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Saturday, February 13, 2010

मोर बाबू पढे अंगरेजी, तिलक काहे थोडा चढाया......विवेकी राय रचित एक विवाह प्रसंग पर हास्य फुहार लिये शानदार लेख.....सतीश पंचम

  

          छछलोल राय गाँव के एकमात्र दिखाउ वर थे। उनके पैर इतने बडे बडे कि दुकानों में उनके नाप के जूते नहीं मिलते। और सिर इतना बडा कि सिली सिलाई टोपी नहीं मिलती। बहुत दिनों तक उनके छोटे भाई की शादी इसलिये रोक कर रखी गई थी कि बडे की शादी हो जाने पर खटकने वाली बात पैदा हो जायगी। लेकिन छोटे की शादी के लिये इतना जोर पडा कि लोगों को लगा कि दोनों भाई अब साथ ही चौक पर बैठेंगे (विवाह करेंगे)।
 
     एक बहुत ही आतुर तिलकहरू सज्जन छछलोल राय को देखने आए। साक्षात्कार में संक्षिप्त प्रश्नोत्तर हुआ।
बबुआ, कुछ पढे लिखे हो ?

हाँ, कई दर्जा पास हैं।

तो जो बोलता हूं उसे लिखो तो।

मगर, पहले लिखवाई का नेग हाथ पर रख दो।

बिना लिखवाई लिये नहीं लिखोगे ?

नहीं।

     इसके बाद लिख लौढा, पढ पत्थर कह वह तिलकहरू हंस दिया। इस पर छछलोल राय पैजामें से बाहर हो गये। नाराज ओराज हुए। तिलकहरू चले गये तो छछलोल राय पर खूब मार पडी। महीनों भाग कर अपनी नानी के यहां रहे।

       इधर छछलोल राय के बालों को न  जाने क्या हो गया कि बेतहाशा सनकुट होने लगे। खिजाब वगैरह फेल होने लगा तो उसे छिपाने के लिये अब वे पहलवान हो गये। हर तीसरे दिन सिर मुँडवा देते हैं। अखाडे की धूल मिट्टी समस्त शरीर के साथ सिर की भी शोभा बढाती है। एक  काला धागा गले में बाँध लिये हैं। किसी दूसरे के यहाँ भी तिलकहरू आते हैं तो दौड-दौड कर चिलम भरते हैं और हुक्के में पानी बराबर बदलते रहते हैं।
  
     इस बार फिर से छछलोल राय की तिलक की तैयारी हुई। छछलोल राय चौके पर बैठे।बैंगनी रंग  का छींट वाला मुरैठा उनके सिर पर बाँध दिया गया। सिल्क का कुरता खूब जम रहा था। बहुत लजाते लजाते छछलोल राय ने अपने छोटे भाई विमल से शाम को ही धूप वाला चश्मा मांग लिया  था। मगर, उन्हें आँखों पर लगाने का  मौका नहीं मिला। उन्हें डर था कि तिलकहरू लोगों के चौके पर आकर बैठने से पूर्व यदि वे उसे लगायेंगे तो संभव है लोग डांट कर उतरवा दें। इसीलिये अभी तक वह पाकिट में पडा था। आज वह बहुत गंभीर बने थे। ओठों को बढा बढा कर बराबर दांतो को छिपा रहे थे।

          मण्डप में तिलकहरू लोग आ गये। मंगलम भगवान विष्णु गरूडध्वज: आदि मंत्र गूँज उठे। स्त्रियों ने मंगल  गीत गाना शुरू किया।  इस बीच छछलोल राय की आँखों पर कब काला चश्मा चढ गया, यह किसी ने नहीं देखा। शरीर के काले रंग को चश्मे की कालिमा ने और चोखा कर दिया।  अब उनकी आँखों का उल्लास तो ढक गया परन्तु दांतो का विज्ञापन सा होने लगा।

          जिस समय तिलक चढाने की क्रिया सम्पादित होने की बात आई उस समय सब लोग बहुत उत्सुक थे।  स्वंय छछलोल राय बहुत आल्हादित नजर आने लगे। उनके बडे बडे हाथ की बडी बडी उंगलियों ने कमाल किया। उनकी खुली अँजली ऐसी लग रही थी जैसे मोटे मोटे काले बेंत से बुनी हुई खाँची है। सो अब इस खाँची में भरा जाने लगा चावल, चन्दन, पान, सुपारी, गुड, फल, आदि- आदि। बर्तन और वस्त्र की बारी आई तो एक कांड हो गया।
  
      जहां पर मंगल कलश रखा था उसके उधर से एक चींटा गुड की गंध पाकर टहलता घूमता चला। जब वह गोबर के बने गौरी-गनेश तक आया तो छछलोल राय की आँखों से उसकी भिडन्त हुई। वह चींटा गौरी-गनेश के शिखर पर चढ गया और वहां से उतर कर इस ओर चला मानो कोई चीनी सैनिक उधर से आकर हिमालय पार कर इस ओर बढा आ रहा हो। इधर छछलोल राय की अँजलि में मंगल दृव्य भरा जा रहा था और उधर छछलोल राय की निगाह बराबर चींटे पर बनी हुई थी। चींटा आगे बढा और ठीक छछलोल राय के पैर के अँगूठे को निशान बना कर आगे बढा। वह इधर उधर भी   मुडता था लेकिन फिर अँगूठे की तरफ  ही आता रहा।
    
        छछलोल राय का सारा ध्यान चींटे पर केंन्द्रित हो गया। इधर मंगल गान, उधर मंत्रोच्चारण, उधर दृव्यदान और सैंकडो दर्शक। अगर यह चींटा काट लेगा तो क्या होगा। छछलोल राय की तो जान सांसत में पड गई। चींटा एकदम सरकता हुआ मस्ती में चुपचाप पैर के पास आ गया। छछलोल राय हडबडा कर खडे हो गये। खडे ही नहीं हो गये, दो कदम पीछे भी हट गये।
 
      भारी हडबडी मच गई। क्या है ? क्या है ?  गान बंद, मंत्र उच्चारण बन्द,    सब लोग हैरान हो गये। इधर घबराये छछलोल राय ने बडी कठिनाई से हाथ के ईशारे से बताया तो सब ने जाना कि इस नाचीज चींटे के कारण इतनी गडबडी हुई।
 
  जब सब शांत हो गया और फिर से तिलक की क्रिया आरंभ हुई  । ………… बर्तन भण्डा चढ गया तो स्त्रियों ने एक और गीत रस्मी तौर पर उठाया जिसमें इस बात की शिकायत जाहीर की गई कि सब बर्तन छोटे – छोटे चढा दिये गये। समधी को वादा न पूरा करने वाली रस्मी गाली दी गई। गीत सुनकर छछलोल राय के कान खडे हो गये। क्या सचमुच बर्तन छोटे छोटे चढा दिये गये हैं। तमाम गाँव भर की स्त्रियां यही गा रही हैं। उसे लगा कि उसकी बडी बेईज्जती हो रही है।

  तभी औरतों ने और एक नया गीत गाया  -

  ई मति जनिहो समधी
आंगन ई छोट बाडे
आंगन का मालिक बाबू दयाल राम,
तीलक लीहें नव लाख जी।
 
     उस समय रूपया चढाने की बात हो रही थी। छछलोल राय औरतों  का गीत सुनकर बहुत खुश हुए। सोचा कि अच्छे मौके पर औरतों ने चेता दिया है लडकीवालो को। कहीं कम न चढा दें।
 
   लडकी वालों की ओर से नोटों का एक बंडल निकाला गया। तिलक विलक जो चढा सो चढा, असल में अब तक छछलोल राय का विवाह नहीं हो पा रहा था सो कम चढे या ज्यादा..उठनी बाजार का सौदा था।   कुछ तू भी समझ कुछ मै भी वाला हिसाब था।  फिर छछलोल राय पार लग रहे थे, यही क्या कम था। सो रूपये कितने चढे इस पर किसी ने ध्यान नहीं दिया।
 
    वह बंडल सामने बैठे लडकी के भाई ने हाथ में लेकर मंगलकलश और गौरी जी को छुलाने के बाद छछलोल राय जी के हाथ पर रख दिया। इधर महिला मंडली की ओर से इस अवसर पर गाया जाने वाला विख्यात गीत शुरू हो गया।

मोर बाबू पढे अंगरेजी,
तिलक काहे थोर जी।

   अर्थात, हमारा लडका अंगरेजी पढता है। इसका तिलक कम क्यों चढाया गया।

        इतना सुनना था कि छछलोल राय भडक उठे। तिलक चढाने की चोट कम परन्तु  अंगरेजी की पढाई की बात उन्हें बहुत खटकी। औरतें झूठ मूठ उनका नाम बढा रही हैं कि वे अंगरेजी पढते हैं, परन्तु , क्या जरूरी है कि जो अंग्रेजी पढेगा उसी को ज्यादा तिलक मिलेगा। अंग्रेजी में ही सुर्खाब का पर लगा है। मैं अंग्रेजी नहीं पढता हूँ तो क्या कोई मेरी ईज्जत बोर (डुबो) देगा। अंग्रेजी में पढाई नहीं है तो क्या हमारे पास खेत, बारी, बैल बछिया और गाय-भैंस नहीं हैं ?  अंग्रेजी वालों से किस बात में कम हैं हम। गिटपिट बोलने नहीं आता है इसलिये हमारा तिलक कम हो जायगा। यह हर्गिज नहीं हो सकेगा।
  
          एक बार फिर रूपया फेंकते हुए छछलोल राय भडक कर खडे हो गये। फिर हडबडी मच गयी। पीछे ही खडे थे छछलोल राय के बाप दयाल । दाँत पीस कर टूट पडे। थप्पडों घूसों की बौछार के बीच लोगों के घेरते-घेरते भी यह कहते छछलोल राय भाग निकले कि बाप रे बाप, यह नहीं जानता था कि तिलक पर आखिर में लात-मूका भी चढता है।

 - विवेकी राय



(   हाल ही में खबर  आई कि एक दूल्हे का विवाह इसलिये रूक गया क्योंकि वह भी बारातियों के साथ नाचने लगा था। यह खबर सुन मुझे विवेकी राय जी के लेख छछलोल राय का तिलकोत्सव की याद हो आई। इसलिये यह लेख विवेकी राय जी की किताब नई कोयल से साभार प्रस्तुत कर  रहा हूँ जिसमें कि दूल्हे पर जमकर कटाक्ष किया गया है जो कि अक्सर अपने को श्रेष्ट और लडकी वालों को हीन समझने की पिनक में रहते हैं।
- सतीश पंचम)

16 comments:

काजल कुमार Kajal Kumar said...

बहुत सुंदर संदर्भ. धन्यवाद.

arun prakash said...

तिलक का प्रसन्ग व उसका सजीव कमेन्ट्री पढ कर आनन्द आ गया आज की पीढी इन लोक मन्गल गीतो को ना तो सुन पाते है और न गुन पाते है
आभार एक अच्छी रचना के लिये

पं.डी.के.शर्मा"वत्स" said...

वाकई विवेक राय जी की इस रचना को पढकर आनन्द आ गया..बहुत ही बढिया!!
धन्यवाद्!

ज्ञानदत्त पाण्डेय Gyandutt Pandey said...

हमको तो तिलक मिला न था! पर छछलोल राय को न मिला, उसका बहुत अफसोस है!

क्या तायें, गांव का तिलक, बिआह आदि देखने का मन हो रहा है। आज गंगा किनारे चौथी छुड़ाते जाते देखा मेहरारुओं को!

सतीश पंचम said...

ज्ञान जी,

एक बार आप गाँव का शादी बियाह देख ही आईये। एक से एक नमूनेबाज मिलेंगे। और गाँव में ही क्यों शहरों में भी उसकी झलक मिल जाती है। कोई दिन भर में दौड दौड कर अपना खत ही बार बार छोलवा रहा है तो कोई इत्र ढूँढता फिरता है कि ऐसा वाला लगाउं कि बस जहां खडा हो जाउं आस पास पूछनिहार आ जांय कि बताओ कौन इतर लगाये हो :)

गाँव की तिलक बरच्छा आदि की बातें तो वैसे भी निरालेपन की चाशनी में तर रहती हैं :)

डॉ. मनोज मिश्र said...

बहुतय सुंदर वर्णन ...

राज भाटिय़ा said...

विवेक राय जी सुंदर रचना पढवाने के लिये धन्यवाद

कार्तिकेय मिश्र (Kartikeya Mishra) said...

आहा... आनंदम आनंदम

कथा सुनकर बरबस मधुबन पाठक याद आ गये.. पूरब के गाँवों के विख्यात चरित्र.. जबर बियाहकटवा हुआ करते थे..

वइसे हमने एक अवधिया प्ले में यही लोकगीत कुछ ऐसे सुना था- "मोर बाबू पढ़े रंगरेजी, बरच्छा काहे थोड़ चढ़े"

सतीश पंचम said...

कार्तिकेय जी,

ये बियाहकटवा का मतलब क्या होता है ? थोडी सी शब्द जानकारी अपने ज्ञानवर्धन के लिये चाहूंगा :)

अनूप शुक्ल said...

मजेदार! जय हो। बियाहकटवा मेरी समझ में उन लोगों के लिये कहा जाता है जो होती शादी हुसका/टलवा देते हैं।

कार्तिकेय मिश्र (Kartikeya Mishra) said...

एकदम सही अनूप चचा.. बियाहकटवा हर गाँव जवार की एक अनिवार्य हस्ती हुआ करे है..

कुछ महापुरुष, जैसे एक मधुबन पाठक हुए थे, जिनका येन केन प्रकारेण विवाह नामक संस्था से भरोसा उठ चुका होता है..बियाहकटवा कहलाते हैं

इनमें से अधिकतर हस्तियां या तो स्वयं बिन मांगे ब्रह्मचारी होते आये हैं, या तो भार्या-पीड़ित.. इन वजहों से दुःखित होकर ये लोग हर देश-काल में तय हो रहे विवाह तोड़कर जनसंख्या घटाने जैसे लोकमंगल के कार्यों में व्यस्त रहते आये हैं। ऐसे ही लोगों के बारे में भोजपुरी में कहावत प्रसिद्ध है-

बरदेखुआ दँवरी नाध दिहें, थारा परात घर-घर जाई/ बाकिर इन बियाहकटवन के मारे का शादी बियाह होखे पाई

पुरबिया बाभन लोगों में तो ज्यादातर यह पुण्यकर्म अपनी पट्टीदारी/बिरादरी के किसी मुँहफुलाये सज्जन के हाथों सम्पन्न होता आया है..

सतीश पंचम said...

अनूपजी और कार्तिकेय जी, आप दोनों ने ही बढ़िया जानकारी बांटी . धन्यवाद . इस जानकारी के बाद तो
मेरे हिसाब से कुछ घरों मे महिलाएं भी बियाह कटवा होती हैं, जो नहीं चाहती की उनके मायके की कोई लड़की इस वर्तमान गाँव यानी उनकी ससुराल मे किसी के यहाँ बियाही जाए. इसमें उनकी हेठी इस बात मे होती है की कल को कोई झगरा रगरा हो तो उघटा पुराण (secret openings) होने पर सेफ साईड बना रहे :)

मनोज कुमार said...

मज़ेदार!

हिमांशु । Himanshu said...

विवेकी राय जी की इस बेहतरीन कहानी का आभार ।

Vivek Rastogi said...

विवेक राय जी को बहुत दिनों बाद वापस पढ़वाने के लिये शुक्रिया।

Satish Chandra Satyarthi said...

हाहाहा.. मजा आ गया.. :)

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