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Sunday, February 14, 2010

जैसे हमारे बरम बाबा, हरसूबाबा, डीह बाबा हैं , वैसे ही अंगरेज लोगन के बलटिहान बाबा ।कालेज के छोकरा-छोकरान तक उन्हें मानते हैं।

     आज सदरू भगत वैलेंटाईन डे मना रहे हैं। एक नई नीली रंग की पट्टेदार चढ्ढी, उस पर सेन्चुरी मिल वाली परमसुख छाप धोती, सफेद रंग का कुर्ता, एक नया अँगोछा कंधे पर रख यूँ चले, मानों समधियाने जा रहे हैं। धोती में नील इतना ज्यादा लगवा लिये थे कि लगता था बसपा का बैनर ही कहीं से झटक लाये हैं और वही पहन-ओढ कर निकले हैं। इधर रमदेई भी आज पूरे फॉर्म में थी। नई-नई साडी को बिना एक बार भी पहने धो-कचार कर धूप में सूखा रही थी, जानती थी नई साडी एक-दो बार धोने से कपडे का बल टूटता है और पहनने में नरमाहट बनी रहती है।

        बगल वाली जलेबी फुआ ने टोक भी दिया था, काहे नया लूगा को धो रही हो, पहन लो एसे ही....लगेगा बियाह वाली साडी है। चलोगी तो लूगा खसर-खसर बोलेगा सो अलग। तो जानते हैं रमदेई ने क्या कहा - अरे नई साडी खसर-खसर बोलती है इसिलिये तो धो-कचार कर धोती का खसरपन कम कर रही हूँ। मैं तो नहीं पहनती लेकिन मेरे बुढउ मानें तब न। बोल रहे थे हम लोग बलटिहान बाबा को मनायेंगे।

बलटिहान बाबा ? वो कहाँ के बाबा है ? जलेबी फुआ ने अचरज से पूछा।

अरे जैसे हमारे बरम बाबा, हरसूबाबा, डीह बाबा हैं न, वैसे ही अंगरेज लोगन के बलटिहान बाबा ।

अच्छा, तो उनके लिये ही पूडी- कढाई चढाने की तैयारी हो रही है ।

हाँ, वह सब तो करना ही पडेगा। कढाही चढेगी, परसाद बंटेगा। बाकी सब भी काज-करम होगा। अब तो देखो बलटिहान बाबा कहाँ तक पार लगाते हैं।

सब पार हो जायेगा बहिनियाराम, सब पार हो जायेगा। बस बलटिहान बाबा पर भरोसा रखो।
   
           रमदेई और जलेबी फुआ की बातें चल ही रही थीं कि सदरू भगत टहकते-लहकते आँगन में आ पहुँचे। देखा जलेबी फुआ पहले ही से बैठी हैं। रमदेई अलग कपडों को उपर-नीचे अलट-पलट कर सुखा रही है, ताकि कपडे जल्दी सूख जायें। एक गठरी में सिधा-पिसान बाँधा जा रहा है ताकि पूडी-उडी का इंतजाम हो, कढाई चढे। थोडे पुआल भी लिये जा रहे हैं ताकि आग जलाकर कढाई देने में आसानी हो। थोडी देर के लिये सदरू भगत को लगा कि औरतें न हों तो तर-त्यौहार का पता ही न चले। वो तो चार औरतें मिल बैठ कर बोल-बतिया लेती हैं, थोडी लेनी-देनी कर लेती हैं तो पता चलता है कि कोई त्यौहार है। एसे समय बच्चों की कचर-पचर अलग चल रही होती है। किसी का पाजामे का नाडा नहीं खुल रहा तो किसी की सियन खुल गई है। इन्हीं सब बातों में सदरू भगत मगन थे कि बाहर पंडित केवडा प्रसाद की आवाज सुनाई पडी।

अरे भगत......अंदर ही हो क्या ?

   अरे पंडितजी। आइये- आइये। कहिये , कैसे आना हुआ। सदरू भगत आँगन से बाहर आते हुए बोले। आना क्या, बस जब से ये सुना कि तुम बलटिहान बाबा को कढाई चढाने जा रहे हो, हम तो दौडे चले आये। पानी भी नहीं पिया, पैर देख लो अभी भी धूल से अंटे पडे हैं।

       हाँ, कढाई चढा तो रहा हूँ। सुना है बहुत पहुँचे हुए बाबा हैं। बहुत पढे लिखे कालेज के छोकरा-छोकरान तक उन्हें मानते हैं।
 
   कालेज के छोकरा-छोकरान बाबा लोग को मानते हैं ? विसवास नहीं होता भगत। देखा नहीं था हरकिरत का लडका जो शहर में पढ रहा था, गाँव आया तो हम लोगों को पिछडा कह रहा था। कहता था कि क्यों पाथर को पूजते हो। कहीं पाथर पूजने से दुख दुर होते हैं। ये बाबा ओबा लोग कुछ नहीं होते बस बेकार के लोग होते हैं। और आज देखो, सब पढुआ-ठेलुआ लोग बलटिहान बाबा को एकदम मान ही नहीं रहे बल्कि उनके लिये मार भी खा रहे हैं। बदनामी झेल रहे हैं। हर जुलुम हँस कर झेल रहे हैं ।

सच कहते हो पंडितजी। मैं तो समझता हूँ कि जितना हम लोगों के देसी बाबा लोगन में शक्ति है, उससे कहीं ज्यादा विदेसी बाबा में शक्ति है। देखा नहीं, क्या बडे, क्या बूढे सब के सब बलटिहान बाबा को मान रहे हैं। सुना है वह एसे बाबा हैं कि उनके लिये गुलाबी रंग की चड्ढी का चढौवा लगता है।

अच्छा।

हां और क्या ? एसे वैसे बाबा थोडे न है।

लेकिन आज तक तो हम लोग अपने यहां चढावे में कोपीन अ लंगोट छोड कुछ चढाये ही नहीं हैं। लंगोट चढाते थे तो एक सिरा एक ओर बाँध देते थे और दूसरा दूसरी ओर। अब इ गुलाबी चड्ढी का चढावा कैसे चढेगा बाबा को।
बस वही मैं भी नहीं समझ पा रहा हूँ कि बलटिहान बाबा का चढौवा गुलाबी चड्ढी कैसे अर्पित किया जाता है, कैसे चढाया जाता है।

अभी यह चर्चा चल ही रही थी कि कुछ लोग भजन गाते हुए बगल से निकले -

बलटिहान बाबा, तेरो अजब है हाल
रे बाबा, तेरो अजब है हाल
मांगे न मोती, नाहीं हीरा
नाही मांगे गहना-गुरिया ,
मांगे चड्ढी-पुआल रे बाबा
तेरो अजब है हाल
रे बाबा......

- सतीश पंचम




 नोट:  सेंट वैलेंटाईन के लिये बलटिहान बाबा नाम ज्ञानदत्त जी द्वारा दिया हुआ है।  विशु्द्ध देशज नाम है। आशा है वैलेंटाईन के विरोधक इस बलटिहान बाबा नामकरण से तमाखू के साथ पिपरमिंट का स्वाद पाएंगे    :)

18 comments:

Suman said...

nice

Arvind Mishra said...

मिट्टी स्थान और बसाहट की सोंधी महक लिए गुदगुदाती बस्साती रचना
लो जी इक ठो और बाबा और चौकिया माई चलने की तैयारी
सिमट गया पूरा जीवन इसी में -हाय मैंने कुछ और न जाना
वैलेंटाईनको जाना भी तो बल्टीहांन ही जाना
हाऊ मार्मिक!

गिरिजेश राव said...

स्तब्ध हूँ इस दृष्टि पर !
ऐसे ही तो जाने कितने सम विषम तत्वों को सहेजते संस्कारित करते मानव समाज बढ़ते रहे हैं।
हिन्दूकरण ऐसे ही होता रहा होगा और सम्भवत: यही जीवनी शक्ति भी है।
बलटिहान बाबा भी जेवनार खाएँगे।
...गुलाबी चढ्ढी वाले व्यंग्य का रंग भी गुलाबी है।

डॉ. मनोज मिश्र said...

बलटिहान बाबा, तेरो अजब है हाल
रे बाबा, तेरो अजब है हाल
मांगे न मोती, नाहीं हीरा
नाही मांगे गहना-गुरिया ,
मांगे चड्ढी-पुआल रे बाबा
तेरो अजब है हाल
रे बाबा......
वाह गजबे लिख दियें हैं आज के दिन.

डॉ. मनोज मिश्र said...

बलटिहान बाबा, तेरो अजब है हाल
रे बाबा, तेरो अजब है हाल
मांगे न मोती, नाहीं हीरा
नाही मांगे गहना-गुरिया ,
मांगे चड्ढी-पुआल रे बाबा
तेरो अजब है हाल
रे बाबा......
वाह गजबे लिख दियें हैं आज के दिन.

ज्ञानदत्त पाण्डेय Gyandutt Pandey said...

हरसू बरम, ननकू बरम याद रहे, बल्टियान बाबा को हम भुला गये थे। प्रायश्चित कर लिये हैं!

Vivek Rastogi said...

गजब है लीला बलटिहान बाबा की.. जय बलटिहान बाबा की !!!

Udan Tashtari said...

बलटिहान बाबा, तेरो अजब है हाल
रे बाबा, तेरो अजब है हाल
मांगे न मोती, नाहीं हीरा
नाही मांगे गहना-गुरिया ,
मांगे चड्ढी-पुआल रे बाबा
तेरो अजब है हाल
रे बाबा.....



-गज़ब महाराज..अभिभूत कर गये इस पोस्ट से,

शानदार!

लवली कुमारी said...

ऐसे ही आपके सेन्स ऑफ़ ह्यूमर के कायल नही हैं..

Kulwant Happy said...

यहाँ ब्लॉगवुड अपना ब्लॉग दर्ज करवाएं। मुझे खुशी हो गई, शायद आपको भी।

मनोज कुमार said...

जय हो। भोलंटाइन बाबा की।

सिद्धार्थ शंकर त्रिपाठी said...

वाह, क्या बात है। बल्टिहान बाबा को बाल्टी भर पूरी का कराही चढ़वाकर आप गाँव भर को परसाद बँटवाने का काम सदरू भगत को दे तो दिए, लेकिन ई बाबा जो शहर छोड़कर गाँव में नजरे इनायत कर दिए तो गजब हो जाएगा। उस दृश्य पर भी आपकी एक पोस्ट आनी चाहिए। प्रतीक्षा रहेगी।

रचना दीक्षित said...

जय हो बल्तीहान बाबा की

रंजना said...

अहहहः...का कहें..... गुलाबी चड्डी पहिने बटलियान बाबा का परम मनोहर रूप आँख के आगे साच्छात परगट हो अभिभूत कर गया...

क्या समा बाँधा आपने...वाह !!!
हम तो फैन हो गए आपके भी और ई बाबा के भी...

प्रशांत पाण्डेय said...

"देखा नहीं था हरकिरत का लडका जो शहर में पढ रहा था, गाँव आया तो हम लोगों को पिछडा कह रहा था।"

हमको तो लगता है साहब इ जो हरकिरत का बेटा है उ कान्वेन्ट मे पढ़ा होगा अउर इ जो हमरे भगत जी है न "सर्व शिक्षा अभियान" वाले है।

एकदम सटीक वर्णन हमारे गांव के लोगो की मनोदशा का। बहुत सुन्दर।

अर्कजेश said...

शानदार रूपक बॉंधा है । बस मजा आ गया ।

rashmi ravija said...

क्या बात है..बहुत ही बढ़िया व्यंग...क्या पता कालान्तर में सचमुच ही गाँव गाँव चढ़ाव चढ़ाया जाने लगे...बलटिहान बाबा को
बहुत ही सरस अंदाज़...बहुत दिनों बाद पढ़ी ऐसी भाषा में कोई रचना...

shikha varshney said...

जय .बलटिहान बाबा की ....थोडा समय लगा समझने में ,पर बहुत मजा आया पढ़कर

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