कर देता हूं।

सतीश पंचम said...

और हां गिरिजेस जी,

इन लाईनों को आपके कमेंट से लेकर कॉपी पेस्ट करने के बावजूद धन्यवाद या थैंक यू नहीं कहूंगा....क्योंकि थ्री इडियट में थैंक्यू कहने पर एक डॉयलॉग था कि आजकल चतुर तुझे मैनर सिखा रहा है क्या.....बडा आया थैंक्यू वाला :)

Arvind Mishra said...

सभी को खींच ले गए नोस्टाल्जिया में .....ऐसे अतीत विरही है आप!

Neeraj Singh said...

बहुत ही जबरदस्त चित्रण..सच में. मैंने भी करीब ११ साल पहले अपने शहर में इसी तरह से 'गंगा जमुना' देखी थी.. श्याम - श्वेत रंग में - कसम से दिल को छु गया था एक एक सीन. मैं समझ सकता हूँ आपकी भावनाओं को.. बेहतरीन

अनूप शुक्ल said...

गजब कमेंट्री!

HARI SHARMA said...

सतीश भाई मजा आ गया.
शुक्रिया

ललित शर्मा said...

वाह! सतीश भाई
दिल को छुने वाली फ़िल्म है आराधना,
चाहे कितनी भी बार देखो नयापन ही है।

ज्ञानदत्त पाण्डेय Gyandutt Pandey said...

मैं फिल्म की क्या, मोबाइल की बात करूंगा। खुद प्री-१९६० मॉडल का होने के बावजूद यह महसूस करता हूं कि लेखनी के मेरे लंगड़ेपन को मोबाइल के कैमरे ने बैसाखी दी है। अन्यथा मेरी अभिव्यक्ति को मौन खा गया होता।
मैं तकनीकी का शुक्रगुजार हूं।

बेचैन आत्मा said...

अच्छी पोस्ट.

anitakumar said...

सही कहा आप ने आज की फ़ि्ल्मों में वो रोमांस कहा और वो खूबसूरती कहां जो पहले की फ़िल्मों में थी। इस फ़िल्म ने तो वैसे भी सभी को दिवाना बना दिया था।

रंजना said...

आपने ऐसा वर्णन किया कि लम्बी आह लेकर मन कह उठा....काश हम भी यह देख पाते....!!!!
फिल्म तो परदे से लेकर टी वी पर तक कई बार देख चुके हैं...पर मल्टीप्लेक्स में इसे देखना आज तक नसीब न हुआ है...

सचमुच यह सराहनीय प्रयास है...

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